Current image: नृसिंह भगवान का दिव्य और रौद्र स्वरूप, हिरण्यकशिपु का वध करते हुए भगवान विष्णु का नरसिंह अवतार

नृसिंह भगवान | Lord Narasimha

भगवान विष्णु के 24 अवतार की कथा


जय श्री हरी🙏

“सोच कर देखिए…”

“एक भाई, जिसने अपने ही भाई की मौत देखी है…” “एक माँ, जिसका पुत्र वाराह भगवान के दांतों तले कुचला गया है…” “और एक पूरा वंश… जो शोक में डूबा है…”

“हिरण्याक्ष मारा गया… वाराह भगवान ने मारा।” “उसकी माता दिति रो रही है… उसकी पत्नी भानुमती विधवा हो गई है…”

“पर उसका भाई… हिरण्यकशिपु… वो नहीं रो रहा…” “क्योंकि उसके हृदय में… शोक नहीं… प्रतिशोध की ज्वाला धधक रही है!”

हिरण्यकशिपु सबको समझाता है, पर अकेले में मुट्ठी बांधता है!

“ठीक है विष्णु… तूने मेरे भाई को मारा है… अब मैं तुझसे भी बड़ी शक्ति लाऊंगा… ऐसी शक्ति कि तू भी मुझे मार न सके… मैं अमर हो जाऊंगा… अमर!”

और यहीं से शुरू होती है, सतयुग की सबसे भयानक तपस्या की कहानी। एक ऐसी तपस्या, जिससे देवलोक भी तपने लगा। एक ऐसा वरदान, जिसने ब्रह्मा जी को भी ठग लिया और एक ऐसा अहंकार, जिसने भगवान को खंभे से निकलने पर मजबूर कर दिया!

“ये कथा है, जब भक्त की एक पुकार पर भगवान को आधा मनुष्य और आधा शेर बनना पड़ा था! श्री नृसिंह अवतार – जब खंभे से निकला भगवान!”

ॐ नृसिंहाय नमः

Current image: हिरण्याक्ष के वध के बाद क्रोधित हिरण्यकशिपु, शोक में डूबी दिति और भानुमती, तथा भगवान वराह द्वारा हिरण्याक्ष के वध का दृश्य।

कहानी शुरू होती है सृष्टि के आदि से जब महर्षि कश्यप ने भगवान को प्रसन्न करने के लिए खीर की आहुति दी थी। आराधना पूरी करके वे शाम के समय अपनी अग्निशाला में ध्यान में बैठे थे।  तभी वहाँ आईं – दक्ष प्रजापति की पुत्री, कश्यप की पत्नी, और दैत्यों की माता – दिति

दिति काम से पीड़ित थी। पुत्र की लालसा में वो कश्यप जी के पास गई और मीठे वचनों से कहा – “हे स्वामी, मुझे पुत्र दो।”

कश्यप जी ने कहा – “हे प्रिये! मैं तुम्हें तुम्हारी इच्छा अनुसार तेजस्वी पुत्र अवश्य दूँगा। पर तुम्हें एक प्रहर प्रतीक्षा करनी होगी। ये संध्या काल है। इस समय भगवान भूतनाथ विचरण करते हैं।

पर कामातुर दिति को कुछ समझ नहीं आया। उसने निर्लज्ज होकर कश्यप जी के सामने पूर्ण समर्पित हो गई। कश्यप जी ने दैव की इच्छा को प्रबल समझकर, दैव को नमस्कार किया और दिति की इच्छा पूरी की।

गर्भ धारण के पश्चात् दिति को गलत समय पर गर्भधारण और अपनी गलती का एहसास हुआ। लेकिन बहुत देर हो चूका था।

समय आने पर दिति ने दो बच्चों को जन्म दी, जिसका नाम हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु रखा गया। जब दोनों बालक का जन्म हुआ, तो तीनों लोकों में उत्पात होने लगे। धरती काँपी, आँधियाँ चलीं, सूर्य-चंद्र पर राहु-केतु बार-बार आए, नदियों का जल सूख गया, गायों के थनों से खून बहने लगा।

