Current image: अग्निमय दिव्य प्रकाश में सिंह पर विराजमान माँ दुर्गा, अनेक भुजाओं में शस्त्र धारण किए हुए, दुर्गा सहस्रनाम (श्लोक 101–120) के पावन भाव के साथ।

 

 

 

 

🙏 दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 101-120) 🙏

देवी दुर्गा के हजार नामों में से अगला 20 श्लोक एवं उनके हिन्दी अर्थ

जब साधक भक्ति की गहराइयों में उतरता है, जब वह केवल शब्द नहीं, बल्कि देवी के स्वरूप को अनुभव करने लगता है और तब खुलता है एक नया द्वार — दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 101–120) का दिव्य रहस्य…

यह केवल नामों का क्रम नहीं है, यह माँ के उन रूपों का वर्णन है, जहाँ वह कभी मंद गति से चलने वाली करुणामयी माता हैं, तो कभी भोग और योग दोनों का संतुलन सिखाने वाली शक्ति।

दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम्(श्लोक 101–120) हमें बताता है कि माँ केवल मंदिरों में नहीं रहतीं, वह हमारे शरीर के तत्वों में, हमारे विचारों में, हमारे जन्म और जीवन के हर चरण में विद्यमान हैं।

माँ दुर्गा —
👉 ज्ञान हैं, स्मृति हैं और धर्म की वाणी हैं…
👉 माता हैं, पुत्री हैं, और संपूर्ण सृष्टि की जननी हैं…
👉 क्रीड़ा करती बालिका भी हैं और काल को नियंत्रित करने वाली शक्ति भी…

इन श्लोकों में माँ का स्वरूप इतना व्यापक हो जाता है कि वह केवल एक देवी नहीं, बल्कि जीवन के हर अनुभव, हर भाव और हर परिवर्तन की मूल शक्ति बन जाती हैं।

आइए, दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 101–120) के इन दिव्य नामों में छिपे रहस्यों को
श्रद्धा और प्रेम के साथ अनुभव करें। 🌸

श्लोक 101

सत्वरा मन्दरा गतिर्मन्दा मन्दिरा मोददायिनी।
मानभूमिः पानपात्रा पानदानकरोद्यता॥101॥
हिन्दी अर्थ: वे शीघ्रगामिनी (सत्वरा) हैं, मन्दगामिनी भी हैं। उनकी गति मन्द (शांत) है। वे मंदिरों में वास करती हैं और आनन्द प्रदान करती हैं। वे मानभूमि हैं, पानपात्र धारण करती हैं और पानदान देने के लिए उद्यत रहती हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 101 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • सत्वरा – माँ तुरंत सहायता करने वाली हैं, भक्त की पुकार पर शीघ्र प्रकट होती हैं।
  • मन्दरा गति / मन्दा – कभी शांत, धीमी और स्थिर गति से कार्य करती हैं, जिससे जीवन में संतुलन बना रहता है।
  • मन्दिरा – स्वयं मंदिर के रूप में भी वही हैं, जहाँ भक्ति बसती है।
  • मोददायिनी – आनंद और प्रसन्नता देने वाली।
  • मानभूमि – सम्मान और आत्मसम्मान की भूमि भी वही हैं।
  • पानपात्रा / पानदानकरोद्यता – वह भक्तों को रस, आनंद और जीवन का अमृत प्रदान करने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं।

माँ हर स्थिति में—चाहे तुरंत सहायता हो या धैर्य से मार्गदर्शन—भक्त को आनंद और संतुलन देती हैं।

श्लोक 102

आधूर्णारूणनेत्रा च किञ्चिदव्यक्तभाषिणी।
आशापुरा च दीक्षा च दक्षा दीक्षितपूजिता॥102॥
हिन्दी अर्थ: उनके नेत्र हल्के अरुण (लाल) हैं। वे कभी-कभी अव्यक्त वाणी बोलती हैं। वे आशापुरा (आशाओं को पूरा करने वाली), दीक्षा स्वरूपा और दक्ष हैं। वे दीक्षितों द्वारा पूजित हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 102 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • आधूर्ण-अरूण नेत्रा – माँ की आँखें लालिमा लिए हुए हैं, जो उनकी शक्ति और करुणा दोनों को दर्शाती हैं।
  • किञ्चित् अव्यक्त भाषिणी – उनकी वाणी रहस्यमयी है, जिसे केवल सच्चा साधक ही समझ सकता है।
  • आशापुरा – भक्तों की सभी इच्छाएँ पूर्ण करने वाली।
  • दीक्षा – साधना का आरंभ कराने वाली शक्ति।
  • दक्षा – कुशल और समर्थ।
  • दीक्षित-पूजिता – जिन्हें साधक विशेष विधि से पूजते हैं।

