राम नाम क्यों है सबसे बड़ा? जानिए रामचरितमानस का गूढ़ रहस्य
जब संसार अंधकार में डूबा हो, जब मन अशांत हो और जब कोई मार्ग न दिखे, तब एक ही दीपक है—“राम नाम”। राम नाम क्यों है सबसे बड़ा? क्या केवल “राम” नाम का उच्चारण ही जीवन बदल सकता है? क्या सच में एक नाम, हजारों नामों के बराबर हो सकता है?
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के बालकाण्ड में “राम नाम” की ऐसी महिमा का वर्णन किया है, जिसे सुनकर स्वयं भगवान शिव भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, जिस नाम को जपकर वाल्मीकि जैसे डाकू महर्षि बन जाते हैं, जिस नाम के प्रभाव से कालकूट विष भी अमृत बन जाता है। यह केवल एक शब्द नहीं…यह ब्रह्म है… यह शक्ति है… यह मुक्ति का द्वार है।
इस दिव्य कथा में हम जानेंगे—
👉 “राम” नाम का वास्तविक रहस्य
👉 क्यों नाम, स्वयं भगवान से भी बड़ा बताया गया है
👉 और कैसे यह नाम कलियुग में हमारा एकमात्र सहारा है
आइए… श्रद्धा और प्रेम से इस अमृत कथा में प्रवेश करें…
श्री नाम वंदना (बालकाण्ड)
चौपाई:
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥1॥
मैं भगवान राम के पवित्र नाम की वंदना करता हूँ। “राम” नाम के अक्षर अग्नि, सूर्य और चंद्रमा के समान शक्ति देने वाले हैं। यह नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्वरूप है। यह वेदों का सार है, निराकार होते हुए भी सभी गुणों से भरपूर है।
“बंदउँ नाम राम रघुबर को…”
यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी अपने हृदय को पूरी विनम्रता के साथ झुकाकर कहते हैं कि
मैं उस “राम” नाम की वंदना करता हूँ, जो केवल एक शब्द नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि की मूल शक्ति है।
“राम” नाम के तीन अक्षर—
👉 “र” अग्नि के समान है, जो हमारे पापों और अज्ञान को जलाकर भस्म कर देता है
👉 “आ” सूर्य के समान है, जो हमारे जीवन में ज्ञान और प्रकाश भर देता है
👉 “म” चंद्रमा के समान है, जो हमारे हृदय को शीतलता और शांति देता है
यह नाम केवल ध्वनि नहीं है। यह स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त स्वरूप है।
यही नाम वेदों का प्राण है, यही सृष्टि का आधार है। अद्भुत बात यह है कि यह नाम निर्गुण भी है और सगुण भी, जिसका कोई रूप नहीं, फिर भी अनंत गुणों से भरा हुआ है।
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥
महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥2॥
यह वही महान मंत्र है जिसे भगवान शिव स्वयं जपते हैं और काशी में मुक्ति के लिए सिखाते हैं। इस नाम की महिमा गणेश जी भी जानते हैं, इसी कारण वे सबसे पहले पूजे जाते हैं।
“महामंत्र जोइ जपत महेसू…”
यह “राम” नाम इतना महान है कि स्वयं भगवान शिव, जो योगियों के भी गुरु हैं। वे भी इस नाम का निरंतर जप करते हैं। काशी जैसे पवित्र स्थान में, जहाँ मुक्ति की प्राप्ति होती है, वहीं भगवान शिव इस “राम” नाम का उपदेश देते हैं।
और गणेश जी, जो हर शुभ कार्य में सबसे पहले पूजे जाते हैं। वे भी इसी नाम की महिमा को जानते हैं।
अर्थात्—
राम नाम ही वह शक्ति है, जो देवताओं को भी महान बनाती है।
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी॥3॥
महर्षि वाल्मीकि जी ने राम नाम की शक्ति को जाना। उन्होंने उल्टा नाम “मरा-मरा” जपकर भी खुद को पवित्र बना लिया। भगवान शिव के यह कहने पर कि एक राम नाम हजार नामों के बराबर है, माता पार्वती भी शिव जी के साथ इसका जप करती हैं।
“जान आदिकबि नाम प्रतापू…”
यहाँ तुलसीदास जी एक अद्भुत उदाहरण देते हैं, आदिकवि महर्षि वाल्मीकि का।
