पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय 4, भाग 3
श्लोक 26–35 : अर्थ एवं भावपूर्ण व्याख्या सहित
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय 4, भाग 3: जब हम पुराणों के पन्नों को खोलते हैं, तो वहाँ केवल कथाएँ नहीं होतीं, बल्कि युगों की चेतना, दिव्यता और जीवन का गूढ़ रहस्य छिपा होता है और उन्हीं दिव्य ग्रंथों में एक है — पद्म महापुराण, जिसका प्रत्येक श्लोक, प्रत्येक प्रसंग हमें धर्म, भक्ति और जीवन के सत्य से परिचित कराता है।
प्रिय पाठकों, आज हम प्रवेश कर रहे हैं उत्तरखण्ड के अध्याय 4 के भाग 3 में, जहाँ एक अद्भुत, अलौकिक और रहस्यमयी दृश्य हमारे सामने प्रकट होता है।
यह कथा है जालंधर की नगरी की है। एक ऐसी नगरी। जहाँ सौंदर्य केवल देखा नहीं जाता, बल्कि अनुभव किया जाता है, जहाँ चित्र भी जीवंत हो उठते हैं, जहाँ धूप की रेखाएँ आकाश को गंगा-यमुना बना देती हैं, जहाँ भवनों का प्रकाश, इन्द्रधनुष से भी अधिक आकर्षक प्रतीत होता है।
“क्या आपने कभी सोचा है कि एक असुर की नगरी इतनी दिव्य कैसे हो सकती है?”
यही इस कथा का रहस्य है…
यह केवल एक नगर का वर्णन नहीं, बल्कि यह उस स्थिति का चित्रण है, जहाँ भौतिक वैभव अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है और जब वैभव चरम पर होता है तो उसके भीतर कहीं न कहीं अहंकार का बीज भी अंकुरित होने लगता है।
आज हम एक-एक श्लोक के माध्यम से उस दिव्य नगरी के वैभव, उसकी कला, उसकी शक्ति और उसके पीछे छिपे गूढ़ संदेश को समझेंगे।
तो आइए, श्रद्धा और भक्ति के साथ इस दिव्य यात्रा का आरम्भ करें और इस खण्ड में जालंधर की दिव्य नगरी की भव्यता, उसके ऐश्वर्य और शक्ति का वर्णन किया गया है। यह वर्णन न केवल काव्यमयी भाषा में है, बल्कि उसमें छिपा आध्यात्मिक संकेत भी गहराई से झलकता है। आइये एक-एक श्लोक को समझते हैं।
“जय श्री हरि…”
संयाति द्विगुणं नूनं निजकान्तारतोद्यमम्॥
भावार्थ: यह उस नगर की कला-संस्कृति का वर्णन है, जहाँ भावनाओं की अभिव्यक्ति इतनी सजीव थी कि दर्शक उसमें डूब जाते।
नभो बभूव तद्गङ्गाकालिन्दीसङ्गमोपमम् ॥
व्याख्या: यह अलंकारिक वर्णन उस दिव्यता का है जो जालंधर की नगरी में व्याप्त थी, मानो हर दृश्य स्वयं तीर्थ बन गया हो।
विभातीन्द्रायुधाकीर्णः शरन्मेघ इवोन्नतः ॥
भावार्थ: जालंधर की नगरी केवल भौतिक समृद्धि की नहीं, बल्कि प्रकाश और सौंदर्य की पराकाष्ठा थी।
विश्रामं यान्ति मध्याह्ने प्रासादशिरसि स्थिताः ॥
व्याख्या: यह नगर की विशालता और उसकी भव्यता का बिम्ब है — जहाँ सूर्य भी थम जाए।
रात्रौ सम्भूतनक्षत्रा इव रेजुर्वराङ्गनाः ॥
चकार सुन्दरीशब्दः स्फुटं मेरुभुवो भुवम् ॥
तत्राभिषेकमकरोद्वादित्रैर्निजगर्जितैः ॥
ताभिश्चित्रविरिञ्चिवक्त्रसरसीहंसीभिराशास्महे ।
वाणीभिर्वसुधाविवाहसमये मन्त्रोत्सवैर्मङ्गलम् ॥
जालन्धराय पुत्राय ददौ भीमं महोदधिः ॥
मृतसञ्जीवनीं नाम्नां मायां रुद्रविमोहिनीम् ॥
Source: पद्म पुराण
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