माँ रहस्यमयी ज्ञान और साधना की शक्ति हैं, जो योग्य भक्त की हर आशा पूरी करती हैं।

श्लोक 103

नागवल्ली नागकन्या भोगिनी भोगवल्लभा।
सर्वशास्त्रमयी विद्या सुस्मृतिर्धर्मवादिनी॥103॥
हिन्दी अर्थ: वे नागवल्ली (पान लता), नागकन्या स्वरूपा हैं। वे भोगिनी और भोग की प्रिय हैं। वे सर्वशास्त्रमयी हैं, विद्या स्वरूपा हैं, सुस्मृति (श्रेष्ठ स्मरण शक्ति) हैं और धर्म की वाणी बोलने वाली हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 103 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • नागवल्ली / नागकन्या – सर्पों से संबंधित दिव्य शक्ति, जो रहस्य और ऊर्जा (कुंडलिनी) का प्रतीक है।
  • भोगिनी / भोगवल्लभा – जीवन के सुखों की अधिष्ठात्री, जो भोग और योग दोनों का संतुलन सिखाती हैं।
  • सर्वशास्त्रमयी विद्या – सभी शास्त्रों का ज्ञान उन्हीं में निहित है।
  • सुस्मृति – श्रेष्ठ स्मरण शक्ति देने वाली।
  • धर्मवादिनी – धर्म का उपदेश करने वाली।

माँ ज्ञान, स्मृति और जीवन के संतुलन (भोग-योग) की मूल शक्ति हैं।

श्लोक 104

श्रुतिस्मृतिधरा ज्येष्ठा श्रेष्ठा पातालवासिनी।
मीमांसा तर्कविद्या च सुभक्तिर्भक्तवत्सला॥104॥
हिन्दी अर्थ: वे श्रुति और स्मृति की धारिणी हैं। वे ज्येष्ठा (श्रेष्ठ) हैं, श्रेष्ठा (उत्तम) हैं और पाताल में भी निवास करती हैं। वे मीमांसा और तर्कविद्या की अधिष्ठात्री हैं। वे सुभक्ति हैं और भक्तवत्सला (भक्तों पर कृपा करने वाली) हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 104 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • श्रुति-स्मृति-धरा – वेद और शास्त्रों का संपूर्ण ज्ञान धारण करने वाली।
  • ज्येष्ठा, श्रेष्ठा – सबसे महान और सर्वोच्च।
  • पातालवासिनी – गहराइयों में भी उपस्थित, अर्थात् हर लोक में उनका वास है।
  • मीमांसा, तर्कविद्या – गहन चिंतन और तर्क की शक्ति भी वही हैं।
  • सुभक्ति – सच्ची भक्ति प्रदान करने वाली।
  • भक्तवत्सला – अपने भक्तों से अत्यंत प्रेम करने वाली।

माँ ज्ञान की ऊँचाइयों और गहराइयों दोनों में हैं, और अपने भक्तों का स्नेहपूर्वक पालन करती हैं।

श्लोक 105

सुनाभिर्यातनाजातिर्गम्भीरा भाववर्जिता।
नागपाशधरामूर्तिरगाधा नागकुण्डला॥105॥
हिन्दी अर्थ: वे सुनाभि (कमल नाभि) हैं, यमराज की दंड स्वरूपा भी हैं। वे गम्भीरा हैं और भाव से रहित हैं (निर्लेप)। वे नागपाश धारण करने वाली मूर्ति हैं, वे अगाध (अपरिमेय) हैं और नागकुण्डल धारण करती हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 105 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • गम्भीरा – अत्यंत गंभीर और गहन स्वरूप वाली।
  • भाववर्जिता – भावों से परे, निराकार चेतना का रूप।
  • नागपाशधरा – सर्प रूपी शक्ति (बंधन) को नियंत्रित करने वाली।
  • अगाधा – जिनकी गहराई को कोई माप नहीं सकता।
  • नागकुण्डला – सर्प के आभूषण धारण करने वाली।