एक समय था जब वे एक डाकू थे। लेकिन जब उन्होंने “राम” नाम का उल्टा जप “मरा-मरा” करना शुरू किया तो वही नाम धीरे-धीरे “राम-राम” बन गया और उनका जीवन बदल गया। वह डाकू महर्षि बन गया, जिसने रामायण जैसे महान ग्रंथ की रचना की।
भगवान शिव स्वयं कहते हैं— “एक राम नाम, हजार नामों के बराबर है”
इस सत्य को जानकर माता पार्वती भी शिवजी के साथ प्रेमपूर्वक “राम” नाम का जप करती रहती हैं।
हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को॥
नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥4॥
पार्वती जी के हृदय में राम नाम के प्रति प्रेम देखकर शिव जी प्रसन्न हो गए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी बना लिया। शिव जी इस नाम की शक्ति को भलीभांति जानते हैं, इसी के प्रभाव से उन्होंने विष को भी अमृत बना लिया।
“हरषे हेतु हेरि हर ही को…”
जब भगवान शिव ने देखा कि माता पार्वती के हृदय में “राम नाम” के प्रति कितना गहरा प्रेम है तो वे अत्यंत प्रसन्न हो गए और उन्होंने पार्वती जी को अपने शरीर का आधा भाग बना लिया यानी उन्हें अपनी अर्धांगिनी बना लिया।
यह केवल प्रेम नहीं, यह “राम नाम” की महिमा का प्रमाण है। शिवजी स्वयं इस नाम की शक्ति को जानते हैं। इसी नाम के प्रभाव से उन्होंने कालकूट विष को भी अमृत बना लिया।
इन चौपाइयों में तुलसीदास जी हमें यह समझाते हैं कि “राम” नाम केवल एक शब्द नहीं, यह जीवन को बदलने वाली दिव्य शक्ति है। यह अज्ञान को जलाता है, यह जीवन में प्रकाश लाता है, यह हृदय को शांति देता है और सबसे बड़ी बात, यह नाम भगवान से भी पहले हमारे पास पहुँच जाता है।
इसलिए, यदि जीवन में शांति, भक्ति और मुक्ति चाहिए तो बस एक ही सहारा है -🙏 “राम नाम” 🙏
दोहा-19
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥19॥
तुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान राम की भक्ति वर्षा ऋतु के समान है और भक्त धान के समान हैं। “राम” नाम के दो अक्षर सावन और भादो के महीने की तरह हैं, जो जीवन को सुख और समृद्धि से भर देते हैं।
“बरषा रितु रघुपति भगति…”
तुलसीदास जी यहाँ एक अद्भुत उपमा देते हैं—
वे कहते हैं कि भगवान श्रीराम की भक्ति वर्षा ऋतु के समान है।
जैसे वर्षा के बिना धरती सूखी, बंजर और जीवनहीन हो जाती है…
वैसे ही भक्ति के बिना मनुष्य का जीवन भी सूखा और अधूरा रह जाता है।
👉 इस उपमा में—
- भक्ति = वर्षा ऋतु
- भक्त = धान (चावल)
- राम नाम = सावन-भादो के महीने
जैसे सावन-भादो की वर्षा से धान हरा-भरा होकर जीवन पाता है…
वैसे ही “राम” नाम के दो अक्षर—
👉 “र” और “म” —
भक्तों के जीवन में प्रेम, आनंद और आध्यात्मिक उन्नति की वर्षा कर देते हैं।
यह केवल उपमा नहीं…
यह एक गहरा संकेत है कि—
राम नाम के बिना भक्ति अधूरी है, और भक्ति के बिना जीवन सूना है।
चौपाई:
आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥
ससुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥1॥
“राम” नाम के दोनों अक्षर बहुत मधुर और सुंदर हैं। ये भक्तों के जीवन का आधार हैं। इनका स्मरण करना आसान है और ये हर किसी को सुख देते हैं। इस संसार में भी लाभ देते हैं और मृत्यु के बाद भी कल्याण करते हैं।
चौपाई 1 – “आखर मधुर मनोहर दोऊ…”
तुलसीदास जी कहते हैं—
“राम” नाम के दोनों अक्षर इतने मधुर और सुंदर हैं कि वे केवल सुनने में ही अच्छे नहीं लगते, बल्कि आत्मा को आनंद से भर देते हैं।
👉 ये अक्षर ऐसे हैं जैसे—
- शरीर के लिए आँखें
- और भक्त के लिए जीवन
