Current image: पद्म महापुराण उत्तरखण्ड - अध्याय 4, भाग 2; जालंधर की दिव्य नगरी का भव्य दृश्य, जिसमें रत्नों से बने महल, स्वर्ण द्वार, चमकती प्राचीरें और दिव्य प्रकाश से आलोकित आकाश दर्शाया गया है।

 

पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय 4, भाग 2

जालंधर की दिव्य नगरी की रचना


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🙏

जब सृष्टि के संतुलन को कोई चुनौती देता है…जब एक शक्ति अपने अस्तित्व से ही त्रिलोक त्रिलोक को चुनौती देती है, तब देवता भी चकित हो जाते हैं और सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी भी मौन हो जाते हैं।

आज हम प्रवेश कर रहे हैं एक ऐसी अद्भुत कथा में, जहाँ जन्म लेता है एक ऐसा योद्धा, जिसकी गूंज केवल पृथ्वी पर नहीं, बल्कि स्वर्ग और पाताल तक सुनाई देती है।

यह कथा है — समुद्रपुत्र जालंधर की। एक ऐसा बालक, जो जन्म लेते ही देवताओं को चुनौती देता है और जिसे स्वयं ब्रह्मा से यह वरदान प्राप्त होता है कि कोई भी देवता उसे पराजित नहीं कर सकता।

“क्या आपने कभी सोचा है कि जब शक्ति को दिव्यता का साथ मिल जाए, तो वह कैसी सृष्टि रचती है?” आज का यह भाग हमें उसी सृष्टि की ओर ले जाएगा। एक ऐसी नगरी, जो केवल ईंट और पत्थरों से नहीं बनी, बल्कि रत्नों, प्रकाश और दिव्यता से गढ़ी गई।

जहाँ समुद्र स्वयं भूमि प्रकट करता है, जहाँ मय दानव जैसे दिव्य शिल्पी एक स्वर्ग से भी अधिक भव्य नगर का निर्माण करते हैं।

यह है जालंधरपुरी। एक ऐसी नगरी, जहाँ भवनों की चमक से पक्षी भ्रमित हो जाते हैं, जहाँ स्वर्ण की दीवारें अग्नि जैसी प्रतीत होती हैं और जहाँ सौंदर्य इतना प्रबल है कि मन स्वयं उसमें खो जाए, लेकिन हर भव्यता के पीछे एक रहस्य छिपा होता है। क्या यह नगरी केवल सौंदर्य और ऐश्वर्य का प्रतीक है? या फिर यह किसी आने वाले तूफान की प्रस्तावना है?

आइए… श्रद्धा, भक्ति और जिज्ञासा के साथ इस दिव्य कथा के श्लोक 12 से 25 तक के गूढ़ रहस्य को समझें।

“जय श्री हरि”

जिस क्षण समुद्र के पुत्र जालंधर ने त्रिलोक को अपनी शक्ति से हिला दिया, उस क्षण ब्रह्मा भी दंग रह गए। उन्होंने उसे वह अद्वितीय वरदान दिया — देवताओं से अजेय होने का वरदान।

पिछले भाग में हमने देखा कि किस प्रकार वह अलौकिक बालक जन्म लेते ही त्रैलोक्य में विस्मय फैलाता है, और ब्रह्मा स्वयं उसे देवों से अवध्य घोषित करते हैं। यही बालक अब एक नई यात्रा की ओर अग्रसर हैएक राज्य की स्थापना की ओर।

इस भाग में पढ़िए:

आइए, अब प्रवेश करें इस भव्य अध्याय पद्म पुराण उत्तरखण्ड के अगले खंड में – श्लोक 12 से 15 तक की अनुपम कथा में।

तदा दैत्यकुलाचार्यः प्राह तं सागरं कविः ।
किं तेन जातु जातेन मातुर्यौवनहारिणा ॥१२॥

Tadaa daitya-kulaachaaryah praaha tam saagaram kavih।
Kim tena jaatu jaatena maatur-yauvana-haarinaa॥12॥

अर्थ: तब दैत्यकुल के गुरु और महाज्ञानी शुक्राचार्य ने समुद्र से कहा — “ऐसा पुत्र जन्म लेकर भी क्या लाभ देगा, यदि वह अपनी माता के यौवन को ही हर ले?”