दोनों जन्म से ही आकाश तक बढ़ गए। फौलाद जैसा शरीर, सोने के कवच, कुंडल, बाजूबंद।

हिरण्याक्ष  ने पृथ्वी को चुराकर क्षीरसागर के तल में छुपा दिया। इसके कारण ब्रह्माजी की सृष्टि रचना का ताना बाना बिगड़ गया। भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी की नासिका से शूकर रूप में जन्म लिया और हिरण्याक्ष को मारकर पृथ्वी को पुनः वापस अपनी धुरी पर स्थापित किया।

हिरण्याक्ष वध के बाद – दैत्य महल में मातम छाया है,  महल में अँधेरा है, दिति रो रही है, भानुमती विधवा वेश में विलाप कर रही है, लेकिन हिरण्यकशिपु ऊपर से शांत, लेकिन अंदर से उबल रहा है।

दिति (रोते हुए, चीख कर): “हाय… मेरे पुत्र हिरण्याक्ष को उस विष्णु के वराह ने मार डाला! मेरे लाल को छीन लिया!”

भानुमती (हिरण्याक्ष की पत्नी): “माँ… अब हमारा क्या होगा?”

हिरण्यकशिपु (गहरी, शांत पर अंदर ज्वालामुखी वाली आवाज़ में):

“शांत हो जाओ माता… रोने से कुछ नहीं होगा। भाई का प्रतिशोध… अब मेरा धर्म है।”

सब शांत होते हैं, पर हिरण्यकशिपु अकेले में, उसकी आँखों में आग है। वह भगवान विष्णु से बदला लेने और स्वयं को अमर होने की प्रतिज्ञा करता है।

“नहीं… मैं शांत नहीं हूँ। मैं शांत नहीं हो सकता। उस विष्णु ने मेरे भाई को मारा है। मैं… मैं ऐसा वरदान लाऊंगा… ऐसा बल लाऊंगा कि वो विष्णु भी मेरे सामने झुक जाएगा! मैं अमर हो जाऊंगा! अमर!”

घोर तपस्या – मंदराचल की घाटी

फिर हिरण्यकशिपु मंदराचल की घाटी में गया और ऐसा घोर तप किया। 100 वर्षों तक तप किया। – चींटियों ने बांबी बना ली, शरीर से धुंआ निकल रहा है, देवलोक तप रहा है]

इंद्र स्वर्ग में, घबराकर ब्रह्माजी के पास पहुंचे: “पितामह! देखिए! उस असुर के तप से स्वर्ग तप रहा है! उसका तेज… सृष्टि को जला देगा!”

ब्रह्मा जी प्रकट होते हुए, हिरण्यकशिपु पर जल छिड़कते हुए बोले, उठो वत्स हिरण्यकशिपु! उठो! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ। मांगो, अमरत्व को छोड़कर जो चाहो मांगो।”

हिरण्यकशिपु चींटियों की बांबी से उठते हुए, और चालाकी भरी हंसी हँसते हुए कहा,  “हाहाहा… ब्रह्मदेव! आप कहते हैं अमरत्व मत मांगो… तो लीजिए, मैं अमरत्व नहीं मांगता। मैं युक्ति से मांगता हूँ।”

हिरण्यकशिपु के हर वाक्य पर ब्रह्मा जी चौंकते हैं:

“सुनिए पितामह!

  1. आपके बनाए हुए किसी भी प्राणी से मेरी मृत्यु न हो – न मनुष्य से, न पशु से, न देवता से, न असुर से।
  2. न भीतर मरे, न बाहर मरे।
  3. न दिन में मरे, न रात में मरे।
  4. न आपके बनाए किसी अस्त्र-शस्त्र से मरे, न पृथ्वी पर मरे, न आकाश में मरे।
  5. कोई मेरा सामना न कर सके।
  6. मैं समस्त प्राणियों का एकछत्र सम्राट बनूं।
  7. इन्द्रादि लोकपालों जैसी महिमा, तपस्वियों का अक्षय ऐश्वर्य मुझे मिले।”

ब्रह्मा जी (मजबूरी में): “एवमस्तु! तथास्तु!”

हिरण्यकशिपु (मन में, अट्टहास): “मूर्ख ब्रह्मा! तुमने सोचा अमरत्व नहीं दिया… पर मैंने तो मृत्यु का हर दरवाजा ही बंद कर दिया! अब मैं अमर हूँ! अब विष्णु भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता!”

