
पद्ममहापुराण — सृष्टिखण्ड, अध्याय 12
चंद्र वंश की उत्पत्ति: हैहय वंश और सहस्त्रार्जुन की उत्पत्ति
जय श्री हरी🙏
प्राचीन भारत की वंश परंपराओं में हैहय वंश का नाम विशेष सम्मान और वीरता के साथ लिया जाता है। इन श्लोकों में बताया गया है कि चन्द्रवंश की परंपरा से आगे चलकर हैहय वंश का प्रादुर्भाव हुआ।
यह वंश शौर्य, शासन-कुशलता और यज्ञ-दान में अग्रणी था। हैहय राजाओं का उद्देश्य केवल राज्य विस्तार नहीं, बल्कि धर्म के अनुसार प्रजा का पालन करना था। यह वंश अपने तेज, ऐश्वर्य और पराक्रम के लिए प्रसिद्ध रहा है।
इसी वंश में जन्मे कार्तवीर्य अर्जुन, जिन्हें सहस्त्रार्जुन कहा गया, इतिहास और पुराण—दोनों में अद्वितीय स्थान रखते हैं। यह कथा राजसी गौरव, तपोबल से प्राप्त वरदान और चक्रवर्ती सम्राट के उत्कर्ष की गाथा है।
दोस्तों, राजा ययाति के बाद चन्द्रवंश में वंश विभाजन हो गया, क्यों ?
राजा नहुष के सात पुत्र थे, जिनमे सबसे बड़ा यति था। यति को राजा बनने की कोई इच्छा नहीं था, क्योंकि वह साधु संत विचार का व्यक्ति थे और वह तपस्या करने वन में चले गए। इसलिए, राजा नहुष के दूसरे बेटे ययाति राजा बना। ययाति के बाद चन्द्रवंश में वंश विभाजन मुख्यतः राजसत्ता, श्राप और उत्तराधिकार के कारण हुआ। यह कथा महाभारत, भागवत पुराण और अन्य पुराणों में विस्तार से मिलती है।
- राजा ययाति के दो पत्निया थी,
- पहली पत्नी ‘शर्मिष्ठा’, जो दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री थी और दूसरी पत्नी ‘सुव्रता देवयानी, जो दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री थी।
- राजा ययाति के पांच पुत्र हुए।
- शर्मिष्ठा से द्रुह्यु, अनु और पुरु का जन्म हुआ और देवयानी से यदु और तुर्वसु का जन्म हुआ।
राजा ययाति को शुक्राचार्य ने समय से पहले वृद्ध होने का श्राप दिया था। तब ययाति ने अपने पाँचों पुत्रों से कहा कि वे अपनी युवावस्था उन्हें दे दें और उनका बुढ़ापा ले लें, ताकि वे कुछ समय और भोग कर सकें। राजा ययाति के चार पुत्र यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु ने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया, लेकिन सबसे छोटे पुत्र पुरु ने पिता की आज्ञा मानकर अपना यौवन दे दिया और स्वयं वृद्धावस्था स्वीकार कर ली।
परिणाम यह हुआ कि जब ययाति को अंततः वैराग्य हुआ, तब उन्होंने पुरु को मुख्य राज्य और राजगद्दी दे दी। अन्य पुत्रों को अलग-अलग दिशाओं में राज्य देकर अलग वंश स्थापित करने भेज दिया।
इसी कारण यदु से यदुवंश पुरु से पुरुवंश और इस प्रकार तुर्वसु, अनु और द्रुह्यु से अलग शाखाएँ बनीं। यही आगे चलकर चन्द्रवंश के कई उपवंशों में विभाजन का कारण बना। यदु से यदुवंश चला, जिसमें आगे चलकर श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। पुरु से पुरुवंश चला, जिसमें आगे कौरव और पांडव उत्पन्न हुए।
भोग की इच्छा कभी समाप्त नहीं होती। आज्ञाकारिता और त्याग से ही वास्तविक सम्मान मिलता है। इसलिए पुरु को मुख्य उत्तराधिकारी बनाया गया, जबकि ज्येष्ठ पुत्र यदु होते हुए भी राजसिंहासन नहीं मिला।
