Current image: श्री राम गीता - Bhagwan Shri Ram singhasan par virajmaan hain aur unke charanon mein haath jode vinamra aur udaasin bhav mein Lakshman ji baithe hain, bhakti aur samarpan ka divya drishya

 

श्री राम गीता

अध्यात्म रामायण


जय श्री राम🙏

आपने कभी ऐसा महसूस किया होगा कि आप जिस चीज के लिए सालों से मेहनत कर रहे थे। आपको वह चीज, वह सफलता आपको मिल जाती है। उस सफलता से कुछ पल, कुछ घंटे या कुछ दिन ख़ुशी मिलती है। अंदर से आवाज आती है अब आगे क्या? उसके बाद क्या ? आपको धीरे-धीरे ख़ुशी के बजाय एक अजीब सा खालीपन महसूस होता है।

आज हम इस लेख में रामायण कथा के उन दो पात्रों की बातचीत बताने जा रहें। एक ऐसी बातचीत जो हजारों साल पहले दो भाइयों के बीच हुई थी। उस बातचीत की गूंज आज भी हमारे दिलों के खालीपन को भर सकती है।

आप इस पोस्ट पर आये हैं तो यह कोई संयोग नहीं है। यकीन मानियें यह आपके लिए एक ईशारा है। शायद आप अपने जीवन में किसी ऐसे स्थान पर खड़े हैं, जहाँ आपके पास सबकुछ होकर भी एक अधूरापन है। आप जीवन के उन गहरे सवालों का जवाब ढूंढ रहें हैं जो हर किसी के मन में कभी-न-कभी उठते हैं।

 

  • दुःख क्या है ?
  • जीवन का असली मकसद क्या है ?
  • इस माया के चक्र से बाहर कैसे निकले?

 

यही प्रश्न एक बार लक्ष्मण जी के मन में भी उठे थे। उस समय स्वयं प्रभु श्रीराम ने उन्हें वह परम ज्ञान दिया जो श्री राम गीता कहलाता है।

हम सब ने भगवान श्रीराम की कहानी अवश्य सुनी है जो भारत के जनमानस में सबसे लोकप्रिय, प्रसिद्ध और पवित्र पौराणिक ग्रंथों में से एक है। भगवान श्रीराम के पराक्रम, उनके त्याग और उनके राजा बनने की कहानी गौरवशाली सनातन भारत का अभिन्न संस्कृति का हिस्सा है।

क्या आपने कभी उस श्री राम को जाना है, जो एक गुरु हैं, दार्शनिक हैं, एक भाई हैं जो ज्ञान देते हैं जो इंसान को हमेशा के लिए मुक्त कर सकता है ? आज आप इस लेख में रामायण की कथा नहीं पढ़ने जा रहें हैं, बल्कि उस गहरे ज्ञान के समंदर में डूबकी लगाने जा रहें है जिसका नाम है “श्री राम गीता”।

बात उस समय की है जब रावण मारा जा चूका था और 14 साल का वनवास समाप्त हो चूका था। अयोध्या में रामराज्य की स्थापना हो चुकी थी। चारों तरफ जश्न का माहौल था। अयोध्या के हर घर में दिए जल रहे थे। हर कोई खुश था।

लेकिन एक इंसान खुश नहीं था और वह थे लक्ष्मण। वह लक्ष्मण जिन्होंने बड़े भाई के लिए 14 साल नींद और आराम त्याग दिया। वह लक्ष्मण जो हर पल श्री राम की परछाई बनकर रहे।

वह लक्ष्मण जो हर पल श्री राम के परछाई बनकर रहे और हर परिस्थिति में ढाल बनकर उनके आगे खड़े थे। अब जब सबकुछ ठीक हो गया था तो उन्हें सबसे ज्यादा खुश होना चाहिए था। है न ? लेकिन हो रहा था बिलकुल उल्टा। उनके अंदर एक ऐसा तूफान चल रहा था. जिसे वह किसी से कह नहीं पा रहे थे। वह देख रहे थे कि कैसे उनके भैया राम जिन्हें वह भगवान मानते थे, माता सीता को बस कुछ लोगों के कहने पर त्याग रहें हैं? लक्ष्मणजी का दिमाग सवालों से भर गया था।

क्या यही धर्म है ? क्या यही न्याय है ?