माँ गूढ़, रहस्यमयी और असीम शक्ति हैं, जो हर बंधन को नियंत्रित करती हैं।

श्लोक 106

सुचक्रा चक्रमध्यस्था चक्रकोणनिवासिनी।
सर्वमन्त्रमयी विद्या सर्वमन्त्राक्षरावलिः॥106॥
हिन्दी अर्थ: वे सुचक्रा हैं, चक्र के मध्य में स्थित रहती हैं और चक्र के कोनों में भी निवास करती हैं। वे सर्वमंत्रमयी हैं, विद्या स्वरूपा हैं और समस्त मन्त्राक्षरों की मालिक हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 106 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • सुचक्रा / चक्रमध्यस्था – योग के चक्रों (energy centers) के मध्य में स्थित शक्ति।
  • चक्रकोणनिवासिनी – हर दिशा और केंद्र में विद्यमान।
  • सर्वमंत्रमयी विद्या – सभी मंत्रों की मूल शक्ति।
  • सर्वमंत्राक्षरावलि – हर अक्षर, हर ध्वनि उन्हीं से उत्पन्न होती है।

माँ ही मंत्र, ऊर्जा और चेतना के केंद्र हैं—हर साधना उन्हीं से शुरू होती है।

श्लोक 107

मधुस्त्रवास्त्रवन्ती च भ्रामरी भ्रमरालिका।
मातृमण्डलमध्यस्था मातृमण्डलवासिनी॥107॥
हिन्दी अर्थ: उनसे मधु (अमृत) प्रवाहित होता है। वे भ्रामरी (भौंरे जैसी ध्वनि करने वाली), भ्रमरालिका स्वरूपा हैं। वे मातृमण्डल (देवीगण) के मध्य में स्थित और वहीं निवास करने वाली हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 107 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • मधुस्त्रवा – मधु (अमृत) बरसाने वाली, जीवन में मिठास भरने वाली।
  • भ्रामरी / भ्रमरालिका – भौंरे के समान गूंजने वाली शक्ति, जो ध्यान में नाद (ध्वनि) के रूप में अनुभव होती है।
  • मातृमण्डलमध्यस्था – मातृ शक्तियों (देवियों) के समूह के मध्य में स्थित।
  • मातृमण्डलवासिनी – सभी देवी शक्तियों में व्याप्त।

माँ अमृत, नाद और समस्त मातृ शक्तियों का केंद्र हैं—वही सभी देवियों की मूल शक्ति हैं।

श्लोक 108

कुमार जननी क्रूरा सुमुखी ज्वरनाशिनी।
निधाना पञ्चभूतानां भवसागरतारिणी॥108॥
हिन्दी अर्थ: वे कुमार (कार्तिकेय) की जननी हैं। कभी-कभी क्रूर स्वरूपा भी होती हैं। वे सुमुखी हैं और ज्वर का नाश करती हैं। वे पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) की निधि हैं और भवसागर से पार उतारने वाली हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 108 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • कुमार जननी – माँ ही समस्त बालकों (सृष्टि) की जननी हैं।
  • क्रूरा – अधर्मियों के लिए कठोर और उग्र रूप धारण करने वाली।
  • सुमुखी – अपने भक्तों के लिए अत्यंत कोमल और सौम्य।
  • ज्वरनाशिनी – सभी रोगों और कष्टों को दूर करने वाली।
  • पंचभूतों की निधाना – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन पाँच तत्वों की मूल आधार वही हैं।
  • भवसागर तारिणी – जन्म-मरण के चक्र से पार कराने वाली।

