पद्ममहापुराण — सृष्टिखण्ड, अध्याय 12
चंद्र वंश की उत्पत्ति: सहस्त्रार्जुन बनाम रावण और परशुराम
जय श्री हरी🙏
जहाँ अत्यधिक शक्ति और ऐश्वर्य होता है, वहाँ परीक्षा भी अनिवार्य होती है। हैहय वंश के महान चक्रवर्ती सम्राट सहस्त्रार्जुन के जीवन की यह अंतिम कथा वीरता, अहंकार, शाप और दैवी न्याय की महाकाव्यात्मक गाथा है।
सहस्त्रार्जुन नर्मदा तट पर विहार कर रहे थे। अपनी हजार भुजाओं से सहस्त्रार्जुन ने नर्मदा की धारा को रोक दिया। उनके पराक्रम से नदी, पर्वत और दिशाएँ तक कांप उठीं। यह उनके अपार बल का प्रत्यक्ष प्रमाण था।
इस कथा में तीन महान शक्तियाँ आमने-सामने आती हैं— सहस्त्रार्जुन, लंकाधिपति रावण और भगवान परशुराम।
पुलस्त्य महर्षि ने जो श्लोक भीष्मजी को सुनाते हैं उसे हम हिंदी में बता रहें हैं –
1. सहस्त्रार्जुन का अद्भुत पराक्रम: प्रकृति और नदियों पर अधिकार (श्लोक 117 – 120 )
वही पशुपाल, क्षेत्रपाल, वृष्टि करने वाला पर्जन्य देव तथा योगी होने के कारण अर्जुन बना रहा ॥११७॥
संग्राम में हजार बाहुओं के द्वारा ज्याघात करने के कारण कठोर त्वचा वाला यह राजा शरत् कालीन कान्तियों से युक्त सूर्य के समान सुशोभित होता है ।।११८॥
यह महिष्मती में सभी मनुष्यों से अधिक कान्तिसपन्न है। ये वर्षाकाल में समुद्र के वेग को रोक लेते थे ॥११९॥
स्त्रियों के साथ क्रीडा करता हुआ वह राजा नदियों के स्रोतों के समक्ष खड़ा होकर अपने सुखानुभव के लिए उन्हें रोक देता था ॥१२०॥
2. नर्मदा, समुद्र और असुरों पर प्रभाव: सहस्त्रार्जुन की अतुल शक्ति (श्लोक 121 – 124 )
लहरियाँ ही जिसकी भृकुटी थी ऐसी नर्मदा नदी शंकित होकर उसके पास आती थी कि यह मनु के वंश में महा समुद्र की अवगाहन कर सकता है ॥१२१।।
अपनी पत्नियों को प्रसन्न करने के लिए जब यह अपने भुजाआ को उठाता था तो समुद्र क्षुब्ध हो जाता था। उस समय पाताल में रहने वाले असुरगण निश्चेष्ट होकर छिप जाते थे। उसकी जङ्घाओं के क्षोभ से आञ्श्चवर्यित होकर वे शंका करने लगते थे कि कहीं अमृत मंथन तो नहीं हो रहा है ।।१२२-१२३॥
बड़े-बड़े सर्प अपना शिर झुकाकर निश्चल हो जाते थे। यही धनुर्धारी रावण के विपरीत बाणों को चलाया था ।।१२४।।
3. रावण पर विजय और पुलस्त्य ऋषि की प्रार्थना (श्लोक 125 – 127)
यही धनुर्धारी धनुष धारण करके मदमत्त रावण को पाँच बाणों से उसकी सेना के साथ रावण को मूर्छित करके उसको जीत कर तथा बाँधकर महीष्मती में लाया और उसको (रावण को) बाँध दिया। उसके बाद मैंने (पुलस्त्य महर्षि ने) उस अर्जुन के समक्ष जाकर मैने उसे प्रसन्न किया ॥१२५-१२६॥
मैने कहा राजन् आप मेरे पौत्र को बन्धन से मुक्त कर दें और इसके साथ मित्रता कर लें। उस सहस्त्रबाहु की प्रत्यञ्चा की जब ध्वनि होती थी तो ॥१२७॥
4. वसिष्ठ का शाप और परशुराम द्वारा सहस्त्रार्जुन का अंत (श्लोक 128 – 131)
