
श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना
रामचरितमानस – बालकाण्ड
जय श्री सीताराम🙏
रामचरितमानस – बालकाण्ड में “श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना” एक अत्यंत सुंदर और गूढ़ आध्यात्मिक आरंभ है। इसे समझना मतलब पूरे मानस के भावलोक में प्रवेश करना है।
श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना का अर्थ क्या है?
- श्री सीताराम → भगवान श्रीराम और माता सीता
- धाम → उनका दिव्य निवास (अयोध्या)
- परिकर → उनके भक्त, सेवक, सखा (जैसे हनुमान जी, लक्ष्मण जी, भरत जी आदि)
- वंदना → प्रणाम, स्तुति, स्मरण
यानी, “श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना” का अर्थ है — भगवान राम, माता सीता, उनके धाम अयोध्या और उनके समस्त भक्तों की वंदना करना है।
1. गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री सीताराम धाम परिकर वंदना क्यों की?
गोस्वामी तुलसीदास जी जानते थे कि बिना कृपा के भक्ति और कथा का फल नहीं मिलता। इसलिए वे कथा शुरू करने से पहले भगवान श्रीराम-सीता की कृपा मांगते हैं, अयोध्या धाम को प्रणाम करते हैं और रामजी के भक्तों (परिकर) को नमस्कार करते हैं।
यह एक तरह से आध्यात्मिक अनुमति (Divine Permission) है, जिससे कथा मंगलमय और सफल हो सके।
श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना भक्ति का मूल मंत्र – केवल भगवान ही नहीं, उनके भक्तों और धाम का भी सम्मान करना और अपने अहंकार का त्याग करना – “मैं कुछ नहीं, सब आपकी कृपा है” और समर्पण भाव यह है कि कथा, ज्ञान और भक्ति सब प्रभु की देन है।
तुलसीदास जी जैसे कह रहे हों:
- “हे सीता-राम! हे अयोध्या धाम! और आपके सभी प्रिय भक्तों!
- मैं आपको प्रणाम करता हूँ, कृपा करें ताकि मैं आपकी पवित्र कथा कह सकूँ।”
“जब तुलसीदास जी रामकथा शुरू करते हैं, तो सबसे पहले वे राम को नहीं… बल्कि राम के पूरे परिवार, उनके धाम और उनके भक्तों को याद करते हैं… क्यों और कैसे याद करते ? क्या है इस वंदना का गहरा रहस्य… आइए जानते हैं…”
श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना – सरयू नदी और अवधपुरी के नर-नारियों की वंदना
“श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना में तुलसीदास जी जब रामकथा शुरू करते हैं, तो वे सीधे राम का नाम नहीं लेते। पहले वे उस धरती को प्रणाम करते हैं, जहाँ प्रभु राम ने जन्म लिया।, उस सरयू को नमन करते हैं, जिसने अनगिनत आत्माओं को पवित्र किया और फिर वे झुकते हैं उन साधारण दिखने वाले लोगों के सामने, जिन पर स्वयं भगवान राम का प्रेम बरसता है। “
तुलसीदास जी चौपाई कहते हैं –
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥
प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥1॥
(Bandau Avadh Puri ati paavani, Sarju sari kali kalush nasavani॥
Pranavau pur nar naari bahori, mamta jinh par Prabhuhi na thori॥1॥)
भावार्थ:-मैं अति पवित्र श्री अयोध्यापुरी और कलियुग के पापों का नाश करने वाली श्री सरयू नदी की वन्दना करता हूँ। फिर अवधपुरी के उन नर-नारियों को प्रणाम करता हूँ, जिन पर प्रभु श्री रामचन्द्रजी की ममता थोड़ी नहीं है (अर्थात् बहुत है)॥1॥
तुलसीदास जी ने श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना में यह पहली चौपाई कहते है, वह श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना का एक अत्यंत भावपूर्ण अंश है। तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं उस अत्यंत पवित्र अयोध्या नगरी को प्रणाम करता हूँ, और उस सरयू नदी को नमन करता हूँ, जो कलियुग के पापों का नाश करने वाली है। फिर मैं अयोध्या के उन सभी स्त्री-पुरुषों को प्रणाम करता हूँ, जिन पर भगवान श्रीराम का अपार स्नेह है, यानी जिनसे प्रभु अत्यंत प्रेम करते हैं।