हिरण्यकशिपु का तीनों लोकों पर अधिकार

ब्रह्माजी से अद्भुत वरदान प्राप्त करने के बाद हिरण्यकशिपु के भीतर शक्ति का ऐसा उन्माद जाग उठा, मानो अब उसे संसार में कोई रोकने वाला ही नहीं था। उसके तप की अग्नि शांत हो चुकी थी, लेकिन उसके हृदय में जल रही प्रतिशोध की अग्नि और भी प्रचंड हो गई थी।

हिरण्यकशिपु ने अपनी विशाल सेना को आदेश दिया— “अब समय आ गया है कि तीनों लोक जान लें… हिरण्यकशिपु के सामने झुकने से इनकार करने का परिणाम क्या होता है!”

हिरण्यकशिपु  की सेना चारों दिशाओं में फैल गई। पहले पृथ्वी के राजाओं को पराजित किया गया। एक के बाद एक राज्य उसके अधीन होते चले गए। जिन राजाओं ने उसका विरोध किया, उनके महल ध्वस्त कर दिए गए और जिन लोगों ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली, उन्हें उसके शासन के आगे सिर झुकाना पड़ा।

स्वर्ग पर आक्रमण 

लेकिन हिरण्यकशिपु का लक्ष्य केवल पृथ्वी नहीं था। उसकी दृष्टि अब स्वर्गलोक पर थी।हिरण्यकशिपु की विशाल दैत्य सेना स्वर्ग की ओर बढ़ी। देवताओं ने उसके आक्रमण का सामना करने का प्रयास किया। इंद्र ने वज्र उठाया। देवसेना युद्ध के लिए तैयार हुई।

आकाश में भयंकर युद्ध छिड़ गया। लेकिन हिरण्यकशिपु के सामने देवताओं की शक्ति टिक नहीं सकी। वज्र के प्रहार भी उसके शरीर को विचलित नहीं कर सके। इंद्र पीछे हटने को विवश हो गए।

एक-एक करके देवता स्वर्ग छोड़ने लगे। किसी ने अपने लोक की रक्षा के लिए स्थान बदला, तो कोई भय के कारण छिप गया। कुछ ही समय में स्वर्गलोक भी हिरण्यकशिपु के अधिकार में आ गया।

 हिरण्यकशिपु  ने इंद्र के महल में प्रवेश किया। जिस सिंहासन पर बैठकर इंद्र तीनों लोकों की व्यवस्था देखते थे, उसी सिंहासन पर अब हिरण्यकशिपु आकर बैठ गया। उसने चारों ओर देखा।

स्वर्ण से चमकता इंद्र का महल, देवताओं के भवन, कल्पवृक्ष, दिव्य संपत्तियाँ, सब अब उसके अधिकार में थीं। हिरण्यकशिपु के चेहरे पर विजयी मुस्कान फैल गई।

हिरण्यकशिपु “जिस सिंहासन पर बैठकर इंद्र स्वयं को देवताओं का राजा समझता था, आज उसी सिंहासन पर हिरण्यकशिपु बैठा है!” वह सिंहासन पर और अधिक गर्व से बैठ गया। उसके सामने भयभीत देवगण खड़े थे।

हिरण्यकशिपु ने घोषणा की— “आज से तीनों लोकों में मेरी आज्ञा चलेगी!” तीनों लोकों में हिरण्यकशिपु का भय व्याप्त हो गया।  हिरण्यकशिपु की सत्ता केवल राजसिंहासन तक सीमित नहीं रही।

उसने आदेश दिया कि “मेरी अनुमति के बिना कोई यज्ञ नहीं होगा। मेरे नाम के बिना कोई उत्सव नहीं होगा और कोई भी देवता मेरी पूजा से ऊपर नहीं माना जाएगा!”

ऋषि-मुनि भयभीत हो गए। यज्ञों की अग्नियाँ बुझने लगीं। देवताओं को मिलने वाली हवियाँ बंद होने लगीं। जहाँ पहले भगवान विष्णु, महादेव और अन्य देवताओं के नामों का स्मरण होता था, वहाँ अब हिरण्यकशिपु का भय दिखाई देने लगा। वह चाहता था कि लोग भगवान को भूल जाएँ और केवल उसी को सर्वशक्तिमान मानें।

हिरण्यकशिपु  ने तीनों लोकों के शासकों को अपने अधीन कर लिया। पृथ्वी उसके चरणों में थी।स्वर्ग उसके अधिकार में था और अंतरिक्ष तक उसका भय फैल चुका था। इंद्र का सिंहासन अब उसके अहंकार का प्रतीक बन चुका था।