माँ ही जीवन की उत्पत्ति, रोगों की नाशक और मोक्ष देने वाली परम शक्ति हैं।

श्लोक 109

अक्रूरा च ग्रहावती विग्रहा ग्रहवर्जिता।
रोहिणी भूमिगर्मा च कालभूः कालवर्तिनी॥109॥
हिन्दी अर्थ: वे अक्रूरा (दयामयी) हैं, ग्रहों की अधिष्ठात्री हैं। वे विग्रह (रूप) हैं और साथ ही निर्ग्रह (रूप से परे) भी हैं। वे रोहिणी स्वरूपा हैं, भूमिगर्मी (धरती की उष्मा) हैं, कालभू (समय की जननी) हैं और कालचक्र को चलाने वाली हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 109 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • अक्रूरा – अत्यंत दयालु और करुणामयी।
  • ग्रहावती – ग्रहों और उनकी शक्तियों को नियंत्रित करने वाली।
  • विग्रहा – विभिन्न रूपों में प्रकट होने वाली।
  • ग्रहवर्जिता – लेकिन स्वयं इन सब बंधनों से परे हैं।
  • रोहिणी – पोषण और वृद्धि देने वाली शक्ति।
  • भूमिगर्मा – पृथ्वी के भीतर की ऊर्जा (गर्भ) भी वही हैं।
  • कालभूः – समय का आधार।
  • कालवर्तिनी – समय को चलाने और नियंत्रित करने वाली।

माँ ही प्रकृति, ग्रह, समय और ऊर्जा—सबकी संचालक हैं, परंतु उनसे परे भी हैं।

श्लोक 110

कलङ्करहिता नारी चतुःषष्ठ्यभिधावती।
अतीता विद्यमाना च भाविनी प्रीतिमञ्जरी॥110॥
हिन्दी अर्थ: वे कलंक रहित नारी हैं। वे चौंसठ विद्याओं की अधिष्ठात्री हैं। वे अतीता (भूतकाल), विद्यमाना (वर्तमान) और भाविनी (भविष्य) स्वरूपा हैं। वे प्रीतिमंजरी हैं, अर्थात् प्रेम और आनन्द की वर्षा करने वाली हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 110 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • कलंक रहिता – पूर्णतः शुद्ध और निष्कलंक।
  • नारी – संपूर्ण स्त्री शक्ति का स्वरूप।
  • चतुःषष्ठि अभिधा – 64 कलाओं (विद्याओं) में प्रकट होने वाली।
  • अतीता – समय से परे।
  • विद्यमाना – वर्तमान में भी उपस्थित।
  • भाविनी – भावों में प्रकट होने वाली।
  • प्रीति मञ्जरी – प्रेम और स्नेह की सुगंध फैलाने वाली।

माँ शुद्धता, कला, प्रेम और समय से परे अस्तित्व की प्रतीक हैं।

श्लोक 111

सर्वसौख्यवतीयुक्तिराहारपरिणामिनी।
जीर्णा च जीर्णवस्रा च नूतना नववल्लभा॥111॥
हिन्दी अर्थ: माता समस्त सुखों की दात्री हैं। वे आहार के पचने की शक्ति के रूप में स्थित हैं। वे जीर्ण वस्त्रधारिणी (पुरानेपन का स्वरूप) और नूतन रूपों की प्रिय भी हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 111 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • सर्वसौख्यवती – सभी प्रकार के सुख देने वाली।
  • युक्ति – बुद्धि और सही निर्णय की शक्ति।
  • आहार परिणमिनी – भोजन को ऊर्जा में बदलने वाली शक्ति (शरीर की क्रिया)।
  • जीर्णा – पुरानी भी वही हैं।
  • जीर्णवस्रा – पुराने वस्त्रों में भी वही।
  • नूतना, नववल्लभा – हर क्षण नई और ताजगी से भरी।

माँ हर परिवर्तन में हैं—पुराने में भी और नए में भी, और जीवन की हर प्रक्रिया को चलाने वाली हैं।

श्लोक 112

अजरा च रजःप्रीता रतिरागविवर्धिनी।
पञ्चवातगतिर्भिन्ना पञ्चश्लेष्माशयाधरा॥112॥
हिन्दी अर्थ: वे अजरा हैं, कभी बूढ़ी नहीं होतीं। वे रजोगुण में प्रिय हैं और रति-राग (प्रेम) की वृद्धि करने वाली हैं। वे पाँच प्रकार के वायु-तत्वों की गति और पाँच श्लेष्माशयों की धारिणी हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 112 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • अजरा – जो कभी वृद्ध नहीं होतीं, सदा युवा हैं।
  • रजःप्रीता – सृष्टि की रचनात्मक शक्ति (रजोगुण) से जुड़ी हुई।
  • रति-राग-विवर्धिनी – प्रेम और आकर्षण को बढ़ाने वाली।
  • पंचवातगति – शरीर की पाँच प्रकार की वायु (प्राण) को नियंत्रित करने वाली।
  • पंचश्लेष्माशयाधरा – शरीर के कफ (श्लेष्मा) तत्व को धारण करने वाली।