लक्ष्मण जी का विचार केवल सीताजी के त्याग की नहीं थी। यह उनके अपने अस्तित्व पर सवाल था। उन्हें लग रहा था कि यह दुनिया, यह रिश्ते, यह सुख-दुःख सब एक धोखा है। आज जो अपना है, कल पराया हो जाता है। एक ऐसी अवस्था जहाँ आपको हर चीज अर्थहीन लगने लगती है। उनका मन अशांत था, बेचैन था और इसी बेचैनी ने उन्हें उस सवाल को पूछने पर मजबूर कर दिया जो इस श्री राम गीता का आधार बना।

लक्ष्मण जी का यह गहरा दुःख और भ्रम, असल में हम सबका दुःख है। दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य, सबसे प्यारे भाई का साथ, और हर तरह की सुख सुविधा रहते हुए भी मन में शांति नहीं।

बाहरी जीत तबतक अधूरी है जबतक अंदर की जंग न जीत लें। हम सब अपने जीवन में किसी न किसी रावण से संघर्ष कर रहें। कोई पैसों के लिए, कोई सफलता के लिए, कोई रिश्तों के लिए ? लेकिन क्या हमने कभी सोंचा है कि उस रावण को हराने के बाद क्या होगा? क्या असली शान्ति मिल जाएगी ?

लक्ष्मण जी का दुःख हमें यह सोंचने पर मजबूर कर देता है कि असली समस्या बाहर नहीं, अंदर है। हमारी सोंच में, हमारे लगाव में और इस दुनिया को देखने के हमारे नजरिये में। लक्ष्मण का यही दुःख उस परम ज्ञान को जन्म दिया था, जो न सिर्फ लक्ष्मण को बल्कि आने वाली हजारों पीढ़ियों को रास्ता दिखाने वाला था।

ज्यादा जरुरी है सही सबाल

दोस्तों, कहते हैं कि सही जवाब मिलना इतना जरुरी नहीं है, जितना जरुरी सही सवाल पूछना है। हमारा पूरा जीवन इस बात पर निर्भर करता है कि हम स्वयं से और इस दुनिया से कैसे सवाल पूछते हैं। लक्ष्मण जी के मन में जो विचारों का तूफान था, जो भ्रम था, वह उन्हें सीधा श्री राम जी के पास ले गया।

जरा सोंचिये, अगर हममें से कोई व्यक्ति अपने भाई या अपने माता पिता से ऐसी परिस्थिति में सवाल पूछता तो कैसे पूछता? जो आप सोंच रहें हैं ठीक उसका उल्टा लक्ष्मण जी ने किया।

लक्ष्मण जी आँखों में आंसू लिए श्री राम के पास पहुंचे और उनके चरणों में बैठ गए। उन्होंने श्री राम से कोई शिकायत नहीं की। कोई गुस्सा नहीं दिखाया। उन्होंने बस एक सवाल पूछा। एक ऐसा सवाल जो शायद हम सब पूछना चाहते हैं, लेकिन हमारे पास शब्द नहीं होते।

लक्ष्मण जी का सबाल

लक्ष्मण जी प्रभु श्री राम से पूछते हैं – हे प्रभु मैं इस संसार के जाल में फंस गया हूँ। यह मोह, माया, लगाव, यह सुख-दुःख का चक्र मुझे बहुत पीड़ा दे रहा है। मुझे हर चीज झूठी और क्षणिक लग रही है। इस बंधन से और इस पीड़ा से आजाद होना चाहता हूँ। कृपा करके मुझे वह ज्ञान दीजिये, वह रास्ता दिखाइए, जिससे मुझे हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाए।

आप लक्ष्मण जी द्वारा पूछे गए प्रश्न को पुनः पढ़िए। इसमें एक भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने की गुंजाईश नहीं दिख रही है। यह प्रश्न कोई मामूली नहीं था। प्रभु से प्रश्न कैसा? लक्ष्मण जी ने यह नहीं पूछा कि आपने सीता माता को क्यों त्यागा? नहीं, उन्होंने समस्या के मूल पर सीधा हमला किया। उन्होंने बाहरी स्थिति को बदलने की बात नहीं की, बल्कि स्वयं को बदलने और ऊपर उठाने का रास्ता पूछा। यह शिष्य का अपने गुरु से, एक भक्त का अपने भगवान से, और एक आत्मा का परमात्मा से पूछा गया सबसे सुद्ध था।