लेकिन हिरण्यकशिपु को यह नहीं पता था कि जिस शक्ति के कारण वह स्वयं को अजेय समझ रहा है… उसी शक्ति के भीतर उसकी मृत्यु का मार्ग भी छिपा हुआ था। ब्रह्माजी के वरदान ने उसे मृत्यु से बचाने की अनेक शर्तें तो दे दी थीं…लेकिन भगवान की लीला के सामने कोई वरदान पूर्ण सुरक्षा नहीं दे सकता था।

और इसी समय… एक ऐसी शक्ति जन्म लेने वाली थी, जो न मनुष्य होगी… न पशु… बल्कि दोनों से परे होगी। वह शक्ति थी— भगवान नृसिंह।

भक्त प्रह्लाद का जन्म

Current image: दिव्य विमान में गर्भवती कायाधु को ले जाते हुए इंद्रदेव को आकाश में देवर्षि नारद रोककर उन्हें कायाधु को छोड़ देने के लिए समझा रहे हैं।

तीनों लोकों पर अपना अधिकार स्थापित करने के बाद हिरण्यकशिपु का अहंकार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। स्वर्ग का सिंहासन उसके अधिकार में था। देवता उसके भय से छिपने लगे थे। ऋषि-मुनियों के यज्ञ बाधित किए जा रहे थे और चारों ओर हिरण्यकशिपु की सत्ता का आतंक फैल चुका था।

लेकिन, जिस समय हिरण्यकशिपु स्वयं को तीनों लोकों का सबसे शक्तिशाली प्राणी समझ रहा था, उसी समय उसके महल में एक ऐसी आत्मा के आगमन की तैयारी हो रही थी, जो उसके पूरे अहंकार को चुनौती देने वाली थी। वह था—प्रह्लाद।

दिति के वंश में आने वाला भक्त

हिरण्यकशिपु के जीवन में विजय तो आ चुकी थी, लेकिन उसके भीतर शांति नहीं थी। उसका मन अभी भी अपने भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु को नहीं भूल पाया था। वह भगवान विष्णु से प्रतिशोध लेना चाहता था।

हिरण्यकशिपु को  विश्वास था कि एक दिन उसकी शक्ति इतनी बढ़ जाएगी कि स्वयं विष्णु भी उसके सामने टिक नहीं पाएँगे। लेकिन नियति कुछ और ही लिख चुकी थी।

हिरण्यकशिपु के घर एक पुत्र का जन्म होने वाला था। महल में प्रसव का समय निकट आया। चारों ओर दासियाँ और राजपरिवार के लोग एकत्र थे। और फिर…एक रात महल में एक दिव्य बालक ने जन्म लिया।

बालक के जन्म के साथ ही वातावरण में जैसे एक अद्भुत शांति फैल गई। बालक को देखकर उसकी माता के चेहरे पर प्रसन्नता छा गई। महल में उत्सव मनाया जाने लगा।

दैत्यराज के घर पुत्र जन्मा था। लेकिन किसी को क्या पता था कि यह कोई साधारण बालक नहीं है। यह बालक आगे चलकर संसार को यह सिखाने वाला था कि भक्ति के सामने भय टिक नहीं सकता।

बालक का नाम पड़ा—प्रह्लाद

जब हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र को पहली बार अपनी गोद में लिया, तो उसके चेहरे पर गर्व दिखाई दिया। वह अपने पुत्र को देखकर प्रसन्न हुआ। उसने सोचा कि “यह मेरा पुत्र है।

एक दिन यही मेरे साम्राज्य को और भी विशाल बनाएगा।”

हिरण्यकशिपु की आँखों में अपने पुत्र के लिए बड़े-बड़े सपने थे। वह चाहता था कि प्रह्लाद बड़ा होकर एक महान दैत्य राजा बने। वह युद्ध कला सीखे। राजनीति कला सीखे और तीनों लोकों पर अपना अधिकार बढ़ाए। और सबसे बढ़कर, अपने पिता की तरह स्वयं को सर्वशक्तिमान समझे।

लेकिन हिरण्यकशिपु को यह नहीं पता था कि उसके पुत्र के हृदय में पहले से ही किसी और का निवास था। भगवान विष्णु का।

आकाश मार्ग में इंद्र और कयाधु

हिरण्यकशिपु अपनी कठोर तपस्या के लिए वन में जा चुका था। उधर उसके महल में उसकी पत्नी कयाधु गर्भवती थी।

