Current image: महादेव द्वारा जालन्धर वध का दिव्य दृश्य, जहाँ भगवान शिव अपने त्रिशूल और चक्र के साथ दैत्य जालन्धर का संहार करते हुए, अग्नि और युद्धभूमि के बीच प्रकट होते हैं।

पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड

अध्याय 19B: भगवान शिव और जालन्धर का अंतिम युद्ध | हिंदी कथा


जय श्री हरी | ॐ नमः शिवाय

युद्ध के दौरान जब जालंधर भगवान शिव को रोकने में असफल रहा, तब उसने तुरंत माया की रचना की—एक देवी पार्वती के रूप में और दूसरी उनकी सखी जया के रूप में। माया-पार्वती को उसने बंधक बना लिया और जया को भगवान शंकर के पास भेज दिया, ताकि उन्हें भ्रमित किया जा सके। भगवान शिव देवी पार्वती को मुक्त कराने के प्रयास में लग गए और युद्ध कुछ समय के लिए रुक गया। उसी समय ब्रह्माजी वहाँ प्रकट हुए।

देवताओं के मध्य ब्रह्माजी अदृश्य रूप से उपस्थित होकर शिवजी को संबोधित करने लगे। उन्होंने कहा—

“हे महेश्वर! आप शोक और मोह से परे हैं। माता–पिता, सुख–दुःख, पुत्र–पत्नी—इन सब बंधनों से आप सर्वथा मुक्त हैं। आप तो अप्रकट, अजन्मा, अनंत और निर्गुण स्वभाव वाले हैं। न किसी ने आपको उत्पन्न किया है और न आप कभी उत्पन्न होंगे। ऋषिगण जानते हैं कि इस समय दैत्य की माया ने आपको मोह में डाल रखा है।”

इसके बाद ब्रह्माजी ने पुनः कहा—

“हे नाथ! आप एक ही हैं, किंतु आपके असंख्य रूप दृष्टिगोचर होते हैं—जैसे समुद्र की लहरों में सूर्य के अनेक प्रतिबिंब दिखाई देते हैं। संन्यासी ध्यान के माध्यम से आपके चरणों को प्राप्त करते हैं। आपका परम स्वरूप अनिर्वचनीय और अगम्य है।”

फिर ब्रह्माजी ने शिवजी को सचेत करते हुए कहा—

“यह स्त्री आपकी पत्नी नहीं है। यह जालंधर द्वारा रची गई माया है, जो पार्वती के समान प्रतीत होती है। वास्तविक पार्वती तो कमल-कोष में सुरक्षित हैं। अब आप शत्रुओं से युद्ध कर देवताओं की रक्षा कीजिए।”

ब्रह्माजी के वचनों को सुनकर शिवजी सावधान हो गए। दैत्य की माया को समझते ही उन्होंने एक विशाल शिला उठाई और दैत्यों पर प्रहार किया। उस प्रहार से करोड़ों दैत्यों का संहार हो गया। इसके पश्चात शिवजी वृषभ पर आरूढ़ होकर अत्यंत क्रोधित हो उठे और पिनाक धनुष हाथ में लेकर बाण साधने लगे।

शिवजी की माया भंग होते ही जालंधर ने उन्हें पुनः भ्रमित करने के लिए एक और शक्तिशाली मायावी रूप रचा। इस नई माया से जालंधर की करोड़ों भुजाएँ प्रकट हो गईं और वह वृक्षों, अस्त्र–शस्त्रों तथा असंख्य रूपों के माध्यम से शिवजी का सामना करने लगा।

यह माया इतनी प्रबल थी कि उसने पूरे भूमंडल का स्वरूप ही बदल दिया। पृथ्वी लाल गैरिक रंग से अलंकृत हो गई, सुंदर मंदिर प्रकट हो गए और चारों ओर मनोहर पुष्पों से सजावट हो गई। मेनका तथा अन्य अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। सर्वत्र उत्सव, संगीत और नृत्य का ऐसा अद्भुत वातावरण बन गया कि युद्धभूमि का स्मरण ही विलुप्त हो गया। दैत्य की इस मायावी लीला से स्वयं शिवजी भी मोहित हो गए। वे युद्ध छोड़कर वृषभ पर आरूढ़ होकर उन अलौकिक दृश्यों और नृत्य को देखने लगे। समुद्र भी विविध स्वर और रूप धारण कर उनके चित्त को और अधिक आकर्षित करने लगा।

इसी बीच दैत्यों ने असंख्य जीवों को समुद्र में फेंककर अपनी उत्सवी माया को और भी भयावह बना दिया। देवता और गण तितर-बितर हो गए—किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।

