पद्ममहापुराण — सृष्टिखण्ड, अध्याय 12
चंद्र वंश की उत्पत्ति: पुरूरवा और उर्वशी की अमर प्रेमकथा
जय श्री हरी🙏
पुराणों में वर्णित कुछ कथाएँ केवल इतिहास नहीं होतीं, वे मानव जीवन के गहरे भावों, प्रेम, विरह, मर्यादा और कर्म का दर्पण होती हैं। बुध के जन्म और ग्रह के रूप में स्थापित होने के बाद बुध और ईला (जो पुरुष और स्त्री दोनों था) से उत्पन्न एक ऐसे राजवंश की स्थापना हुई जिसके लिए महाभारत काल के तीनो चंद्रवंशी राजवंश यथा कुरुवंशी, यदुवंशी और वृष्णिवंशी गर्व करते थे।
पुरूरवा और उर्वशी की कथा भारतीय पौराणिक परंपरा की एक अमर प्रेमगाथा है। पुरूरवा और उर्वशी का प्रेम केवल एक साधारण आकर्षण नहीं था, बल्कि यह स्वर्ग और पृथ्वी के मिलन का प्रतीक था। एक ओर स्वर्गलोक की अनुपम सुंदरता से विभूषित दिव्य अप्सरा उर्वशी, और दूसरी ओर पृथ्वी पर राज्य करने वाला तेजस्वी, पराक्रमी और यशस्वी राजा पुरूरवा।
1. बुध और इला का मिलन
पद्मपुराण सृष्टिखण्ड के अनुसार, चन्द्रमा और देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा के प्रेम संबंध से बुध का जन्म हुआ। देवलोक में यह चर्चा फैली कि तारा से जन्मे पुत्र चन्द्रमा का है या बृहस्पति का, क्योंकि तारा संकोच और लज्जा से कुछ भी नहीं बोल रही थी। ब्रह्माजी के समझाने के बाद, देवी तारा ने स्वीकार किया कि वह चन्द्रमा का पुत्र है।
बृहस्पति, तारा और चंद्रमा को समझाने के बाद और बुध को ग्रह का स्थान देने के बाद ब्रह्माजी सबों के देखते-ही-देखते वहाँ से अन्तर्धान हो गये। बुद्धि के देवता ‘बुध’ जब युवा हुआ तो एक दिन जंगल में घूमने गया। वही इला नामक महिला से मुलाकात हुई और दोनों में प्रेम हो गया।
जब बुध को इला से प्रेम हो गया, तो उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि वास्तव में इला एक राजा थी जो स्त्री के रूप में परिवर्तित हो गई थी। अपने राज्य के धर्मनिष्ठ शासक राजा सुद्युम्न शिकार के लिए जंगल में गए, लेकिन जैसे ही वे और उनके अनुयायी जंगल में दाखिल हुए, वे सभी स्त्री में परिवर्तित हो गए।
यह घटना भगवान शिव द्वारा लगाए गए एक प्रतिबंध के कारण हुई, क्योंकि एक बार जब वे पार्वती के साथ अकेले वन में थे। वह वन भगवान शिव और माता पार्वती द्वारा श्रापित वन था। कोई भी पुरुष उस जंगल में प्रवेश करता, तो वह स्त्री बन जाता। इस तथ्य से अनभिज्ञ राजा सुद्युम्न और उनके अनुयायी जंगल में प्रवेश कर गए और भगवान की निजता में खलल डाला। राजा सुद्युम्न और उनके अनुयायी तुरंत ही स्त्री रूप में परिवर्तित हो गए।
इस प्रकार स्त्री रूप धारण करने वाले राजा को इला के नाम से जाना जाने लगा, जो लज्जा के कारण राज्य में वापस नहीं लौटीं। संयोगवश, बुध की मुलाकात इला से हुई और उनका विवाह हो गया। बुध और इला के मिलन से एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम पुरुरवा था। इसी पुरुरवा ने आगे चलकर ‘चंद्रवंश’ की स्थापना की, जिसमें आगे चलकर पांडव और कौरव जैसे महान योद्धा हुए।
इसी बीच इला की मुलाकात ऋषि वशिष्ठ से हुई और उन्होंने सारी घटना का खुलासा किया। ऋषि ने भगवान शिव से प्रार्थना की और उनसे पवित्र राजा सुद्युम्न को उनके मूल स्थान पर वापस लाने का मार्ग सुझाया। भगवान शिव ने इला को हर दूसरे माह पुरुषत्व प्राप्त करने की अनुमति दी। इस प्रकार इला और राजा का जन्म हर माह बारी-बारी से होता रहा।
बुध की पत्नी के रूप में इला ने पुरुरवा को जन्म दिया। समय बीतने पर, बुध पुरुरवा को राजा बनाकर स्वयं ग्रह रूप में स्थापित हो गये। इधर इला वनप्रस्थ में शरण लेकर देवी भगवती की पूजा करने लगी। इला की सच्ची भक्ति फलदायी हुई और उन्होंने स्वयं शाश्वत भगवती में विलीन हो गईं!