वह युग के अन्त में प्रवृत अग्नि के प्रत्यञ्चा की ध्वनि के समान होती थी। भाग्य का बल आश्चर्यकारी है कि युद्ध में परशुरामजी ने सजस्त्रार्जुन की भुजाओ को तालवन के समान काट डाला। जिस सहस्रार्जुन को कुद्ध होकर वसिष्ठ महर्षि ने शाप दिया था कि ॥१२८-१२९॥
तुमने मेरे प्रख्यात वन को जला दिया है अतएव तुम अपराधी हो तुम्हारा पाप ही तुमको मार डालेगा ॥१३०॥
तुम्हारी हजार भुजाओं को काटकर तथा तुम्हारा मंथन करके तुमसे बलवान् तपस्वी ब्राह्मण भार्गव (परशुराम) तुम्हारा वध करेंगे ॥१३१॥
5. सहस्त्रार्जुन के पुत्र और हैहय वंश की पाँच शाखाएँ (श्लोक 132 – 136 )
ज्ञानी मुनि के शाप के कारण परशुरामजी ने सहस्त्रार्जुन का वध किया। सजस्त्रार्जुन के सौ पुत्र थे उनमें पाँच महारथी थे ।।१३२।।
महाबलवान् वे सबके सब शास्त्रों के ज्ञाता, वीर धर्मात्मा तथा महाबलवान थे। उनके नाम है शूरसेन, शूर, धृष्ट, कृष्ण ॥१३३॥
तथा ज्यध्वज । राजा जयध्वज ने ही अवन्ति को बसाया । जयध्वज के पुत्र महाबलवान् तालजंघ हुए ॥१३४॥
उनके तालजंघ के नाम से विख्यात सौ पुत्र हुए । उन हैहयों के पाँच वंश हुए ॥१३५॥
वीतिहोत्र, भोज, अवन्ति, तुण्डकेर और विक्रान्त । ये सबके सब तालजङ्घ कहलाते थे ॥१३६॥
6. हैहय वंश का विस्तार और सहस्त्रार्जुन की महिमा-फलश्रुति (श्लोक 137 – 140)
वीतहोत्र के पुत्र पराक्रमी अनन्त हुए । अनन्त के पुत्र शत्रुओं के विनाशक दुर्जय हुए ॥ १३७॥
वे महाराज सद्भाव एवं धर्मपूर्वक प्रजाओं का पालन करते थे । राजा कार्तवीर्य अर्जुन, हजार भुजाओं वाले थे ।।१३८॥
जिन्होंने अपने धनुष के बल पर समुद्र पर्यन्त पृथिवी को जीत लिया था। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर सहस्त्रार्जुन का नाम लेता है, उसकी सम्पत्ति का नाश नहीं होता है और वह अपनी नष्ट सम्पत्ति को पुनः प्राप्त कर लेता है । जो व्यक्ति इस लोक में कार्तवीर्य के जन्म का वर्णन करता है वह यज्ञ करने वाले तथा दान देने वाले के समान स्वर्ग लोक में पूजित होता है ॥१४०॥
अंतिम श्लोकों में इस सम्पूर्ण अध्याय की फलश्रुति दी गई है। जो व्यक्ति श्रद्धा से इस कथा का पाठ या श्रवण करता है, वह पापों से मुक्त होता है और धर्म, बल तथा विवेक प्राप्त करता है। यह अध्याय जीवन में शक्ति और विनय के संतुलन का संदेश देता है।
सहस्त्रार्जुन का जीवन वीरता, वैभव और तपोबल की पराकाष्ठा था, पर उनका अंत यह सिखाता है कि अहंकार सबसे महान शक्ति को भी नष्ट कर देता है। रावण की पराजय और परशुराम के हाथों वध—दोनों घटनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि धर्म के सामने कोई भी अपराजेय नहीं। इसी संदेश के साथ यह अध्याय और यह महान कथा हमें आत्मसंयम, विनय और धर्म का मार्ग दिखाती है। 🙏
इस तरह पद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के यदुवंश वर्णन नामक बारहवें अध्याय का हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ॥१२॥
Source: पद्मपुराण
🙏 जय श्री हरी 🙏