व्याख्या: यहाँ शुक्राचार्य का संकेत उस शक्ति की ओर है जो केवल विनाश या आत्मकेंद्रित उद्देश्य के लिए प्रयुक्त हो। यदि वह पुत्र केवल अपनी माता के तेज को नष्ट कर दे, और आगे वंश का नाम ऊँचा न करे — तो उसका जन्म व्यर्थ है। यह एक दार्शनिक दृष्टिकोण भी है — शक्ति तभी सार्थक है जब वह सृजन में लगे।

प्ररोहति न यः स्वस्य वंशस्याग्रे ध्वजो यथा ।
तवात्मजो विक्रमेण त्रैलोक्यं भोक्ष्यति ध्रुवम् ॥१३॥

Prarohati na yah svasya vamshasya agre dhvajo yathaa।
Tavaatmajo vikramena trailokyam bhokshyati dhruvam॥13॥

अर्थ: जो वंशज अपने वंश के लिए गौरव का कारण न बने, वह उस ध्वज के समान है जो कभी लहराता नहीं। तेरा पुत्र निश्चित ही अपने पराक्रम से त्रिलोक को भोगेगा।

व्याख्या: शुक्राचार्य जालंधर की महानता की भविष्यवाणी करते हैं। वह न केवल समुद्रपुत्र है, बल्कि एक ऐसा योद्धा है जो त्रैलोक्य के सिंहासन को चुनौती देगा।

जम्बूद्वीपे महापीठं योगिनीगणसेवितम्।
आप्लावितं त्वयेदानीं मुञ्च जालन्धरालयम् ॥१४॥

Jambudweepe mahaapeetham yogini-gana-sevitam।
Aaplaavitam tvayedaanim munch Jaalandharaalayam॥14॥

अर्थ: जम्बूद्वीप में एक महान स्थान है, जिसे योगिनी-गण सेवा करते हैं। तू अभी उस पवित्र भूमि को जल से ढाँक रहा है — उसे छोड़ दे, और वहीं अपने पुत्र जालंधर का निवास बनाओ।

व्याख्या: यह स्थल कोई सामान्य स्थान नहीं — यह शक्ति की तपस्थली है। जालंधर जैसे योद्धा के लिए वही उपयुक्त भूमि है, जो सिद्धभूमि रही है।

तत्र राज्यं प्रयच्छास्मै तनयाय महार्णव !
अजयश्चाप्यवध्यश्च तत्रस्थोऽयं भविष्यति ॥१५॥

Tatra raajyam prayachchhaasmai tanayaaya mahaarnava!
Ajayashchaapyavadhyashcha tatrastho’yam bhavishyati॥15॥

अर्थ: हे महार्णव! अपने पुत्र को उसी भूमि पर राज्य दो। वहाँ रहते हुए वह न तो पराजित होगा और न ही मारा जा सकेगा।

व्याख्या: शुक्राचार्य यहाँ दिव्य भूमि और जालंधर के बीच एक रहस्यमय संबंध बना रहे हैं। वह भूमि उसे अजेयता प्रदान करेगी — ठीक जैसे तीर्थभूमियाँ साधकों को सिद्धि देती हैं।

एवमुक्तोऽर्णवः प्रीत्या भार्गवेणाथ लीलया ।
अपासर्पत्सुतप्रीत्यै जले स्थलमदर्शयत् ॥१६॥

Evamukto’rnavah preetyaa bhaargavenatha leelayaa।
Apaasarpatsuta-preetyai jale sthalamadarshayat॥16॥

अर्थ: शुक्राचार्य के वचन सुनकर समुद्र अत्यंत प्रसन्न हुआ। पुत्र की प्रीति में वह खेल-खेल में जल को हटाकर वह स्थल प्रकट कर देता है।

व्याख्या: यह दृश्य कल्पनातीत है — जल की लहरें पीछे हटती हैं, और उनके नीचे से प्रकट होता है एक दिव्य भूखंड। प्रकृति स्वयं झुकती है एक योद्धा की महत्ता के सामने।

शतयोजनविस्तीर्णमायतं च शतत्रयम् ।
देशं जालन्धरं पुण्यं तस्य नाम्नैव विश्रुतम् ॥१७॥

Shata-yojana-vistirnam aayatam cha shata-trayam।
Desham Jaalandharam punyam tasya naamnaiva vishrutam॥17॥

अर्थ:वह स्थान सौ योजन चौड़ा और तीन सौ योजन लंबा था। वह पुण्यभूमि जालंधर के नाम से प्रसिद्ध हुई।

व्याख्या: यह कोई साधारण राज्य नहीं था — इसका हर अंश दिव्यता और शक्ति से ओतप्रोत था। यह वही “जालंधरपुरी” है, जो बाद में देवताओं की सत्ता को चुनौती देने वाला केंद्र बनती है।

दैत्यवर्य समाहूय मयं प्रोवाच सागरः ।
पुर जालन्धरे पाठं कुरू जालन्धराय वै ॥१८॥

Daitya-varya samaahuya mayam prowaacha saagarah।
Pura Jaalandhare paatham kuru Jaalandharaaya vai॥18॥

अर्थ:समुद्र ने तब दानवों में श्रेष्ठ मय दानव को बुलाकर कहा, “इस जालंधरपुरी का निर्माण करो, जालंधर के लिए।”