कथा शुरू करने से पहले तुलसीदास जी यह बता रहे हैं कि केवल भगवान की पूजा ही नहीं, उनके धाम (अयोध्या), उनकी कृपा की धारा (सरयू), और उनके भक्तों का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है।
अयोध्या – केवल एक शहर नहीं, एक चेतना है। “अवध पुरी अति पावनि” का अर्थ केवल भौतिक अयोध्या नहीं है। अयोध्या का एक गहरा अर्थ है -“जहाँ युद्ध (अहंकार, द्वेष) नहीं होता” हमारे भीतर जब शांति, प्रेम और भक्ति का भाव होता है, तब हमारा हृदय ही “अयोध्या” बन जाता है।
सरयू नदी – आत्मा को शुद्ध करने वाली धारा है। “सरजू सरि कलि कलुष नसावनि” सरयू केवल जल नहीं है, यह भक्ति और शुद्धि का प्रतीक है। जैसे सरयू स्नान से शरीर शुद्ध होता है, वैसे ही राम नाम और भक्ति से मन के पाप धुलते हैं। संकेत यह है कि “यदि तुम रामभक्ति में डूब जाओ, तो कलियुग के सारे दोष मिट सकते हैं।”
अयोध्या के नर-नारी – सर्वोच्च भक्त “ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी” यह बहुत गहरा वाक्य है। भगवान सबको प्रेम करते हैं, लेकिन जो भक्त पूर्ण समर्पण में जीते हैं, उन पर भगवान का प्रेम “विशेष” हो जाता है।
तुलसीदास जी हमें सिखा रहे हैं: “भगवान से प्रेम पाना है तो उनके प्रिय भक्तों जैसा बनना होगा।”
2. श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना – सीताजी की निंदा करने वालों और माता कौशल्या की वंदना
श्रीराम केवल राजा नहीं हैं। वे ऐसे करुणामय भगवान हैं, जो अपनी ही पत्नी की निंदा करने वालों को भी आख़िर में अपने धाम में स्थान दे देते हैं और फिर तुलसीदास जी झुकते हैं उस माँ के चरणों में, जिसकी गोद से स्वयं भगवान ने जन्म लिया। वह माँ…कौशल्या…जो इस संसार की ‘प्राची’ है, जहाँ से दिव्यता का सूर्योदय हुआ। “
श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना के दूसरे चौपाई में तुलसीदास जी कहते हैं –
सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए॥
बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची॥2॥
(Siya nindak agh ogh nasae, lok bisok banai basae।
Bandau Kaushalya disi praachi, kirati jaasu sakal jag maachi॥2॥)
भावार्थ:-उन्होंने (अपनी पुरी में रहने वाले) सीताजी की निंदा करने वाले (धोबी और उसके समर्थक पुर-नर-नारियों) के पाप समूह को नाश कर उनको शोकरहित बनाकर अपने लोक (धाम) में बसा दिया। मैं कौशल्या रूपी पूर्व दिशा की वन्दना करता हूँ, जिसकी कीर्ति समस्त संसार में फैल रही है॥2॥
यह चौपाई भी श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना का अत्यंत गूढ़ और भावपूर्ण हिस्सा है। इसमें तुलसीदास जी ने एक साथ करुणा, न्याय और दिव्य मातृत्व—तीनों का अद्भुत संगम दिखाया है।
तुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान श्रीराम ने सीताजी की निंदा करने वालों (जैसे धोबी आदि) के पापों का नाश कर दिया, और उन्हें शोक से मुक्त करके अपने धाम में स्थान दिया।फिर मैं माता कौशल्या की वंदना करता हूँ, जो पूर्व दिशा के समान हैं और जिनकी कीर्ति पूरे संसार में फैली हुई है।
श्री राम की करुणा न्याय से भी ऊपर है क्योंकि ईश्वर का हृदय न्याय से नहीं, करुणा से चलता है। “सिय निंदक अघ ओघ नसाए” यहाँ एक बहुत बड़ा विरोधाभास दिखता है कि जिन्होंने माता सीता की निंदा की, वही लोग बाद में भगवान के धाम में स्थान पा गए।