बुध और इला से पुरूरवा का जन्म हुआ। वह सभी लोगों से नमस्कृत था । पुरूरवा ने सौ से भी अधिक अश्वमेध यागो को सम्पन्न किया। पुरूरवा ने हिमालय पर्वत के शिखर पर ब्रह्माजी की आराधना करके वह सम्पूर्ण लोकों के ऐश्वर्य को प्राप्त करके सातों द्वीपों का स्वामी हो गया। केशी जैसा अनेक शक्तिशाली दैत्य उसके नौकर थे।
पुरूरवा के रूप को देखकर स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी मोहित हो गई और उसकी पत्नी बन गई। सम्पूर्ण लोकों का कल्याण चाहने वाले उस राजा ने, पर्वत, कानन तथा वन से युक्त पृथिवी का धर्मपूर्वक पालन किया।
2. पुरूरवा और उर्वशी पहला मिलन
पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवराज इंद्र ने राजा पुरुरवा को स्वर्ग में अपना आधा आसन इसलिए प्रदान किया था क्योंकि पुरुरवा एक अत्यंत पराक्रमी सम्राट थे और उन्होंने देवताओं के सबसे बड़े दुश्मन ‘केशी’ नामक राक्षस को हराकर स्वर्ग की रक्षा की थी।
यह घटना उस समय की है जब केशी नामक दैत्य का आतंक पृथ्वी से स्वर्ग तक फैला हुआ था। केशी नामक दानव ने स्वर्ग लोक में भारी उत्पात मचाया था और देवराज इंद्र को भी पराजित कर दिया था।
उर्वशी स्वर्गलोक की मुख्य अप्सरा थी। वह देवों के राजा इन्द्र की कृपापात्र थी। वह उनके दरबार में प्रत्येक सन्ध्या नृत्य किया करती थी। वह सुन्दर थी। उसने अपना हृदय किसी को अर्पित नहीं किया था। उसे किसी ने भी बालिका, किशोरी अथवा माता के रूप में मानना स्विकार नहीं था। उर्वशी सभी पुरुषौं की महिला मित्र के रूप में ही जानी-मानी जाती थी।
एक दिन उर्वशी अपनी सखी चित्रलेखा और अन्य अप्सराओं के साथ धरती की सुंदरता देखने आई। ‘केशी’ राक्षस ने उर्वशी को देखा तो कामांध हो गया। ऐसी सुन्दर स्त्री उसने आज तक देखी ना थी।
उसने उर्वशी से प्रणय याचना की किन्तु उस राक्षस का भयानक मुख देख कर उर्वशी वहाँ ये भाग निकली। इसे अपना अपमान जान कर उस राक्षस ने उर्वशी का अपहरण कर लिया और जबरन अपने साथ ले जाने लगा। स्वयं को संकट में देख कर उर्वशी उच्च स्वर में अपनी रक्षा की गुहार लगाने लगी।
उसी समय आर्यावर्त के अधिपति महाराज पुरुरवा वही से गुजर रहे थे। जब उन्होंने एक स्त्री के चिल्लाने का स्वर सुना तो उसी ओर भागे। आगे जाकर उन्होंने देखा कि एक राक्षस एक स्त्री का हरण कर उसे बलात अपने साथ ले जा रहा है। वे क्षत्रिय थे, उसपर से राजा सो प्रजा की रक्षा करना उनका धर्म था। उन्होंने उस राक्षस को रोका और उर्वशी को स्वतंत्र करने को कहा। किन्तु जब राक्षस नहीं माना तो दोनों में भयानक युद्ध हुआ।
उस समय चंद्रवंशी राजा पुरुरवा ने उस शक्तिशाली राक्षस को युद्ध में हरा दिया और उर्वशी को मुक्त करा दिया। इस वीरता से मोहित होकर उर्वशी उन्हें अपना दिल दे बैठी।
