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🙏 दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 121-136) 🙏
देवी दुर्गा के हजार नामों में अंतिम 16 श्लोक एवं उनके हिन्दी अर्थ
जब सृष्टि की गहराइयों में उतरते हैं, जब मन सीमाओं से परे जाकर सत्य को खोजने लगता है, तब एक ही शक्ति हर रूप में प्रकट होती है —माँ आदिशक्ति, जिनके हजार नाम दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् में प्रसिद्ध है।
वह कभी मर्यादा बनकर संसार को संतुलित करती हैं, तो कभी महोदधि (समुद्र) की तरह अनंत और अथाह बन जाती हैं, कभी वह वेदों का ज्ञान धारण करने वाली ललिता हैं, तो कभी अधर्म का संहार करने वाली उग्र काली। वही माँ आदिशक्ति, जिनके हजार नाम दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् में प्रसिद्ध है।
माँ आदिशक्ति, जिनके हजार नाम दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् में प्रसिद्ध है। यह वही शक्ति है, जो हमारी भाषा में, हमारी संस्कृति में, हमारे संस्कारों में बसती है, जो इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना बनकर हमारे भीतर प्रवाहित होती है, जो सूक्ष्म अणु से लेकर विराट ब्रह्मांड तक हर रूप में विद्यमान है।
दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् के इन दिव्य श्लोकों (121–136) में देवी के उसी अद्भुत, रहस्यमय और सर्वव्यापी स्वरूप का वर्णन है, जहाँ वह केवल एक देवी नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि की चेतना, ऊर्जा और परम सत्य बनकर प्रकट होती हैं।
आइए, श्रद्धा और भक्ति के साथ दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् के इन श्लोकों के गूढ़ अर्थ को समझें, और माँ के उन अनंत रूपों का अनुभव करें, जो हर क्षण हमें मार्ग दिखाते हैं।
श्लोक 121
पोषिणी शोषिणी शक्तिर्दीर्घकेशी सुलोमशा॥121॥
देवी वह शक्ति हैं जो इस संसार की मर्यादा (सीमा) को बनाए रखती हैं। जैसे समुद्र (महोदधि) अपनी सीमा में रहता है, वैसे ही देवी सम्पूर्ण सृष्टि को संतुलन और अनुशासन में रखती हैं।
- प्राकारवलया – जैसे किले की दीवार रक्षा करती है, वैसे ही देवी हमें हर ओर से सुरक्षा देती हैं।
- वेला / मर्यादा – वे ही नियम और सीमाओं की स्थापना करती हैं।
- पोषिणी – सभी जीवों का पालन-पोषण करने वाली हैं।
- शोषिणी शक्ति – जब समय आता है, तो वे सब कुछ समेट (नष्ट) भी कर लेती हैं।
👉 दीर्घकेशी, सुलोमशा
इन शब्दों से देवी के सौंदर्य और प्राकृतिक, मुक्त स्वरूप का वर्णन है—उनके लंबे केश और कोमल शरीर उनकी दिव्यता को दर्शाते हैं।
श्लोक 122
नरासृक्पानमत्ता च नरमुण्डास्थिभूषणा॥122॥
दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् के इस श्लोक में देवी के दो विपरीत रूप—सौम्य और उग्र—का अद्भुत संगम है।
- ललिता, तन्वी – अत्यंत सुंदर, कोमल और आकर्षक स्वरूप वाली देवी।
- वेदवेदाङ्गधारिणी – वे समस्त वेदों और ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं।
👉 लेकिन साथ ही—
- नरासृक्पानमत्ता – असुरों के रक्त का पान कर उग्र रूप धारण करने वाली।
- नरमुण्डास्थिभूषणा – नरमुंड (खोपड़ी) और हड्डियों की माला धारण करने वाली।
देवी ज्ञान और करुणा की मूर्ति हैं, लेकिन अधर्म और अन्याय के विनाश के लिए वे भयानक रूप भी धारण करती हैं (जैसे माँ काली)।
श्लोक 123
शाम्भरी गारुडीविद्या वारुणी वरुणार्चिता॥123॥
👉 दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् के इस श्लोक में,
