Current image: वृंदा और स्मरदुति की सहायता के लिए साधु रूप में श्रीहरि आये

 

पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड

अध्याय 15: श्रीहरि की लीला और वृंदा की बेचैनी


जय श्री हरी

मानसरोवर के युद्ध ने शिवजी, माता पार्वती, गणेशजी, कार्तिकेय जी और शिवगणों को अलग थलग कर दिया था। जो मायावी शक्ति भगवान शिव के सामने जाते ही भस्म हो जाता था और जो देवी स्वयं माया और प्रकृति देवी जगदम्बा हो उन्हें भी असुर जालंधर ने मोहित कर रखा था।

जालंधर ने विचित्र चाल चला एक तरफ भगवान शिव और उनके गणों को शुम्भ के साथ युद्ध में व्यस्त कर दिया। शुम्भ जालंधर का रूप बनाकर युद्ध कर रहा था और माया के प्रभाव से शिवजी उसे पहचान न सके।

दूसरी ओर जालंधर स्वयं शिवजी का रूप बना लिया और वह अपने साथी दुर्वारण को नंदी बना दिया। दोनों देवी पार्वती के पास हार और पश्चाताप करते हुए पहुँच गए। उसने देवी पार्वती को भी अपनी बातों से उलझा दिया। शिव रूपी जालंधर के मन में सिर्फ वासना भरा था। जो देवी स्वयं सृष्टि को मोहित कर देती हैं, वही उस समय जालन्धर की माया में मोहित हो गईं।

राजा युधिष्ठिर का देवर्षि नारदजी से प्रश्न

युधिष्ठिर ने कहा- हे ब्रह्मन् ! जब माया महेश के द्वारा पार्वतीजी मोहित हुयी तो उसके बाद जो हुआ उसे आप मुझे बतलाएँ।

देवर्षि नारदजी का उत्तर

देवर्षि नारद जो उन्होंने स्वयं घटना के साक्षी थे उन्होंने युधिष्ठिर को बताना शुरू किया। उन्होंने जो कहा उसे मैं अपने शब्दों में वर्णन करता हूँ।

देवर्षि नारद जी जो देवी पार्वती के सौंदर्य का वर्णन जालंधर के सामने करके उसे अधर्म के रास्ते चलने पर उकसाया था। अब नारदजी सीधे क्षीरसागर में विराजमान श्रीहरी के पास पहुंचे हुए थे। देवर्षि नारद जी ने जालंधर से मिलने से लेकर भगवान शिव के युद्ध में शामिल होने और देवी पार्वती के दयनीय दशा का वर्णन सुना दिया। उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार शुम्भ जालंधर का रूप बनाकर शिवजी से युद्ध कर रहा है और किस प्रकार जालंधर शिवजी का रूप बनाकर देवी पार्वती को मोहित कर लिया है।

श्रीहरि के आँखों में आँसू

नारदजी की बात सुनकर, क्षीर सागर में विश्राम कर रहे श्रीहरि के हृदय में गहरी चिंता उठी। अचानक उनकी आँखों से आँसू झरने लगे। कुछ भयानक होने का संकेत स्पष्ट था। श्रीहरि तुरंत शेषनाग के आसन से उठ बैठे। उन्होंने इधर-उधर देखा— वहाँ नारद थे… और वायु देव भी उपस्थित थे। भगवान चिंतित थे— “अब मुझे क्या करना चाहिए?”

गरुड़जी को मानसरोवर भेजना

इसी उधेड़बुन में उन्होंने अपने प्रिय वाहन गरुड़ को स्मरण किया। स्मरण करते ही गरुड़जी तुरंत उपस्थित हो गए। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर, प्रभु के सामने खड़े हो गए। श्रीहरि बोले— “गरुड़! तुरंत युद्धभूमि पर जाओ। देखकर आओ। क्या जालंधर मारा गया या कहीं उसने भगवान शिव को अपनी माया से मोहित तो नहीं कर दिया? सब देखो और तुरंत मुझे बताओ।” फिर श्रीहरि ने और गंभीर होकर कहा – गरुड़, यह साधारण युद्ध नहीं है।