श्री राम गीता आध्यात्मिक ज्ञान, आत्मज्ञान, और वेदांत का एक पवित्र ग्रंथ है, जिसमें मुख्य रूप से भगवान श्रीराम द्वारा पहले हनुमानजी और बाद में लक्ष्मणजी को दिए गए उपदेश शामिल हैं। यह मुख्य रूप से अध्यात्म रामायण (उत्तरकांड) का हिस्सा है, लेकिन इसके कुछ रूप गुरु वशिष्ठ द्वारा वर्णित ज्ञान-आधारित संवाद के रूप में भी मिलते हैं। यह कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्ति के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार पर जोर देती है।

प्रभु श्री राम का उत्तर

प्रभु श्री राम जी लक्ष्मण जी की हालत देखकर मुस्कुराये। यह दया की मुस्कान थी। यह समझने की मुस्कान थी। उन्हने लक्ष्मण को उठाया और कहा, लक्ष्मण तुम धन्य हो। तुम्हारी बुद्धि सही दिशा में जा रही है। संसार के ज्यादातर लोग तो बस बाहरी चीजों में ही उलझे रहते हैं। वह कभी ऐसी सवाल पूछते ही नहीं। तुमने जो पूछा है, वह परम ज्ञान का दरवाजा है। मैं तुम्हें वही रहस्य बताऊंगा जो मैंने पहले हनुमान को बताया था। इसे ध्यान पूर्वक सुनों क्योंकि यह ज्ञान तुम्हें इस माया के समंदर से पार ले जायेगा।

श्री रामजी ने लक्ष्मण को बताया की तुम जो दुःख महसूस कर रहे हो, वह तुम्हारा असली स्वाभाव नहीं है। दुःख, दर्द, गुस्सा यह सब तो बस मन के खेल है जो आते-जाते रहते हैं। तुम वो आसमान हों जिसमें बादल आते-जाते रहतें हैं। तुम आसमान हो और बादल सुख-दुःख है। तुम वो नहीं हो, जो दुखी है। तुम वो हो जो इस दुःख को देख रहा है।

यह माइंड ब्लोइंग कांसेप्ट था। यहीं पर श्री राम ने उस सबसे बड़े सबल का बीज बो दिया, जो हर आध्यात्मिक खोज का केंद्र है। मैं कौन हूँ ?

भगवान श्री राम ने लक्ष्मण को तैयार किया एक ऐसी सच्चाई सुनने के लिए जो शायद उनके अबतक के सारे विश्वास को अलग नजरिये से अनुभव होने वाली थी। उन्होंने कहा कि मुक्ति कोई ऐसी चीज नहीं है जो मरने के बाद किसी स्वर्ग में मिलती है। नहीं, मुक्ति तो यहीं इसी पल में संभव है।

हम पूरी जिंदगी यही सोंचते रहते हैं कि हम यह शरीर है, यह नाम है, यह रिश्ते हैं, यह जॉब है, यह बिज़नेस है। लेकिन प्रभु श्री राम कहते हैं कि यह सब तुम्हारी असली पहचान नहीं है। यह तो बस वस्त्रों की तरह है जो तुमने पहने हुए हो। असली पहचान क्या है? वह कौन सी सच्चाई है, जिसे जानने के बाद कोई दुःख, कोई डर हमें छू भी नहीं सकता।

सपनों की सच्चाई

श्री राम कहते हैं कि एक इंसान सपने में स्वयं को राजा या भिखारी देख सकता है। वह सपने में खुशी और दुःख महसूस कर सकता है। लेकिन जैसे ही वह जागता है उसे पता चलता है कि वह न तो राजा था और न भिखारी। वह तो हमेशा से वही था जो वह है। ठीक उसी तरह यह जिंदगी और यह दुनिया भी एक लम्बे सपने की तरह है। इस सपने को सच मानकर स्वयं को एक शरीर और मन मानकर सुख-दुःख का अनुभव करते हैं। जो हमारी असली पहचान है वह सबसे अलग है, वह सबसे पड़े है। उसका असली स्वरुप आत्मा है। तुम शुद्ध चेतना हो।

स्वयं ही वह परम सत्ता हो

श्री राम समझाते हैं कि यह वह जागरूकता है, जिसके कारण तुम्हें हर चीज का अनुभव होता है। आप सोंचिये, जब आप गहरी नींद में होते हैं, तब आपको न अपने शरीर का पता होता है न दुनिया का। लेकिन, जैसे ही आप जागते हैं, आपको सब कुछ महसूस होने लगता है। यह जो होने का एहसास है, वही आत्मा है। असल में, दो कुछ भी नहीं है। वह आत्मा जो तुम्हारे अंदर है और वह ब्रह्म जो पुरे ब्रह्माण्ड में है, वह दोनों एक ही है।