पद्मपुराण सृष्टिखण्ड के 12वें अध्याय श्लोक संख्या 98 से 116 में पुलस्त्य महर्षि ने श्लोक भीष्मजी को सुनाते हैं। आइये श्लोक के अनुसार कथा हिंदी अर्थों में पढ़ते हैं।
1. यदुवंश की महिमा, श्रीकृष्ण–बलराम अवतार और हैहय वंश की उत्पत्ति
यदु के तेजस्वी वंश में अनेक पराक्रमी यादव उत्पन्न हुए, और उसी गौरवशाली यदुवंश में आगे चलकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी ने अवतार लिया। उनका अवतरण केवल एक राजवंश की वृद्धि के लिए नहीं, बल्कि पृथ्वी के भार को उतारने, अधर्म का नाश करने और धर्म की पुनः स्थापना करने के लिए हुआ था। इस दिव्य वंश पर देवताओं की विशेष कृपा मानी जाती है।
यदु के वंश में पाँच प्रमुख पुत्र उत्पन्न हुए—सहस्रजित्, क्रोष्टा, नील, अञ्जिक और रघु। इनमें सहस्रजित् ज्येष्ठ और अत्यंत प्रतापी थे। सहस्रजित् के पुत्र राजा शतजित् हुए जो धर्मनिष्ठ और यशस्वी राजा थे।
शतजित् के तीन परम धार्मिक पुत्र हुए—हैहय, हयता और तालहय।
हैहय का पुत्र धर्मनेत्र विशेष रूप से प्रसिद्ध हुए। हैहय केवल एक राजकुमार नहीं थे, बल्कि आगे चलकर एक प्रभावशाली वंश के प्रवर्तक बने। हैहय के नाम पर ही आगे चलकर हैहय वंश प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार हैहय यदुवंश की उस शाखा के मूल स्तंभ बने, जिसने अनेक पराक्रमी राजाओं को जन्म दिया।
हैहय के पुत्र धर्मनेत्र कहलाए। धर्मनेत्र भी अपने पिता हैहय की भाँति धर्मपरायण और न्यायप्रिय थे। धर्मनेत्र के पुत्र कुन्ति हुए, और कुन्ति के पुत्र मात हुए। इस प्रकार हैहय से प्रारंभ हुआ यह वंश आगे बढ़ता गया और हैहय वंश की प्रतिष्ठा दूर-दूर तक फैल गई।
पुराणों में वर्णित है कि हैहय वंश अपनी वीरता, शासनकुशलता और धार्मिक आचरण के लिए विख्यात था। आगे चलकर इसी हैहय वंश में कार्तवीर्य अर्जुन जैसे महान सम्राट उत्पन्न हुए, जिनकी कीर्ति सम्पूर्ण आर्यावर्त में गूँज उठी। इस प्रकार यदुवंश की एक प्रमुख शाखा के रूप में हैहय और उनका वंश भारतीय इतिहास एवं पुराणों में विशेष स्थान रखता है।
2. हैहय वंश का विस्तार: महिष्मान से कृतवीर्य अर्जुन तक
यदुवंश की उस गौरवशाली शाखा में, जहाँ से हैहय वंश की प्रतिष्ठा प्रारम्भ हुई, आगे चलकर अनेक पराक्रमी और धर्मनिष्ठ राजाओं ने जन्म लिया। हैहय से चली यह वंशधारा समय के साथ और भी सुदृढ़ होती गई, और उसी हैहय वंश में संहत के पुत्र राजा महिष्मान् उत्पन्न हुए।
राजा महिष्मान् अत्यंत प्रतापी और दूरदर्शी शासक थे। कहा जाता है कि उनके नाम पर ही महिष्मती नगरी का विस्तार और वैभव बढ़ा। महिष्मान् के पुत्र भद्रसेन हुए, जो अपने पिता के समान ही शौर्य और नीति के धनी थे। भद्रसेन का प्रभाव इतना व्यापक था कि वे वाराणसी के भी अधिपति माने गए। उनके शासनकाल में हैहय वंश की कीर्ति और भी फैलने लगी।