- अक्षक्रीडारतिः – देवी लीला में रत हैं, यह संसार उनके लिए एक खेल के समान है।
- शारि, शारिका-शुक-भाषिणी – वे मधुर वाणी बोलती हैं, जैसे तोता या मैना।
👉 आगे—
- शाम्भरी – शिव की शक्ति।
- गारुडी विद्या – सर्प आदि विषों को नष्ट करने वाली दिव्य विद्या।
- वारुणी, वरुणार्चिता – जल तत्व से जुड़ी शक्ति, जिन्हें वरुण देव भी पूजते हैं।
श्लोक 124
मीनमूर्तिर्धरामूर्तिः वदान्याऽप्रतिमाश्रया॥124॥
दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् के इस श्लोक में, देवी के अवतार स्वरूप बताए गए हैं—
- वाराही – वराह (सूअर) रूप में, जिसने पृथ्वी को बचाया।
- दंष्ट्रोद्धृत वसुन्धरा – अपने दाँतों (दंष्ट्रा) से पृथ्वी को उठाने वाली।
👉 आगे—
- मीनमूर्ति – मछली रूप (मत्स्य अवतार की शक्ति)।
- धरामूर्ति – स्वयं पृथ्वी के रूप में भी वही हैं।
- वदान्या – अत्यंत दयालु और दानी।
- अप्रतिम आश्रया – जिनका कोई समान नहीं, जो सभी का अंतिम सहारा हैं।
श्लोक 125
स्मृतिसंस्काररूपा च सुसंस्कारा च संस्कृतिः॥125॥
👉 दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् के इस श्लोक में,
- अमूर्ता – देवी का कोई एक रूप नहीं, वे निराकार भी हैं।
- निधिरूपा – वे सभी खजानों (धन, ज्ञान, शक्ति) का स्रोत हैं।
- शालिग्रामशिला-शुचिः – शालिग्राम की तरह पवित्र और पूजनीय।
👉 आगे—
- स्मृति और संस्कार रूपा – हमारी यादें, संस्कार और आंतरिक चेतना भी वही हैं।
- सुसंस्कारा, संस्कृतिः – वे ही हमारी संस्कृति, परंपरा और सभ्यता का आधार हैं।
देवी केवल बाहरी रूप में ही नहीं, बल्कि हमारे अंदर के संस्कार, विचार और संस्कृति के रूप में भी विद्यमान हैं।
श्लोक 126
इडा च पिङ्गला पिङ्गा सुषुम्ना सूर्यवाहिनी॥126॥
- प्राकृता देशभाषा – देवी ही सभी भाषाओं में विद्यमान हैं—चाहे वह संस्कृत हो, प्राकृत हो या कोई भी स्थानीय भाषा।
- गाथा, गीति, प्रहेलिका – सभी गीत, कथाएँ, पहेलियाँ और साहित्य भी उन्हीं की अभिव्यक्ति हैं।
👉 अब योग की दृष्टि से—
- इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना – ये शरीर की तीन मुख्य नाड़ियाँ (energy channels) हैं।
- इड़ा – शीतल, चंद्र ऊर्जा
- पिंगला – उष्ण, सूर्य ऊर्जा
- सुषुम्ना – बीच की दिव्य नाड़ी, जिससे आत्मज्ञान होता है
- सूर्यवाहिनी – देवी ही इस ऊर्जा प्रवाह को नियंत्रित करती हैं।
श्लोक 127
अणुरूपा बृहद्रूपा लघुरूपा गुरुस्थिता॥127॥
- शशिस्रवा – चंद्रमा के समान शीतल अमृत बरसाने वाली।
- तालुस्था – मुख के तालु (ऊपरी भाग) में स्थित, जहाँ योग में अमृत का अनुभव होता है।
- अमृतजीविनी – वह अमृत रूपी ऊर्जा जो जीवन को बनाए रखती है।
👉 आगे—
- अणुरूपा – अति सूक्ष्म (परमाणु से भी छोटी)
- बृहद्रूपा – अत्यंत विशाल (पूरे ब्रह्मांड जितनी)
- लघुरूपा – हल्की, सूक्ष्म उपस्थिति
- गुरुस्थिता – महान, स्थिर और भारी स्वरूप
देवी हर स्तर पर हैं—सूक्ष्म से लेकर विशाल तक, और जीवनदायिनी ऊर्जा के रूप में हमारे भीतर प्रवाहित होती हैं।
श्लोक 128
विषयाक्रान्तदेहा च निर्विशेषा जितेन्द्रिया॥128॥
- स्थावर (अचल) और जंगम (चल) – पेड़-पौधे, पर्वत, मनुष्य, पशु—सबमें वही शक्ति है।
- कृतकर्मफलप्रदा – हर जीव को उसके कर्मों का फल देने वाली भी वही हैं।
👉 आगे—
- विषयाक्रांतदेहा – जो जीव इंद्रियों के विषयों (भोग) में फँसा हुआ है, उसमें भी वही शक्ति है।
- निर्विशेषा – देवी किसी में भेदभाव नहीं करतीं।
