Shiva Purana

भगवान शंकर का पूर्ण रूप – काल भैरव


जय श्री कालभैरव

अहंकार चाहे ब्रह्मा का हो या मानव का, उसका अंत निश्चित है। काल भैरव शिव का वह स्वरूप जो पाप, काल और अभिमान तीनों का नाश करता है।
🙏 जय श्री काल भैरव 🙏

प्राचीन काल की बात है। सृष्टि अपने क्रम में चल रही थी। देव, ऋषि और मुनि अपने-अपने कार्यों में रत थे। एक दिन समस्त देवताओं के मन में एक गूढ़ जिज्ञासा उत्पन्न हुई . “वह अविनाशी तत्त्व कौन है, जो सृष्टि से पहले भी था, सृष्टि में भी है और सृष्टि के बाद भी रहेगा?”

इस प्रश्न के समाधान हेतु देवगण सुमेरु पर्वत पर स्थित ब्रह्मलोक पहुँचे और सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी से निवेदन किया — “हे पितामह! आप हमें उस परम, अविनाशी, अनादि तत्त्व का ज्ञान कराइए।”

ब्रह्मा का अहंकार और माया

उस समय भगवान शिव की माया से मोहित होकर ब्रह्माजी सत्य को पहचान न सके। अहंकारवश उन्होंने गर्व से कहा –

मैं ही स्वयंभू हूँ, अजन्मा हूँ, अनादि हूँ।
मैं ही इस संसार का कर्ता, धर्ता और हर्ता हूँ।
प्रवृत्ति और निवृत्ति का मूलाधार मैं ही हूँ।
मैं ही निरंजन, निर्गुण, पूर्ण ब्रह्म हूँ।”

ब्रह्माजी के ये वचन सुनकर वहाँ उपस्थित मुनि-मंडली स्तब्ध रह गई। तभी भगवान विष्णु, जो साक्षात धर्म और संतुलन के अधिष्ठाता हैं, ब्रह्माजी से बोले – “पितामह! मेरी आज्ञा से ही आपको सृष्टि-रचना का दायित्व मिला है। फिर आप स्वयं को सर्वोच्च ईश्वर कैसे कह सकते हैं?”

ब्रह्मा-विष्णु विवाद

धीरे-धीरे यह संवाद विवाद में बदल गया। ब्रह्मा और विष्णु—दोनों अपने-अपने प्रभुत्व को सिद्ध करने लगे। शास्त्र-वाक्य उद्धृत होने लगे, तर्क-वितर्क बढ़ने लगे। अंततः यह निश्चय हुआ कि वेदों से ही प्रमाण लिया जाए, क्योंकि वे साक्षात ईश्वर की वाणी हैं।

चारों वेदों का निर्णय

तभी चारों वेद मानव रूप धारण कर वहाँ प्रकट हुए और एक-एक कर अपना मत प्रकट किया –

ऋग्वेद बोले —

“जिसके भीतर समस्त भूत निहित हैं, जिससे यह सारा जगत प्रवाहित होता है, वह परम तत्त्व केवल रुद्र ही है।”

यजुर्वेद ने कहा —

“जिससे हम वेद प्रमाणित होते हैं, जो समस्त यज्ञों और योगों के स्वामी हैं, वह केवल शिव ही हैं।”

सामवेद ने घोषणा की —

“जिसके प्रकाश से संसार प्रकाशित है, जिसे योगी ढूँढ़ते हैं, वह त्र्यम्बक शिव ही हैं।”

अथर्ववेद बोले —

“जिसकी भक्ति से साक्षात्कार होता है, जो सुख-दुःख से परे अनादि ब्रह्म हैं, वह केवल शंकर ही हैं।”

फिर भी माया बनी रही

इतने स्पष्ट प्रमाणों के बाद भी शिव-माया से मोहित ब्रह्मा और विष्णु सत्य को पूर्णतः स्वीकार न कर सके। तभी ओंकार स्वरूप प्रकट हुआ और बोला – “शिव ही नित्य, अनंत और सनातन परब्रह्म हैं।”

अनादि ज्योति स्तंभ

अचानक ब्रह्मा और विष्णु के मध्य आदि-अंत रहित एक विशाल ज्योति-स्तंभ प्रकट हुआ। उस ज्योति की प्रचंड उष्मा से ब्रह्माजी का पंचम सिर जलने लगा।

कालभैरव का प्राकट्य

उसी क्षण त्रिशूलधारी, नील-लोहित, भस्म-विभूषित भगवान शिव प्रकट हुए। अज्ञानवश ब्रह्माजी ने उन्हें अपना पुत्र समझ लिया। यह सुनकर शिवजी अत्यंत क्रुद्ध हुए। उन्होंने अपने तेज से कालभैरव को प्रकट किया और आज्ञा दी

“हे भैरव! ब्रह्मा के अहंकार का नाश करो।”

भैरव ने अपनी बायीं उँगली के नखाग्र से ब्रह्माजी का पंचम सिर काट दिया।

पश्चाताप और शिव की करुणा

भयभीत ब्रह्माजी शतरुद्रीय का पाठ करते हुए शिवजी की शरण गए। विष्णु जी सहित सभी देवताओं को तब जाकर सत्य का बोध हुआ। शिवजी करुणामय हुए और दोनों को अभयदान दिया।

काल भैरव — काशी के अधिपति

शिवजी ने भैरव को वरदान दिया –

काल भैरव – जो काल को भी भयभीत करें

पाप भक्षक – जो भक्तों के पाप तत्काल नष्ट करें

काशी के कोतवाल

और आज्ञा दी -“हे भैरव! ब्रह्मा के कपाल को धारण कर भिक्षावृत्ति करते हुए काशी जाओ। वहाँ तुम ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाओगे।”

कपालमोचन तीर्थ

भैरव जैसे ही काशी पहुँचे, उनके हाथ से कपाल और चिमटा पृथ्वी पर गिर पड़े। वहीं कपालमोचन तीर्थ की स्थापना हुई।

इस तीर्थ में पिंडदान, देव-तर्पण और पितृ-तर्पण करने से मनुष्य ब्रह्महत्या जैसे महापाप से भी मुक्त हो जाता है।

अहंकार ज्ञान को नष्ट करता है
शिव ही परम सत्य हैं
काल भैरव न्याय, वैराग्य और करुणा के प्रतीक हैं काशी मोक्षदायिनी है
Source: Shiva Purana

ॐ नमः शिवाय 🙏 जय श्रीहरि 🙏