भद्रसेन के पुत्र दुर्दम हुए। दुर्दम अपने नाम के अनुरूप अजेय और दृढ़ निश्चयी थे। दुर्दम के पुत्र धनक (भीम) हुए, जो अपनी शक्ति और पराक्रम के कारण प्रसिद्ध थे। धनक के चार लोकविख्यात पुत्र हुए—कृताग्नि, कृतवीर्य, कृतधर्मा और कृतौजा। इन चारों ने हैहय वंश की मर्यादा और परंपरा को आगे बढ़ाया।
इनमें कृतवीर्य विशेष रूप से विख्यात हुए। कृतवीर्य के पुत्र सहस्रार्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) हुए, जो हैहय वंश के सबसे महान और प्रतापी सम्राट माने जाते हैं। सहस्रार्जुन ने अपने पराक्रम, तप और दैवी वरदानों के कारण असाधारण शक्ति प्राप्त की थी। उनके सहस्र भुजाओं की कथा पुराणों में प्रसिद्ध है, जिसके कारण वे सहस्रार्जुन कहलाए।
इस प्रकार महिष्मान् से लेकर कृतवीर्य अर्जुन तक हैहय वंश का विस्तार केवल वंशवृद्धि की कथा नहीं, बल्कि धर्म, पराक्रम, शासनकौशल और यश की सतत परंपरा की गाथा है। हैहय वंश ने भारतीय पुराणों और इतिहास में अपना विशिष्ट स्थान इसी तेजस्वी परंपरा के कारण प्राप्त किया।
3. सहस्त्रार्जुन की तपस्या, दत्तात्रेय की कृपा और चार अद्भुत वरदान
हैहय वंश के महान सम्राट सहस्त्रार्जुन, जिन्हें कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से भी जाना जाता है, असाधारण पराक्रम और तेज के धनी थे। पुराणों में वर्णित है कि उनकी एक हजार भुजाएँ थीं। यह केवल शारीरिक सामर्थ्य का प्रतीक नहीं, बल्कि उनकी व्यापक शक्ति, संगठन क्षमता और अद्वितीय शासन कौशल का भी संकेत था। वे सातों द्वीपों के अधिपति बने और उनका राज्य सात समुद्रों से घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वी तक विस्तृत था।
किन्तु सहस्त्रार्जुन का यह वैभव केवल जन्मसिद्ध नहीं था। उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति प्राप्त करने के लिए दस हजार वर्षों तक कठोर तपस्या की। यह तप साधारण नहीं था—उन्होंने इंद्रियों को वश में कर, राजसी सुखों का त्याग कर, एकाग्रचित्त होकर ईश्वर का ध्यान किया। उनकी तपस्या का उद्देश्य केवल राज्य विस्तार नहीं, बल्कि दैवी अनुग्रह प्राप्त करना था।
उन्होंने महर्षि अत्रि के पुत्र भगवान दत्तात्रेय की आराधना की। दत्तात्रेय स्वयं त्रिदेवों के अंश माने जाते हैं और योग, ज्ञान तथा वैराग्य के परम प्रतीक हैं। सहस्त्रार्जुन की दीर्घकालीन भक्ति और कठोर साधना से प्रसन्न होकर दत्तात्रेय ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए और चार अद्भुत वरदान प्रदान करने की घोषणा की।
पहले वरदान में सहस्त्रार्जुन ने अपनी एक हजार भुजाओं की सिद्धि माँगी, जिससे वे असंख्य शत्रुओं का सामना एक साथ कर सकें और अपराजेय बनें। यह वरदान उन्हें असाधारण युद्धक क्षमता प्रदान करने वाला था।
दूसरे वरदान में उन्होंने प्रार्थना की कि उन्हें अधर्म का भय न रहे। इसका अर्थ यह था कि वे सदैव धर्म के मार्ग पर चलें और अधर्म उनकी शक्ति को प्रभावित न कर सके। यह वरदान उनके शासन को धार्मिक और न्यायपूर्ण बनाए रखने का संकल्प था।