माँ शरीर की हर सूक्ष्म क्रिया और भावनात्मक ऊर्जा को नियंत्रित करती हैं।

श्लोक 113

पञ्चपित्तवतीशक्तिः पञ्चस्थानविभाविनी।
उदक्या च वृषस्यन्ती बहिः प्रस्रविणी त्र्यहा॥113॥
हिन्दी अर्थ: माता पंच-पित्त की शक्ति हैं, पाँच अंगों की धारिणी हैं। वे नदियों के जल की धारा के रूप में प्रकट होती हैं और तीन दिनों तक बहने वाले स्त्रोत (ऋतुचक्र आदि) की धारिणी हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 113 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • पंचपित्तवती शक्ति – शरीर के पित्त तत्व की शक्ति भी वही हैं।
  • पंचस्थान विभाविनी – शरीर के विभिन्न केंद्रों (स्थानों) में कार्य करने वाली।
  • उदक्या – जल तत्व की शक्ति।
  • वृषस्यन्ती / बहिः प्रस्रविणी – शरीर की शुद्धि और प्रवाह (excretion) की प्रक्रिया भी वही नियंत्रित करती हैं।
  • त्र्यहा – तीनों काल (भूत, वर्तमान, भविष्य) में उपस्थित।

माँ शरीर के संतुलन, शुद्धि और समय के हर प्रवाह को नियंत्रित करती हैं।

श्लोक 114

रजःशुक्रधरा शक्तिर्जरायुर्गर्भधारिणी।
त्रिकालज्ञा त्रिलिङ्गा च त्रिमूर्तिस्त्रिपुरवासिनी॥114॥
हिन्दी अर्थ: वे रज और शुक्र की धारिणी शक्ति हैं, गर्भ को धारण करने वाली हैं। त्रिकाल की ज्ञाता हैं, तीन लिंगों की अधिष्ठात्री, त्रिमूर्ति और त्रिपुरा में निवासिनी हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 114 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • रजः-शुक्र-धरा – स्त्री और पुरुष दोनों की जनन शक्ति (reproductive energy) भी वही हैं।
  • जरायु-गर्भधारिणी – गर्भ में जीवन को धारण करने वाली माँ की शक्ति।
  • त्रिकालज्ञा – तीनों काल (भूत, वर्तमान, भविष्य) को जानने वाली।
  • त्रिलिङ्गा – तीनों रूपों (सृष्टि, पालन, संहार) में विद्यमान।
  • त्रिमूर्ति – ब्रह्मा, विष्णु, महेश—इन तीनों की शक्ति।
  • त्रिपुरवासिनी – तीनों लोकों में रहने वाली।

माँ ही जीवन की उत्पत्ति, समय का ज्ञान और समस्त देवताओं की मूल शक्ति हैं।

श्लोक 115

अरागा शिवतत्त्वा च कामतत्वानुरागिणी।
प्राच्यवाची प्रतीची च दिगुदीची च दिग्विदिग्दिशा॥115॥
हिन्दी अर्थ: वे रागरहित, शिवतत्त्व स्वरूपा और कामतत्त्व की अनुरागिणी भी हैं। वे सभी दिशाओं में व्याप्त हैं—पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और संपूर्ण दिशाएँ उन्हीं में स्थित हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 115 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • अरागा – माँ किसी भी आसक्ति (राग) से मुक्त हैं।
  • शिवतत्त्वा – वे शिव के परम सत्य स्वरूप हैं।
  • कामतत्त्वानुरागिणी – फिर भी सृष्टि के संचालन के लिए प्रेम और काम (रचना शक्ति) से जुड़ी हैं।
  • प्राच्य (पूर्व), प्रतीची (पश्चिम), उदीची (उत्तर), दक्षिण आदि दिशाएँ – हर दिशा में वही विद्यमान हैं।
  • दिग्विदिग्दिशा – केवल मुख्य दिशाएँ ही नहीं, बल्कि हर कोने, हर दिशा में वही शक्ति है।