जालंधर और शिवजी का युद्ध कोई नश्वर प्राणी देखकर वापस नहीं लौट सकता। केवल तुम ही इसे सहन कर सकते हो। यदि शस्त्रों की वर्षा अधिक हो, तो बाणों की धुँध में अपने शरीर को छिपाकर आगे बढ़ना। और पार्वती माता की स्थिति भी अवश्य देखना – दैत्यों की माया बहुत भयंकर होती है।”

यह कहकर श्रीहरि ने एक अद्भुत सिद्धि वाली दिव्य गुटिका गरुड़ को दी और कहा – “इसे मुख में रख लेना। इससे कोई माया, कोई भ्रम तुम्हें छू भी नहीं सकेगा।” गरुड़जी ने श्रद्धा से कहा – “जैसा आदेश प्रभु।”

गुटिका को मुख में रखकर उन्होंने भगवान विष्णु की परिक्रमा की और अपनी अद्भुत गति से आकाश में उड़ते हुए सीधे युद्धभूमि की ओर निकल पड़े।

गरुड़जी वहाँ पहुँचे और देखा कि एक तरफ से दैत्यों और दूसरी तरफ से देवताओं और शिवगणों के बीच बहुत भयानक युद्ध चल रहा है, लेकिन उन्हें कुछ स्पष्ट समझ नहीं आया। वे वहाँ से तुरंत उड़कर तेज गति से मानसरोवर पर्वत पहुँचे—वह पर्वत इतना ऊँचा था कि देवताओं के लिए भी वहाँ पहुँचना कठिन है।

गरुड़जी ने जालंधर का माया भ्रम तोड़कर सत्य को देखा

वहाँ जाकर उन्होंने गौरी माता का स्थान तो नहीं देखा, और न ही किसी प्रकार की आवाज़ सुनाई दी। थोड़ा आगे बढ़कर उन्होंने “माया-महेश” को देखा—जो दरअसल जालंधर का बनाया हुआ नकली शिव था। उस पुरे क्षेत्र में असुर जालंधर ने माया से मोहित कर रखा था वहां जो जाता उसे सबकुछ सत्य दीखता था अर्थात कोई वही देख सकता था जो जालंधर दिखाना चाहता था।

गरुड़जी ने श्रीहरि द्वारा दी गई गुटिका अपने मुँह में रखी हुई थी, इसलिए उन्हें भ्रम नहीं हुआ और वे समझ गए कि यह असली शिव नहीं बल्कि जालंधर है। यह देखकर वे दुखी हो गए और रोते हुए वापस क्षीरसागर में श्रीहरि के पास पहुँचे।

श्रीहरि को गरुड़जी का परामर्श

गरुड़जी सीधे श्रीहरि के पास पहुंचे और उन्होंने श्रीहरि से कहा – “हे प्रभु! जालंधर ने शिवजी का रूप धारण कर लिया है और उसी रूप में उसने माता पार्वती को धोखे में डाल दिया है। यदि आप सच में देवताओं के रक्षक हैं, तो आपको युद्ध में जाना चाहिए और जालंधर से माया-युद्ध करना चाहिए।”

गरुड़ ने आगे कहा— “मैंने जालंधर की रानी को उसके सिंहासन पर बैठे देखा। वह संगीत, नृत्य और वाद्यों के बीच अत्यंत प्रसन्न दिख रही थी। वह इतनी सुंदर है कि रंभा, उर्वशी जैसी अप्सराएँ भी उसके सामने फीकी पड़ जाएँ। उसका स्पर्श पाने वाला कोई भी पुरुष अपने आपको धन्य समझे। वह आपके साले की पत्नी भी है और देवी लक्ष्मी को भी अत्यंत प्रिय है। आप उसे अपने साथ ले आएँ—इससे शिवजी का भी उपकार होगा।”

नारदजी कहते हैं-

गरुड़ की यह बातें सुनकर श्रीभगवान् ने उन्हें डाँटा और कहा कि ऐसी अनुचित बात नहीं करनी चाहिए। फिर उन्होंने उपाय सोचकर गरुड़ को पुनः भेज दिया।