- जितेन्द्रिया – जो इंद्रियों को जीत लेता है, उसमें देवी का उच्च रूप प्रकट होता है।
देवी सबमें समान रूप से हैं, और कर्म के अनुसार फल प्रदान करती हैं।
श्लोक 129
निर्विकारा च निर्वैरा विरतिः सत्यवर्द्धिनी॥129॥
- चित्स्वरूपा – देवी स्वयं चेतना (Consciousness) हैं।
- चिदानन्दा – वे शुद्ध आनंद स्वरूप हैं।
- परब्रह्मप्रबोधिनी – वे ही हमें परम सत्य (परब्रह्म) का ज्ञान कराती हैं।
👉 आगे—
- निर्विकारा – जिनमें कोई परिवर्तन नहीं होता।
- निर्वैरा – जो किसी से द्वेष नहीं करतीं।
- विरति – संसार के मोह से दूर करने वाली।
- सत्यवर्द्धिनी – सत्य को बढ़ाने और स्थापित करने वाली।
श्लोक 130
विविक्तसेविनी प्रज्ञा जनयित्री च बहुश्रुतिः॥130॥
- पुरुषाज्ञा – परमात्मा (पुरुष) की आज्ञा का पालन कराने वाली शक्ति।
- अभिन्ना – परमात्मा से अलग नहीं, बल्कि उसी का स्वरूप हैं।
👉 आगे—
- क्षान्ति – क्षमा और धैर्य की मूर्ति।
- कैवल्यदायिनी – मोक्ष (मुक्ति) प्रदान करने वाली।
- विविक्तसेविनी – जो एकांत और ध्यान में निवास करती हैं।
- प्रज्ञा जनयित्री – बुद्धि और ज्ञान उत्पन्न करने वाली।
- बहुश्रुति – जिनके पास असीम ज्ञान है।
श्लोक 131
शिवा शिवप्रिया सेव्या सेवाफलविवर्द्धिनी॥131॥
- निरीहा – देवी किसी भी प्रकार की इच्छा या स्वार्थ से रहित हैं।
- समस्ता-एका – वे सम्पूर्ण सृष्टि में एक ही रूप से विद्यमान हैं।
- सर्वलोकैकसेविता – सभी लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी आदि) में उनकी पूजा होती है।
👉 आगे—
- शिवा – कल्याण स्वरूप, मंगलमयी।
- शिवप्रिया – भगवान शिव की प्रिय।
- सेव्या – जिनकी सेवा (भक्ति) करनी चाहिए।
- सेवाफलविवर्द्धिनी – जो भक्तों की सेवा का फल बढ़ा देती हैं।
देवी निःस्वार्थ, सर्वव्यापी और भक्तों को उनके कर्मों का उत्तम फल देने वाली हैं।
श्लोक 132
प्रत्यञ्चा च धुनर्यष्टिः खड्गधारा दुरानतिः॥132॥
- कलौ – कलियुग में
- कल्कि-प्रिया – भगवान कल्कि की प्रिय शक्ति
- काली – उग्र रूप धारण करने वाली देवी
- दुष्ट म्लेच्छ विनाशिनी – अधर्मियों और पापियों का नाश करने वाली
👉 आगे—
- प्रत्यञ्चा – धनुष की डोरी
- धनुर्यष्टि – धनुष
- खड्गधारा – तलवार धारण करने वाली
- दुरानति – जिसे कोई झुका नहीं सकता
देवी कलियुग में धर्म की रक्षा के लिए उग्र रूप धारण कर दुष्टों का विनाश करती हैं।
श्लोक 133
वीरभूर्वीरमाता च वीरसूर्वीरनन्दिनी॥133॥
- अश्वप्लुति, वल्गा – घोड़े की गति और नियंत्रण (लगाम) की शक्ति
- सृणि – हथियार (अंकुश आदि)
- मृत्यु-वारिणी – मृत्यु से बचाने वाली
👉 आगे—
- वीरभूः – वीरों की भूमि
- वीरमाता – वीरों की जननी
- वीरसूः – वीरों को जन्म देने वाली
- वीरनन्दिनी – वीरों में आनंद लेने वाली
देवी शक्ति, साहस और जीवन रक्षा की प्रतीक हैं—वह वीरता की जननी हैं।
श्लोक 134
सौभाग्यसुभगाकारा सर्वसौभाग्यवर्द्धिनी॥134॥
- जयश्री – विजय की देवी
- जयदीक्षा – विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देने वाली
- जयदा – जीत देने वाली
- जयवर्द्धिनी – सफलता को बढ़ाने वाली
👉 आगे—
- सौभाग्य-सुभग-आकारा – सौभाग्य और सुंदरता की मूर्ति
- सर्वसौभाग्यवर्द्धिनी – हर प्रकार के सौभाग्य को बढ़ाने वाली
श्लोक 135
सर्वतीर्थमयीमूर्तिः सर्वदेवमयीप्रभा॥135॥
श्लोक 136
पुण्यं सहस्रनामेदं शिवायाः शिवभाषितम॥136॥
- क्षेमङ्करी – कल्याण करने वाली
- क्षेमरूपा – स्वयं कल्याण का स्वरूप
- सत्कीर्ति – अच्छी ख्याति देने वाली