तभी भगवान विष्णु प्रकट हुए और शिवजी से बोले—

“हे देवदेव! यह दैत्य की माया है। आप अपने भीतर स्थित चक्र की शक्ति को पहचानिए। जालंधर के वध के लिए ही आपने चक्र का निर्माण किया था, फिर युद्ध में उसका प्रयोग क्यों नहीं करते?” भगवान विष्णु के वचन सुनते ही शिवजी चौंक उठे और उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का स्मरण हो आया। वे जान गए कि वे स्वयं शंकर हैं—जगत के संहारकर्ता, माया से परे और सम्पूर्ण सृष्टि के अधिष्ठाता। भगवान विष्णु द्वारा सचेत किए जाने पर भगवान शिव तुरंत अपने वाहन नंदी (वृषभ) पर आरूढ़ होकर युद्धभूमि की ओर प्रस्थान कर गए। शिवजी को आते देख जालन्धर क्रोध से भर उठा और मार्ग रोककर उनके सामने आ खड़ा हुआ।

जैसे ही जालन्धर समीप आया, शिवजी का तृतीय नेत्र खुल गया। उनके उस विकराल और रौद्र स्वरूप से दानवों की विशाल सेना चींटी-कीड़ों की भाँति जलकर नष्ट होने लगी। शुम्भ, निशुम्भ और राहु जैसे शक्तिशाली दैत्य भी भयभीत होकर पाताल लोक की ओर भाग खड़े हुए। कुछ ही क्षणों में पूरी सेना नष्ट हो चुकी थी। अब युद्धभूमि में केवल जालन्धर ही अकेला पर्वत के समान अडिग खड़ा था। वह शिवजी के उस रौद्र और वास्तविक स्वरूप को देखकर भी भयभीत नहीं हुआ, बल्कि अट्टहास करते हुए बोला— “महादेव! इस संसार को भस्म करने वाले अपने इस विकराल रूप को समेट लीजिए। मुझसे शस्त्रों द्वारा युद्ध कीजिए, योगशक्ति से नहीं।”

जालन्धर की निर्भयता देखकर शिवजी प्रसन्न हुए और बोले— “दैत्येश! कोई वर माँगो। मेरे इस रौद्र रूप को देखकर भी तुम निर्भय खड़े हो—यह मुझे संतोष देता है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड भी इस स्वरूप को सहन नहीं कर सकता, फिर भी तुम अडिग हो।”

शिवजी की इस प्रसन्नता का लाभ उठाकर जालन्धर बोला— “मुझे मुक्ति चाहिए। मैं संसार के समस्त भोगों से निःस्पृह हो चुका हूँ।”

शिवजी मुस्कुराए और बोले— “मूर्ख दैत्य! तुम्हारा यह शरीर दिव्य है, सिद्धियों से युक्त है, वीरता से परिपूर्ण है और स्वयं वृन्दा के मन को बाँध लेने वाला है। ऐसा शरीर त्यागकर तुम मुक्ति माँग रहे हो? तुम ब्रह्म को नहीं जानते, इसलिए अपनी योग्य वस्तु को ठुकरा रहे हो। तुम्हारी पत्नी वृन्दा—जिसे मायाशक्ति अपने साथ ले गई—वह पहले ही परम पद को प्राप्त कर चुकी है।”

फिर गंभीर स्वर में शिवजी बोले—

“यदि मुक्ति ही चाहते हो, तो ऐसा वर माँगो जो स्वर्ग और मोक्ष—दोनों के मध्य का हो।”

परंतु जालन्धर अपने संकल्प पर अडिग रहा। उसने कहा— “देव! जिसने अपने जीवन का कर्तव्य पूर्ण कर लिया, उसे केवल मुक्ति ही चाहिए। आपके दर्शन से और आपसे युद्ध करके आपके हाथों मारा जाना—मेरे लिए यही सर्वोच्च सिद्धि है।”

शिवजी ने कहा— “मेरा स्थान परम है। यदि तुम वहाँ पहुँचना चाहते हो, तो पहले मुझ पर प्रहार करके मुझे क्रोधित करो। जब मैं क्रोध में तुम्हारा वध करूँगा, तभी तुम निष्पाप होकर मेरे धाम को प्राप्त करोगे।”

जालन्धर ने विनम्रता से कहा— “महादेव! आप जगत् के पूज्य हैं। मैं आप पर पहले प्रहार नहीं कर सकता।”

नारदजी कहते हैं— तब शिवजी ने जालन्धर से कहा कि यदि वह मुक्ति चाहता है, तो उसे पहले प्रहार करना ही होगा। तब जालन्धर ने शिवजी पर बाणों की वर्षा कर दी। वे बाण शिवजी के शरीर पर ऐसे चमक रहे थे जैसे लोहे के पर्वत पर अग्नि की चिनगारियाँ चमक रही हों। उसी प्रकार शिवजी के बाण भी जालन्धर के शरीर में लगकर तारों से भरे आकाश के समान शोभायमान हो रहे थे।

अब दोनों के मध्य भीषण द्वंद्व युद्ध आरंभ हुआ। इस संसार में शिवजी जैसा संहारक और जालन्धर जैसा बाणों को सहन करने वाला कोई दूसरा नहीं था। जालन्धर ने हजारों पर्वतों के समान प्रहार किए, पृथ्वी के भारी-भरकम खंडों की भाँति आघात करता हुआ शिवजी पर टूट पड़ा। उसी समय अवसर पाकर शिवजी ने अपना त्रिशूल सीधे जालन्धर के हृदय में घोंप दिया। त्रिशूल लगते ही जालन्धर के मुख से एक भयंकर ज्वर उत्पन्न हुआ—सिंह के समान मुख वाला और मनुष्याकार शरीर से युक्त। उस ज्वर को देखकर शिवजी के मुख से एक और शक्ति प्रकट हुई—शरभ—जिसने उसी क्षण उस ज्वर का संहार कर दिया।