दैत्यराज की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर देवराज इंद्र ने दैत्यों पर आक्रमण कर दिया। दैत्य सेना पराजित होने लगी और इंद्र ने कयाधु को बंदी बना लिया। कयाधु भयभीत थी।

वह अपने गर्भ पर हाथ रखकर भगवान को स्मरण कर रही थी। इंद्र उसे आकाश मार्ग से अपने साथ ले जा रहे थे।

कयाधु: “देवराज! मैंने आपका क्या अपराध किया है? मुझे इस प्रकार कहाँ ले जा रहे हैं?”

इंद्र: “तुम्हारा कोई व्यक्तिगत अपराध नहीं है, कयाधु। लेकिन तुम्हारे गर्भ में हिरण्यकशिपु का पुत्र पल रहा है।”

कयाधु घबरा गई और बोली – “तो क्या एक अजन्मे बालक ने भी आपका क्या बिगाड़ा है?”

इंद्र गंभीर होकर बोले— “तुम हिरण्यकशिपु को नहीं जानतीं। वह देवताओं का घोर शत्रु है। यदि उसका पुत्र भी उसी के मार्ग पर चला, तो वह बड़ा होकर देवताओं के लिए और भी बड़ा संकट बन सकता है।”

कयाधु ने अपने गर्भ पर हाथ रखते हुए बोली: “लेकिन वह अभी जन्मा भी नहीं है। आप उसके भविष्य का निर्णय अभी कैसे कर सकते हैं?”

इंद्र कुछ क्षण मौन रहे। फिर बोले— “मैं उसे जन्म लेने के बाद दैत्यों की शक्ति बनने का अवसर नहीं दूँगा। मैं उसे अपने साथ ले जाऊँगा… और उचित समय पर उसका अंत कर दूँगा।”

इंद्रदेव की बात सुनकर कयाधु भय से काँप उठी। अपने आपको सँभालते हुए बोली –“नहीं! मेरे बच्चे को मत छीनिए!”

नारद जी का आगमन

तभी…आकाश में वीणा की मधुर ध्वनि गूँजी। “नारायण… नारायण…” इंद्र ने पीछे मुड़कर देखा। आकाश में देवर्षि नारद प्रकट हो चुके थे।

नारद जी ने शांत स्वर में कहा— “देवराज इंद्र… यह आप क्या करने जा रहे हैं?”

इंद्रदेव नारदजी को देखकर आश्चर्यचकित हो गए उनने हाथ जोड़कर नारदजी को प्रणाम किया और कहा – “देवर्षि! आप यहाँ?”

नारदजी: “हाँ, इंद्रदेव। और मैं तुमसे एक प्रश्न पूछने आया हूँ। जिसने अभी संसार का मुख भी नहीं देखा, वह तुम्हारा शत्रु कैसे हो गया?”

इंद्रदेव ने उत्तर दिया— “देवर्षि, आप जानते हैं कि हिरण्यकशिपु देवताओं का कितना बड़ा शत्रु है। उसके तप से मुझे भय है। उसके गर्भ में पल रहा यह बालक भी बड़ा होकर दैत्यों का नेतृत्व करेगा।”

नारदजी मुस्कुराए।

नारदजी: “देवराज… किसी का जन्म उसके कर्मों का प्रमाण नहीं होता।”

इंद्रदेव चुप रहे।

नारद जी आगे बोले— “और फिर, तुम्हें यह कैसे निश्चित है कि हिरण्यकशिपु का पुत्र अपने पिता के मार्ग पर ही चलेगा?”

इंद्रदेव: “लेकिन वह दैत्यकुल में जन्म लेगा।”

नारदजी: “दैत्यकुल में जन्म लेना और दैत्यभाव रखना—दो अलग बातें हैं, इंद्रदेव।”

इंद्र नारद जी की ओर देखने लगे। नारद जी ने कयाधु की ओर संकेत किया।

नारदजी: “यह स्त्री निर्दोष है। और इसके गर्भ में जो बालक है, उसके विषय में तुम्हें कोई निश्चित ज्ञान नहीं है।”

इंद्रदेव कुछ नरम पड़े। लेकिन उन्होंने फिर कहा— “यदि वह भविष्य में देवताओं के लिए संकट बन गया तो?”