तीसरे वरदान के रूप में उन्होंने धर्मपूर्वक बल प्राप्त कर सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय पाने की कामना की। यहाँ ‘धर्मतः बल’ का विशेष महत्व है—वे अन्याय या अत्याचार से नहीं, बल्कि धर्मसम्मत पराक्रम से विजय चाहते थे। यह उनके आदर्श क्षत्रिय होने का प्रमाण है।
चौथे और अत्यंत गूढ़ वरदान के रूप में उन्होंने माँगा कि उनकी मृत्यु केवल उनसे अधिक बलवान योद्धा के हाथों ही हो। यह वरदान उनके आत्मविश्वास और वीरता का प्रतीक था। वे कायरता या अपमानजनक मृत्यु नहीं चाहते थे, बल्कि रणभूमि में पराक्रम के साथ प्राण त्यागने की इच्छा रखते थे।
इन चार वरदानों की शक्ति से सहस्त्रार्जुन ने क्षात्र धर्म के अनुसार सातों द्वीपों और सात समुद्रों से युक्त पृथ्वी पर विजय प्राप्त की। उनका राज्य वैभव, व्यवस्था और सामर्थ्य का अद्वितीय उदाहरण बन गया।
इस प्रकार सहस्त्रार्जुन की कथा केवल बल और विजय की गाथा नहीं है, बल्कि तपस्या, भक्ति, धर्मनिष्ठा और दैवी कृपा से प्राप्त सामर्थ्य की प्रेरणादायक व्याख्या भी है।
4. राजर्षि कार्तवीर्य अर्जुन की यज्ञ-महिमा और अद्वितीय ऐश्वर्य
दत्तात्रेय भगवान के वरदान से जब सहस्त्रार्जुन की एक हजार भुजाएँ प्रकट हुईं, तब उनका तेज और प्रभाव अनेक गुना बढ़ गया। वे केवल बाहुबल से ही नहीं, बल्कि धर्म, दान और यज्ञ के द्वारा भी महान बने। सहस्त्रार्जुन, जिन्हें राजर्षि कार्तवीर्य अर्जुन कहा जाता है, ने अपनी शक्ति का उपयोग धर्म की स्थापना और लोककल्याण के लिए किया।
उन्होंने विपुल दक्षिणा देकर अनेक महायज्ञ सम्पन्न किए। उनके यज्ञ केवल औपचारिक अनुष्ठान नहीं थे, बल्कि वैदिक परंपरा की पूर्ण विधि और भव्यता से सम्पन्न होते थे। यज्ञों में ब्राह्मणों को उदारतापूर्वक स्वर्ण, गौ, भूमि और वस्त्र दान में दिए जाते थे। उनकी उदारता इतनी विशाल थी कि दूर-दूर से ऋषि, मुनि और विद्वान उनके यज्ञों में सम्मिलित होने आते थे।
उनके यज्ञमण्डपों के स्तम्भ और वेदियाँ सुवर्ण निर्मित थीं। यह वैभव केवल ऐश्वर्य प्रदर्शन नहीं था, बल्कि देवताओं के प्रति उनकी गहरी श्रद्धा का प्रतीक था। कहा जाता है कि देवताओं ने स्वयं अलंकृत विमानों द्वारा उनके यज्ञों में उपस्थित होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। इस प्रकार उनके यज्ञों में दिव्यता और राजसी वैभव का अद्भुत समन्वय दिखाई देता था।
राजर्षि कार्तवीर्य अर्जुन के दरबार और यज्ञों में गन्धर्व और अप्सराएँ सदैव उपस्थित रहती थीं। दिव्य संगीत और स्तुतियों से वातावरण गूँज उठता था। नारदजी जैसे देवर्षि भी उनकी कीर्ति का गान करते थे। यह उनके यश और धर्मनिष्ठा का प्रमाण था कि देवताओं और ऋषियों द्वारा उनकी प्रशंसा की जाती थी।
कार्तवीर्य अर्जुन का व्यक्तित्व अद्वितीय था—वे एक ओर अपार शक्ति और ऐश्वर्य के स्वामी थे, तो दूसरी ओर धर्म, दान और यज्ञ के आदर्श संरक्षक। उनकी महिमा को देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि उनके समान कोई अन्य राजा न पहले हुआ था और न आगे होगा। वे वास्तव में राजर्षि थे—राजा भी और ऋषि के सदृश धर्मपरायण भी।
