वंदना पदावली – बालकाण्ड प्रारंभ
श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड के इन पंचवंदना पदों में तुलसीदासजी ने श्रीगणेश, सरस्वती, गुरु, शिव और श्रीराम — इन पाँच दिव्य रूपों की वंदना की है। यह वंदनाएँ केवल औपचारिक नहीं, बल्कि आत्मा के गहन भावों और काव्यशक्ति की प्रेरणा से ओतप्रोत हैं।
🌺 1. गणेश वंदना
जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन ॥
📖 हिंदी अर्थ: जिनका स्मरण करते ही सिद्धि प्राप्त होती है, जो गणों के नायक हैं और जिनका मुख हाथी के समान है — वही गणेशजी, जो बुद्धि और शुभ गुणों के भंडार हैं, वे मुझ पर कृपा करें।
🪔 व्याख्या: श्रीगणेश विघ्नविनाशक और सिद्धि-दाता हैं। तुलसीदासजी उनकी गंभीरता (हाथीमुख) और मंगलकारी प्रकृति को स्मरण करते हुए उन्हें अपनी रचना में बुद्धि और गुणों की वर्षा करने के लिए आमंत्रित करते हैं। यह वंदना केवल रचना के आरंभ के लिए नहीं, वरन् जीवन के हर आरंभ के लिए उपयुक्त प्रार्थना है।
🌺 2. करुणामय वंदना (सरस्वती / राम / गुरु तत्व)
मूक होइ बाचाल पंगु चढइ गिरिबर गहन।
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन ॥
📖 हिंदी अर्थ: जिसकी कृपा से मूक (गूंगा) बोलने लगता है और लंगड़ा (अशक्त) भी ऊँचे पर्वत पर चढ़ जाता है — वही दयालु प्रभु, जो कलियुग के समस्त पापों का नाश करते हैं — वे मुझ पर दया करें।
🪔 व्याख्या: यह वंदना भगवत्कृपा की महिमा का चित्रण है। ईश्वर की कृपा में ऐसी शक्ति है कि असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं — मेरे भीतर कुछ विशेष नहीं, पर आपकी कृपा सब कुछ करवा सकती है। यहां एक प्रकार से नम्रता और पूर्ण आत्मसमर्पण की भावना है।
🌺 3. श्रीराम ध्यान
नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन।
करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन ॥
📖 हिंदी अर्थ: जो नील कमल के समान श्यामवर्ण हैं, जिनकी आँखें नवोदित कमल के समान लालिमा लिए हुए हैं — वे छीरसागर में शयन करने वाले भगवान विष्णु रूप श्रीराम सदा मेरे हृदय में निवास करें।
🪔 व्याख्या: यहां तुलसीदासजी राम के दिव्य रूप का ध्यान करते हैं — उनका श्याम स्वरूप, तरुण कमल-नेत्र, और क्षीरसागर-वासी होने का संकेत दे कर उनके विष्णुत्व को प्रकट करते हैं। वह राम जिनका ध्यान देवगण करते हैं — वे ही मेरे हृदय में निवास करें, यही भावभरी प्रार्थना है।
🌺 4. शिवजी की वंदना
कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन।
जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन ॥
📖 हिंदी अर्थ: जिनका शरीर कुंद फूल और चंद्रमा के समान उज्ज्वल है, जो उमा (पार्वती) के प्रिय हैं, और करुणा के स्रोत हैं — जो दीनों पर प्रेम करते हैं — वे त्रिपुरासुर के संहारक शिवजी मुझ पर कृपा करें।
🪔 व्याख्या: शिवजी की छवि शांत, शीतल, करुणामय और परोपकारी है। वो केवल रुद्र नहीं, दीनों के संरक्षक हैं। तुलसीदासजी यहाँ शिव को करुणा का सागर कहकर उनसे अपने ऊपर कृपा की प्रार्थना कर रहे हैं — ताकि लेखन में भटकाव न आए।
🌺 5. गुरु वंदना
बंदंउ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर ॥
📖 हिंदी अर्थ: मैं अपने गुरु के चरणकमलों की वंदना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र हैं, नर-रूप में नारायण हैं — जिनके वचन महामोह रूपी अंधकार को सूर्य-किरणों के समान नष्ट कर देते हैं।
🪔 व्याख्या: गुरु को नररूप हरि कहकर तुलसीदासजी यह स्पष्ट करते हैं कि गुरु और ईश्वर में कोई भेद नहीं। गुरु की वाणी आत्मा को अज्ञान के अंधकार से बाहर निकालती है। यहाँ “रबि कर निकर” (सूर्य किरणों की पंक्ति) का प्रयोग बहुत सुंदर है — जैसे प्रकाश धीरे-धीरे फैलता है, वैसे ही गुरु की कृपा से आत्मा में बोध फैलता है।
स्रोत: रामचरित मानस ग्रन्थ