जिस प्रकार आँखों के बिना संसार नहीं दिखता, उसी प्रकार “राम” नाम के बिना जीवन का असली अर्थ समझ में नहीं आता। और सबसे बड़ी बात— यह नाम सबके लिए सुलभ है। ना कोई कठिन साधना, ना कोई विशेष योग्यता ।
बस प्रेम से स्मरण करो और यह नाम तुम्हें इस लोक में सुख देता है और परलोक में भी तुम्हारा साथ निभाता है।
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के॥
बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती॥2॥
राम नाम को बोलना, सुनना और याद करना बहुत अच्छा लगता है। तुलसीदास जी को यह राम-लक्ष्मण के समान प्रिय है। “र” और “म” अलग दिखते हैं, लेकिन वास्तव में ये हमेशा साथ रहते हैं, जैसे जीव और परमात्मा।
“कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके…”
यहाँ तुलसीदास जी अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि “राम” नाम को बोलना, सुनना और स्मरण करना, तीनों ही अत्यंत आनंददायक हैं।
उनके लिए यह नाम उतना ही प्रिय है, जितना स्वयं श्रीराम और लक्ष्मण। “र” और “म” अक्षर अलग-अलग दिखते हैं, लेकिन वास्तव में ये अलग नहीं हैं। ये वैसे ही एक हैं
जैसे जीव और ब्रह्म (आत्मा और परमात्मा) अर्थात “राम” नाम हमें यह सिखाता है कि
हम भगवान से अलग नहीं हैं, हम उन्हीं का अंश हैं।
नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता॥
भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन॥3॥
राम नाम के दोनों अक्षर नर-नारायण जैसे हैं। ये संसार का पालन करते हैं और भक्तों की रक्षा करते हैं। ये भक्ति के आभूषण हैं और चंद्रमा-सूर्य की तरह जगत का कल्याण करते हैं।
“नर नारायन सरिस सुभ्राता…”
तुलसीदास जी “राम” नाम के दोनों अक्षरों को नर और नारायण के समान बताते हैं। जैसे ये दोनों मिलकर संसार का पालन करते हैं, वैसे ही “राम” नाम भक्तों की रक्षा करता है।
यह नाम भक्ति रूपी सुंदर स्त्री के कानों का आभूषण है और पूरे संसार के लिए सूर्य और चंद्रमा के समान है
👉 सूर्य जैसे प्रकाश देता है
👉 चंद्रमा जैसे शीतलता देता है
उसी प्रकार “राम” नाम जीवन में ज्ञान और शांति दोनों प्रदान करता है।
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के॥
जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से॥4॥
राम नाम मोक्ष रूपी अमृत जैसा आनंद देता है। यह संसार को संभालने वाली शक्ति जैसा है। भक्तों के मन में यह ऐसे बसता है जैसे कमल में भौंरा। और जीभ को ऐसा आनंद देता है जैसे यशोदा को कृष्ण-बलराम।
“स्वाद तोष सम सुगति सुधा के…”
यह चौपाई तो मानो “राम नाम” की महिमा का चरम है।
तुलसीदास जी कहते हैं – “राम” नाम मोक्ष रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति जैसा है। यह संसार को संभालने वाली शक्ति जैसा है (कच्छप और शेषनाग) और सबसे सुंदर उपमा, यह नाम भक्तों के मन रूपी कमल में भौंरे की तरह रस लेता हुआ बस जाता है और हमारी जीभ के लिए यह उतना ही आनंद देता है जितना माता यशोदा को श्रीकृष्ण और बलराम देते हैं।
दोहा
एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ॥20॥
तुलसीदासजी कहते हैं- श्री रघुनाथजी के नाम के दोनों अक्षर बड़ी शोभा देते हैं, जिनमें से एक (रकार) छत्ररूप (रेफ र्) से और दूसरा (मकार) मुकुटमणि (अनुस्वार) रूप से सब अक्षरों के ऊपर है॥20॥
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥1॥
समझने में नाम और नामी दोनों एक से हैं, किन्तु दोनों में परस्पर स्वामी और सेवक के समान प्रीति है (अर्थात् नाम और नामी में पूर्ण एकता होने पर भी जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नाम के पीछे नामी चलते हैं।