- पथिदेवता – मार्ग दिखाने वाली देवी
👉 आगे—
- सर्वतीर्थमयी मूर्ति – सभी तीर्थों का स्वरूप
- सर्वदेवमयी प्रभा – सभी देवताओं की शक्ति उन्हीं में समाहित है
देवी ही जीवन का सही मार्ग दिखाती हैं और सभी तीर्थों व देवताओं की शक्ति का स्रोत हैं।
दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् के इन श्लोकों में वर्णित माँ का स्वरूप हमें यह सिखाता है कि वह केवल मंदिरों में विराजमान कोई मूर्ति नहीं हैं, वह हमारे श्वासों में बहने वाली प्राण शक्ति हैं। हमारे विचारों में जन्म लेने वाले संस्कार हैं और हमारे कर्मों को दिशा देने वाली चेतना हैं।
दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् वह ही अणु में भी हैं और विराट में भी, शांति में भी हैं और संहार में भी, ज्ञान में भी हैं और मौन में भी। जब हम अपने भीतर झांकते हैं, जब हम अपने मन को इन्द्रियों से परे ले जाकर स्थिर करते हैं, तब हमें अनुभव होता है कि—
👉 माँ ही चित् (चेतना) हैं…
👉 माँ ही आनंद हैं…
👉 और वही हमें परब्रह्म की ओर जागृत करने वाली शक्ति हैं…
कलियुग में भी, जब अधर्म बढ़ता है, वह काली बनकर रक्षा करती हैं, और जब कोई भक्त सच्चे मन से पुकारता है, तो वह शिवप्रिया बनकर उसे शरण देती हैं।
अंततः जो इस सहस्रनाम का स्मरण करता है, उसके जीवन में सौभाग्य, सिद्धि और शांति स्वतः प्रकट होने लगती है, क्योंकि यह केवल शब्द नहीं—यह स्वयं माँ की जीवंत उपस्थिति है। 🌺
॥ जय माँ दुर्गा ॥
माँ आद्या शक्ति, माँ भवानी, माँ जगदम्बिका — आप ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार की अधिष्ठात्री हैं। आपके सहस्रनाम का पाठ करने से साधक को समस्त सुख, सिद्धि और मोक्ष प्राप्त होता है। हे माँ! अपनी अनंत करुणा से हम सबका जीवन मंगलमय करें।
॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तु ते ॥
🌺🌺 जय माता दी 🌺🌺
📿 “दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 121-136)” लेख केवल आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी भारत के विभिन्न सनातन, वैदिक, और पौराणिक ग्रंथों के स्रोतों पर आधारित है तथा किसी भी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।
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Cosmic Harmony
📖 दुर्गा सहस्रनाम पाठ की पूरी श्रृंखला यहाँ से पढ़ें
- 1.👉 यहाँ से शुरुआत करें और जानें कि इस पाठ का सही महत्व क्या है-
- दुर्गा सहस्रनाम पाठ क्यों, सावधानियाँ, लाभ और विधि 2. 👉माँ के प्रारंभिक दिव्य नामों का भावपूर्ण रहस्य-
- दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 1–20) 3. 👉ज्ञान और शक्ति के अगले स्वरूपों का विस्तार-
- दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 21-40) 4. 👉माँ के गूढ़ और रहस्यमय रूपों का दर्शन-
- दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 41-60) 5. 👉भक्ति और शक्ति का अद्भुत संगम-
- दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 61-80) 6. 👉माँ के उग्र और करुणामयी रूपों की झलक-
- दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 81-100) 7. 👉आध्यात्मिक गहराई और चेतना का विस्तार-
- दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 101-120) 8. 👉अंतिम भाग — जहाँ माँ का पूर्ण, सर्वव्यापी और परम स्वरूप प्रकट होता है-
- दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 121-136)










