🙏 दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 21-40) 🙏
देवी दुर्गा के हजार नामों में से अगला 20 श्लोक एवं उनके हिन्दी अर्थ
जब साधक भक्ति के प्रथम चरण से आगे बढ़ता है, जब वह केवल नामों का उच्चारण नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी शक्ति को महसूस करने लगता है, तब प्रकट होता है एक और दिव्य रहस्य—दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 21–40)
दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम्(श्लोक 21–40) में माँ का स्वरूप अत्यंत व्यापक और अद्भुत बन जाता है। यहाँ वह केवल एक रूप में नहीं, बल्कि अनेक देवियों की संयुक्त शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं…
👉 वह देवी माँ ऐन्द्री, माहेश्वरी, ब्राह्मी, कौमारी बनकर देवताओं की शक्तियों को धारण करती हैं,
👉 वह देवी माँ चण्डी बनकर अधर्म का विनाश करती हैं,
👉 और वही देवी माँ गौरी बनकर करुणा और सौम्यता का रूप लेती हैं।
दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 21–40) हमें यह समझाता है कि माँ केवल सृष्टि की रचयिता ही नहीं, वह स्थिति और संहार दोनों की संचालिका हैं।
इस भाग में माँ का स्वरूप और भी सूक्ष्म हो जाता है। वह षट्चक्रों में प्रवाहित होने वाली कुंडलिनी शक्ति हैं, वह काल (समय) के हर क्षण—निमिष, मुहूर्त, काष्ठा—में विद्यमान हैं और वही इंद्रियों—रस, गंध, स्पर्श—के रूप में भी अनुभव होती हैं।
आइए, दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 21–40) के इन दिव्य नामों में छिपे रहस्यों को
श्रद्धा, भक्ति और पूर्ण समर्पण के साथ अनुभव करें। 🌸
श्लोक 21
ऐन्द्री माहेश्वरी ब्राह्मी कौमारी कमलासना।
इच्छा भगवती शक्तिः कामधेनुः कृपावती॥21॥
हिन्दी अर्थ: देवी इन्द्राणी (ऐन्द्री), माहेश्वरी, ब्राह्मी, कौमारी और कमल पर विराजमान हैं। वे इच्छा की अधिष्ठात्री भगवती शक्ति हैं, कामधेनु समान वरदान देने वाली और करुणामयी हैं।
श्लोक 22
वज्रायुधा वज्रहस्ता चण्डी चण्डपराक्रमा।
गौरी सुवर्णवर्णा च स्थितिसंहारकारिणी॥22॥
हिन्दी अर्थ: वे वज्र आयुध धारण करने वाली, वज्रहस्तिनी हैं। वे चण्डिका हैं, जिनका पराक्रम अत्यन्त उग्र है। वे गौरी हैं, जिनका शरीर सुवर्ण के समान चमकता है और सृष्टि की स्थिति तथा संहार करने वाली हैं।
श्लोक 23
एकानेका महेज्या च शत बाहुर्महाभुजा।
भुजङ्गभूषणा भूषा षट्चक्राक्रमवासिनी॥23॥
हिन्दी अर्थ: माँ एक भी हैं और अनेक रूपों में भी विराजती हैं। वे महाज्ञेय (अत्यंत महान और पूज्य) हैं। उनके असंख्य भुजाएँ हैं। वे सर्पों से अलंकृत हैं और षट्चक्रों (योग के छह चक्रों) में निवास करती हैं।
श्लोक 24
षट्चक्रभेदिनी श्यामा कायस्था कायवर्जिता।
सुस्मिता सुमुखी क्षामा मूलप्रकृतिरीश्वरी॥24॥
हिन्दी अर्थ: वे षट्चक्रों को भेदने वाली हैं। वे श्यामवर्णा, शरीर में ही विराजमान, फिर भी शरीर से परे हैं। वे सुमुखी, सुस्मिता, क्षमा स्वरूपा और समस्त जगत की मूलप्रकृति एवं ईश्वरी हैं।
श्लोक 25
अजा च बहुवर्णा च पुरुषार्थप्रर्वतिनी।
रक्ता नीला सिता श्यामा कृष्णा पीता च कर्बुरा॥25॥
हिन्दी अर्थ:वे अजा (अजन्मा) हैं, अनेक रूप और रंग धारण करने वाली हैं। वे पुरुषार्थ की प्रवर्तक हैं। वे कभी रक्ता, कभी नीली, कभी श्वेत, कभी श्यामा, कभी कृष्णवर्णी, पीतवर्णी और कर्बुरवर्णी स्वरूप धारण करती हैं।
श्लोक 26
क्षुधा तृष्णा जरा वृद्धा तरुणी करुणालया।
कला काष्ठा मुहूर्ता च निमिषा कालरूपिणी॥26॥
