Current image: सिंहासन पर विराजमान भगवान श्रीराम हाथ में धनुष धारण किए हुए, सामने भक्तिभाव से बैठे हनुमानजी और माता सीता, रामचरितमानस पारायण के प्रारंभिक आवाहन मंत्र का दिव्य दृश्य

 

 

 

 

🌺 श्रीरामचरितमानस पारायण मंत्र (श्लोक 1–10) 🌺

आवाहन से लेकर श्रीराम के ध्यान व आवाहन तक | शुद्ध पाठ | हिंदी अर्थ | विस्तृत भावार्थ

श्रीरामचरितमानस पारायण का आरंभ 7 विशेष मंत्रों से होता है जिन्हें आवाहन मंत्र कहा जाता है — जिनमें रामकथा से जुड़े सभी प्रमुख पात्रों (तुलसीदास, वाल्मीकि, शिव, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, भरत, हनुमान) का सादर निमंत्रण होता है। इसके पश्चात 3 मंत्रों द्वारा प्रधान पूजा का आरंभ, ध्यान और भगवान श्रीराम का साकार आवाहन किया जाता है।

🪔 भाग 1: आवाहन मंत्र (श्लोक 1–7)

1. तुलसीदास जी का आवाहन

तुलसीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुचिव्रत।
नैऋत्य उपविश्येदं पूजनं प्रतिगृह्यताम् ॥

हिंदी अर्थ: हे शुचिव्रती (पवित्र आचरण वाले) तुलसीदास जी! आपको नमस्कार है। आप यहाँ पधारें और नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम दिशा) में विराजमान होकर मेरा यह पूजन स्वीकार करें।

व्याख्या: इस मंत्र द्वारा तुलसीदास जी का आवाहन किया जाता है, जिन्होंने श्रीरामचरितमानस की रचना की। नैऋत्य दिशा प्रायः गुरु या काव्यकर्ता के लिए निर्दिष्ट होती है। इस आह्वान में भक्ति और विनम्रता से तुलसीदास जी से निवेदन किया जाता है कि वे इस पाठ में उपस्थित होकर कृपा करें और उसे स्वीकार करें।

2. वाल्मीकि जी का आह्वान

ॐ तुलसीदासाय नमः।
श्रीवाल्मीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुभप्रद।
उत्तरपूर्वयोर्मध्ये तिष्ठ गृह्णीष्व मेऽर्चनम् ॥

हिंदी अर्थ: ॐ तुलसीदास जी को नमस्कार। हे वाल्मीकि जी! जो शुभ देने वाले हैं, आपको नमस्कार है। कृपया उत्तर और पूर्व के मध्य (ईशान कोण) में आकर विराजमान हों और मेरा पूजन स्वीकार करें।

व्याख्या: यहाँ महर्षि वाल्मीकि का आह्वान है, जो रामकथा के आदि रचयिता हैं। उनके बिना रामकथा की संपूर्णता अधूरी है। ईशान कोण ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक है। इस मंत्र में तुलसीदास और वाल्मीकि – दोनों को स्मरण कर कथा की शुद्धता और सिद्धि की प्रार्थना की गई है।

3. शिव-पार्वती का आह्वान

ॐ वाल्मीकाय नमः।
गौरीपते नमस्तुभ्यमिहागच्छ महेश्वर।
पूर्वदक्षिणयोर्मध्ये तिष्ठ पूजा गृहाण मे ॥

हिंदी अर्थ: ॐ वाल्मीकि जी को नमस्कार। हे गौरीपते (महादेव), आपको नमस्कार है। कृपया पूर्व और दक्षिण के मध्य (आग्नेय कोण) में आकर विराजमान हों और मेरी पूजा स्वीकार करें।

व्याख्या: शिवजी स्वयं रामकथा के महान भक्त और वक्ता हैं। रामचरितमानस के आरंभ में भी तुलसीदासजी ने शिव-पार्वती की वंदना की है। यह श्लोक उनके आह्वान हेतु है। शिव को पूजन में सम्मिलित करना आध्यात्मिक ऊर्जा और कथा की गूढ़ता को प्रतिष्ठित करता है।