माँ निर्लिप्त होकर भी सृष्टि को प्रेम से चलाती हैं और हर दिशा में व्याप्त हैं।

श्लोक 116

अहङ्कृतिरहङ्कारा बाला माया बलिप्रिया।
शुक्रश्रवा सामिधेनी सुश्रद्धा श्राद्धदेवता॥116॥
हिन्दी अर्थ: माता अहंकार और अहंकारिणी भी हैं। वे बालरूपा, माया और बलि (यज्ञ) प्रिय हैं। वे यज्ञ की सामिधेनी, सुश्रद्धा और श्राद्ध की देवता हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 116 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • अहंकार – “मैं” की भावना भी उसी से उत्पन्न होती है।
  • बाला – बालिका रूप में भी वही हैं।
  • माया – यह सम्पूर्ण जगत उनकी माया है।
  • बलिप्रिया – यज्ञ और समर्पण उन्हें प्रिय है
  • शुक्रश्रवा, सामिधेनी – यज्ञ की अग्नि और आहुति में भी वही शक्ति हैं।
  • सुश्रद्धा – सच्ची श्रद्धा वही देती हैं।
  • श्राद्धदेवता – पितरों के कर्मों में पूजित होने वाली देवी।

माँ ही अहंकार, माया, श्रद्धा और यज्ञ की शक्ति हैं—सब कुछ उन्हीं से चलता है।

श्लोक 117

माता मातामही तृप्तिः पितुमाता पितामही।
स्नुषा दौहित्रिणी पुत्री पौत्री नप्त्री शिशुप्रिया॥117॥
हिन्दी अर्थ: वे माता हैं, मातामही हैं, तृप्ति स्वरूपा हैं। पितामही हैं, पुत्री हैं, पौत्री और नातिनियों की प्रिय माता हैं। वे समस्त कुल की स्त्रियों में व्याप्त हैं और शिशुओं की प्रिय हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 117 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • माता, मातामही, पितामही – माँ, नानी, दादी—हर रूप में वही हैं।
  • तृप्ति – संतोष और तृप्ति भी वही देती हैं।
  • स्नुषा (बहू), दौहित्रिणी (नातिन), पुत्री, पौत्री – हर रिश्ते में वही विद्यमान हैं।
  • शिशुप्रिया – बच्चों से प्रेम करने वाली।

माँ हर रिश्ते में हैं—वह केवल देवी नहीं, बल्कि हर संबंध का प्रेम और आधार हैं।

श्लोक 118

स्तनदा स्तनधारा च विश्वयोनिः स्तनन्धयी।
शिशूत्सङ्गधरा दोला लोला क्रीडाभिनन्दिनी॥118॥
हिन्दी अर्थ: वे स्तनपान कराने वाली, विश्व की योनिरूपिणी, शिशु की पोषण करने वाली हैं। वे शिशुओं को गोद में झुलाने वाली और खेल-खेल में आनन्द देने वाली माता हैं।
दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 118 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –
  • स्तनदा, स्तनधारा – माँ अपने स्तनों से पोषण देने वाली।
  • विश्वयोनि – संपूर्ण सृष्टि की जन्मदात्री।
  • स्तनन्धयी – बच्चों को दूध पिलाने वाली माँ।
  • शिशु उत्संगधरा – बच्चे को गोद में रखने वाली।
  • दोला, लोला – झूले में झुलाने वाली।
  • क्रीडाभिनन्दिनी – बच्चों की क्रीड़ा में आनंद लेने वाली।

माँ का यह रूप अत्यंत कोमल और वात्सल्य से भरा है—वह पूरी सृष्टि की पालनकर्ता माता हैं।

श्लोक 119

उर्वशी कदली केका विशिखा शिखिवर्तिनी।
खट्वाङ्गधारिणी खट्व बाणपुङ्खानुवर्तिनी॥119॥
वे उर्वशी के रूप में, केले की तरह कोमल, मोरनी की तरह स्वरयुक्त और बाण की नोक जैसी तीक्ष्ण हैं। वे खट्वांग धारण करने वाली और बाण की पंखधारिणी हैं।

दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 119 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –

  • उर्वशी – अत्यंत सुंदर और आकर्षक स्वरूप।
  • कदली, केका – प्रकृति की सुंदरता और मधुर ध्वनियाँ भी वही हैं।
  • शिखिवर्तिनी – मोर के साथ जुड़ी हुई, सौंदर्य और नृत्य की प्रतीक।
  • खट्वांगधारिणी – शक्तिशाली अस्त्र धारण करने वाली।
  • बाणपुङ्खानुवर्तिनी – लक्ष्य भेदने वाली शक्ति।