नारद जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया— “यदि वह अधर्म के मार्ग पर जाएगा, तो उसके कर्म ही उसका निर्णय करेंगे। लेकिन केवल भय के कारण किसी निर्दोष को दंड देना धर्म नहीं है।” इंद्र मौन हो गए।

कुछ क्षण बाद नारद जी बोले—“देवराज, यदि तुम्हें इस स्त्री के भविष्य की चिंता है, तो इसे मेरे आश्रम में छोड़ दो। यह मेरी शरण में रहेगी।”

इंद्र ने कयाधु की ओर देखा। फिर नारद जी की ओर। उनके मन का संशय धीरे-धीरे शांत होने लगा।

इंद्रदेव: “देवर्षि, यदि यह आपकी शरण में है, तो मैं इसे नहीं रोकूँगा।” उन्होंने कयाधु को मुक्त कर दिया। आपकी बात का मैं सम्मान करता हूँ। मैं इसे आपके आश्रम में छोड़कर वापस स्वर्ग लौटता हूँ। नारद जी ने आशीर्वाद दिया।

नारदजी: “जाओ देवराज। धर्म की रक्षा केवल शस्त्र से नहीं, विवेक से भी होती है।”

इंद्रदेव वहाँ से चले गए।

कयाधु ने नारद जी के चरणों में प्रणाम की और बोली –

“देवर्षि… आपने मुझे और मेरे बच्चे को बचा लिया। मैं आपका यह उपकार कभी नहीं भूलूँगी।” नारद जी मुस्कुराए।

नारदजी: “कयाधु, मैंने केवल तुम्हें आश्रय दिया है। लेकिन तुम्हारे गर्भ में जो बालक है… उसकी नियति स्वयं भगवान ने लिखी है।”

कयाधु ने आश्चर्य से पूछा— “क्या आप मेरे पुत्र के भविष्य को जानते हैं?”  नारद जी ने अपनी वीणा उठाई और धीरे से बोले—

“नारायण… नारायण…”

“यह बालक साधारण नहीं है। इसके हृदय में भगवान की भक्ति जागृत होगी।” कयाधु कुछ समझ नहीं पाई। वह नारद जी के आश्रम में रहने लगी। वहीं से उसके जीवन में एक नया अध्याय शुरू हुआ।

नारद जी प्रतिदिन उसे भगवान विष्णु की महिमा, धर्म, भक्ति और आत्मज्ञान की बातें सुनाने लगे। और… कयाधु के साथ-साथ उसके गर्भ में पल रहा वह बालक भी उन दिव्य वचनों को सुन रहा था। वही बालक आगे चलकर कहलाया—भक्त प्रह्लाद।

नन्हे प्रह्लाद के कानों में पहली बार जो शब्द पड़े, वे राजसत्ता, युद्ध और अहंकार के नहीं थे। वे थे— “नारायण… नारायण…”

देवर्षि नारद की वाणी से निकला भगवान का नाम उसके हृदय में उतरता चला गया। यही कारण था कि जन्म लेने से पहले ही उसके मन में भगवान के प्रति प्रेम जाग उठा।

महल में एक अलग ही बालक

समय बीतता गया। प्रह्लाद धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। महल में दैत्य सैनिकों की गर्जना होती थी। राजसभा में युद्ध और विजय की बातें होती थीं। हिरण्यकशिपु के दरबार में उसके नाम की जय-जयकार होती थी।

लेकिन उसी महल में एक छोटा-सा बालक बैठकर धीरे-धीरे भगवान का नाम जपता था।

“नारायण… नारायण…” उसे सोने के महलों में कोई विशेष आकर्षण नहीं था। उसे राजसिंहासन की इच्छा नहीं थी। उसे शक्ति का मोह नहीं था।

जब दूसरे बालक खेलते थे, प्रह्लाद भगवान का नाम गाता था। जब दूसरे युद्ध की बातें सुनते थे, प्रह्लाद प्रेम और भक्ति की बातें करता था। और जब कोई उससे पूछता— “तुम किसका नाम लेते हो?” तो वह मुस्कुराकर कहता— “मेरे प्रभु नारायण का।”

पिता के सपने और पुत्र की भक्ति

हिरण्यकशिपु अपने पुत्र को देखकर प्रसन्न होता था। उसे लगता था कि समय आने पर प्रह्लाद भी उसके साम्राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा। लेकिन धीरे-धीरे उसे अपने पुत्र के व्यवहार में कुछ अलग दिखाई देने लगा। एक दिन हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अपने पास बुलाया। बालक उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