यह सुनकर लक्ष्मण जी का दिमाग घूम गया होगा। कहाँ वह स्वयं को एक दुखी और परेशां इंसान समझ रहे थे और कहाँ श्री राम उन्हें बता रहे थे कि “तुम स्वयं ही वह परम सत्ता हो।

भ्रम और सुख-दुःख क्यों

प्रश्न उठता है कि अगर हम सब वही भ्रम हैं, वही सुद्ध चेतना हैं तो फिर हमें यह महसूस क्यों नहीं होता ? हम स्वयं को इस छोटे से शरीर में कैद महसूस करते हैं? क्यों जमे दुःख दर्द असली लगते हैं ? अगर दुनिया एक सपना है तो इतनी वास्तविक क्यों लगती है ?

भगवान श्री राम ने इस सबाल के जबाव में ही उस सबसे बड़ी पहेली को समझाया, जो इस पुरे खेल को चला रही है। वो पावर जो एक को अनेक दिखाती है और जो हमें हमारी असली पहचान से दूर रखती है। उस पावर का नाम है “माया”। माया कैसे काम करती है और इसके जाल से कैसे निकाला जा सकता है ? यही वो रहस्य है जो हमारे सारे बंधनों को समाप्त कर सकता है।

भगवान की सृजनात्मक शक्ति

माया भगवान् की वह सृजनात्मक शक्ति (क्रिएटिव पावर) है जो इस एक निराकार ब्रह्म को अनेक नामों और रूपों वाली दुनिया की तरह दिखाती है। श्री राम इस गीता के माध्यम से समझाते हैं कि माया के दो बड़े काम है।

पहला, माया असली चीज को छुपा देती है। जैसे बादल सूरज को छुपा देती है, वैसे ही माया हमारी असली पहचान यानि आत्मा को छुपा देती है।

दूसरा, माया उसकी जगह कुछ और दिखाती है जो असली नहीं है। जैसे अँधेरे में रखी रस्सी को सांप समझ लेना जबकि रस्सी असली है, लेकिन हमारा डर और अज्ञान उसे सांप की तरह दिखाता है।

माया के कारण यह दुनिया, यह लोग, और यह रिश्ते हमें सुख-दुःख की तरह दिखाई देता है। यह माया इतनी शक्तिशाली है कि यह हमें यकीन दिला देता है कि यही दुनिया सच है जो दिख रहा है। हम यह छोटा सा शरीर है जो पैदा होता है और मर जाता है। यही से हमारे सारे दुःख और डर की शुरुआत होती है।

हम स्वयं को एक सामान्य इंसान मान लेते हैं तो हमें चीजों से लगाव हो जाता है। हमें लगता है कि यह मेरा घर है। यह मेरा परिवार है। यह मेरा पैसा है। जब कभी यह चीजें हमसे दूर होती है, तो हमें दुःख होता है। हमें भविष्य का डर सताता है। हमें मौत से डर लगता है। यह सब माया का ही खेल है। वह हमें इस दुनिया के खेल में इतना उलझा देती है कि हम भूल जाते हैं कि हम इस खेल के खिलाडी नहीं बल्कि वो हैं जो इस खेल को देख रहा है।

माया इतनी शक्तिशाली क्यों

यह सुनकर लक्ष्मण जी ने पूछा कि अगर यह माया इतनी शक्तिशाली है तो क्या इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है ? क्या हम हमेशा इसी धोखे में जीते रहेंगे ?

