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पद्ममहापुराण — सृष्टिखण्ड, अध्याय 12

चंद्र वंश की उत्पत्ति: आयु → नहुष → ययाति वंश विस्तार


जय श्री हरी🙏

चन्द्र → बुध → पुरुरवा → आयु → नहुष → ययाति → यदु / पुरु वंश का वर्णन महाभारत (आदि पर्व), भागवत पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, ब्रह्म पुराण, और हरिवंश पुराण ग्रंथों में स्पष्ट रूप से मिलता है। पुराणों में वंशों का वर्णन केवल राजाओं की सूची नहीं है, बल्कि यह धर्म, कर्म और भविष्य की दिशा का संकेत होता है।

चन्द्रवंश की परंपरा में आयु, नहुष और ययाति ऐसे महत्त्वपूर्ण नाम हैं, जिनके वंश से आगे चलकर अनेक महान राजवंश और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य वंश प्रकट हुआ। यह कथा वंश विस्तार के साथ यह भी सिखाती है कि सत्ता, अहंकार और त्याग तीनों जीवन के अनिवार्य चरण हैं।

पद्मपुराण सृष्टिखंड अध्याय 12 में श्लोक संख्या 76 से 97 में पुलस्त्य महर्षि ने भीष्मजी को चंद्रवंशी राजा पुरुरवा के बाद से यदु तक की कथा सुनाया। 

1. देवताओं, असुरों तथा मनुष्यो को हराने वाला राजा रजि 

पुरूरवा और उर्वशी के ने आठ पुत्रों को जन्म दिया -आयु, दृढायु, वश्यायु, बलायु, धृतिमान, वसु, दिव्यायु तथा शतायु। ये आठो दिव्य बल और ओज से युक्त थे। आयु के पुत्र नहुष तथा वृद्धशर्मा, रजि, दण्ड, विशाख थे। ये पाँचो वीर पुत्र महारथी थे। रजि के सौ पुत्र हुए। वे राजेय के नाम से विख्यात हुए। 

आयु के पांच पुत्रों में सबसे पहले रजि के बारे में बताया गया है, क्योंकि राजा रजि भगवान विष्णु का भक्त था और वह अन्य भाइयों की अपेक्षा योग्य थे। नहुष से पहले रजि राजा क्यों बना, इसका कारण वंशक्रम नहीं बल्कि परिस्थिति और कर्म है। यहाँ “राजा” बनने का अर्थ केवल वंशानुगत सिंहासन नहीं, बल्कि देवताओं के बीच इन्द्र-पद जैसा सर्वोच्च अधिकार भी है। उनके वंश एक पीढ़ी के बाद समाप्त हो गया। क्यों समाप्त हुआ इसकी कथा इस प्रकार बताया गया है। 

राजा बनने से पहले की बात है।  रजि ने भगवान् नारायण की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उन्हें वर प्रदान किया कि वह सदा विजयी रहेगा। उसके बाद रजि ने देवताओं, असुरों तथा मनुष्यो पर विजय, प्राप्त किए। इसलिए राजा आयु ने अपने तीसरे पुत्र रजि को योग्य जानकर राज्य उसके हाथों में सौंप दिया।

  2.राजा रजि की शर्त, देवताओं की विजय

उधर देव और असुर के बीच तीन सौ वर्षों से देवासुर संग्राम हो रहा था। उस संग्राम में प्रह्लाद तथा इन्द्र दोनों में से कोई भी विजय नहीं प्राप्त कर सका । उसके बाद देवताओं तथा असुरों ने अलग-अलग जाकर ब्रह्माजी से पूछा कि इन दोनों पक्षों में से कौन सा पक्ष विजयी होगा ? 

इस पर ब्रह्माजी ने कहा कि जिस पक्ष की ओर से राजा रजि युद्ध करेंगे वही पक्ष विजयी होगा। उसके बाद दोनों पक्षों के लोगों ने जाकर राजा रजि से प्रार्थना किए कि आप हमारी सहायता करें। इस पर रजि ने कहा हम उसी पक्ष की सहायता करेंगे जो हमे अपना इन्द्र बनाये। 

दैत्यों ने राजा रजि के इस शर्त को नहीं स्वीकार किया जबकि देवताओं ने उसे स्वीकार कर लिया। देवताओं ने कहा कि आप हमलोगों के स्वामी हो जायँ और शत्रुओं की सेना को नष्ट कर दें। उसके बाद राजा रजि ने युद्ध में उतरे और असुरों की सेना में भयानक तबाही मचाई। राजा रजि ने उन असुरों को भी नष्ट कर दिए, जिनको इन्द्र मार नहीं सके थे। 

3. इन्द्र राजा रजि के पुत्र बने 

देवता बड़ी समझदारी से जीत भी हासिल किये और स्वर्ग का राज्य भी अपने पास सुरक्षित रख लिए।  राजा रजि के कर्मों से प्रसन्न होकर इन्द्र राजा रजि के पुत्र बन गये। कोई भी राजा अपने पुत्र को ही राज्य सौंपता है। 

दूसरी ओर पृथ्वी पर मनुष्य  और स्वर्ग में देवताओ की आयु में बहुत अंतर होता है। देवताओं का एक वर्ष मनुष्य के लिए दस हजार वर्ष के बराबर होता है।  युद्ध करते-करते राजा रजी की उम्र ढल चुकी थी जबकि इंद्र वैसे ही युवा बने रहे। इसलिए युद्ध जितने के बाद इन्द्र को राज्य प्रदान करके रजि तपस्या करने के लिए वन में चले गये। 

