पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड
अध्याय 19C: जालन्धर का अंत, योगिनियों का आविर्भाव और शिवजी का वरदान
जय श्री हरी | ॐ नमः शिवाय
जालन्धर का शरीर, जो सिर कटने के बाद भी राक्षसी शक्ति से भरा हुआ था, रक्त से सराबोर होकर नृत्य करने लगा। उसके कंठ से बार-बार नए-नए दैत्य निकलने लगे। शिवजी ने उन सभी दैत्यों को तुरंत अपने चक्र से नष्ट कर दिया। जालन्धर के शरीर की मेदा (चरबी) इतनी अधिक थी कि उससे पृथ्वी फैल गई—इसी कारण पृथ्वी का नाम मेदिनी पड़ा। जहाँ उसका रक्त पर्वत जैसा जमा, उस स्थान का नाम शोणितपुर कहलाया। चारों ओर जालन्धर के मांस के ढेर छा गए थे। यह देखकर शिवजी ने चौसठ योगिनियों का स्मरण किया।
स्मरण करते ही वे सभी दिव्य देवियाँ तत्काल वहाँ प्रकट हो गईं। आकाश मंडल आलोकित हो उठा, दिशाएँ सुगंधित हो गईं और दिव्य आभा से वातावरण भर गया। वे समस्त योगिनियां हाथ जोड़कर महादेव के समक्ष खड़ी हो गईं और विनम्र स्वर में बोलीं—
“स्वामी, आज्ञा दें। हम आपके संकेत की प्रतीक्षा में हैं। हमें क्या करना है?”
उनकी वाणी में पूर्ण समर्पण और शिव-भक्ति का भाव झलक रहा था। उस समय रणभूमि में भयंकर दृश्य उपस्थित था। चारों ओर मांस के पहाड़ जैसे ढेर पड़े थे—असुरों के कटे हुए अंग, रक्त की नदियाँ और विनाश के चिह्न। यह सब उस महायुद्ध का परिणाम था, जो अंततः जालंधर का अंत करने के लिए हुआ था।
शिवजी ने गंभीर स्वर में आदेश दिया—
“हे योगिनियां! ये जो मांस के पर्वत समान ढेर पड़े हैं, तुम सब मिलकर इन्हें तुरंत नष्ट कर दो।”
शिवाज्ञा मिलते ही ब्राह्मी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेश्वरी और अन्य समस्त योगिनियां अपने-अपने गणों सहित सक्रिय हो उठीं। उनकी गति वायु से भी तीव्र थी। वे केवल शस्त्रों से ही नहीं, बल्कि अपनी दिव्य दृष्टि-शक्ति और संकल्प-बल से भी कार्य सिद्ध करने में समर्थ थीं। जैसे ही योगिनियां ने अपनी अग्नि-समान दृष्टि उन मांस समूहों पर डाली, वे क्षणभर में भस्म हो गए। न कहीं रक्त का चिह्न रहा, न मांस का ढेर—सब कुछ शुद्ध हो गया।
यह दृश्य केवल शारीरिक शुद्धि नहीं था, बल्कि उस अधर्म और अहंकार का भी अंत था, जिसने समस्त लोकों को आतंकित कर रखा था। वास्तव में यह प्रक्रिया जालंधर का अंत पूर्ण करने की अंतिम कड़ी थी। जब बाहरी अवशेष भी समाप्त हो गए, तब स्पष्ट हो गया कि अब सचमुच जालंधर का अंत हो चुका है।
उसी समय एक अद्भुत घटना घटी। जालंधर के दिव्य शरीर से एक प्रचंड तेज निकला। वह तेज सूर्य के समान प्रखर और अग्नि के समान दैदीप्यमान था। वह प्रकाश आकाश में उठकर सीधा भगवान शिव की ओर अग्रसर हुआ और उनके परम तेज में विलीन हो गया। यह संकेत था कि जालंधर का अंत केवल वध मात्र नहीं था, बल्कि उसकी मूल शक्ति का शिव में लय हो जाना था।
देवताओं ने जब यह दृश्य देखा, तो वे आश्वस्त हो गए कि अब सचमुच जालंधर का अंत हो चुका है और तीनों लोक पुनः भयमुक्त हो गए हैं। योगिनियां भी अपने कार्य की पूर्णता देखकर प्रसन्न हुईं। उन्होंने पुनः शिवजी को प्रणाम किया और अपने-अपने लोकों को लौट गईं।
इस प्रकार शिव की आज्ञा, योगिनियां की दिव्य शक्ति और धर्म की विजय से जालंधर का अंत हुआ। यह कथा केवल एक असुर-वध की नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की अंतिम विजय और दैवी शक्तियों के समन्वय का प्रतीक है।
योगिनियों का वरदान
कार्य पूरा होने पर शिवजी प्रसन्न हुए और योगिनियों से बोले—
“तुम सब वर मांगो।”
योगिनियों ने कहा— “हे नाथ, जो मनुष्य संसार के भोग या मोक्ष की इच्छा से हमारे रूपों की अपने घरों में पूजा करेगा, उसका मनचाहा फल आपकी कृपा से अवश्य प्राप्त हो।”