श्रीहरि और शेषनागजी ने अपने दो रूप बनायें यानि डबल रोल

लक्ष्मीजी को बिना बताए, श्रीहरि ने अपना पीताम्बर शेषनाग से बने बिस्तर पर बिछा दिया और अपनी माया से एक दूसरा रूप बना दिया। वृन्दा के सौंदर्य और पतिव्रता-धर्म के कारण वे उसके प्रति आकर्षित होकर गुप्त रूप से वहाँ से निकल पड़े।

जब शेषनाग ने देखा कि श्रीहरि छिपकर जा रहे हैं, तो वे भी अपना दूसरा रूप बनाकर केशव के पास पहुँचे और बोले -“हे प्रभु! मुझे भी अपने साथ चलने की आज्ञा दें। मैं कहाँ जाऊँ और क्या करूँ? मैं तो आपके मुख की ओर देखकर भोजन करता हूँ, तभी मुझे सुख मिलता है।”

श्रीभगवान् ने कहा -“मैं शंकरजी के सम्मान और पार्वतीजी के उपकार के लिए जालन्धर की पत्नी वृन्दा को उसके पतिव्रत-धर्म के बंधन से मुक्त करने जा रहा हूँ। यह काम मुझे छिपकर करना है।” लेकिन शेषजी नहीं माने। तब श्रीहरि बोले— “आओ, हम दोनों उस घने, भयंकर वन में चलते हैं जहाँ हम वृन्दा को अपनी ओर आकर्षित कर सकें।”

मायावी भयानक वन

इसके बाद दोनों वन में चले गए। वहाँ जाकर श्रीहरि और शेष ने जटा और वल्कल का वेश बना लिया, जैसे साधु-संत हों। उन्होंने वहाँ एक आश्रम भी बना लिया,जो सभी इच्छाएँ पूरी करने वाला लगता था। उनके मायावी रूपों के अनेक शिष्य और प्रशिष्य भी उत्पन्न हो गए। यहाँ तक कि वहाँ सिंह, बाघ, जंगली सूअर, भालू और वानर भी प्रकट हो गए, सब माया से!

जब श्रीहरि की लीला प्रारम्भ होती है तब जंगल में रहें या महल में उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जंगल में भी शुकुन हो जाता है और महल में भी बेचैनी छा जाती है।

फिर श्रीहरि ने मंत्रों द्वारा वृन्दा को आकर्षित किया। उनके मंत्र-प्रभाव से वृन्दा के हृदय में अचानक बेचैनी और घोर चिंता पैदा हो गई। वह रानी अपने महल में बैठी दिव्य स्त्रियों द्वारा चलाए जा रहे चँवरों के बीच भी शांति नहीं पा पा रही थी। बार-बार उसे अपने पति जालन्धर की चिंता सताने लगी। चंदन और अगरु का लेप लगाने के बाद भी वह बार-बार मूर्छित होने लगती। चतुर्दशी की रात, चौथे प्रहर में, उसने एक भयंकर अशुभ स्वप्न देखा, जो विधवा होने जैसी आशंका का सूचक था।

देवी वृंदा की डरावनी सपना

रात में वृन्दा ने एक बहुत डरावना सपना देखा। उसने देखा कि असुरराज जालन्धर का सिर कटकर गिरा हुआ है, उस पर सफ़ेद भस्म (राख) लगाकर कोई उसे मसल रहा है। एक गिद्ध उसकी आँखें निकाल रहा है और उसके कान-नाक कटे हुए हैं। फिर उसने देखा कि खुले बालों वाली, भयानक चेहरे वाली और काले रंग की एक देवी (काली) लाल वस्त्र पहनकर खप्पर में जालन्धर का खून पी रही है।

इस भयानक स्वप्न को देखकर वृन्दा समझ गयी कि यह उसके पति जालन्धर के विनाश का संकेत है। स्वप्न के बाद, जब वह सोकर उठी, तो मागध लोग गीत गा रहे थे और वाद्य बजा रहे थे। किम्पुरुष उसके वंश की स्तुति कर रहे थे। जब सब शांत हुआ, तो वृन्दा ने प्रसन्न होकर उन्हें धन दिया और ब्राह्मणों को बुलाकर अपना सपना सुनाया। ब्राह्मणों ने सपने को सुनकर कहा – “देवि, यह सपना बहुत डरावना और अनिष्ट का सूचक है। इसके निवारण के लिए दान दो।”