उर्वशी विजेता पुरुरवा के प्रेम में पड़ गयी और उर्वशी के मन मे कामवासना जागृत हुआ। किन्तु उर्वशी को स्वर्गलोक लौटना पड़ा और पुरुरवा भी उसके लिए बेचैन रहने लगा। पुरुरवा की समझ में न आया कि वह क्या करे। उसने अपने बचपन के मित्र राजविदूषक को अपनी व्यथा कह सुनायी।
इधर राजा पुरुरवा की इस महान सहायता से प्रसन्न और प्रभावित होकर, देवराज इंद्र ने भी राजा पुरुरवा को अपना मित्र माना और सम्मान स्वरूप उन्हें स्वर्गलोक में अपने सिंहासन का आधा भाग प्रदान किया।
इस घटना के बाद से राजा पुरुरवा देवराज इंद्र के घनिष्ठ मित्र और देवताओं के युद्धों में उनके सेनापति के रूप में भी जाने गए। वह धर्म, अर्थ तथा काम इन तीनों का समान रूपेण पालन करता था ।
3. धर्म, अर्थ और काम की परीक्षा
एक बार कौतुक वशात् धर्म, अर्थ और काम राजा पुरुरवा को देखने के लिए आये । वे यह जानना चाहते थे कि यह राजा किस प्रकार हम तीनों को समान रूप से मानता है ? राजा पुरुरवा ने आये हुए उन तीनों को भक्ति पूर्वक अर्घ्य प्रदान किया ।
राजा ने तीन सुवर्ण निर्मित आसनों को लाया । वह तीनों को उन आसनों पर बैठाकर इन तीनों का पूजन किया, किन्तु धर्म की उसने थोड़ी अधिक पूजा की । यह देखकर, अर्थ एवं काम राजा के प्रति अत्यन्त क्रोधित हो गए। अर्थ ने राजा को शाप दिया कि लोभ के कारण तुम्हारा नाश हो जायेगा ।
काम ने भी कहा कि हे राजन गन्धमादन पर्वत पर तुम्हें उन्माद हो जायेगा। कुमार वन में तुम्हारा उर्वशी से वियोग हो जायेगा और उसके कारण तुम विक्षिप्त हो जाओगे ।
धर्म ने आशीर्वाद दिया तुम लम्बी आयु वाले तथा धार्मिक होओगे । हे राजेन्द्र ! तुम्हारी सन्तानें तब तक बनी रहेंगी जब तक सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे।
उसकी अनेक प्रकार से वृद्धि होगी उसका नाश नहीं होगा । तुम्हें उर्वशी विषयक काम के कारण साठ वर्षों तक उन्माद होगा।
वह अप्सरा भी शीघ्र ही तुम्हारी वशवर्तिनी भार्या हो जायेगी। यह कहकर वे तीनों अन्तर्धान हो गये और राजा पुरूरवा भी राज्य करने लगे ॥
4. उर्वशी और पुरूरवा का पुनः मिलन
केशी राक्षस को हराकर उर्वशी को वापस इंद्र को सौंपने के कारण इन्द्र की पुरूरवा से मित्रता हो गयी थी। पुरूरवा प्रतिदिन देवेन्द्र से मिलने जाते थे। पुरुरवा और उर्वशी का प्रेम समय के साथ प्रगाढ़ होता गया । संसार में सबसे श्रेष्ठ वीर पुरूरवा से इन्द्र ने कहा इसको तुम ले जाओ।
एक दिन वह अपने उद्यान में बैठा उर्वशी के सम्बन्ध में सोच रहा था कि उर्वशी उसके पीछे आ खड़ी हुई। उर्वशी ने पुरुरवा को पिछे से आलिंगन किया और दोनों परस्पर आलिंगन में बँध गये। ठीक उसी समय स्वर्गलोक से एक दूत आया और उसने उर्वशी को देवराज इन्द्र का सन्देश सुनाया। इन्द्र ने उसे आज्ञा दी थी कि वह तत्काल स्वर्गलोक पहुँचकर एक विशेष नृत्यनाटिका में भाग ले। लाचार हो उर्वशी को लौट जाना पड़ा।
5. लक्ष्मीरूप से नृत्य और भरतमुनि का शाप