इसका गहरा संदेश है कि भगवान केवल दंड देने वाले नहीं हैं, वे पाप को नष्ट करते हैं, पापी को नहीं। श्री राम का न्याय कठोर हो सकता है, लेकिन उनकी करुणा अनंत होती है।
लोक बिसोक – दुख से मुक्ति “लोक बिसोक बनाइ बसाए” यहाँ “बिसोक” यानी बिना शोक के। भगवान का धाम ऐसा स्थान है, जहाँ कोई दुख, पछतावा या पीड़ा नहीं रहती। जब आत्मा प्रभु की शरण में पहुँचती है, तो उसके सारे दुख समाप्त हो जाते हैं।
माता कौशल्या – जो पूर्व दिशा का प्रतीक हैं। “बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची…” तुलसीदास जी ने माता कौशल्या को पूर्व दिशा (प्राची) कहा है। पूर्व दिशा से ही सूर्य उदय होता है यानी प्रकाश, ज्ञान और जीवन की शुरुआत पूर्व दिशा ही है। इसलिए, माता कौशल्या वह दिव्य “दिशा” हैं, जहाँ से स्वयं भगवान श्रीराम (सूर्य समान) प्रकट हुए।
मातृत्व की महिमा -माँ का स्थान ईश्वर के समान पूजनीय है। “कीरति जासु सकल जग माची” माता कौशल्या की महिमा केवल इसलिए नहीं है कि वे राम की माता हैं, बल्कि इसलिए कि उन्होंने ईश्वर को जन्म दिया, और ममता, त्याग और प्रेम का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत किया। जहाँ शुद्ध मातृत्व होता है, वहीं भगवान का अवतार होता है।
तुलसीदास जी हमें तीन महत्वपूर्ण बातें सिखाते हैं—- भगवान की करुणा असीम है – वे पापी को भी स्वीकार कर लेते हैं।
- सच्ची शरण में जाने से दुख समाप्त हो जाता है।
- माता का स्थान सर्वोच्च है – वही ईश्वर के आगमन का माध्यम बनती हैं।
श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना – भगवान राम के प्राकट्य और उनके माता-पिता की वंदना
जब संसार अंधकार में डूबा था, तब एक दिव्य चंद्रमा उदित हुआ। वह चंद्रमा था—प्रभु श्री राम…जो भक्तों को शीतलता देते है और दुष्टों के लिए पाले के समान बन जाते है और तुलसीदास जी झुकते हैं उस पिता के सामने जिसने भगवान को गोद में खिलाया, उस माँ के सामने, जिसकी गोद में स्वयं परमात्मा ने जन्म लिया। और फिर वे कहते हैं—
- हे प्रभु! मुझे अपना सेवक नहीं…
- अपना बच्चा समझकर कृपा करो…
गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना के तीसरे और चौथे चौपाइयों ऐसी वंदना की है जो श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना को और भी ऊँचाई पर ले जाती हैं। यहाँ तुलसीदास जी केवल वंदना ही नहीं करते, बल्कि भगवान के प्राकट्य, उनके माता-पिता की महिमा और अपनी पूर्ण शरणागति भी प्रकट करते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं –
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू॥
दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी॥3॥
करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी॥
जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता॥4॥
(Pragateu jahan Raghupati sasi chaaru, biswa sukhad khal kamal tusaaru।
Dasarath rau sahit sab raani, sukrut sumangal moorati maani॥3॥)
(Karau pranam karam man baani, karahu kripa sut sevak jaani।
Jinhahi birachi bad bhayau bidhata, mahima avadhi Ram pitu mata॥4॥)
भावार्थ:-जहाँ (कौशल्या रूपी पूर्व दिशा) से विश्व को सुख देने वाले और दुष्ट रूपी कमलों के लिए पाले के समान श्री रामचन्द्रजी रूपी सुंदर चंद्रमा प्रकट हुए। सब रानियों सहित राजा दशरथजी को पुण्य और सुंदर कल्याण की मूर्ति मानकर मैं मन, वचन और कर्म से प्रणाम करता हूँ। अपने पुत्र का सेवक जानकर वे मुझ पर कृपा करें, जिनको रचकर ब्रह्माजी ने भी बड़ाई पाई तथा जो श्री रामजी के माता और पिता होने के कारण महिमा की सीमा हैं॥3-4॥