शिवजी की इस अपराजेय शक्ति को देखकर भी जालन्धर पीछे नहीं हटा। वह तूफ़ान की भाँति दौड़कर नंदी के पास पहुँचा और अपार बल से उनकी पूँछ पकड़कर उन्हें आकाश में घुमाकर हिमालय पर्वत पर फेंक दिया। नंदी को दूर फेंकने के पश्चात जालन्धर ने ‘कालकेदार’ नामक विशाल धनुष उठाया और तीव्र बाणों से शिवजी पर प्रहार करने लगा। प्रत्युत्तर में शिवजी ने भी बाण चलाए और जालन्धर के रथ, सारथी तथा घोड़ों को एक ही क्षण में नष्ट कर दिया। दस योजन लंबा वह भव्य रथ युद्धभूमि में खंड-खंड होकर बिखर गया।

अब जालन्धर पैदल ही शिवजी पर टूट पड़ा। दोनों के मध्य हुआ यह युद्ध असाधारण, रोमहर्षक और समस्त संसार को कंपा देने वाला था। देवताओं ने भय से अपने-अपने स्थान त्याग दिए, कहीं यह दृश्य कालांत का संकेत न हो। गदा, तलवार, भाले और बाण—सभी शस्त्र एक-दूसरे पर वर्षा होने लगे। उनके चरणों के प्रहार से पृथ्वी काँप उठी और उनके संघर्ष की ध्वनि से आकाश भी सुन्न-सा प्रतीत होने लगा।

युद्ध और अधिक भीषण होता गया। जालन्धर की असीम शक्ति देखकर शिवजी ने योगमाया का सहारा लिया और एक ही क्षण में उसके सभी शस्त्रों को अदृश्य कर दिया। अब करोड़ों भुजाओं और भयानक नेत्रों वाला जालन्धर निःशस्त्र होकर शिवजी की ओर वेग से दौड़ा। वह अपने विशाल हाथों से शिवजी को जकड़ने लगा। तत्क्षण शिवजी ने अपनी कृपाण उठाई और उसके दोनों हाथ काट दिए। कटे हुए हाथों से बहते रक्त से शिवजी का शरीर नील-लोहित दिखाई देने लगा, किंतु भगवान रुद्र तनिक भी विचलित नहीं हुए। हाथ कट जाने पर भी जालन्धर पीछे नहीं हटा। जैसे सिर रहित राहु सूर्य को ग्रसने का प्रयास करता है, उसी प्रकार वह बिना हाथों के भी शिवजी से भिड़ गया।

उसकी इस अद्भुत वीरता से शिवजी संतुष्ट हुए और बोले— “मैं प्रसन्न हूँ। दुर्लभ से दुर्लभ वर माँगो।”

जालन्धर बोला— “भगवन! मुझे अपना लोक दीजिए। मैं हाथों और शस्त्रों से रहित हो चुका हूँ, मेरी अवमानना न करें। यदि आपने मुझे मुक्ति नहीं दी, तो मैं आपको मार डालूँगा।” यह कहकर वह फिर दौड़ा और अपनी शेष शक्ति से शिवजी के वक्षस्थल पर प्रहार किया। उसी क्षण शिवजी ने अपने मुख से वह सुदर्शन-सदृश चक्र प्रकट किया, जिसे उन्होंने पूर्व में रचा था। उसकी ज्योति हजारों सूर्यों के समान दीप्तिमान थी, मानो सम्पूर्ण सृष्टि को भस्म कर दे।

शिवजी ने उसी चक्र से जालन्धर का सिर काट दिया। वह सिर सौ योजन ऊँचाई तक आकाश में उछला और सौ दाँतों से युक्त वह भयावह मस्तक व्याघ्र की गति से ब्रह्मलोक तक जा पहुँचा। फिर वह स्वर्ग की दिशा से पृथ्वी की ओर गिरने लगा। शिवजी उसे रोकने के लिए दौड़े। सिर से रक्त की नदियाँ बह रही थीं और उसकी गर्जना से दिशाएँ काँप उठीं। सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश मंद पड़ गया और समस्त संसार भय से भर गया। जब वह सिर हिमालय की ओर गिरने लगा, तब शिवजी ने अपने चक्र से उसे दो टुकड़ों में काट दिया। दोनों टुकड़े हिमालय पर गिरे और तत्क्षण शिवजी में विलीन हो गए।

जालन्धर के कटे हुए कंठ से लाखों दैत्य उत्पन्न हुए, किंतु शिवजी ने अपने चक्र को घुमाकर उन सबका भी संहार कर दिया।

इस प्रकार महादेव ने जालन्धर के आतंक का पूर्ण अंत किया और देवताओं सहित समस्त लोकों को शांति और राहत प्राप्त हुई।

Source: पद्मपुराण

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