
“जय श्रीहरि!
आज हम श्रवण करेंगे श्रीविष्णु सहस्रनाम — वे 1000 दिव्य नाम, जो स्वयं भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को श्रीकृष्ण की उपस्थिति में बताए।
यह स्तोत्र न केवल भगवान विष्णु की महिमा है, बल्कि यह हमारे चित्त को शुद्ध करने वाला, पापों का नाश करने वाला, और मोक्ष प्रदान करने वाला स्तुति-पथ है।
आइए, श्रद्धा, भक्ति और मन की एकाग्रता के साथ इन नामों का जाप करें।”
Vishnu Sahasranamam: श्रीहरि के सहस्र नामों में अनंत शक्ति का स्त्रोत
नामों में है भगवान, और भगवान में है सब कुछ…”
श्रीविष्णु सहस्रनाम — एक ऐसा दिव्य स्तोत्र, जिसमें भगवान विष्णु के 1000 पावन नाम सम्मिलित हैं। यह न केवल स्तुति है, बल्कि एक जीवित चेतना है — जो हर नाम के साथ आपको परमात्मा से जोड़ती है।
हर नाम एक दीपक है,
हर जाप एक साक्षात्कार है,
और हर श्वास में विष्णु का वास है।
यहाँ प्रस्तुत है विष्णु सहस्रनाम का पूर्ण जाप — शुद्ध उच्चारण, शांत संगीत और दिव्य भावों के साथ। ध्यान, आराधना, और आत्मिक शांति की खोज में यह स्तोत्र एक अद्भुत साधन है।
🔱 क्यों सुनें विष्णु सहस्रनाम?
- मानसिक और आत्मिक शांति के लिए
- रोग, भय, और संकटों से मुक्ति हेतु
- ध्यान और भक्ति साधना में गहराई के लिए
- श्रीहरि की कृपा और जीवन में शुभता के लिए
आइए, निर्मल हृदय और एकाग्र मन से
भगवान श्रीहरि का ध्यान करें —
🎧 यहाँ सुनें सम्पूर्ण विष्णु सहस्रनाम – एक बार में 1000 नामों का दिव्य जाप: Video Link- https://youtu.be/ugDJSnzUHxc
आइए, निर्मल हृदय और एकाग्र मन से इन श्लोकों पढ़ते हुए
भगवान श्रीहरि का ध्यान करें —
विष्णुसहस्त्रनाम स्तोत्रम – श्लोक रूप में नाम जप
व्यासम् वशिष्ठरनप्तारम् शक्ते:पौत्रमकल्मषम्।
श्री वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिर उवाच
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
श्री भीष्म उवाच
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् ।
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् ।
ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् ।
एष मे सर्व धर्माणां धर्मोऽधिकतमोमतः ।
परमम् यो महत्तेजः परमम् यो महत्तपः ।
परमम् यो महद्ब्रह्म परमम् यः परायणम् । 15 ॥
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादि युगागमे ।
तस्य लोक प्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः ।
अमृतां शूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः ।
विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् ॥
पूर्वन्यासः
“अस्य श्री विष्णोर्दिव्य सहस्रनाम स्तोत्र महामन्त्रस्य…”
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इस दिव्य विष्णु सहस्रनाम महामंत्र के
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ऋषि हैं – भगवान वेदव्यास (जिन्होंने इसे प्रकट किया)।
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छन्द है – अनुष्टुप् (श्लोक की काव्य संरचना)।
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देवता हैं – श्रीमहाविष्णु, परमात्मा, श्रीमन्नारायण।
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बीज है – “अमृतांशूद्भवो भानुः” (जो अमृत और प्रकाश के स्रोत हैं)।
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शक्ति है – “देवकीनन्दनः स्रष्टा” (सृष्टि करने वाले श्रीकृष्ण)।
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परम मंत्र है – “उद्भवः, क्षोभणो देव” (सृष्टि के उत्पत्ति और संचालन करने वाले)।
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कीलक (मंत्र की गुप्त शक्ति) – शंख, चक्र, नन्दकी धारण करने वाले।
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अस्त्र – शार्ङ्गधनुष और गदा धारण करने वाले।
