Current image: “सिंह पर विराजमान माँ दुर्गा का दिव्य स्वरूप – दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् श्लोक 61–80 हिन्दी अर्थ सहित”

 

 

 

 

🙏 दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 61-80) 🙏

देवी दुर्गा के हजार नामों में से अगला 20 श्लोक एवं उनके हिन्दी अर्थ

जब भक्ति की राह पर चलते-चलते साधक का मन स्थिर होने लगता है और जब वह केवल शब्द नहीं, बल्कि माँ की उपस्थिति को अनुभव करने लगता है, तब प्रकट होता है एक और दिव्य अध्याय—दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 61-80) का रहस्यमय संसार।

दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम्(श्लोक 61-80) में माँ का स्वरूप अत्यंत अद्भुत और बहुआयामी हो जाता है। यहाँ वह सुरारि (असुरों) का नाश करने वाली शक्ति भी हैं, और लज्जा, करुणा और प्रेम से भरी कोमल माता भी।

इस भाग में माँ केवल युद्ध करने वाली देवी नहीं हैं, वह संगीत की सप्त स्वरमयी ध्वनि भी हैं, वह नृत्य की लय भी हैं, और वही ज्ञान की गहराइयों तक पहुँचाने वाली चेतना भी हैं।

दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 61-80) हमें यह सिखाता है कि माँ हर रूप में हमारे साथ हैं…
👉 जब हम भय में होते हैं, तो वह रक्षक बनकर सामने आती हैं।
👉 जब हम अज्ञान में होते हैं, तो वह ज्ञान बनकर मार्ग दिखाती हैं।
👉 और जब हम साधना में होते हैं, तो वह योग और ध्यान की शक्ति बन जाती हैं।

आइए, दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 61-80) के इन दिव्य नामों के माध्यम से माँ के उस स्वरूप को महसूस करें, जो हर क्षण हमारे भीतर और बाहर कार्य कर रहा है। 🌸

श्लोक 61

सुरारिघातिनी कृत्या पूतना च तिलोत्तमा।
लज्जा रसवती नन्दा भवानी पापनाशिनी॥

देवी सुरों के शत्रुओं का वध करती हैं। वे कृत्या (मंत्रशक्ति), पूतना (दुष्ट नाशिनी), तिलोत्तमा (अद्वितीय सुन्दरी), लज्जा, रसवती, नन्दा और भवानी हैं। वे पापों का नाश करती हैं।

श्लोक 62

पट्टाम्बरधरा गीतिः सुगीतिर्ज्ञानगोचरा।
सप्तस्वरमयी तन्त्री षड्जमध्यमधैवता॥
हिन्दी अर्थ: वे रेशमी वस्त्र धारण करने वाली, गीत स्वरूपा और सुन्दर गीतों की अधिष्ठात्री हैं। ज्ञान से संबंधित हैं। सप्तस्वरमयी, तंत्री वाद्य की शक्ति और षड्ज-मध्यम-धैवत स्वर की देवी हैं।

श्लोक 63

मूर्छना ग्रामसंस्थाना मूर्छा सुस्थानवासिनी।
अट्टाट्टहासिनी प्रेता प्रेतासननिवासिनी॥
हिन्दी अर्थ: वे मूर्छना (संगीत की विधा) स्वरूपा हैं, ग्राम (संगीत प्रणाली) में निवास करती हैं। सुन्दर आसनों में वास करती हैं। वे प्रेतों पर नियंत्रण रखने वाली, हँसी से सम्पूर्ण आकाश गूँजाने वाली और प्रेतासन पर विराजमान होने वाली हैं।

श्लोक 64

गीतनृत्यप्रिया कामा तुष्टिदा पुष्टिदा क्षमा।
निष्ठा सत्यप्रिया प्राज्ञा लोलाक्षी च सुरोत्तमा॥
हिन्दी अर्थ: माँ को गीत और नृत्य प्रिय हैं। वे कामरूपिणी, तुष्टि (सन्तोष) और पुष्टि (पोषण) देने वाली हैं। क्षमा की मूर्ति हैं, निष्ठा स्वरूपिणी, सत्यप्रिय और प्राज्ञा (ज्ञान की अधिष्ठात्री) हैं। उनकी दृष्टि चंचल है और वे श्रेष्ठ देवताओं द्वारा पूजित हैं।

श्लोक 65

सविषा ज्वालिनी ज्वाला विश्वमोहार्तिनाशिनी।
शतमारी महादेवी वैष्णवी शतपत्रिका॥
हिन्दी अर्थ: वे विष के साथ भी समर्थ हैं, अग्नि-ज्वाला स्वरूपा हैं। वे संसार के मोह और दुःख का नाश करने वाली हैं। शतमारी, महादेवी, वैष्णवी और शतपत्रिका (कमल की पंखुड़ियों की सुन्दरी) हैं।