माया जाल को कैसे ख़त्म करें

श्री राम ने लक्ष्मण जी को वह उम्मीद की किरण दिखाई। प्रभु श्री राम ने कहा कि माया मेरी ही शक्ति है और इसलिए यह इतनी शक्तिशाली है। इसे अपने दम पे पार करना लगभग असंभव है, लेकिन जो पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ मेरी शरण में आ जाता है, वह इस माया के सागर को आसानी से पार कर लेता है।

यहाँ पर भक्ति का मतलब सिर्फ पूजा पूजा पाठ या उपवास करना नहीं है। भक्ति का मतलब है समर्पण। यह मान लेना कि मैं अपनी छोटी सी बुद्धि से इस मुश्किल से पार नहीं कर सकता। हे प्रभु ! अब आप ही रास्ता दिखाइए। जैसे ही हम अपना “मैं” ईश्वर को सौंप देते हैं। माया का असर हमपर कम होने लगता है। क्योंकि माया अहंकार पर ही काम करती है। जब “मैं” नहीं रहा तो “मेरा” का सबाल ही ख़त्म हो जाता है।

श्री राम गीता के अनुसार, ज्ञान की तलवार से ही माया के इस जाल को काटा जा सकता है और वह ज्ञान क्या है? वही ज्ञान जो बताती है कि मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ। इस विचार को इस एक अनुभव को लगातार अपने अंदर बनायें रखना ही माया से मुकाबला करने का सबसे अहम हथियार है। लेकिन यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल है। हमारा मन बार-बार हमें पुराणी आदतों में खींच लाता है।

मन और आत्मा की कहानी

हमारा मन और आत्मा उन दो पक्षी तरह है जो एक पेड़ के दो डाली पर ऊपर निचे दोनों बैठे हैं। एक पक्षी जो निचे डाल पर बैठा है वह बहुत ही चंचल है। वह वृक्ष पर लगे फल को कभी पूरा खा जा रहा है तो कभी चखकर नीचे फेंक दे रहा है। मीठे फल मिलने पर वह खुश होता है और पूरा खा जाता है, जबकि खट्टे फल को चखते ही दुखी हो रहा है और मेहनत बेकार समझकर निचे फेक दे रहा है।

वह पक्षी फलों के स्वाद की दुनिया में डूबा हुआ है। यह पक्षी है हमारा मन, जो ईगो, कभी ख़ुशी कभी गम में उलझा हुआ है। हमारा मन पूरी तरह से दुनिया के उतार-चढाव पर प्रतिक्रिया करता है।

उसी वृक्ष के दूसरी डाली पर एक आत्मा रूपी पक्षी बैठा है। वह कुछ भी नहीं करता है। न कुछ बोलता है और न कुछ प्रतिक्रिया करता है। उसे फलों के खट्टे मीठे स्वाद से कोई लेना-देना नहीं है। उसे सुख-दुःख से भी कुछ लेना देना नहीं है। वह चुपचाप शांत भाव से निचे की डाली पर बैठे मन रूपी पक्षी के गतिविधि को देखता रहता है। वह बस एक साक्षी की तरह है।

जब मनरूपी पक्षी दुखी, असहाय और पूरी तरह निराश हो जाता है, तब वह ऊपर की डाल पर बैठे आत्मारूपी पक्षी को ओर देखता है। वह सोंचता है यह कितना शांत है। उसे देखकर मनरूपी पक्षी को सुकून मिलता है। फिर, धीरे-धीरे उसकी तरफ जाने की कोशिश करता है। जैसे-जैसे वह आत्मारुपी पक्षी के नजदीक पहुँचता है, उसे फलों के खट्टे-मीठे स्वाद का असर कम होने लगता है।

जब पास पहुँचता है तो एक गजब घटना होती है, वहाँ कोई दूसरा पक्षी नहीं है। लेकिन वह घबराता बिलकुल भी नहीं है। वह अब उसी की तरह रहने लगता है। शांत, स्थिर, और दुनिया के माया जाल ऊपर। आत्मारुपी पक्षी उस मनरूपी पक्षी में एकाकार हो चूका था।

यह कथा, हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा सच है। हमारे अंदर आत्मा और मन नामक दोनों पक्षी मौजूद है। हमारा मन जो दिन-रात सुख-दुःख में गोते लगा रही है और हमारी आत्मा जो मन के क्रियाकलाप को ध्यान से देख रही है। मन को आत्मा से जोड़ना ही ध्यान है और जब मन आत्मा से जुड़ता है तब आत्मा से परमात्मा स्वयं जुड़ते हैं। जिस दिन हम कार्य करना शुरू करते हैं, उसी दिन से हम इस दुनिया में रहते हुए भी इसके दुखों से ऊपर उठ जायेंगे।

अब सबाल यह है कि इस संसार में तो हमें जीने के लिए काम करना होता है। क्रिया-प्रतिक्रिया करना होता है। हम हर समय साक्षी बनकर कैसे बैठ सकते हैं ? क्या हमें सबकुछ त्याग कर साधु बन जाना चाहिए ? इसका उत्तर है नहीं।