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नेत्र – रथाङ्गपाणि (चक्रधारी) जो रक्षा करते हैं।
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कवच – त्रिसामा (तीनों वेदों के सामस्वरूप)।
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योनि – आनंदस्वरूप परब्रह्म।
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दिग्बन्ध – कालस्वरूप सुदर्शन।
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ध्यान – विश्वरूप भगवान।
अंत में —
यह जप भगवान महाविष्णु की प्रसन्नता के लिए किया जाता है।
भावार्थ:
साधक यह स्वीकार करता है कि यह स्तोत्र कोई साधारण रचना नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा की दिव्य ऊर्जा से युक्त महामंत्र है।
ध्यानम्:
क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकते मौक्तिकानां
मालाक्लुप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैमौर्तिकैमण्डितांगः।
शुभ्रैरभ्रैरदभ्रै रुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूषवर्षैः
आनन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदाशङखपाणिर्मुकुन्दः॥
अर्थ: क्षीरसागर के पवित्र तट पर, जहाँ रेत मणियों और मोतियों से चमक रही है, जो मोतियों की माला से सजे आसन पर विराजमान हैं, जिनका शरीर स्फटिक मणि के समान उज्ज्वल और आभूषणों से विभूषित है, जिनके ऊपर श्वेत मेघ अमृतमयी वर्षा कर रहे हैं। कमल, गदा और शंख धारण करने वाले, शत्रुओं का नाश करने वाले, आनंदस्वरूप भगवान मुकुन्द हमें पवित्र करें।
भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलचन्द्रसूर्यौ च नेत्रे
कर्णावाशाः शिरोद्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः।
अन्तस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः
चित्रंरंरम्यते तं त्रिभुवनवपुषं विष्णुमीशम् नमामि॥
अर्थ: जिनके चरण ही पृथ्वी हैं, जिनकी नाभि आकाश है, जिनकी आँखें सूर्य और चन्द्रमा हैं, और वायु उनका प्राण है, जिनके कान दिशाएँ हैं, जिनका सिर स्वर्ग है, जिनका मुख अग्नि है, समुद्र जिनका वस्त्र है, और जिनके भीतर सम्पूर्ण विश्व स्थित है। देवता, मनुष्य, पक्षी, पशु, सर्प, गन्धर्व और दैत्य आदि सब उन्हीं में स्थित हैं। ऐसे तीनों लोकों को शरीर रूप में धारण करने वाले, विश्वरूप भगवान विष्णु को मैं नमस्कार करता हूँ।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम्।
लक्ष्मिकान्तं कमलनयनं योगिहृद्द्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
मेघश्यामं पीतकौशेयवासं श्रीवत्साङकं कौस्तुभोद्भासिताङगं।
पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम्॥
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे॥
सशङखचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणं।
सहारवक्षस्थलशोभिकौस्तुभं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥
छायायां पारिजातस्य हेम्सिंहासनोपरि।
आसीनमंबूदश्याममायाताक्षमलंकृतम्॥
चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङकितवक्षसम्।
रुक्मिणीसत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये॥
सर्वप्रहरणायुध ॐ नमः इति। वनमालिगदी शार्ङ्गीशंखीचक्री च नंदकी ।
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यह थे भगवान श्रीविष्णु के सहस्र दिव्य नाम। प्रत्येक नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि अनंत ब्रह्मांड की शक्ति, करुणा और संरक्षण का प्रतीक है।
जो श्रद्धा और भक्ति से
इन नामों का श्रवण या कीर्तन करता है — उसके जीवन से भय दूर हो जाता है, बंधन कट जाते हैं, और आत्मा शांति का अनुभव करती है।
शास्त्र कहते हैं — “न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्।”
जो वासुदेव के भक्त हैं, उनका कभी अहित नहीं होता।
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
जय श्रीमन्नारायण 🙏
हरि ॐ तत्सत्।