5. चक्रवर्ती सम्राट सहस्त्रार्जुन: सात द्वीपों का दीर्घकालीन शासन
राजर्षि सहस्त्रार्जुन केवल पराक्रमी योद्धा ही नहीं, बल्कि धर्म, यज्ञ, दान और तपस्या के अद्भुत संगम थे। शास्त्रों में वर्णित है कि वे यज्ञों के अनुष्ठान, विपुल दान, कठोर तप और अपराजेय शौर्य के बल पर सम्पूर्ण सप्तद्वीपी पृथ्वी में वायु के वेग के समान विचरण करते थे। यहाँ “वायु के वेग” का अर्थ केवल तीव्र गति नहीं, बल्कि उनकी सर्वव्यापक सत्ता और प्रभाव से है। जिस प्रकार वायु अदृश्य होकर भी सर्वत्र व्याप्त रहती है, उसी प्रकार सहस्त्रार्जुन की कीर्ति और शासन-शक्ति सातों द्वीपों में स्थापित थी।
उनके राज्य में धर्म की प्रतिष्ठा थी। यज्ञों द्वारा वे देवताओं को संतुष्ट करते, दान द्वारा प्रजा और ब्राह्मणों का पालन करते, तथा तपस्या द्वारा अपने आत्मबल को दृढ़ बनाए रखते थे। पराक्रम से वे शत्रुओं को परास्त करते और न्यायपूर्वक शासन करते थे। इस प्रकार उनका शासन केवल सैन्य बल पर नहीं, बल्कि धर्म और नीति पर आधारित था।
श्लोक 116 के अनुसार वे पचासी हजार वर्षों तक सप्तद्वीपी पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट रहे। “चक्रवर्ती” शब्द का अर्थ है—वह सार्वभौम सम्राट जिसके रथ का चक्र बिना किसी बाधा के समस्त दिशाओं में घूम सके। सहस्त्रार्जुन ने इतने दीर्घ काल तक अखंड और स्थिर शासन स्थापित किया, जो उनकी अद्वितीय क्षमता, संगठन-शक्ति और दैवी अनुग्रह का प्रमाण है।
इतने विशाल काल तक शासन करना केवल बाहुबल का परिणाम नहीं हो सकता; यह उनकी नीति, प्रजावत्सलता और धर्मपालन का फल था। उनके राज्य में व्यवस्था, समृद्धि और सुरक्षा का वातावरण था। इस प्रकार सहस्त्रार्जुन का चक्रवर्ती शासन भारतीय पुराणों में आदर्श राजधर्म और सार्वभौम सत्ता का उज्ज्वल उदाहरण माना गया है।
हैहय वंश और सहस्त्रार्जुन की यह कथा राजसी वैभव, वीरता और तपोबल का अद्भुत उदाहरण है। दत्तात्रेय जैसे महर्षि के वरदान से प्राप्त शक्ति ने सहस्त्रार्जुन को महान बनाया, पर साथ ही यह कथा यह भी सिखाती है कि असीम शक्ति के साथ विनय और धर्म अनिवार्य हैं। यही कारण है कि यह कथा आज भी वीर रस और नीति—दोनों का सजीव पाठ मानी जाती है।
Source: पद्मपुराण
🙏 जय श्री हरी 🙏
📿 “हैहय वंश और सहस्त्रार्जुन की उत्पत्ति” लेख केवल आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी भारत के विभिन्न सनातन, वैदिक, और पौराणिक ग्रंथों के स्रोतों पर आधारित है तथा किसी भी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।
📜”हैहय वंश और सहस्त्रार्जुन की उत्पत्ति” लेख में प्रस्तुत श्लोक पारंपरिक ग्रंथों में उपलब्ध मूल स्वरूप पर आधारित हैं। इनमें कोई जानबूझकर परिवर्तन नहीं किया गया है।
🖼️ इस लेख में प्रयुक्त चित्र AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) द्वारा निर्मित हैं और केवल भावात्मक प्रस्तुति के उद्देश्य से उपयोग किए गए हैं।
✍️ लेखक: Arvind Kumar Singh
Cosmic Harmony