प्रभु श्री रामजी अपने ‘राम’ नाम का ही अनुगमन करते हैं (नाम लेते ही वहाँ आ जाते हैं)। नाम और रूप दोनों ईश्वर की उपाधि हैं, ये (भगवान के नाम और रूप) दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि हैं और सुंदर (शुद्ध भक्तियुक्त) बुद्धि से ही इनका (दिव्य अविनाशी) स्वरूप जानने में आता है॥1॥
को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू॥
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥2॥
इन (नाम और रूप) में कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है। इनके गुणों का तारतम्य (कमी-बेशी) सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे। रूप नाम के अधीन देखे जाते हैं, नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो सकता॥2॥
रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें॥
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें॥3॥
कोई सा विशेष रूप बिना उसका नाम जाने हथेली पर रखा हुआ भी पहचाना नहीं जा सकता और रूप के बिना देखे भी नाम का स्मरण किया जाए तो विशेष प्रेम के साथ वह रूप हृदय में आ जाता है॥3॥
नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥दोहा
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥21॥
तुलसीदासजी कहते हैं, यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है, तो मुख रूपी द्वार की जीभ रूपी देहली पर रामनाम रूपी मणि-दीपक को रख॥21॥
चौपाई:
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥ब्रह्मा के बनाए हुए इस प्रपंच (दृश्य जगत) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नाम को ही जीभ से जपते हुए (तत्व ज्ञान रूपी दिन में) जागते हैं और नाम तथा रूप से रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं॥1॥
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ॥ साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥2॥जो परमात्मा के गूढ़ रहस्य को (यथार्थ महिमा को) जानना चाहते हैं, वे (जिज्ञासु) भी नाम को जीभ से जपकर उसे जान लेते हैं। (लौकिक सिद्धियों के चाहने वाले अर्थार्थी) साधक लौ लगाकर नाम का जप करते हैं और अणिमादि (आठों) सिद्धियों को पाकर सिद्ध हो जाते हैं॥2॥
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥ राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥3॥संकट से घबड़ाए हुए आर्त भक्त नाम जप करते हैं, तो उनके बड़े भारी बुरे-बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं।
जगत में चार प्रकार के
- अर्थार्थी-धनादि की चाह से भजने वाले,
- आर्त संकट की निवृत्ति के लिए भजने वाले,
- जिज्ञासु-भगवान को जानने की इच्छा से भजने वाले,
- ज्ञानी-भगवान को तत्व से जानकर स्वाभाविक ही प्रेम से भजने वाले) रामभक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं॥3॥
चारों ही चतुर भक्तों को नाम का ही आधार है, इनमें ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष रूप से प्रिय हैं। यों तो चारों युगों में और चारों ही वेदों में नाम का प्रभाव है, परन्तु कलियुग में विशेष रूप से है। इसमें तो (नाम को छोड़कर) दूसरा कोई उपाय ही नहीं है॥4॥
दोहा
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।
नाम सुप्रेम पियूष ह्रद तिन्हहुँ किए मन मीन॥22॥
जो सब प्रकार की (भोग और मोक्ष की भी) कामनाओं से रहित और श्री रामभक्ति के रस में लीन हैं, उन्होंने भी नाम के सुंदर प्रेम रूपी अमृत के सरोवर में अपने मन को मछली बना रखा है (अर्थात् वे नाम रूपी सुधा का निरंतर आस्वादन करते रहते हैं, क्षणभर भी उससे अलग होना नहीं चाहते)॥22॥
चौपाई:
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥निर्गुण और सगुण ब्रह्म के दो स्वरूप हैं। ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। मेरी सम्मति में नाम इन दोनों से बड़ा है, जिसने अपने बल से दोनों को अपने वश में कर रखा है॥1॥
प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥सज्जनगण इस बात को मुझ दास की ढिठाई या केवल काव्योक्ति न समझें। मैं अपने मन के विश्वास, प्रेम और रुचि की बात कहता हूँ। निर्गुण और सगुण दोनों प्रकार के ब्रह्म का ज्ञान अग्नि के समान है। निर्गुण उस अप्रकट अग्नि के समान है, जो काठ के अंदर है, परन्तु दिखती नहीं और सगुण उस प्रकट अग्नि के समान है, जो प्रत्यक्ष दिखती है।
तत्त्वतः दोनों एक ही हैं, केवल प्रकट-अप्रकट के भेद से भिन्न मालूम होती हैं। इसी प्रकार निर्गुण और सगुण तत्त्वतः एक ही हैं। इतना होने पर भी दोनों ही जानने में बड़े कठिन हैं, परन्तु नाम से दोनों सुगम हो जाते हैं। इसी से मैंने नाम को (निर्गुण) ब्रह्म से और (सगुण) राम से बड़ा कहा है, ब्रह्म व्यापक है, एक है, अविनाशी है, सत्ता, चैतन्य और आनन्द की घन राशि है॥2-3॥
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥4॥ऐसे विकाररहित प्रभु के हृदय में रहते भी जगत के सब जीव दीन और दुःखी हैं। नाम का निरूपण करके (नाम के यथार्थ स्वरूप, महिमा, रहस्य और प्रभाव को जानकर) नाम का जतन करने से (श्रद्धापूर्वक नाम जप रूपी साधन करने से) वही ब्रह्म ऐसे प्रकट हो जाता है, जैसे रत्न के जानने से उसका मूल्य॥4॥
दोहा
निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।
कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार॥23॥
राम नाम की शक्ति बहुत महान है। तुलसीदास जी कहते हैं कि उनके अनुसार नाम भगवान राम से भी बड़ा है।
चौपाई:
राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी॥नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥1॥
श्री रामचन्द्रजी ने भक्तों के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करके स्वयं कष्ट सहकर साधुओं को सुखी किया, परन्तु भक्तगण प्रेम के साथ नाम का जप करते हुए सहज ही में आनन्द और कल्याण के घर हो जाते हैं॥1॥।
राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥ रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी॥2॥
सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥3॥
श्री रामजी ने एक तपस्वी की स्त्री (अहिल्या) को ही तारा, परन्तु नाम ने करोड़ों दुष्टों की बिगड़ी बुद्धि को सुधार दिया। श्री रामजी ने ऋषि विश्वामिश्र के हित के लिए एक सुकेतु यक्ष की कन्या ताड़का की सेना और पुत्र (सुबाहु) सहित समाप्ति की, परन्तु नाम अपने भक्तों के दोष, दुःख और दुराशाओं का इस तरह नाश कर देता है जैसे सूर्य रात्रि का। श्री रामजी ने तो स्वयं शिवजी के धनुष को तोड़ा, परन्तु नाम का प्रताप ही संसार के सब भयों का नाश करने वाला है॥2-3॥
दंडक बन प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन॥ निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन॥4॥
प्रभु श्री रामजी ने (भयानक) दण्डक वन को सुहावना बनाया, परन्तु नाम ने असंख्य मनुष्यों के मनों को पवित्र कर दिया। श्री रघुनाथजी ने राक्षसों के समूह को मारा, परन्तु नाम तो कलियुग के सारे पापों की जड़ उखाड़ने वाला है॥4॥
दोहा:
सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ। नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ॥24॥
श्री रघुनाथजी ने तो शबरी, जटायु आदि उत्तम सेवकों को ही मुक्ति दी, परन्तु नाम ने अगनित दुष्टों का उद्धार किया। नाम के गुणों की कथा वेदों में प्रसिद्ध है॥24॥ चौपाई:
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ ॥नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे॥1॥
श्री रामजी ने सुग्रीव और विभीषण दोनों को ही अपनी शरण में रखा, यह सब कोई जानते हैं, परन्तु नाम ने अनेक गरीबों पर कृपा की है। नाम का यह सुंदर विरद लोक और वेद में विशेष रूप से प्रकाशित है॥1॥
राम भालु कपि कटुक बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥ नामु लेत भवसिन्धु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥2॥
श्री रामजी ने तो भालू और बंदरों की सेना बटोरी और समुद्र पर पुल बाँधने के लिए थोड़ा परिश्रम नहीं किया, परन्तु नाम लेते ही संसार समुद्र सूख जाता है। सज्जनगण! मन में विचार कीजिए (कि दोनों में कौन बड़ा है)॥2॥
राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा॥राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी॥3॥
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती॥फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें॥4॥
श्री रामचन्द्रजी ने कुटुम्ब सहित रावण को युद्ध में मारा, तब सीता सहित उन्होंने अपने नगर (अयोध्या) में प्रवेश किया। राम राजा हुए, अवध उनकी राजधानी हुई, देवता और मुनि सुंदर वाणी से जिनके गुण गाते हैं, परन्तु सेवक (भक्त) प्रेमपूर्वक नाम के स्मरण मात्र से बिना परिश्रम मोह की प्रबल सेना को जीतकर प्रेम में मग्न हुए अपने ही सुख में विचरते हैं, नाम के प्रसाद से उन्हें सपने में भी कोई चिन्ता नहीं सताती॥3-4॥
दोहा:
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि। रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि॥25॥
इस प्रकार नाम (निर्गुण) ब्रह्म और (सगुण) राम दोनों से बड़ा है। यह वरदान देने वालों को भी वर देने वाला है। श्री शिवजी ने अपने हृदय में यह जानकर ही सौ करोड़ राम चरित्र में से इस ‘राम’ नाम को (साररूप से चुनकर) ग्रहण किया है॥25॥
मासपारायण, पहला विश्राम
चौपाई:
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी॥सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी॥1॥
नाम ही के प्रसाद से शिवजी अविनाशी हैं और अमंगल वेष वाले होने पर भी मंगल की राशि हैं। शुकदेवजी और सनकादि सिद्ध, मुनि, योगी गण नाम के ही प्रसाद से ब्रह्मानन्द को भोगते हैं॥1॥
नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥2॥
नारदजी ने नाम के प्रताप को जाना है। हरि सारे संसार को प्यारे हैं, हरि को हर प्यारे हैं और आप श्री नारदजी हरि और हर दोनों को प्रिय हैं। नाम के जपने से प्रभु ने कृपा की, जिससे प्रह्लाद, भक्त शिरोमणि हो गए॥2॥
ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥3॥
ध्रुवजी ने ग्लानि से विमाता के वचनों से दुःखी होकर सकाम भाव से हरि नाम को जपा और उसके प्रताप से अचल अनुपम स्थान ध्रुवलोक प्राप्त किया। हनुमान्जी ने पवित्र नाम का स्मरण करके श्री रामजी को अपने वश में कर रखा है॥3॥
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥ कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥4॥
नीच अजामिल, गज और गणिका (वेश्या) भी श्री हरि के नाम के प्रभाव से मुक्त हो गए। मैं नाम की बड़ाई कहाँ तक कहूँ, राम भी नाम के गुणों को नहीं गा सकते॥4॥
दोहा:
नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥26॥
कलियुग में राम का नाम कल्पतरु यानि मन चाहा पदार्थ देने वाला और कल्याण का निवास अर्थात मुक्ति का घर है, जिसको स्मरण करने से भाँग सा (निकृष्ट) तुलसीदास तुलसी के समान (पवित्र) हो गया॥26॥