हिन्दी अर्थ: वे ही क्षुधा (भूख), तृष्णा (प्यास), जरा (बुढ़ापा), वृद्धा और तरुणी हैं। वे करुणा का आलय हैं। वे ही कला, काष्ठा (समय की गणना), मुहूर्त और निमेष (पलभर) स्वरूपिणी काल की अधिष्ठात्री हैं।
श्लोक 27
सुवर्णरसना नासाचक्षुः स्पर्शवती रसा।
गन्धप्रिया सुगन्धा च सुस्पर्शा च मनोगतिः॥27॥
हिन्दी अर्थ: माँ सुवर्ण-रसना (स्वर्ण समान जीभ वाली), सुन्दर नासा और नेत्रों वाली हैं। वे स्पर्श और रस की अधिष्ठात्री हैं। वे गन्धप्रिय, सुगन्धा, सुस्पर्शा और मन की गति (मनोगति) स्वरूपा हैं।
📖 हमारे अन्य लेख यहां से पढ़ें:
श्लोक 28
मृगनाभिर्मृगाक्षी च कर्पूरामोदधारिणी।
पद्मयोनिः सुकेशी च सुलिङ्गा भगरूपिणी॥28॥
हिन्दी अर्थ: वे मृगनाभि (कस्तूरी) धारण करने वाली, मृगनयनी (हरिण जैसे नेत्रों वाली), कर्पूर की सुगन्ध वाली हैं। वे पद्मयोनि (कमल से उत्पन्न), सुन्दर केशों वाली, सुलिङ्गा और भगमूर्ति स्वरूपा हैं।
श्लोक 29
योनिमुद्रा महामुद्रा खेचरी खगगामिनी।
मधुश्रीर्माधवी वल्ली मधुमत्ता मदोद्धता॥29॥
हिन्दी अर्थ: वे योनिमुद्रा और महामुद्रा स्वरूपा हैं। वे खेचरी, आकाश में गमन करने वाली, पक्षियों के समान गमन करने वाली हैं। वे मधुश्री, माधवी लता, मधुमग्न और मदोन्मत्ता स्वरूपा हैं।
श्लोक 30
मातङ्गी शुकहस्ता च पुष्पबाणेक्षुचापिनी।
रक्ताम्बरधराक्षीबा रक्तपुष्पावतंसिनी॥30॥
हिन्दी अर्थ: वे मातंगी देवी हैं, शुक (तोते) को हाथ में धारण करती हैं। वे पुष्पबाण और इक्षुचाप धारण करती हैं। वे रक्तवर्ण के वस्त्र पहनने वाली, लाल आभूषणों से सुसज्जित और लाल पुष्पों से शोभित हैं।
श्लोक 31
शुभ्राम्बरधरा धीरा महाश्वेता वसुप्रिया।
सुवेणी पद्महस्ता च मुक्ताहारविभूषणा॥31॥
हिन्दी अर्थ: देवी श्वेत वस्त्र धारण करने वाली, धैर्यशालिनी, अत्यन्त उज्ज्वला और धनप्रिया हैं। वे सुन्दर वेणी (चोटी) वाली, हाथों में कमल धारण करने वाली और मुक्ताहार से अलंकृत हैं।
श्लोक 32
कर्पूरामोदनिःश्वासा पद्मिनी पद्ममन्दिरा।
खड्गिनी चक्रहस्ता च भुशुण्डी परिघायुधा॥32॥
हिन्दी अर्थ: वे कर्पूर की सुगंध से युक्त श्वास लेने वाली हैं। वे पद्मिनी (कमलरूपी), कमल के समान निवास करने वाली हैं। वे खड्ग (तलवार) और चक्र धारण करती हैं, साथ ही भुशुण्डी और परिघ (गदा) जैसे आयुधों से सुसज्जित हैं।
श्लोक 33
चापिनी पाशहस्ता च त्रिशूलवरधारिणी।
सुबाणा शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना॥33॥
हिन्दी अर्थ: वे धनुषधारी हैं, हाथों में पाश (फंदा) और त्रिशूल लिए रहती हैं। वे वरदान देने वाली हैं, शक्ति धारण करती हैं और मयूरवाहना हैं।
श्लोक 34
वरायुधधरा वीरा वीरपानमदोत्कटा।
वसुधा वसुधारा च जया शाकम्भरी शिवा॥34॥
हिन्दी अर्थ: देवी वरायुध धारण करने वाली, वीरांगना और वीररस के पान से परिपूर्ण हैं। वे वसुंधरा स्वरूपा, धन-दात्री, जया, शाकम्भरी और शिवा कहलाती हैं।
श्लोक 35
विजया च जयन्ती च सुस्तनी शत्रुनाशिनी।
अन्तर्वती वेदशक्तिर्वरदा वरधारिणी॥35॥
हिन्दी अर्थ: वे विजया, जयन्ती, सुन्दर स्तनवाली और शत्रुनाशिनी हैं। वे अन्तर्वती (अन्तःशक्ति), वेदशक्ति, वरदायिनी और वरदान प्रदान करने वाली हैं।
श्लोक 36
शीतला च सुशीला च बालग्रहविनाशिनी।
कौमारी च सुपर्णा च कामाख्या कामवन्दिता॥36॥
हिन्दी अर्थ: वे शीतला हैं, सुशील स्वभाव वाली और बालग्रह (बालकों के रोगों) का नाश करने वाली हैं। वे कौमारी, गरुड़रूपा, कामाख्या और सबकी वन्दनीय हैं।
श्लोक 37
जालन्धरधरानन्ता कामरूपनिवासिनी।
कामबीजवती सत्या सत्यमार्गपरायणा॥37॥