देवी वृंदा की बेचैनी

किसी अनहोनी की आशंका के डर से वृन्दा ने गायें, वस्त्र, रत्न, आभूषण, हाथी आदि बहुत-सा धन ब्राह्मणों को दान में दिया। ब्राह्मण प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका अभिषेक किया। फिर भी वृन्दा ज्वर (बुखार) और चिंता से परेशान थी। वह महल में लौट आयी और अपनी नगरी को देखा, जो पूरी तरह मंगलमय और शांत थी। उसी समय भगवान विष्णु ने अपनी माया से उसके मन को आकर्षित किया। इस कारण वृन्दा महल में नहीं रुक सकी। वह अपनी सखी “स्मरदूती” के साथ खच्चरों वाले रथ पर बैठकर तुरंत “सौभाग्य-कानन” नाम के वन में पहुँच गयी।

वह वन बहुत सुंदर था। चारों ओर तरह-तरह के पेड़, मधुर आवाज़ वाले पक्षी, फूलों का रस बहने वाले झरने, और अप्सराओं की उपस्थिति से वह वन और भी दिव्य लग रहा था। वहाँ केवल मंद हवा ही चलती थी, कोई दूसरा व्यक्ति अंदर नहीं आ सकता था। क्योंकि श्रीहरि ने केवल वृंदा को आकर्षित करने के लिए माया वन का निर्माण किया था। दूसरा अन्य व्यक्ति या जिव को कुछ भी नजर नहीं आता था।

इस सुंदर वन को देखकर भी वृन्दा को सुख नहीं मिला। वह अपने पति जालन्धर को याद करने लगी और सोचने लगी, “मैं अपने प्रिय पति को अब कैसे देख पाऊँगी?”

सबसे भयानक वन में प्रवेश

फिर वह उस वन से निकलकर दूसरे वन में गयी। भगवान विष्णु की माया से मोहित होकर वह अपनी सखी के साथ रथ पर बैठी आगे बढ़ती गयी। इसके बाद उसने एक भयानक वन देखा, जहाँ बड़े-बड़े काले पेड़ थे, उनके ऊपर चट्टानों जैसी शाखाएँ थीं।

जंगल में डरावने सिंह, चीते, सियार और साँप भरे हुए थे। पेड़ आकाश को छू रहे थे और गुफाएँ गहरे अँधेरे से भरी थीं।

इस भयावह जंगल को देखकर चंचल नेत्रों वाली वृन्दा आश्चर्य में पड़ गयी और भयभीत भी हो गयी। वृन्दा अपनी सखी और रथ चलाने वाली स्मरदूती के साथ भयावह जंगलों में भटक रही थी।

अचानक वृन्दा ने कहा – “हे स्मरदूति! रथ को तुरंत वापस घर ले चलो… मैं यहाँ बिल्कुल सुरक्षित महसूस नहीं कर रही।”

स्मरदूती ने घबराकर उत्तर दिया – “सखी! मुझे बिल्कुल पता नहीं कि दिशा कौन-सी है।

मुझे यह भी नहीं समझ आ रहा कि हम किस ओर जा रहे हैं। रथ की खच्चरियाँ भी थक चुकी हैं… और यहाँ तो रास्ता भी दिखाई नहीं देता। लगता है भाग्य ही हमें कहीं खींचकर ले जा रहा है… मुझे तो डर लग रहा है कि कहीं कोई राक्षस हमें खा न जाए!”

ऐसा कहकर वह फिर भी हिम्मत करके रथ को तेजी से हाँकने लगी।

रहस्यमय स्थान पर पहुँचना

कुछ ही देर बाद रथ एक ऐसे स्थान पर पहुँच गया जहाँ सिद्ध पुरुष रहते थे — लेकिन वहीँ पास में एक बहुत भयानक वन भी दिख रहा था। वहाँ अजीब-सी शांति थी!