स्वर्ग में इंद्र देव और राजा पुरुरवा सिंहासन पर विराजमान थे। राजा के सम्मान के लिए इंद्रदेव ने नृत्य का कार्यकर्म रखे थे।
भरतमुनि द्वारा रचित लक्ष्मी स्वयम्बर नाटक प्रस्तुत किया गया। उर्वशी ने पुरूरवा को प्रसन्न करने के लिए उसके महान चरित का गान शुरू की। उस नाटक में उर्वशी के अलावा, मेनका, तथा रम्भा को आदेश दिया गया था कि तुमलोग नृत्य करो । वहाँ पर उर्वशी ने लयपूर्वक गीत गाते हुए लक्ष्मीरूप से नृत्य किया।
नृत्य करती हुयी वह पुरूरवा को देखकर कामार्त हो गयी और वह पहले से तय सम्पूर्ण अभिनयों को भूल गयी। कामवासना से युक्त उर्वशी ने अनजाने में ही वह पुरुरवा को पुकार बैठी।
उसके कारण क्रुद्ध होकर भरत मुनि ने शाप दे दिया कि तुमने मेरी नाटिका में चित्त नहीं रमाया। तुम भूलोक जाकर वहाँ पुरुरवा के साथ मनुष्य की भाँति ही रहो। उसका पृथिवी पर पुरूरवा से वियोग होगा। वह पचपन वर्षों तक लता के रूप में रहेगी।
6. पुरुरवा और उर्वशी का विवाह या धोखा
उर्वशी पुरुरवा से सम्बन्ध बनाना चाहती तो थी। किन्तु मृत्युलोक में नहीं रहना चाहती थी। अतएव देवराज इन्द्र के पास पहुँचकर घुटनों के बल गिड़गिड़ाने लगी कि वह उसको शाप-मुक्त कर दें। इन्द्र को अपनी प्रिय अप्सरा पर दया आयी। वह बोले, ‘‘उर्वशी, तुम भूलोक जाओ, किन्तु तुम अधिक समय वहाँ नहीं रहोगी।
उसके बाद उर्वशी राजा पुरुरवा के पास जाकर उन्हें अपना पति बना ली। इंद्र ने बड़ी चालाकी से पुरुरवा की सहायता और मित्रता को धोखा दिया। उसने उर्वशी को शर्तों के साथ विवाह कराने में सफल रहा। उर्वशी ने भूलोक से तुरंत वापसी की तैयारी कर ली।
उर्वशी ने पुरुरवा से विवाह किया, लेकिन विवाह के लिए तीन शर्तें रखीं:
- पुरुरवा को हमेशा उर्वशी के साथ रहने वाले दो मेढ़ों (भेड़ों) की रक्षा करनी होगी।
- राजा केवल घी का आहार करेंगे, और
- उर्वशी को नग्न अवस्था में केवल सहवास के समय ही देखेंगे।
7. पुरुरवा और उर्वशी का वियोग
उर्वशी ने मेमने पाल रखे थे। उसे उनसे इतना प्रेम था कि सोते-जागते समय वह उन्हें अपने पलँग से बाँधकर रखा करती थी। उधर स्वर्गलोक के संगीतकारों, गन्धर्वों को उसके बिना अपनी कला अधूरी लग रही थी। उन्हें पुरुरवा के साथ उर्वशी की शर्त के बारे में ज्ञात था।
अतएव मध्यरात्रि को वे मेमना चुरा ले चले। उन्होंने जानबूझकर आवाज की, जिससे उर्वशी जग गयी। उसने पुरुरवा को कुहनी मारकर कहा, ‘‘इधर आप निद्रा-मग्न हैं, उधर गन्धर्व मेरा मेमना चुराये लिये जा रहे हैं।’’किन्तु पुरुरवा ने उबासी लेकर करवट बदल ली। गंधर्व को अपनी योजना में सफलता नहीं मिली तो खाली हाथ वापस लौट गया। अगले दिन उर्वशी कुपित बनी रही, लेकिन पुरुरवा उसे मना नहीं पाया।
कुछ दिनों के उपरान्त एक रात को गन्धर्व फिर आये। उर्वशी फिर चिल्लायी, ‘‘गन्धर्व मेरा मेमना चुराये लिये जा रहे हैं!’’