हिन्दी अर्थ: वे जालन्धर पर्वत की धारिणी, अनन्ता, कामरूप की निवासिनी हैं। वे कामबीज स्वरूपा, सत्यस्वरूपा और सत्य मार्ग की परायण हैं।
श्लोक 38
स्थूलमार्गस्थिता सूक्ष्मा सूक्ष्मबुद्धिप्रबोधिनी।
षट्कोणा च त्रिकोणा च त्रिनेत्रा त्रिपुरसुन्दरी॥38॥
हिन्दी अर्थ: वे स्थूल और सूक्ष्म दोनों मार्गों में स्थित हैं। वे सूक्ष्म बुद्धि को जागृत करने वाली हैं। वे षट्कोण और त्रिकोण रूपिणी, त्रिनेत्री और त्रिपुरसुन्दरी हैं।
श्लोक 39
वृषप्रिया वृषारूढा महिषासुरघातिनी।
शुम्भदर्पहरा दीप्ता दीप्तपावकसन्निभा॥39॥
हिन्दी अर्थ: वे वृषभ (बैल) की प्रिय, वृषभारूढ़ा हैं। वे महिषासुर का वध करने वाली हैं। वे शुम्भ का घमंड नष्ट करने वाली और प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्विनी हैं।
श्लोक 40
कपालभूषणा काली कपालामाल्यधारिणी।
कपालकुण्डला दीर्घा शिवदूती घनध्वनिः॥40॥
हिन्दी अर्थ: वे कपालों से भूषित काली हैं। वे कपालों की माला धारण करती हैं, कपालकुण्डल पहने हुए हैं, दीर्घा हैं। वे शिवदूती (शिव की दूत) और घनगर्जन के समान ध्वनि वाली हैं।
दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 21–40) हमें यह गहरा बोध कराता है कि माँ केवल एक स्वरूप में सीमित नहीं हैं, वह अनंत रूपों में प्रकट होने वाली परम शक्ति हैं…
👉 वह देवी माँ देवताओं की शक्ति बनकर धर्म की रक्षा करती हैं,
👉 वह देवी माँ काल बनकर सृष्टि को नियंत्रित करती हैं,
👉 और वही देवी माँ इंद्रियों के माध्यम से जीवन को अनुभव कराती हैं।
दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 21–40) यह भी सिखाता है कि माँ ही शक्ति हैं, माँ ही प्रकृति हैं, और माँ ही चेतना हैं और जब साधक इन नामों का मनन करता है, तो उसके भीतर धीरे-धीरे यह अनुभूति जागृत होती है कि—
माँ हर रूप में उसके साथ हैं, और वही उसे अज्ञान से ज्ञान, भय से निर्भयता और बंधन से मुक्ति की ओर ले जाती हैं।
इसलिए, दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 21–40) केवल पढ़ने का विषय नहीं है। यह स्वयं को पहचानने और परम सत्य से जुड़ने का मार्ग है। माँ के इन दिव्य नामों को अपने हृदय में बसाइए, और अनुभव कीजिए उस अनंत शक्ति को, जो हर क्षण आपको मार्ग दिखा रही है। 🙏🌺
॥ जय माँ दुर्गा ॥
माँ आद्या शक्ति, माँ भवानी, माँ जगदम्बिका — आप ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार की अधिष्ठात्री हैं। आपके सहस्रनाम का पाठ करने से साधक को समस्त सुख, सिद्धि और मोक्ष प्राप्त होता है। हे माँ! अपनी अनंत करुणा से हम सबका जीवन मंगलमय करें।
॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तु ते ॥
🌺🌺 जय माता दी 🌺🌺
📿 “दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 21-40)” लेख केवल आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी भारत के विभिन्न सनातन, वैदिक, और पौराणिक ग्रंथों के स्रोतों पर आधारित है तथा किसी भी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।
📜”दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 21-40)” लेख में प्रस्तुत श्लोक पारंपरिक ग्रंथों में उपलब्ध मूल स्वरूप पर आधारित हैं। इनमें कोई जानबूझकर परिवर्तन नहीं किया गया है।
🖼️ “दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 21-40)” लेख में प्रयुक्त चित्र AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) द्वारा निर्मित हैं और केवल भावात्मक प्रस्तुति के उद्देश्य से उपयोग किए गए हैं।
✍️ लेखक: Arvind Kumar Singh
Cosmic Harmony