इन दोनों चौपाइयों में तुलसीदास जी कहते हैं कि जहाँ माता कौशल्या रूपी पूर्व दिशा से सुंदर चंद्रमा के समान श्रीराम प्रकट हुए, जो पूरे संसार को सुख देने वाले हैं और दुष्टों के लिए पाले अर्थात नाश करने वाले के समान हैं। मैं राजा दशरथ और उनकी सभी रानियों को पुण्य और मंगल की मूर्ति मानकर मन, वचन और कर्म से प्रणाम करता हूँ। वे मुझे अपना पुत्र और सेवक समझकर कृपा करें, क्योंकि उन्हें रचकर स्वयं ब्रह्मा भी गौरवान्वित हुए, और वे श्रीराम के माता-पिता होने के कारण महिमा की पराकाष्ठा हैं।
राम – चंद्रमा के समान शीतलता देने वाले हैं। “रघुपति ससि चारू” तुलसीदास जी ने श्रीराम को चंद्रमा (ससि) कहा है। चंद्रमा शीतलता और शांति देता है, उसी तरह श्रीराम हृदय को शांति और आनंद देते हैं। श्री राम का स्मरण मन के ताप (चिंता, दुख) को शांत करता है।
दुष्टों के लिए ‘पाला’ क्यों? यहाँ बहुत सुंदर उपमा है—“खल कमल तुसारू” जैसे पाला (तुषार) पड़ते ही कमल मुरझा जाता है, वैसे ही राम के सामने दुष्टता टिक नहीं पाती। श्री राम केवल करुणामय ही नहीं, वे अधर्म के विनाशक भी हैं।
दशरथ और रानियाँ – राजा दशरथ और उनके रानियों को पुण्य और मंगल की मूर्ति कहा है। “सुकृत सुमंगल मूरति मानी” तुलसीदास जी उन्हें साधारण माता-पिता नहीं मानते हैं। वे मानते हैं कि उनके सारे पुण्यों का यह फल हैं क्योंकि उनके घर में स्वयं भगवान ने जन्म लिया। जहाँ सच्चा धर्म और पुण्य होता है, वहीं भगवान प्रकट होते हैं।
पूरी शरणागति – मन, वचन, कर्म से समर्पित होकर प्रणाम करना। “करउँ प्रनाम करम मन बानी” यह केवल प्रणाम नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण है— मन से (भाव), वचन से (शब्द) और कर्म से (कार्य) से। यही सच्ची भक्ति का मार्ग है।
“सुत सेवक जानी” – भक्त और भगवान के बीच अद्भुत संबंध को दर्शाता है। तुलसीदास जी कहते हैं—“मुझे अपना पुत्र और सेवक समझकर कृपा करें” यहाँ दो भाव एक साथ हैं:
- पुत्र → प्रेम, अपनापन
- सेवक → विनम्रता, समर्पण
यह भक्ति का सर्वोत्तम संतुलन है।
राम के माता-पिता – राजा दशरथ और कौशलया प्रभु श्रीराम के माता-पिता होने के कारण महिमा की अंतिम सीमा पर पहुँच चुके हैं। इससे आगे महिमा संभव नहीं है। “महिमा अवधि राम पितु माता”
तुलसीदास जी कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने भी उन्हें बनाकर यश पाया और वे राम के माता-पिता होने के कारण महिमा की अंतिम सीमा (limit) पर हैं। ईश्वर के माता-पिता होना, यह सर्वोच्च गौरव और दिव्यता है।
श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना के इन दोनों में तुलसीदास जी हमें सिखाते हैं कि –
- भगवान शांति भी देते हैं और अधर्म का नाश भी करते हैं।
- सच्चे पुण्य और धर्म से ही भगवान का प्राकट्य होता है।
- भक्ति का सर्वोच्च रूप है — मन, वचन, और कर्म से समर्पण।
- माता-पिता (विशेषकर दिव्य माता-पिता) का स्थान अत्यंत ऊँचा है।
Source: रामचरितमानस – बालकाण्ड
🙏 जय श्री सीताराम 🙏
📿 “श्री सीताराम धाम परिकर वंदना” लेख केवल आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी भारत के विभिन्न सनातन, वैदिक, और पौराणिक ग्रंथों के स्रोतों पर आधारित है तथा किसी भी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।
📜 इस लेख में प्रस्तुत श्लोक पारंपरिक ग्रंथों में उपलब्ध मूल स्वरूप पर आधारित हैं। इनमें कोई जानबूझकर परिवर्तन नहीं किया गया है।
🖼️ इस लेख में प्रयुक्त चित्र AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) द्वारा निर्मित हैं और केवल भावात्मक प्रस्तुति के उद्देश्य से उपयोग किए गए हैं।
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