श्लोक 66

विषारिर्नागदमनी कुरुकुल्ल्याऽमृतोद्भवा।
भूतभीतिहरारक्षा भूतावेशविनाशिनी॥
हिन्दी अर्थ: वे विष और नागों की शत्रु हैं, उन्हें वश में करने वाली हैं। अमृतोत्पन्न कुरुकुल्ला शक्ति हैं। वे भूत-प्रेत के भय को हरने वाली और भूतावेश का नाश करने वाली शक्ति हैं।

श्लोक 67

रक्षोघ्नी राक्षसी रात्रिर्दीर्घनिद्रा निवारिणी।
चन्द्रिका चन्द्रकान्तिश्च सूर्यकान्तिर्निशाचरी॥
हिन्दी अर्थ: वे राक्षसों का नाश करने वाली रक्षोघ्नी हैं। रात्रि स्वरूपा, दीर्घ निद्रा (तन्द्रा) को नष्ट करने वाली हैं। वे चन्द्रिका, चन्द्रकान्ति और सूर्यकान्ति स्वरूपिणी हैं। निशाचरी रूप में भी वे सबका कल्याण करती हैं।

श्लोक 68

डाकिनी शाकिनी शिष्या हाकिनी चक्रवाकिनी।
शीता शीतप्रिया स्वङ्गा सकला वनदेवता॥
हिन्दी अर्थ: वे डाकिनी, शाकिनी, हाकिनी रूप में प्रकट होती हैं। चक्रवाक पक्षी जैसी शोभा वाली हैं। शीतल और शीतप्रिय हैं। वे अपने अंग से ही सम्पूर्ण हैं और वनदेवताओं के रूप में भी पूजित हैं।

श्लोक 69

गुरुरूपधरा गुर्वी मृत्युर्मारी विशारदा।
महामारी विनिद्रा च तन्द्रा मृत्युविनाशिनी॥
हिन्दी अर्थ: माँ गुरु रूप धारण करने वाली हैं। वे मृत्यु का नाश करने वाली, अत्यन्त विदुषी, महामारी को हरने वाली हैं। वे निद्रारहित और तन्द्रा का विनाश करने वाली हैं।

श्लोक 70

चन्द्रमण्डलसङ्काशा चन्द्रमण्डलवासिनी।
अणिमादिगुणोपेता सुस्पृहा कामरूपिणी॥
हिन्दी अर्थ: देवी चन्द्रमण्डल जैसी शोभा वाली हैं, चन्द्रमण्डल में निवास करने वाली हैं। वे अणिमा आदि अष्टसिद्धियों से युक्त हैं, सभी के लिए वांछनीय और कामरूप धारण करने वाली हैं।

श्लोक 72

चतुस्समुद्रशयना चतुर्वर्गफलप्रदा।
काशपुष्पप्रतीकाशा शरत्कुमुदलोचना॥72॥
हिन्दी अर्थ: वे चारों समुद्रों में व्याप्त होकर स्थित रहती हैं और चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) प्रदान करती हैं। उनका रूप काश के पुष्प के समान है और नेत्र शरद ऋतु के खिले हुए श्वेत कमल के समान हैं।

श्लोक 73

सोमसूर्याग्निनयना ब्रह्मविष्णुशिवार्चिता।
कल्याणीकमला कन्या शुभा मङ्गलचण्डिका॥73॥
हिन्दी अर्थ: उनकी तीन नेत्र चन्द्र, सूर्य और अग्नि के समान हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु और शिव द्वारा पूजित हैं। वे कल्याण देने वाली, कमल समान कोमल, कन्या स्वरूपिणी, शुभा और मंगल चण्डिका हैं।

श्लोक 74

भूता भव्या भविष्या च शैलजा शैलवासिनी।
वाममार्गरता वामा शिववामाङ्गवासिनी॥74॥
हिन्दी अर्थ: वे भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों में विद्यमान हैं। वे शैलजा (पर्वतराज हिमालय की पुत्री) हैं और पर्वतों में वास करती हैं। वाममार्ग (तंत्र साधना) में रत हैं, वामस्वभावा हैं और शिव के वामांग (बाईं ओर) में वास करती हैं।

श्लोक 75

वामाचारप्रिया तुष्टिर्लोपामुद्रा प्रबोधिनी।
भूतात्मा परमात्मा भूतभावविभाविनी॥75॥
हिन्दी अर्थ: वे वामाचार (तंत्र साधना) की प्रिया हैं। वे तुष्टि (संतोष) स्वरूपा हैं, लोपामुद्रा के रूप में प्रकट हुईं, सबको ज्ञान देने वाली हैं। वे भूतात्मा (सभी प्राणियों की आत्मा), परमात्मा और भूतभाव (सृष्टि के कारण) की विभाविनी हैं।

श्लोक 76

मङ्गला च सुशीला च परमार्थप्रबोधिनी।
दक्षिणा दक्षिणामूर्तिः सुदीक्षा च हरिप्रसूः॥76॥
हिन्दी अर्थ: वे मंगलमयी, सुशील और परमार्थ (मोक्ष) की बोधदायिनी हैं। वे दक्षिणा स्वरूपा हैं, दक्षिणामूर्ति हैं, उत्तम दीक्षा देने वाली और श्रीहरि (विष्णु) को जन्म देने वाली माया स्वरूपा हैं।