व्याख्या: मय दानव — विश्वकर्मा के समान दानवों के महान शिल्पी। अब एक दिव्य नगरी की रचना प्रारंभ होती है — जो केवल शिल्प ही नहीं, शक्ति का प्रतीक भी बनेगी।

अम्भोधिनैव मुक्तस्तु चक्ने रत्नमयं पुरम् ।
प्राकारगोपुरद्वारं सोपानगृहभूमिकम् ॥१९॥

Ambhodhinaiva muktastu chakne ratnamayam puram।
Praakaara-gopura-dwaaram sopaana-griha-bhoomikam॥19॥

अर्थ: मय दानव ने समुद्र द्वारा दी गई भूमि पर रत्नों से बना हुआ एक भव्य नगर बनाया — जिसमें प्राचीरें, गोपुर (मुख्य द्वार), सीढ़ियाँ और गृहभूमियाँ थीं।

व्याख्या: रत्नों से बना नगर! यह केवल भौतिक समृद्धि का प्रतीक नहीं, बल्कि एक ऐसा केंद्र बनने जा रहा है, जहाँ से विश्व सत्ता को चुनौती दी जाएगी।

यत्रेन्द्रनीलसम्बद्धप्रासादतलसंस्थिताः ।
मेनिरे जलदोधोगंताण्डवस्थाः शिखण्डिनः ॥२०॥

Yatrendranila-sambaddha praasaada-tala-samsthitaah।
Menire jaladodhogam taandava-sthaah shikhandinah॥20॥

अर्थ:इन्द्रनील मणियों से बने भवनों में खड़े होकर मोर समझते थे कि बादलों के नीचे नृत्य कर रहे हैं।

व्याख्या: नगर इतना भव्य था कि वहाँ के प्रतिबिंब और चमक ने पक्षियों तक को भ्रम में डाल दिया। यह सौंदर्य की पराकाष्ठा है।

यत्र प्रवालमाणिक्यभवनोत्था मरीचयः ।
सेव्यन्ते शकुनैश्च तरुचिराङ्कुरशङ्कया ॥२१॥

Yatra pravaala-maanikya-bhavanotthaa mareechayah।
Sevyante shakunaishcha taru-chiraankura-shankayaa॥21॥

अर्थ: प्रवाल और माणिक्य से बने भवनों से निकलती किरणों को पक्षी पेड़ों की नई कोपलें समझकर उन्हें खाने आते।

व्याख्या: यह दृश्य एक कवि की कल्पना को भी पार करता है, नगरी की प्रभा से पक्षी तक धोखा खा जाएं, यह दृश्य दिव्य सौंदर्य का सर्वोच्च वर्णन है।

यत्र काञ्चनहर्येषु त्विषोवह्निषु कातराः ।
विलोक्य प्रपलायन्तु दावशङ्काः शिखण्डिनः ॥२२॥

Yatra kaanchana-haryeshu tvisho’vahnisu kaataraah।
Vilokya prapalaayantu daava-shankaa shikhandinah॥22॥

अर्थ:जहाँ सोने की दीवारें इतनी चमकदार थीं कि मोर उन्हें आग समझकर डर कर भाग जाते।

व्याख्या: शिल्पकला और प्रकृति का अद्वितीय समागम — जहाँ सौंदर्य भय का कारण बन जाता है।

यत्र स्फटिकशालोत्थप्रभासं मिश्रिता दिशः ।
विभान्ति मन्दरोद्भान्ताः सफेनार्णवसन्निभाः ॥२३॥

Yatra sphatika-shaalottha prabhaasam mishritaa dishah।
Vibhaanti mandarodbhantaah sa-phenaarṇava-sannibhaah॥23॥

अर्थ: जहाँ स्फटिक से बनी शालाओं की चमक दिशाओं को मंदार पर्वत के समान प्रकाशित करती थी, और वह झागयुक्त समुद्र के समान प्रतीत होती थीं।

व्याख्या: इस श्लोक में जालंधरपुरी को मंदार और समुद्र की भव्यता से तुलना कर उसकी महिमा का वर्णन किया गया है।

यत्रमोहं स्वहम्र्येषुविभातालोकसंस्थिताः ।
चक्रिरे ललनाः पूर्ण सान्ध्यचन्द्रोपमाननाः ॥२४॥

Yatra moham sva-harmyeshu vibhaata-aloka-samsthitaah।
Chakrire lalanaah poorna saandhya-chandropamaananaah॥24॥

अर्थ: जहाँ स्त्रियाँ सन्ध्या के चन्द्रमा के समान मुखवाली थीं, और अपने रूप से मोह का संचार कर रही थीं।