इस बार पुरुरवा तत्काल उठ खड़ा हुआ और उसने गन्धर्वों का पीछा किया। शीघ्रता में उसके रात्रिकालीन वस्त्र शरीर से छूट गये। देखते-ही-देखते गन्धर्वों ने बिजली चमकाने की व्यवस्था की। उर्वशी ने उसे निर्वस्त्र देखा और अन्तर्धान हो गयी।
8. भरतमुनि, काम और अर्थ के श्राप का प्रभाव
भरतमुनि के श्राप के अनुसार, उर्वशी पचपन वर्षों तक लता के रूप में जंगल में विलीन हो गई। पुरुरवा ने उसके लिए सारा भूलोक छान मारा। वह पर्वतों, घाटियों में भटकता रहा। विक्षिप्त हो वह कभी-कभी वन की लताओं को उर्वशी समझ कर उनकाका आलिंगन कर लेता।
जब वन में वृक्षों से होकर पानी की बूँदें गिरतीं, तो उसे उनमें उर्वशी के पदचाप सुनाई पड़ते। जब आकाश स्वच्छ होता और चिड़ियाँ चहचहाती होतीं, तो उसे उर्वशी के हँसने और गाने का भ्रम होता। जब आकाश मेघाच्छन्न होता, तो उसे लगता कि उर्वशी छिपी हुई है और सहसा ही उसे मिल जाएगी, किन्तु उसकी खोज व्यर्थ गयी, उर्वशी उसे प्राप्त न हो सकी।
9. धर्म का वरदान बना आशीर्वाद
उर्वशी के वियोग में पागल हुए पुरुरवा जगह-जगह भटकने लगे। बाद में उन्हें ‘धर्म’ (या विष्णु भगवान) के वरदान के अनुसार, ज्ञान प्राप्त हुआ कि वे यज्ञ करें। पुरुरवा ने त्रेतायुग में वैदिक यज्ञों और अग्नि का विस्तार किया, जिससे प्रसन्न होकर देवों ने उन्हें उर्वशी के साथ मिलन का वरदान दिया। पचपन वर्षों के उपरान्त भरतमुनि का श्राप टूटा।
उर्वशी को पुरुरवा के सम्मुख प्रकट हुई। उसने कहा, ‘‘तुम मुझे वर्ष में अन्तिम दिन ही पा सकोगे फिर उसी दिन मुझसे समागम करना।’’ और इस प्रकार वर्ष में एक दिन ही वह पुरुरवा को प्राप्त हो पाती, सिर्फ एक ही बार पुरुरवा और उर्वशी एक दूसरे के साथ संभोग कर पाते। वर्ष के शेष दिनों वह उसकी विरह-वेदना में जला करता, उसकी खोज किया करता, किन्तु कभी नहीं खोज पाता, उस सौन्दर्य, लावण्य, मोहकता और भ व्यता के प्रतीक उर्वशी को।
इसी तरह उर्वशी ने पुरूरवा के वीर्य से आठ पुत्रों को जन्म दिया । आयु, दृढायु, वश्यायु, बलायु, धृतिमान, वसु, दिव्यायु तथा शतायु उन सबों का नाम थे ।
पुरूरवा और उर्वशी की यह कथा केवल प्रेम की नहीं, बल्कि मानव और दिव्य संसार के अंतर, मर्यादा और मोह, और कर्म के फल को समझाने वाली गूढ़ पौराणिक शिक्षा है। यही कारण है कि यह कथा युगों-युगों से सुनी, कही और समझी जाती रही है। यह प्रेम को अमर बनाती है, किंतु यह भी सिखाती है कि स्थायित्व केवल आत्मज्ञान और धर्म में ही है।
धयान देने योग्य यह है कि चंद्रवंशी पुरुरवा के बाद जो वंश आगे बढ़ा वह पुरुवंशी कहलाये। आगे चलकर इसी वंश से कुरुवंश, वृष्णिवंश और यदुवंश निकले।
पुरुरवा और उर्वशी की कथा का वर्णन करते हुए शताब्दियों बाद पाण्डुपुत्र अर्जुन उर्वशी के प्रणय याचना को ये कहते हुए ठुकरा देते हैं कि वे उनके पूर्वज पुरुरवा की पत्नी थी इसी कारण वे उनके लिए माता सामान है। अर्जुन के द्वारा इस प्रकार अपमानित होने पर उर्वशी उसे नपुंसक होने का श्राप दे देती है। हालाँकि बाद में ये श्राप अर्जुन के काम ही आता है जब उन्हें अज्ञातवास बिताना होता है। इस बारे में अर्जुन कहते हैं कि माता द्वारा क्रोध में दिया गया श्राप भी पुत्रों का भला ही करता है।
Source: पद्मपुराण
🙏 जय श्री हरी 🙏
📿“पुरूरवा और उर्वशी की अमर प्रेमकथा” लेख केवल आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी भारत के विभिन्न सनातन, वैदिक, और पौराणिक ग्रंथों के स्रोतों पर आधारित है तथा किसी भी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।
📜”पुरूरवा और उर्वशी की अमर प्रेमकथा” लेख में प्रस्तुत श्लोक पारंपरिक ग्रंथों में उपलब्ध मूल स्वरूप पर आधारित हैं। इनमें कोई जानबूझकर परिवर्तन नहीं किया गया है।
🖼️”पुरूरवा और उर्वशी की अमर प्रेमकथा” लेख में प्रयुक्त चित्र AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) द्वारा निर्मित हैं और केवल भावात्मक प्रस्तुति के उद्देश्य से उपयोग किए गए हैं।
Cosmic Harmony
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