शिवजी बोले— “जो भी भक्त तुम लोगों की भक्ति-भाव से पूजा करेगा, मैं उसे उसका इच्छित वरदान दूँगा। और जो मेरा भक्त होकर भी योगिनियों या केशव से द्वेष करेगा, उसके सारे पुण्य मैं स्वयं भैरव रूप में छीन लूँगा।” यह वर पाकर योगिनियाँ अत्यंत प्रसन्न हुईं।
पार्वतीजी और वृषभ का आगमन
इसके बाद शिवजी ने पार्वतीजी और अपने वृषभ (नंदी) को स्मरण किया। और स्मरण करते ही वे दोनों तुरंत प्रकट हो गए। पार्वतीजी के आगमन से शिवजी का हृदय पूर्णतः प्रसन्न हो उठा।
जालन्धर को मारने के बाद उसका शरीर रक्त से लाल हो उठा और काटे गए अंगों से अनेक छोटे-छोटे दैत्य निकलने लगे। भगवान शंकर ने उन सबका संहार कर दिया। जालन्धर की देह से इतनी मेदा यानी चर्बी निकली कि पृथ्वी उस मेदा से भर गई। इसी कारण पृथ्वी को आगे चलकर “मेदिनी” कहा गया। जहाँ जालन्धर का रक्त पर्वत के समान जम गया, वह स्थान “शोणितपुर” कहलाया।
युद्धक्षेत्र में हर ओर मांस और रक्त के ढेर फैले थे। इसे देखकर शिवजी ने अपनी 64 योगिनियों को स्मरण किया। स्मरण होते ही वे तुरंत शिवजी के सामने उपस्थित हो गईं और पूछा — “भगवन, हमारा क्या कर्तव्य है?”
शिवजी ने आदेश दिया कि जो विशाल मांस के ढेर पड़े हैं, उन्हें तुम सब नष्ट कर दो। ब्राह्मी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेश्वरी — सभी देवियाँ अपने-अपने गणों के साथ उपस्थित थीं। उन्होंने मात्र दृष्टि करते ही मांस के उन ढेरों को गायब कर दिया।
जालन्धर के शरीर का जो तेज था, वह योगिनियों द्वारा उसकी देह भक्षण करने के बाद सूर्य के समान प्रखर होकर उठी और अंत में शिवजी में ही लीन हो गई। इस प्रकार भगवान शंकर ने इस दैत्य का अंत किया। युद्ध समाप्त होने पर शिवजी ने प्रसन्न होकर योगिनियों को वर मांगने को कहा।
योगिनियों ने कहा — “हे देव! जो मनुष्य हमारे स्वरूप की पूजा करेगा, उसे संसार में भोग और मोक्ष दोनों आपकी कृपा से प्राप्त हों।” भगवान शंकर बोले — “जो भक्त तुम्हारी श्रद्धा से पूजा करेगा, उसे मैं मनोवांछित फल दूँगा और जो मेरा भक्त योगिनियों तथा केशव से द्वेष करेगा, उसके सभी पुण्यों का मैं भैरव रूप में हरण कर लूँगा।”
यह सुनकर योगिनियों का दल प्रसन्न हुआ। इसके बाद शिवजी ने पार्वती और नंदी का स्मरण किया, और वे तत्काल उनके पास आ गए। शिव-पार्वती दोनों ही हर्ष से भर गए।
इसके बाद शिवजी ने योगिनियों को आदेश दिया कि जालन्धर के कबन्ध (कटे हुए शरीर) में जो मनुष्यों का रक्त जमा है, उसे वे पी लें। योगिनियाँ हर्ष से नृत्य करती हुई रक्त और मांस का भक्षण करने लगीं।
उनकी इस शक्ति और भयंकर रूप को देखकर शिवजी भी भैरव बनकर उनके साथ रक्तपान करने लगे। योगिनियों के गण विशालकाय और तीक्ष्ण-दाँतों वाले हो गए — वे आज भी समय-समय पर मांस और रक्त का भोग करती हैं — यही कारण है कि जालन्धर फिर से जीवित नहीं हो पाता।
इसी बीच ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, ऋषि, मरुद्गण आदि सभी देवता वहाँ उपस्थित हुए और भगवान शंकर की स्तुति करने लगे। दिशाएँ शुद्ध हो गईं, सुगन्धित हवा बहने लगी और आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई।
शिवजी का जलाभिषेक किया गया और देवताओं ने विजय डंके बजाए। भौरे पराग से मतवाले होकर गिर रहे थे, मधु की धारा बह रही थी — सम्पूर्ण भूमण्डल मानो शिव-विजय का उत्सव मना रहा था। त्रैलोक्य में जालन्धर की मृत्यु से शान्ति और प्रसन्नता फैल गई।