4. लक्ष्मण-उर्मिला का आह्वान

ॐ गौरीपतये नमः।
श्रीलक्ष्मण नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः।
याम्यभागे समातिष्ठ पूजनं संगृहाण मे ॥

हिंदी अर्थ: ॐ गौरीपती शिवजी को नमस्कार। हे श्रीलक्ष्मण जी! आपको और आपकी प्रिय पत्नी (उर्मिला) को नमस्कार है। कृपया दक्षिण दिशा में आकर विराजमान हों और मेरा पूजन स्वीकार करें।

व्याख्या: लक्ष्मण जी रामभक्ति और सेवा के प्रतीक हैं। उनका आवाहन कर हम त्याग, वीरता और सेवा की भावना को आमंत्रित करते हैं। साथ में उर्मिला जी का स्मरण उनके संपूर्ण त्याग को सम्मान देना है।

5. शत्रुघ्न का आह्वान

ॐ श्रीसपन्नीकाय लक्ष्मणाय नमः।
श्रीशत्रुघ्न नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः।
पीठस्य पश्चिमे भागे पूजनं स्वीकुरुष्व मे ॥

हिंदी अर्थ: ॐ लक्ष्मण जी और उनकी पत्नी उर्मिला को नमस्कार। हे शत्रुघ्न जी! आपको और आपकी पत्नी को नमस्कार है। कृपया वेदी के पश्चिम भाग में विराजें और मेरा पूजन स्वीकार करें।

व्याख्या: शत्रुघ्न जी का पूजन संपूर्ण रामपरिवार की पूर्णता का प्रतीक है। वे सेवा और समर्पण का मूर्त रूप हैं। पूजन स्थान की पश्चिम दिशा उन्हें समर्पित कर श्रद्धा प्रकट की जाती है।

6. भरत का आह्वान

ॐ श्रीसपन्नीकाय शत्रुघ्नाय नमः।
श्रीभरत नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः।
पीठकस्योत्तरे भागे तिष्ठ पूजां गृहाण मे ॥

हिंदी अर्थ: ॐ शत्रुघ्न जी और उनकी पत्नी को नमस्कार। हे भरत जी! आपको और आपकी प्रिय पत्नी को नमस्कार है। कृपया पूजन पीठ के उत्तर भाग में विराजें और मेरी पूजा स्वीकार करें।

व्याख्या: भरत जी त्याग, आदर्श, और आत्मनिष्ठा के प्रतीक हैं। राम के चरणों की पादुका रखकर उन्होंने राज्य किया। उनका आह्वान इस संकल्प का प्रतीक है कि हम भी अपने कर्तव्यों में समर्पण और निष्काम भाव रखेंगे।

7. हनुमान जी का आह्वान

ॐ श्रीसपन्नीकाय भरताय नमः।
श्रीहनुमन्नमस्तुभ्यमिहागच्छ कृपानिधे।
पूर्वभागे समातिष्ठ पूजनं स्वीकुरु प्रभो ॥

हिंदी अर्थ: ॐ भरत जी और उनकी पत्नी को नमस्कार। हे कृपानिधि (करुणा के समुद्र) श्रीहनुमान जी! आपको नमस्कार है। कृपया पूर्व दिशा में आकर विराजें और मेरा पूजन स्वीकार करें।

व्याख्या: हनुमान जी बिना रामकथा अधूरी है। वे भक्ति, बल, सेवा और बुद्धि के देवता हैं। उनका आह्वान ही समस्त बाधाओं का निवारण है। पूजन में उनका स्थान पूर्व दिशा में होना सूर्योदय और आशा का प्रतीक है।

🪔 भाग 2: प्रधान पूजा (श्लोक 8–10)

8. प्रधान पूजा आरंभ

ॐ हनुमते नमः
अथ प्रधानपूजा च कर्तव्या विधिपूर्वकम्।
पुष्पाञ्जलिं गृहीत्वा तु ध्यानं कुर्यात्परस्य च ॥

हिंदी अर्थ: अब विधिपूर्वक पूजा आरंभ करें। पुष्पांजलि लेकर परमेश्वर का ध्यान करें।