4. रजि पुत्रों का अधर्म, इन्द्र की पराजय और बृहस्पति की नीति

राजा रजि के सौ पुत्रों ने जब जाना कि छल से देवताओं ने उसके पिता से इंद्र का पद अपने पास ही रख लिया है, तो वे क्रुद्ध हो गए। वे देवताओं से इंद्र का पद छीनने के लिए तपस्या करके बल बढ़ाने लगे। तपस्या और बल रूपी गुण से युक्त रजि के पुत्रों ने इन्द्र से यज्ञ का भाग तथा राज्य दोनों छिन लिया। 

रजि के पुत्रों से पीडित किए गये राज्यभ्रष्ट इन्द्र, दीन होकर देवगुरु बृहस्पति के पास गए। उनसे कहे कि मुझे रजि के पुत्रों ने दुःख दिया है। हे बृहस्पते ! अब न तो मेरा राज्य है और न तो यज्ञ का भाग ही मुझे मिलता है। हे देवाधिप आप ऐसा उपाय करें कि मुझे मेरा राज्य मिल जाय।

5. रजि पुत्रों का पतन

उसके बाद बृहस्पति ने इन्द्र को ग्रहशान्ति तथा पौष्टिक कर्मों के द्वारा बल से युक्त बना दिया । बृहस्पति ने जाकर रजि के पुत्रों को मोहित कर दिया। रजि के पुत्रों का धर्म से मोहभंग हो गया। धर्मज्ञ बृहस्पति ने उन सबों को अपने धर्म से  पथभ्रष्ठ कर दिया। 

बुद्धिमानों में श्रेष्ठ बृहस्पति ने रजि के पुत्रो को त्रयी धर्म से भ्रष्ट करके हेतु वादी यानि कुतार्किक बना दिया, इस बात को जानकर  उन समस्त धर्म बहिष्कृतों को इन्द्र ने वज्र से मार डाला।

6. नहुष वंश और ययाति का उदय 

 राजा रजि जंगल में तपस्या करने चले गए और उसके सौ पुत्रों को देवताओं ने मार डाला। उसके बाद आयु के बड़े पुत्र नहुष के पुत्र राजा बना।  नहुष के सात ही पुत्र हुए। वे सब धार्मिक थे। उन नहुष के पुत्रों के नाम थे यति, ययाति, शर्याति, उत्तर, पर, अयति तया वियति । ये सातों वंश को बढाने वाले थे।

Current image: आयु → नहुष → ययाति वंश 

यति अपनी कुमारावस्था में वैखानस योगी हो गये। धर्म का पालन करते हुए ययाति राजा हुए। ययाति की दो पत्नियां थी। पहली पत्नी वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा थी । उनकी दूसरी पत्नी पहली पत्नी वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा थी । उनकी दूसरी पत्नी शुक्राचार्य की पुत्री सुव्रता देवयानी थी ।

7. ययाति के पुत्र, पुरु–यदु वंश और श्रीकृष्ण अवतार की भूमिका 

ययाति के पाँच पुत्र हुए उनमें देवयानी ने दो पुत्रों को जन्म दिया यदु तथा तुर्वसु को; शर्मिष्ठा ने तीन पुत्रों को जन्म दिया द्रुहयु मण तथ पुरु को । उनमें यदु, पुरु तथा भरत ये तीनों तुम्हारे (भीष्मजी के) ही वंश को बढाने वाले थे । यदु के वंश में यादव हुए, जिस वंश में बलरामजी तथा भगवान् श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए। 

अंतिम श्लोकों में संकेत मिलता है कि यदुवंश से आगे चलकर वृष्णि वंश और अंततः भगवान श्रीकृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ। इस प्रकार ययाति की वंश परंपरा केवल राजाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्वयं ईश्वर के अवतार का आधार बनी। यह वंश धर्म, भक्ति और लीला, तीनों का संगम है।

आयु, नहुष और ययाति की यह वंशावली आधारित कथा हमें यह समझाती है कि वंश केवल रक्त से नहीं, बल्कि कर्म, त्याग और धर्म से महान बनता है। जहाँ नहुष का अहंकार पतन का कारण बना, वहीं ययाति के वंश से भगवान श्रीकृष्ण जैसे अवतार का प्रकट होना धर्म की विजय का शाश्वत संदेश देता है।

पिता / स्रोत माता संतान
अत्रि मुनि दिशाएँ (स्त्री रूप) चन्द्रमा
चन्द्रमा तारा बुध
बुध ईला पुरुरवा
पुरुरवा उर्वशी आयु, दृढायु, वश्यायु, बलायु, धृतिमान, वसु, दिव्यायु, शतायु
आयु नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, दण्ड, विशाख
नहुष यति, ययाति, शर्याति, उत्तर, पर, अयति, वियति
ययाति देवयानी यदु, तुर्वसु
ययाति शर्मिष्ठा द्रुहयु, अनु, पुरु

यही इस कथा की सबसे बड़ी शिक्षा और महिमा है। 🙏

Source: पद्मपुराण

🙏 जय श्री हरी 🙏

📿 यह लेख केवल आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी भारत के विभिन्न सनातन, वैदिक, और पौराणिक ग्रंथों के स्रोतों पर आधारित है तथा किसी भी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।

📜 इस लेख में प्रस्तुत श्लोक पारंपरिक ग्रंथों में उपलब्ध मूल स्वरूप पर आधारित हैं। इनमें कोई जानबूझकर परिवर्तन नहीं किया गया है।

🖼️ “आयु → नहुष → ययाति वंश विस्तार” लेख में प्रयुक्त चित्र AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) द्वारा निर्मित हैं और केवल भावात्मक प्रस्तुति के उद्देश्य से उपयोग किए गए हैं।


✍️ लेखक: Arvind Kumar Singh
Cosmic Harmony

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