श्लोक 77

योगिनी योगयुक्ता च योगाङ्ग ध्यानशालिनी।
योगपट्टधरा मुक्ता मुक्तानां परमा गतिः॥77॥
हिन्दी अर्थ: वे योगिनी हैं, योग में लीन रहती हैं। वे योग के अंगों में स्थित होकर ध्यान में शीलवान हैं। वे योगपट्ट धारण करती हैं। वे मुक्तिदायिनी हैं और मुक्त आत्माओं की परम गति हैं।

श्लोक 78

नारसिंही सुजन्मा च त्रिवर्गफलदायिनी।
धर्मदा धनदा चैव कामदा मोक्षदाद्युतिः॥78॥
हिन्दी अर्थ: वे नारसिंही स्वरूपा हैं, उत्तम जन्मदायिनी हैं। वे त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का फल देने वाली हैं। वे धर्म, धन, काम और मोक्ष—सभी प्रदान करती हैं।

श्लोक 79

साक्षिणी क्षणदा कांक्षा दक्षजा कूटरूपिणी।
ऋतुः कात्यायनी स्वच्छा सुच्छन्दा कविप्रिया॥79॥
हिन्दी अर्थ: वे साक्षिणी (सभी कर्मों की साक्षी) हैं। वे क्षण को देने वाली और अभिलाषा स्वरूपा हैं। दक्ष प्रजापति की कन्या, कभी कूट रूप धारण करने वाली हैं। वे ऋतुरूपा हैं, कात्यायनी हैं, स्वच्छ और सुन्दर छन्दों में रमने वाली तथा कवियों को प्रिय हैं।

श्लोक 80

सत्यागमा बहिःस्था च काव्यशक्तिः कवित्वदा।
मीनपुत्री सती साध्वी मैनाकभगिनी तडित्॥80॥
हिन्दी अर्थ: वे सत्यागम की स्वरूपा हैं, बाहर भी विद्यमान रहती हैं। वे काव्यशक्ति हैं और कवित्व देने वाली हैं। वे मीन की पुत्री, सती, साध्वी और मैनाक पर्वत की बहन हैं। वे तडित् (बिजली) स्वरूपा हैं।
 

दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 61-80) हमें एक गहरी अनुभूति कराता है कि माँ केवल शक्ति नहीं, वह जीवन की हर कला, हर ध्वनि और हर अनुभव की आत्मा हैं…

माँ सुरारि
👉 माँ सुरारि, संगीत में स्वर बनकर गूंजती हैं।
👉 माँ आद्या , नृत्य में लय बनकर बहती हैं।
👉 और माँ दुर्गा, ध्यान में मौन बनकर प्रकट होती हैं।

दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 61-80) यह भी दर्शाता है कि माँ ही भय को हरने वाली रक्षक शक्ति हैं, माँ ही अज्ञान को मिटाने वाली ज्ञान शक्ति हैं, और माँ ही मुक्ति की ओर ले जाने वाली योग शक्ति हैं। जब साधक इन नामों का स्मरण करता है, तो धीरे-धीरे उसके भीतर यह जागृति होने लगती है कि माँ हर रूप में उसके साथ हैं और वही उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों की ओर ले जा रही हैं।

इसलिए, दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 61-80) केवल पढ़ने का विषय नहीं है। यह जीवन को दिव्यता से जोड़ने का एक सेतु है। माँ के इन नामों को अपने हृदय में उतारिए और अनुभव कीजिए उस अनंत शक्ति को, जो हर क्षण आपको मार्ग दिखा रही है। 🙏🌺

॥ जय माँ दुर्गा ॥

माँ आद्या शक्ति, माँ भवानी, माँ जगदम्बिका — आप ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार की अधिष्ठात्री हैं। आपके सहस्रनाम का पाठ करने से साधक को समस्त सुख, सिद्धि और मोक्ष प्राप्त होता है। हे माँ! अपनी अनंत करुणा से हम सबका जीवन मंगलमय करें।

॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तु ते ॥

🌺🌺 जय माता दी 🌺🌺

📿 “दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 61-80)” लेख केवल आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी भारत के विभिन्न सनातन, वैदिक, और पौराणिक ग्रंथों के स्रोतों पर आधारित है तथा किसी भी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।

📜”दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 61-80)” लेख में प्रस्तुत श्लोक पारंपरिक ग्रंथों में उपलब्ध मूल स्वरूप पर आधारित हैं। इनमें कोई जानबूझकर परिवर्तन नहीं किया गया है।

🖼️ “दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 61-80)” लेख में प्रयुक्त चित्र AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) द्वारा निर्मित हैं और केवल भावात्मक प्रस्तुति के उद्देश्य से उपयोग किए गए हैं।


✍️ लेखक: Arvind Kumar Singh
Cosmic Harmony

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