कर्म बंधन से मुक्ति

प्रभु श्री राम कहते हैं कि सांसारिक वातावरण यानि घर परिवार में रहते हुए भी और सारे कार्य करते हुए भी मुक्त रहा जा सकता है। इसी कला का नाम है “कर्मयोग”। कर्मयोग अर्थात कर्म करते हुए भी कर्म बंधन से मुक्ति।

कर्म करना इस प्रकृति का नियम है। आप चाहकर भी बिना कर्म किये नहीं रह सकते। साँस लेना भी एक कर्म है। सोंचना, विचार करना भी एक कर्म है। इसलिए कर्म त्यागना समाधान नहीं है। असली समस्या कर्म नहीं बल्कि कर्म के साथ हमारा लगाव है। यहीं पर भगवद्गीता का सार समझाते है, जिसे कहते हैं कर्मयोग। कर्मयोग का सीधा अर्थ है बिना किसी सफलता-असफलता की आशा के पूरी मेहनत और ईमानदारी से कर्म करो।

कर्म के परिणाम की चिंता क्यों नहीं करें

कर्म के परिणाम की चिंता मत करो। परिणाम क्या मिलेगा ? यह सोंचकर परेशान मत हो। आपका अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके परिणाम पर नहीं।

यह सुनने में बहुत सामान्य लगता है, लेकिन यह हमारे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती है। हम तो कोई भी काम परिणाम के लिए ही करते हैं। अध्यन करते हैं अच्छे अंक पाने के लिए। नौकरी करते हैं, वेतन पाने के लिए। हम बिना फल की इच्छा के कैसे काम करें ?

श्री राम गीता में इसका तरीका बताया गया है। अपने हर काम को एक पूजा समझो। जब आप कोई काम करते हैं तो बेहतर परिणाम की आशा रखते हैं, जिसके कारण काम से अधिक परिणाम से लगाव हो जाता है। जब परिणाम से लगाव होगा तो सुख या दुःख मिलेगा।

जब आप वही काम भगवान के लिए या लोगों के भलाई के लिए करते हों तो वह कर्म पूजा बन जाता है। आप अपना सबसे बेहतर करने की कोशिश करते हो। परिणाम को ईश्वर की मर्जी पर छोड़ दीजिए। इससे आपके मन पर कोई बोझ नहीं रहेगा। सफलता मिली तो ईश्वर का प्रसाद और असफलता मिली तो ईश्वर की मर्जी समझिये।

पहचान आपके काम से ज्यादा बड़ी है

आपकी असली पहचान आपके काम से ज्यादा बड़ी है। जब यह सोंचकर काम करते हैं तो काम की गुणवत्ता बढ़ जाती है, क्योंकि आप डर और लालच में काम नहीं कर रहे हो बल्कि अपनी ऊर्जा और एकाग्रता के साथ काम कर रहे हो, जहां आप काम में इतने डूब जाते हो कि आपको समय का पता ही नहीं चलता। यही कर्मयोग की निशानी है।

कर्म करते हुए भी कर्म बंधन से मुक्त रहना एक कला है और इस कला में निपुणता होने के लिए मन की एकाग्रता बहुत जरुरी है। लेकिन, हमारा मन तो बन्दर की तरह है, जो एक जगह रुकता नहीं हैं।

इस मन को कैसे साधा जाये? इसे ज्ञान और कर्म के रस्ते पर चलने के लिए कैसे तैयार किया जाये? इसके लिए, प्रभु श्री राम ने सबसे शक्तिशाली उपाए बताते हैं, जो हर इंसान के पास है और वह उपाय है “भक्ति”।

भक्ति की ताकत

भक्ति की ताकत क्या है और कैसे हमारे मन को बदल सकती है ? हमारा मन हजारों इच्छाओं, डरों और आदतों से भरा हुआ है। मन को ज्ञान की बातें ज्यादा देर अच्छी नहीं लगती। यह बार-बार हमें दुनिया की तरफ खींचता है।

श्री राम गीता में भक्ति को एक गहरे और वैज्ञानिक तरीके से समझाया गया है। भक्ति का असली मतलब है प्रेम और समर्पण। जब आप किसी से प्रेम करते हैं तो आपका मन स्वाभाविक रूप से उसी के बारे में सोंचता है। आपको उसके लिए कुछ भी करना अच्छा लगता है। बस इसी प्रेम को भगवान की तरफ घुमा देना है।

