
पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय-3 Part-1
भाग 1: नारद और युधिष्ठिर का संवाद (श्लोक 1–11)
🌸 जब धर्मराज युधिष्ठिर अपने वनवास के कठिन समय में, दुःख की गहराइयों में डूबे थे — तब एक ज्योतिर्मय क्षण आया। नारद मुनि, ज्ञान और श्रद्धा के प्रतीक, उनके समक्ष उपस्थित हुए। वही क्षण बन गया एक दिव्य कथा का प्रारंभ, जो न केवल देवासुर संग्राम की है, बल्कि आत्मा के भीतर उठते धर्म और अधर्म के द्वंद्व की भी है। आइए, इस गूढ़ कथा की शुरुआत पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय-3 Part-1 में करें।
पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय-3 Part-1 हम 11 श्लोक में कथा को हिंदी अर्थ और व्याख्या
श्लोक 1:सूत उवाच
एकदा नारदोद्रष्टुं पांडवदुःखकर्षितां ।
यौ काम्यावनविप्रः सतकृत्यथाविदी ॥
अथ नत्वा मुनिश्रेष्ठम् युधिष्ठिर उवाच ह ॥
भगवानकर्मणा केन दुःखब्धौ पतित वयम् ॥
सूत उवाच
तमुवाच ऋषिर्दुःखं त्यजत्वं पाण्डुनन्दन ।
सुखदुःखसमाहारे संसारे कः सुखी नरः ॥
ईश्वरोऽपि हि न स्थायी पीड्यते देहसञ्चयैः ।
न दुःखरहितः कश्चिद्देही दुःखसहो यतः ॥
शरीरं सवितुर्यस्माद्राहुस्तद्मसते बली ।
राहोरपि शिरश्छिन्नं शौरिणाऽ मृतभोजने ॥
सोऽपि शाङ्गधरो देव क्षिप्तः सागरगह्वरे ।
जालन्धरेण वीरेण निहतः सोऽपि शम्भुना ॥
युधिष्ठिर उवाच
कौऽसौ जालन्धरोवीरः कस्यपुत्रः कुतो बली ।
कथं जालन्धरं सङ्ख्य हतवान्वृषभध्वजः ॥
एतत्सर्वं समाचक्ष्व विस्तरेण तपोधन !
अनुवाद: हे तपस्वी! कृपया यह सब विस्तार से कहिए। जिज्ञासा की लहर अब कहानी को गहराई में ले जाती है — दिव्य संवाद अब कथा-वृत्तांत में परिवर्तित होता है। श्लोक 9:सूत उवाच
राज्ञा स एव मुक्तस्तु कथयामास नारदः ।
नारद उवाच
शृणु भूप कथां दिव्यां अशेषाघौघनाशिनीम् ।
ईशानसिन्धुसून्वोश्च संग्रामं परमाद्भुतम् ॥
एकदा गिरिशं स्तोतुं प्रययौ पाकशासनः ।
अप्सरोगणसङ्कीर्णो देवैर्बहुभिरावृतः ॥
✨ तो यह था पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय-3 Part-1 की प्रारंभिक झलक। आगे की कथा में हम जानेंगे — कैसे एक अप्सरा, एक श्राप और एक रहस्यपूर्ण उत्पत्ति मिलकर जन्म देते हैं जालंधर जैसे अद्भुत असुर को। बने रहिए हमारे साथ — अगले भाग में और भी गूढ़ रहस्य खुलेंगे।
➡️ भाग 2 में जानिए: इंद्र का अहंकार, तुलसी का श्राप और जालंधर की जन्मकथा।
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स्रोत: पद्म महापुराण उत्तर खंड ग्रन्थ
Source: पद्म पुराण
📿 “पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय-3 Part-1” लेख केवल आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी भारत के विभिन्न सनातन, वैदिक, और पौराणिक ग्रंथों के स्रोतों पर आधारित है तथा किसी भी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।
📜”पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय-3 Part-1″ लेख में प्रस्तुत श्लोक पारंपरिक ग्रंथों में उपलब्ध मूल स्वरूप पर आधारित हैं। इनमें कोई जानबूझकर परिवर्तन नहीं किया गया है।
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✍️ लेखक: Arvind Kumar Singh
Cosmic Harmony
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