माँ सौंदर्य और शक्ति—दोनों का अद्भुत संगम हैं।

श्लोक 120

लक्ष्यप्राप्तिकरा लक्ष्यालध्या च शुभलक्षणा।
वर्तिनी सुपथाचारा परिखा च खनिर्वुतिः॥120॥
हिन्दी अर्थ: वे लक्ष्य की प्राप्ति कराने वाली, शुभलक्षणयुक्त और सत्य मार्ग की चलने वाली हैं। वे रक्षा परिखा के समान हैं और खनन से उत्पन्न आश्रय देने वाली हैं।

दुर्गा सहस्रनाम के श्लोक 120 में इन नामों के अनुसार बताया गया है कि –

  • लक्ष्यप्राप्तिकरा – जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कराने वाली।
  • लक्ष्या, लध्या – वही लक्ष्य भी हैं और उसे पाने का साधन भी।
  • शुभलक्षणा – शुभ गुणों से युक्त।
  • वर्तिनी, सुपथाचारा – सही मार्ग पर चलाने वाली।
  • परिखा – रक्षा करने वाली (जैसे किले की खाई)।
  • खनिर्वृति – गहराई में छिपे खजाने (आत्मिक सुख) तक पहुँचाने वाली।

माँ हमें सही मार्ग दिखाकर जीवन के लक्ष्य तक पहुँचाती हैं और हमारी रक्षा करती हैं।

 

दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 101–120) हमें एक गहरा सत्य सिखाता है कि माँ केवल पूजा की प्रतिमा नहीं हैं, वह हमारे जीवन की हर अवस्था में प्रवाहित होने वाली चेतना हैं…

माँ जगदम्बा —
👉 जन्म से पहले गर्भ में भी हैं…
👉 बाल्यकाल की क्रीड़ा में भी हैं…
👉 यौवन की ऊर्जा में भी हैं…
👉 और अंततः काल के चक्र में भी वही विराजमान हैं…

दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 101–120) यह भी दर्शाता है कि माँ ही हमारे शरीर के तत्वों को संतुलित करती हैं, हमारे कर्मों को दिशा देती हैं, और हमें भवसागर से पार लगाने का मार्ग दिखाती हैं।

जब साधक इन नामों का स्मरण करता है, तो धीरे-धीरे उसे यह अनुभव होने लगता है कि—

👉 माँ बाहर नहीं, भीतर ही निवास करती हैं…
👉 और वही भीतर से हमें ज्ञान, शक्ति और प्रेम की ओर ले जाती हैं…

इसलिए, दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 101–120) केवल पढ़ने का विषय नहीं है— यह जीने का अनुभव है… महसूस करने का मार्ग है…

माँ के इन नामों को अपने हृदय में उतारिए, और अनुभव कीजिए उस दिव्य शक्ति को, जो हर क्षण आपके साथ है… 🙏🌺

॥ जय माँ दुर्गा ॥

माँ आद्या शक्ति, माँ भवानी, माँ जगदम्बिका — आप ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार की अधिष्ठात्री हैं। आपके सहस्रनाम का पाठ करने से साधक को समस्त सुख, सिद्धि और मोक्ष प्राप्त होता है। हे माँ! अपनी अनंत करुणा से हम सबका जीवन मंगलमय करें।

॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तु ते ॥

🌺🌺 जय माता दी 🌺🌺

 

📿 “दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 101-120)” लेख केवल आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी भारत के विभिन्न सनातन, वैदिक, और पौराणिक ग्रंथों के स्रोतों पर आधारित है तथा किसी भी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।

📜”दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 101-120)” लेख में प्रस्तुत श्लोक पारंपरिक ग्रंथों में उपलब्ध मूल स्वरूप पर आधारित हैं। इनमें कोई जानबूझकर परिवर्तन नहीं किया गया है।

🖼️ “दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 101-120)” लेख में प्रयुक्त चित्र AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) द्वारा निर्मित हैं और केवल भावात्मक प्रस्तुति के उद्देश्य से उपयोग किए गए हैं।


✍️ लेखक: Arvind Kumar Singh
Cosmic Harmony

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