Current image: स्वर्णिम मंदिर में सिंहासन पर विराजमान भगवान विष्णु भक्तों को आशीर्वाद देते हुए, पुरुष और महिला भक्त हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए – भगवान को प्रिय बनने और भगवत्प्राप्ति की सहज राह

 

भगवान को प्रिय बनने और भगवत्प्राप्ति की सहज राह

श्रीनाभादासजी महाराज, भक्तमाल में भगवद्भक्तों की महिमा का गायन न केवल भक्ति का आधार मानते हैं, बल्कि उसे परम कल्याणकारी साधन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे भगवान को प्रिय बनने और भगवत्प्राप्ति की सहज राह में यह उद्घोष करते हैं कि—

हरिजन को गुन बरनते हरि हृदि अटल बसायँ।
जग कीरति मंगल उदै, तीनौं ताप नसायँ॥
(भक्तमाल दोहा २०८)

भावार्थ—

  • जो व्यक्ति भगवान के प्रिय भक्तों के गुणों और चरित्र का श्रद्धा से वर्णन करता है,
  • उसके जीवन में जगत में कीर्ति, शुभता तथा मंगल का उदय होता है।
  • उसके सभी प्रकार के दुःख—आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक ताप—का नाश होता है,
  • और सबसे बड़ी बात, भगवान स्वयं उसके हृदय में अटल रूप से निवास करते हैं

भगवान को प्रिय बनने और भगवत्प्राप्ति की सहज राह : भक्तों का गुणगान

श्रीनाभादासजी महाराज, भक्तमाल में जीवों को सावधान करते हुए, एक अत्यंत गंभीर और गूढ़ उपदेश देते हैं:—

“(जो) हरि प्रापति की आस है, तौ हरिजन गुन गाव।
नतरु सुकृत भुजे बीज ज्यों, जनम जनम पछिताय॥”
(भक्तमाल दोहा २१०)

भावार्थ—

  • यदि सच में हृदय में भगवान को पाने की सच्ची आकांक्षा है, तो हरिजन अर्थात् भगवद्भक्तों के गुणों का गायन कीजिए।
  • क्योंकि यदि यह नहीं किया, तो जन्म-जन्मांतरों के संचित पुण्य भुने हुए बीज के समान निष्फल हो जाएँगे—
  • जैसे भुना बीज फिर अंकुरित नहीं होता, वैसे ही वे पुण्य भी कल्याणकारी न रहेंगे।
  • और फिर अंततः आत्मा को जन्म-जन्मांतरों में पछताना पड़ेगा।।

भगवान को प्रिय बनने और भगवत्प्राप्ति की सहज राह: भक्त-चरित्र का गान

श्रीनाभादासजी महाराज,क्तों के गुणगान को केवल एक साधन नहीं, बल्कि ईश्वर को पुत्रवत प्रिय हो जाने की अवस्था तक पहुँचाने वाला कार्य मानते हैं। वे कहते हैं:

“सो प्रभु प्यारौ पुत्र ज्यों, बैठे हरि की गोद।”
(भक्तमाल दोहा २११)

भावार्थ—

  • जो भक्तों के चरित्र का गायन, श्रवण और अनुमोदन करता है,
  • वह भगवान को पुत्र के समान प्रिय हो जाता है।
  • भगवान उसे अपनी गोद में बैठा लेते हैं,
  • अर्थात् उसे अपनी परम निकटता, स्नेह और करुणा से आप्लावित कर देते हैं।

🕉️ अवतारों की वन्दना – भक्तमाल का प्रथम छप्पय

जब श्रीनाभादासजी ने भक्तों के चरित्रों का वर्णन प्रारम्भ किया, तो उन्होंने सबसे पहले मंगलाचरण के पश्चात भगवान के २४ प्रमुख अवतारों की वन्दना की। यह भक्तमाल का प्रथम छप्पय है:
जय जय मीन, बराह, कमठ, नरहरि बलि-बावन। परसुराम, रघुबीर, कृष्ण, कीरति जग पावन॥
बुद्ध, कलक्की, ब्यास, पृथू, हरि, हंस, मन्वंतर। जग्य, रिषभ, हयग्रीव, ध्रुव, बरदैन, धन्वंतर॥

भावार्थ—

हे प्रभो! आपकी मीन (मत्स्य), वराह, कूर्म (कच्छप), नरसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण—इन सब अवतारों का मैं जय-जयकार करता हूँ, जिनके चरित्रों से जगत पवित्र होता है।बुद्ध, कल्कि, व्यास, पृथु, हंस, मन्वंतर, यज्ञ, ऋषभ, हयग्रीव, ध्रुव, वरदान प्रदान करने वाले, धन्वंतरि, बद्रीपति, दत्तात्रेय, कपिल, सनक-सनन्दन आदि सनकादिक मुनियों के इन चौबीस लीलामय रूपों को मैं अपने गुरुदेव अग्रदासजी के हृदय-पद में अर्पित करता हूँ।
 
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भक्तमाल: प्राकट्य कथा

🕉️ श्रीराम के चरणचिह्नों की वन्दना – भक्तमाल का दूसरा छप्पयय

इसके पश्चात अगले छप्पय में नाभादासजी ने श्रीरामजी के चरणचिह्नों की भावपूर्ण वन्दना की है और प्रार्थना की है कि वे चिह्न भक्तों के लिए मंगलदायक और सहायता करने वाले हों—
अंकुस, अंबर, कुलिस, कमल, जव, ध्वजा, धेनुपद। शंख, चक्र, स्वस्तिक, जम्बूफल, कलश, सुधाह्रद॥
अर्धचंद्र, षट्कोण, मीन, बिंदु, ऊर्ध्वरेखा। अष्टकोण, त्रिकोण, इन्द्रधनुष, पुरुषविशेषा॥

भावार्थ—

श्रीरघुनाथजी के चरणों में अंकुश, आकाश, वज्र, कमल, जौ, ध्वजा, गौ के खुर, शंख, चक्र, स्वस्तिक, जामुनफल, कलश, अमृतसर (सुधा-ह्रद), अर्धचंद्र, षट्कोण, मीन, बिंदु, ऊर्ध्वरेखा, अष्टकोण, त्रिकोण, इंद्रधनुष, और पुरुष के विशेष चिन्ह विद्यमान हैं।ये सभी चिह्न मंगलदायक हैं और संतों की रक्षा व सहायता करने वाले हैं। हे प्रभो! आपके ये चरणचिह्न हमारे हृदय में नित्य वास करें।

स्रोत: भक्तमाल पौराणिक साहित्य