व्याख्या: हनुमान जी के स्मरण से आरंभ कर पुष्पांजलि द्वारा पूजा का शुभारंभ। इस श्लोक में मुख्य पूजा का आरंभ बताया गया है। पहले हनुमान जी को नमस्कार किया जाता है, क्योंकि वे सभी कार्यों के विघ्नहर्ता, रक्षक और साक्षी हैं। फिर पुष्पांजलि लेकर भगवान श्रीराम का ध्यान किया जाता है — यह ध्यान पूजा का आधार है। यहां से पूजा की गंभीरता और अंतःकरण की पवित्रता अनिवार्य हो जाती है।

9. श्रीराम का ध्यान

रक्ताम्भोजदलाभिरामनयनं पीताम्बरालंकृतं
श्यामांगं द्विभुजं प्रसन्नवदनं श्रीसीतया शोभितम् ।
कारुण्यामृतसागरं प्रियगणैर्भात्रादिभिर्भावितं
वन्दे विष्णुशिवादिसेव्यमनिशं भक्तेष्टसिद्धिप्रदम् ॥

हिंदी अर्थ: पीतांबरधारी, करुणामय, सीता सहित श्रीराम — जो सबकी सिद्धि देने वाले हैं — को मैं वंदन करता हूँ। जिनकी आँखें लाल कमल की पंखुड़ियों जैसी मनोहर हैं, जो पीताम्बर से अलंकृत हैं, जिनका शरीर श्याम वर्ण का है, जिनके दो भुजाएँ हैं, और जो प्रसन्नवदन हैं — ऐसे श्रीराम, जो श्रीसीता सहित शोभित हो रहे हैं, करुणा के अमृत सागर हैं, भाई-बंधुओं के साथ प्रेमपूर्वक रमण करते हैं, जिन्हें विष्णु और शिव आदि देवता भी निरंतर पूजते हैं, जो भक्तों की इच्छाओं की सिद्धि देने वाले हैं — मैं उन श्रीराम को वंदन करता हूँ।

व्याख्या: यह ध्यान मंत्र भगवान राम के सगुण, साकार रूप को हमारे अंतःकरण में स्थापित करता है। यहाँ श्रीराम का सौंदर्य, उनकी करुणा, उनका पारिवारिक स्नेह, और उनकी दिव्यता — सबको शब्दों में समेटा गया है। श्रीसीता सहित उनका ध्यान, भक्त को रामराज्य जैसी शांति और अनुग्रह की अनुभूति कराता है। शिव और विष्णु जैसे देवताओं द्वारा भी पूजित राम यहां परात्पर ब्रह्म के रूप में प्रकट होते हैं।

10. श्रीराम का आवाहन

आगच्छ जानकीनाथ जानक्या सह राघव।
गृहाण मम पूजां च वायुपुत्रादिभिर्युतः ॥

हिंदी अर्थ: हे जानकीनाथ श्रीराम! आप जानकी (सीता जी) सहित पधारिए और वायुपुत्र (हनुमान जी) आदि पार्षदों सहित मेरी पूजा को स्वीकार कीजिए।

व्याख्या: अब साधक, ध्यान किए गए श्रीराम का आवाहन करता है — “हे प्रभो! आप प्रकट होइए, अपनी कृपा दृष्टि से मेरे इस पूजन को स्वीकार कीजिए।” यह आवाहन मंत्र पूजा को आंतरिक से बाह्य रूप में लाने का चरण है, जहाँ आराध्य को प्रत्यक्ष पूजन में आमंत्रित किया जाता है। वायुपुत्र हनुमान और अन्य सेवकों सहित श्रीराम के आगमन की प्रार्थना, भक्त के प्रेम और संपूर्ण आत्मसमर्पण का प्रतीक है।

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श्रीरामचरितमानस (बालकाण्ड) – गुरु महिमा


इन 10 श्लोकों से श्रीरामचरितमानस पारायण की शुरुआत दिव्यता, श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में होती है।

स्रोत: रामचरित मानस ग्रन्थ