समर्पण कैसे करें

जब आप ईश्वर को अपना सबसे प्रिय मान लेते हैं तो आपका मन 24 घंटे उसी में लगा रहता है। श्री राम कहते हैं कि ज्ञान का रास्ता कुछ सूखा और मुश्किल हो सकता है। मैं आत्मा हूँ। यह विचार बनायें रखना हर किसी के लिए आसान नहीं है। लेकिन भक्ति का रास्ता बहुत रसीला और आनंद से भरा है। यहां आपको कुछ त्यागना नहीं है। अपना हर काम, अपनी हर भावना, अपना हर रिश्ता सबकुछ ईश्वर को समर्पित कर देना है।

  1. जब आप भोजन करें तो यह सोंचे कि आप भगवान् को भोग लगा रहे हैं।
  2. जब आप काम करें तो यह सोंचें कि आप भगवान की सेवा कर रहें हैं।
  3. जब आप किसी से मिलें तो यह सोंचें कि आप हर इंसान में बसे उसी भगवान से मिल रहें हैं।

इस प्रकार आपका पूरा जीवन ही एक पूजा बन जाता है। भक्ति हमारे मन को शुद्ध करने का सबसे तेज तरीका है। जब हम लगातार भगवान का नाम लेते हैं, उनकी कहानियां सुनते है तो हमारे मन से धीरे-धीरे नकारात्मक विचार अपने आप निकलने लगते हैं। हमारा मन शांत, एकाग्रता और प्रेम से भर जाता है।

जीते जी मुक्ति

एक शांत और शुद्ध मन ही ज्ञान को ग्रहण करने लायक बनता है। ज्ञान और भक्ति अलग-अलग रास्ते नहीं है, बल्कि एक ही गंतव्य तक पहुँचने के दो रास्ते हैं। भक्ति मन को तैयार करती है और ज्ञान उसे आजाद करता है।

जब कोई इंसान इस ज्ञान को अपने जीवन में उतार लेता है तो उसका जीवन मुक्त हो जाता है यानि जीते जी मुक्ति। यह कोई मरने के बाद मिलने वाला स्वर्ग नहीं बल्कि यहीं इसी दुनिया में और इसी शरीर में अनुभव की जानेवाली एक अवस्था है। ऐसा व्यक्ति सुख में ज्यादा खुश नहीं होता और दुःख में ज्यादा परेशान नहीं होता। वह मान और अपमान, सर्दी और गर्मी, सफलता और असफलता सब में एक जैसा स्थिर रहता है।

जीवन मुक्त इंसान दुनिया से भागता नहीं है। वो अपने सारे काम करता है। अपनी सारी जिम्मेदारियां निभाता है, लेकिन बिना किसी लगाव के और बिना की तनाव के। वह एक कमल के पत्ते की तरह हो जाता है, जो रहता तो पानी में है लेकिन पानी का एक बून्द भी उसे गीला नहीं कर पाती। भय, भविष्य और मौत की उसे कोई चिंता नहीं होती वह तो अमर आत्मा है जिसका न कभी जन्म हुआ और न कभी मृत्यु होगी।

वह इस परम सत्य में जीता है। यह अवस्था किसी चमत्कार से नहीं बल्कि लगातार अभ्यास और वैराग्य से मिलती है। यह एक दिन की बात नहीं बल्कि पूरी जिंदगी की साधना है , श्री राम गीता उसी साधना का सम्पूर्ण रास्ता है।

Source: अध्यात्म रामायण

🙏 जय श्री सीताराम 🙏

 

📿 “श्री राम गीता” लेख केवल आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी भारत के विभिन्न सनातन, वैदिक, और पौराणिक ग्रंथों के स्रोतों पर आधारित है तथा किसी भी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।

📜 श्री राम गीता लेख में प्रस्तुत श्लोक पारंपरिक ग्रंथों में उपलब्ध मूल स्वरूप पर आधारित हैं। इनमें कोई जानबूझकर परिवर्तन नहीं किया गया है।

🖼️ इस लेख में प्रयुक्त चित्र AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) द्वारा निर्मित हैं और केवल भावात्मक प्रस्तुति के उद्देश्य से उपयोग किए गए हैं।


✍️ लेखक: Arvind Kumar Singh
Cosmic Harmony

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