व्याख्या: नगर की स्त्रियाँ भी उतनी ही दिव्य थीं — उनका सौंदर्य वातावरण में मोह और आकर्षण फैलाता था।

यत्रेन्द्रनीपकादम्बपवनोद्यानमोदिताः ।
चित्तं विशन्त्यो नारीणां चक्रिरे मोहनज्वरम् ॥२५॥

Yatrendra-neepa-kaadamba-pavana-udyaana-moditaah।
Chittam vishantyo naareenaam chakrire mohana-jvaram॥25॥

अर्थ: जहाँ इन्द्रनील, कदंब और पवन के उद्यानों में विचरती नारियाँ, पुरुषों के चित्त में आकर्षण और मोह का ज्वर उत्पन्न करती थीं।

व्याख्या: जालंधरपुरी का हर तत्व — भवन, प्रकृति, स्त्रियाँ — सब मिलकर एक स्वर्गीय नगरी की अनुभूति देते हैं। यह कोई साधारण नगर नहीं, यह भविष्य की चुनौती का गढ़ है।

जब जालंधर के लिए समुद्र ने दिव्य पुर का निर्माण किया – रत्नों से जगमगाता, इन्द्रनील और प्रवाल से सुसज्जित, और स्वर्ग से भी अधिक मोहक – तब यह स्पष्ट हो गया कि कोई असामान्य घटना घटने वाली है। दैत्यगुरु शुक्राचार्य जानते थे – यह बालक केवल समुद्र का पुत्र नहीं, वरन् देवताओं की शक्ति को चुनौती देने वाला होगा।

“तो प्रिय पाठकों …” आपने जाना कि कैसे समुद्र ने अपने पुत्र के लिए एक अद्भुत, अलौकिक और दिव्य नगरी की रचना की। एक ऐसी नगरी, जो रत्नों से जगमगाती थी, जिसकी चमक से दिशाएँ आलोकित थीं और जिसका वैभव स्वर्ग से भी अधिक मोहक था।

जहाँ हर दृश्य…एक कविता था…जहाँ हर निर्माण…एक चमत्कार था लेकिन सनातन धर्म की एक गहरी सीख यहाँ छिपी है। जहाँ अत्यधिक ऐश्वर्य होता है वहाँ परीक्षा भी उतनी ही बड़ी होती है।

जालंधरपुरी केवल एक नगर नहीं थी, वह एक शक्ति का केंद्र थी एक ऐसा केंद्र जो आने वाले समय में देवताओं की सत्ता को चुनौती देने वाला था। शुक्राचार्य की दूरदृष्टि, मय दानव की शिल्पकला और समुद्र का पुत्रप्रेम। इन सबने मिलकर एक ऐसी भूमिका तैयार की, जिससे इतिहास की दिशा बदलने वाली थी।

“लेकिन प्रश्न अभी भी शेष है…” क्या यह दिव्यता, यह वैभव… जालंधर को धर्म के मार्ग पर ले जाएगा? या फिर यही ऐश्वर्य… उसके अहंकार को जन्म देगा… और एक महायुद्ध का कारण बनेगा?

“जीवन में भी ऐसा ही होता है…” जब हमें शक्ति, सफलता और वैभव मिलता है, तो वह केवल आनंद के लिए नहीं बल्कि एक परीक्षा के रूप में आता है। यदि हम उसे संयम और भक्ति से साध लें तो वही वैभव हमें महान बना देता है और यदि उसमें अहंकार आ जाए तो वही हमें पतन की ओर ले जाता है।

“इसी गूढ़ संदेश के साथ हम इस दिव्य कथा के इस भाग को यहीं विराम देते हैं।

अगले भाग में हम जानेंगे — कैसे इस जालंधरपुरी में शक्ति की लहर उठती है और प्रारंभ होती है देवासुर संग्राम की भूमिका। तब तक हरि नाम का स्मरण करते रहिए और भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ते रहिए।

“जय श्री हरि… जय श्री पद्म महापुराण…” 🌺

Source: पद्म पुराण

📿 “पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय 4, भाग 2” लेख केवल आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी भारत के विभिन्न सनातन, वैदिक, और पौराणिक ग्रंथों के स्रोतों पर आधारित है तथा किसी भी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।

📜”पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय 4, भाग 2″ लेख में प्रस्तुत श्लोक पारंपरिक ग्रंथों में उपलब्ध मूल स्वरूप पर आधारित हैं। इनमें कोई जानबूझकर परिवर्तन नहीं किया गया है।

🖼️ “पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय 4, भाग 2” लेख में प्रयुक्त चित्र AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) द्वारा निर्मित हैं और केवल भावात्मक प्रस्तुति के उद्देश्य से उपयोग किए गए हैं।


✍️ लेखक: Arvind Kumar Singh
Cosmic Harmony

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