न हवा की आवाज,

न पत्तों की सरसराहट,

न किसी पक्षी का स्वर।

सबकुछ जैसे एक सुनसान, चुप, भयावह दुनिया हो। रथ का व्यवहार भी बदल गया जैसे ही वे उस क्षेत्र में पहुँचे, रथ भी विचित्र हो गया। घोड़ियाँ हिनहिनाना बंद कर चुकी थीं। रथ की आवाज बिल्कुल गायब थी। पताकाएँ हिलना बंद हो गयीं। लटकती घंटियाँ भी चुप थीं। सब कुछ मृत-सा स्थिर लग रहा था। यह देखकर वृन्दा ने डरते हुए अपनी सखी से कहा – “स्मरदूति… अब हम कहाँ जाएँ? घर में भी शांति नहीं, वन में भी भय है।”

भयानक पर्वत और घोड़ियों का रुक जाना

स्मरदूती ने सामने की ओर इशारा किया और बोली – “सखी, देखो! सामने वह भयावह पर्वत है… इसे देखकर घोड़ियाँ बिल्कुल आगे नहीं बढ़ पा रहीं। वे डर से कांप रही हैं।”

यह सुनकर वृन्दा का हृदय काँप उठा। वह घबराकर रथ से उतर गयी और अपने गले में पड़े हार को देखकर भी व्याकुल हो उठी।

भयानक राक्षस का आगमन

अचानक वहीं एक अत्यंत भयानक राक्षस प्रकट हुआ। उसका रूप इतना डरावना था कि देखकर कोई भी बेहोश हो जाए। उसके तीन पैर थे, पाँच हाथ थे, सात आँखें थीं, शरीर पीले रंग का, कान बाघ के जैसे, चेहरा और कंधे सिंह की तरह, बाल लाल और गरुड़ की तरह लटकते हुए। वृन्दा ने उसे देखा तो घबराकर अपनी आँखें ढक लीं और केले के पौधे की तरह काँपने लगी।

स्मरदूती की चीख

प्रतिहारी (स्मरदूती) ने डर में लगाम छोड़ दी और चिल्लाई! “रानी! मेरी रक्षा करो… यह राक्षस मुझे खा जाएगा!” पर तब तक देर हो चुकी थी।

राक्षस का हमला

राक्षस दौड़कर रथ के पास पहुँचा और पूरे रथ को जोर से उठाकर घुमाने लगा। घोड़ियाँ चीखने तक नहीं पाईं। राक्षस ने उन्हें वैसे ही खा लिया जैसे सिंह हिरण को खा लेता है। वृन्दा डर के मारे जमीन पर गिर पड़ी। मानो किसी पर घात लगाते हुए व्याघ्र की दहाड़ से डरी हुई मृगी गिर जाती है। स्मरदूती भी डर में भागकर एक पेड़ की जड़ में जा गिरी। जैसे कोई टूटी हुई अशोक लता गिर पड़ी हो।

राक्षस की दुष्ट इच्छा

फिर वह राक्षस वृन्दा के पास गया और उसका हाथ पकड़ लिया। वह बोला – “यदि तुम अपने प्राण बचाना चाहती हो तो मेरी बात सुनो… मैंने सुना है कि भगवान शंकर ने तुम्हारे पति जालन्धर का वध कर दिया है। अब तुम मुझे अपना पति बना लो। फिर तुम बिना भय के लंबे समय तक जीओगी, मांस और मदिरा का आनंद लो।” यह सुनते ही वृन्दा जैसे प्राणहीन हो गयी। वह स्तब्ध, निढाल, और मृत सदृश हो गयी।

श्रीहरि ने आगे कैसे लीला रची अगले लेख में पढ़िए।

इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के छठे उत्तर खण्ड के नारद युधिष्ठिर संवाद के अन्तर्गत जालन्धरोपाख्यान का श्रीभगवान् की माया का वर्णन नामक पन्द्रहवें अध्याय का हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।१५।।

Source: पद्मपुराण

ॐ नमः शिवाय 🙏 जय श्रीहरि 🙏