पद्म महापुराण उत्तरखण्ड – अध्याय 4, भाग 3
श्लोक 26–35 : अर्थ एवं भावपूर्ण व्याख्या सहित
प्रस्तावना:
इस खण्ड में जालंधर की दिव्य नगरी की भव्यता, उसके ऐश्वर्य और शक्ति का वर्णन किया गया है। यह वर्णन न केवल काव्यमयी भाषा में है, बल्कि उसमें छिपा आध्यात्मिक संकेत भी गहराई से झलकता है। आइये एक-एक श्लोक को समझते हैं।
श्लोक २६
यत्र लेख्यगतं नृणां विलोक्य सुरतं जनः ।
संयाति द्विगुणं नूनं निजकान्तारतोद्यमम्॥
संयाति द्विगुणं नूनं निजकान्तारतोद्यमम्॥
अर्थ: जहाँ लोगों की चित्रों या शिल्पों में अंकित प्रेममय दृश्यों को देखकर, सामान्य जनों के हृदय में भी अपने प्रिय के प्रति प्रेम की प्रेरणा द्विगुणित हो जाती थी।
भावार्थ: यह उस नगर की कला-संस्कृति का वर्णन है, जहाँ भावनाओं की अभिव्यक्ति इतनी सजीव थी कि दर्शक उसमें डूब जाते।
भावार्थ: यह उस नगर की कला-संस्कृति का वर्णन है, जहाँ भावनाओं की अभिव्यक्ति इतनी सजीव थी कि दर्शक उसमें डूब जाते।
श्लोक २७
यत्र वातायनोद्धृतधूपधूमस्य लेखया ।
नभो बभूव तद्गङ्गाकालिन्दीसङ्गमोपमम् ॥
नभो बभूव तद्गङ्गाकालिन्दीसङ्गमोपमम् ॥
अर्थ: जहाँ खिड़कियों से निकलते धूप और धूपधुएँ के रेखाचित्रों से आकाश गंगा और यमुना के संगम के समान प्रतीत होता था।
व्याख्या: यह अलंकारिक वर्णन उस दिव्यता का है जो जालंधर की नगरी में व्याप्त थी, मानो हर दृश्य स्वयं तीर्थ बन गया हो।
व्याख्या: यह अलंकारिक वर्णन उस दिव्यता का है जो जालंधर की नगरी में व्याप्त थी, मानो हर दृश्य स्वयं तीर्थ बन गया हो।
श्लोक २८
यत्रानेकगृहोद्भूतप्रभया सकलं नभः ।
विभातीन्द्रायुधाकीर्णः शरन्मेघ इवोन्नतः ॥
विभातीन्द्रायुधाकीर्णः शरन्मेघ इवोन्नतः ॥
अर्थ: जहाँ अनेक भवनों की प्रकाशमयी आभा से सम्पूर्ण आकाश ऐसे दीप्त हो उठता था जैसे शरद ऋतु का आकाश इन्द्रधनुष से सुशोभित हो।
भावार्थ: जालंधर की नगरी केवल भौतिक समृद्धि की नहीं, बल्कि प्रकाश और सौंदर्य की पराकाष्ठा थी।
भावार्थ: जालंधर की नगरी केवल भौतिक समृद्धि की नहीं, बल्कि प्रकाश और सौंदर्य की पराकाष्ठा थी।
श्लोक २९
यत्रानिशं भ्रमभ्रान्ताः सूर्यवाहाः प्रपीडिताः।
विश्रामं यान्ति मध्याह्ने प्रासादशिरसि स्थिताः ॥
विश्रामं यान्ति मध्याह्ने प्रासादशिरसि स्थिताः ॥
अर्थ: जहाँ सूर्य की किरणें भी भ्रमित होकर दिन के मध्य प्रासादों की छतों पर विश्राम करती थीं।
व्याख्या: यह नगर की विशालता और उसकी भव्यता का बिम्ब है — जहाँ सूर्य भी थम जाए।
व्याख्या: यह नगर की विशालता और उसकी भव्यता का बिम्ब है — जहाँ सूर्य भी थम जाए।
श्लोक ३०
वत्रकुत्र च हयेंषु बिभ्रत्यो मालतीखजः ।
रात्रौ सम्भूतनक्षत्रा इव रेजुर्वराङ्गनाः ॥
रात्रौ सम्भूतनक्षत्रा इव रेजुर्वराङ्गनाः ॥
अर्थ: जहाँ रात में चंदन और मालती पुष्पों से सजे रथों पर सवार नारियाँ आकाश के नक्षत्रों के समान दमकती थीं।
श्लोक ३१
यत्र हाटकहिन्दोल श्रृङ्खलाघर्षयोद्धतः ।
चकार सुन्दरीशब्दः स्फुटं मेरुभुवो भुवम् ॥
चकार सुन्दरीशब्दः स्फुटं मेरुभुवो भुवम् ॥
अर्थ: जहाँ स्वर्ण झूलों की श्रृंखलाओं के घर्षण से उत्पन्न ध्वनि, मेरु पर्वत की तलहटी को गुंजायमान करती थी।
श्लोक ३२
सार्क सरिद्धिः पुत्रस्योशनसा सह सागरः ।
तत्राभिषेकमकरोद्वादित्रैर्निजगर्जितैः ॥
तत्राभिषेकमकरोद्वादित्रैर्निजगर्जितैः ॥
अर्थ: समुद्र ने अपने पुत्र जालंधर का जलाभिषेक अपने गर्जना रूपी वाद्ययंत्रों से किया।
श्लोक ३३
… शचीकान्तस्य वाचस्पतिः ।
ताभिश्चित्रविरिञ्चिवक्त्रसरसीहंसीभिराशास्महे ।
वाणीभिर्वसुधाविवाहसमये मन्त्रोत्सवैर्मङ्गलम् ॥
ताभिश्चित्रविरिञ्चिवक्त्रसरसीहंसीभिराशास्महे ।
वाणीभिर्वसुधाविवाहसमये मन्त्रोत्सवैर्मङ्गलम् ॥
अर्थ: जैसे ब्रह्मा की सरस्वतीमुखी वाणियाँ कल्याण करती हैं, वैसे ही इस उत्सव में मंगलकामनाएँ दी गईं।
श्लोक ३४
महापद्मसहस्रं तु सैन्यमात्मोदरोद्भवम्।
जालन्धराय पुत्राय ददौ भीमं महोदधिः ॥
जालन्धराय पुत्राय ददौ भीमं महोदधिः ॥
अर्थ: समुद्र ने अपने उदर से उत्पन्न हजारों महापद्म नामक योद्धा जालंधर को प्रदान किए।
श्लोक ३५
जालन्धराय शुक्रोऽपि प्रीत्या विद्यां निजां ददौ ।
मृतसञ्जीवनीं नाम्नां मायां रुद्रविमोहिनीम् ॥
मृतसञ्जीवनीं नाम्नां मायां रुद्रविमोहिनीम् ॥
अर्थ: शुक्राचार्य ने भी जालंधर को माया विद्या दी, जिसका नाम था — मृतसञ्जीवनी एवं रुद्र को मोहित करने वाली मोहिनी विद्या।