चौपाई:
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥ बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू॥1॥
केवल कलियुग की ही बात नहीं है, चारों युगों में, तीनों काल में और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोकरहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतों का मत यही है कि समस्त पुण्यों का फल श्री रामजी में या राम नाम में प्रेम होना है॥1॥
ध्यानु प्रथम जुग मख बिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥ कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना॥2॥
पहले (सत्य) युग में ध्यान से, दूसरे (त्रेता) युग में यज्ञ से और द्वापर में पूजन से भगवान प्रसन्न होते हैं, परन्तु कलियुग केवल पाप की जड़ और मलिन है, इसमें मनुष्यों का मन पाप रूपी समुद्र में मछली बना हुआ है (अर्थात पाप से कभी अलग होना ही नहीं चाहता, इससे ध्यान, यज्ञ और पूजन नहीं बन सकते)॥2॥
नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥ राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥3॥
ऐसे कराल (कलियुग के) काल में तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसार के सब जंजालों को नाश कर देने वाला है। कलियुग में यह राम नाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है (अर्थात परलोक में भगवान का परमधाम देता है और इस लोक में माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करता है।)॥3॥
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥ कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥4॥
कलियुग में न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, राम नाम ही एक आधार है। कपट की खान कलियुग रूपी कालनेमि के (मारने के) लिए राम नाम ही बुद्धिमान और समर्थ श्री हनुमान्जी हैं॥4॥
दोहा:
राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल। जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥27॥
राम नाम श्री नृसिंह भगवान है, कलियुग हिरण्यकशिपु है और जप करने वाले जन प्रह्लाद के समान हैं, यह राम नाम देवताओं के शत्रु (कलियुग रूपी दैत्य) को मारकर जप करने वालों की रक्षा करेगा॥27॥
चौपाई:
भायँ कुभायँ अनख आलस हूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥ सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥1॥
अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (बैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है। उसी (परम कल्याणकारी) राम नाम का स्मरण करके और श्री रघुनाथजी को मस्तक नवाकर मैं रामजी के गुणों का वर्णन करता हूँ॥1॥
तो यह थी “राम नाम” की वह अनंत महिमा, जिसे वेद, पुराण और संत सभी एक स्वर में गाते हैं।
तुलसीदास जी स्पष्ट कहते हैं—
👉 कलियुग में न कर्म का बल है, न ज्ञान का…
👉 केवल “राम नाम” ही एकमात्र आधार है…
यह नाम—
संकट में रक्षा करता है…
अज्ञान में प्रकाश देता है…
और अंत में… जीव को परम शांति और मोक्ष तक पहुंचाता है…
सोचिए, जिस नाम को स्वयं भगवान शिव जपते हैं, जिस नाम को पार्वती जी अपने हृदय में बसाए रखती हैं, जिस नाम से प्रह्लाद, ध्रुव, अजामिल तक का उद्धार हुआ।
क्या वह नाम हमारे जीवन को नहीं बदल सकता?
🌿 इसलिए…
आज से… अभी से…
अपने जीवन में “राम” नाम को स्थान दें…
“राम नाम मणि दीप धरु…”
अपने हृदय के द्वार पर यह दीप जला दें…
फिर देखिए—
अंधकार अपने आप मिट जाएगा…
स्रोत: रामचरितमानस
🙏जय सियाराम🙏
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