स्त्रियों ने नृत्य किया, यक्ष–किन्नरों ने गीत गाए। शिव-पार्वती कैलाश लौट आए और देवियाँ उन पर पुष्प-वर्षा करती रहीं। शिवजी ने करुणा करके देवताओं को उनके पदों पर पुनः स्थापित किया और उन्हें अपनी सम्पदा भी प्रदान की।
नारदजी अंत में युधिष्ठिर से कहते हैं —
“राजन्! मैंने जालन्धर जैसे महावीर का चरित्र पूरी तरह सुनाया। भगवान विष्णु आज भी क्षीरसागर में इसलिए प्रविष्ट हैं कि वे पहले जालन्धर के प्रति कृतज्ञ हैं। संसार में हर प्राणी अपने कर्मों का फल भोगता है, सुख-दुःख इसी से मिलता है। जब तक शरीर है, कर्म हैं; और कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। ज्ञान से बड़ा कोई रक्षक नहीं है। स्वयं कृष्ण आदि अवतार भी अपने अवतारदेह में सुख-दुःख का अनुभव करते हैं — यह सब कर्म के ही नियम से होता है।”
नारदजी आगे युधिष्ठिर से कहते हैं:
“राजन्! वैराग्य रहित, सांसारिक सुखों में उलझा हुआ मनुष्य भी यह समझ ले कि कर्म की गति सबसे अधिक बलवान है। किसी का क्या कहना — स्वयं देवता, असुर, मनुष्य, सभी कर्म के नियम से बंधे हैं।”
नारदजी युधिष्ठिर को सांत्वना देते हुए कहते हैं — “तुम धैर्य रखो। शुभ कर्मों का फल अवश्य आएगा। तुम अपने शत्रुओं को परास्त कर के फिर से अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त करोगे। उदास मत होना, समय अवश्य बदलेगा।” वे बताते हैं कि इस पवित्र कथा को सुनकर मनुष्य अपने दुःखों से हारता नहीं है। इसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — जीवन के चारों पुरुषार्थ — सभी का ज्ञान सहजता से प्राप्त होता है। यह आख्यान पाप नाशक, शोक और मोह का नाश करने वाला तथा स्वर्ग प्रदान करने वाला है।
जो इसे सुनता है:
- ब्राह्मण ज्ञान प्राप्त करता है
- क्षत्रिय अपना राज्य पाता है
- वैश्य धन-संपत्ति से समृद्ध होता है
- शूद्र जीवन में सुख पाता है
- यदि कोई राजा सन्मार्ग पर चल रहा हो और किसी कारण से उसका राज्य छिन गया हो, तो वह इस कथा का नित्य श्रवण करे — उसे पुनः राज्य मिल जाता है।
- यह कथा सज्जनों को इतनी प्रिय होती है कि फिर उन्हें अन्य कोई कथा अच्छी नहीं लगती, जैसे कोयल की मीठी ध्वनि ही मन को भाती है, कौए की कर्कश ध्वनि नहीं।
नारदजी आगे कहते हैं —
- “इस कथा के वाचक को श्रद्धा से अन्न, वस्त्र, तिल, स्वर्ण, गौ तथा भूमि का दान देना चाहिए। इससे श्रोता को पूर्ण फल मिलता है।
- आचार्य की पूजा से देवता भी प्रसन्न होते हैं।
- अन्नदान और ब्राह्मणों का सम्मान श्रवण का पुण्य बढ़ा देता है।”
- इस कथा को सुनने वाला पुत्र–पौत्रों से समृद्ध होता है, विजय प्राप्त करता है और अंत में विष्णुलोक जाता है।
- नारदजी बताते हैं कि इस कथा के माध्यम से तुलसी की उत्पत्ति का रहस्य सुनने से भी पाप नष्ट हो जाते हैं।
- तुलसी का माहात्म्य अत्यंत पवित्र और पाप विनाशक है — इसे कहने और सुनने वाले दोनों ही मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
- अपने घर में तुलसी लगाने मात्र से पापों का नाश होता है।
- तुलसी का दर्शन करने से भी ब्रह्महत्या जैसे महापाप का क्षय होता है — इसमें कोई संदेह नहीं।
कार्तिक और माघ महीने में तुलसी से श्रीहरि की पूजा सर्वोत्तम मानी गई है। वैशाख में तुलसी पूजन का विशेष महत्व बताया गया है। तुलसी की एक परिक्रमा करने से पाप नष्ट हो जाते हैं और गृहस्थ का जीवन शुद्ध हो जाता है। जो लोग सदा दान करते हैं, वे भी शुद्ध होकर देवताओं की पूजा के योग्य बन जाते हैं। संसार में विष्णु भक्त तो वैसे भी दुर्लभ हैं—लेकिन जो तुलसी की पूजा करते हैं, वे सभी भगवान के अत्यंत प्रिय हैं।
Source: पद्मपुराण
ॐ नमः शिवाय 🙏 जय श्रीहरि 🙏