Current image: टूटे हुए खंभे से भगवान नृसिंह का दिव्य प्राकट्य और उनकी गोद में प्रेमपूर्वक बैठे भक्त प्रह्लाद का भावपूर्ण दृश्य।

हिरण्यकशिपु ने उसे गोद में बैठाया और प्रेम से पूछा— “पुत्र! बताओ, तुम्हें सबसे अच्छी चीज क्या लगती है?” प्रह्लाद ने अपने पिता की ओर देखा। उसके चेहरे पर अद्भुत शांति थी।

प्रह्लाद बोला— “पिताजी… मुझे सबसे अच्छा भगवान श्रीहरि का नाम लगता है।” हिरण्यकशिपु के चेहरे पर मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई। उसने सोचा— “श्रीहरि?”

उसके हृदय में वर्षों से जल रही विष्णु-विरोधी अग्नि अचानक भड़क उठी। लेकिन सामने उसका छोटा-सा पुत्र था। इसलिए उसने स्वयं को रोक लिया।

उसे क्या पता था कि आने वाले समय में यही बालक— उसके साम्राज्य की सबसे बड़ी चुनौती बनने वाला है। और एक दिन…यही बालक अपने पिता से कहेगा— “भगवान केवल मेरे हृदय में नहीं, पिताजी… वे तो हर जगह हैं।” उस दिन हिरण्यकशिपु के अहंकार की अंतिम परीक्षा होगी। और एक खंभे के भीतर से… स्वयं भगवान नृसिंह प्रकट होंगे।

हिरण्यकशिपु के महल में, उसकी रानी कयाधु के पुत्र प्रह्लाद अब 5 साल का तेजस्वी बालक हो चूका था।

गुरुकुल में शुक्राचार्य के पुत्र शंड-अमर्क: “बोलो प्रह्लाद! तुम्हारे पिता कौन हैं?” नन्हे प्रह्लाद मुस्कुराकर, मधुर आवाज में बोले, “मेरे पिता तो भगवान श्री हरि विष्णु हैं। और आपके भी। और इन दैत्य बालकों के भी।”

बालक दैत्य: “हरि? हरि कौन है?”

प्रह्लाद भजन गाते हुए बोले, “श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्… वही तो इस जगत के पालक हैं।”

पिता-पुत्र का टकराव

हिरण्यकशिपु प्रह्लाद को गोद में बिठाता है।  हिरण्यकशिपु प्यार से कहता है: “बेटा प्रह्लाद, गुरुकुल में तुमने क्या सबसे अच्छी बात सीखी? बताओ।”

प्रह्लाद बिना डरे कहता है, “पिताजी, इस संसार में सबसे अच्छी बात है – भगवान विष्णु की भक्ति। ये संसार दुखों का घर है, इसलिए वन में जाकर हरि को भजना चाहिए।

“हिरण्यकशिपु गोद से प्रह्लाद को फेंकते हुए, क्रोध में चिल्लाया, “किसने पढ़ाया इसे ये विष्णु भक्ति! ये तो मेरे शत्रु का बीज है! ये मेरा पुत्र नहीं, मेरे घर में शत्रु पैदा हुआ है!”

हिरण्यकशिपु (दैत्यों को आदेश): “ले जाओ इसे! मार डालो! ये विष्णु का चेला जीने योग्य नहीं!”

प्रह्लाद वध के असफल प्रयास –

फिर शुरू हुआ अत्याचार]

  1. हाथी से: मतवाले हाथी प्रह्लाद को कुचलने आते हैं, पर प्रह्लाद “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” जपता है, हाथी झुक जाते हैं।
  2. सर्पों से: विषधर सांप डसते हैं, विष अमृत बन जाता है।
  3. कृत्या राक्षसी: “खा जा इसे!” – कृत्या आती है पर खुद भस्म हो जाती है।
  4. पहाड़ से गिराना: पहाड़ से फेंका, भगवान ने गोद में उठा लिया।
  5. शंबरासुर की माया: हजारों मायाएं, पर प्रह्लाद अडिग।
  6. विष: विष का प्याला अमृत बना।
  7. आग में: होलिका (हिरण्यकशिपु की बहन) प्रह्लाद को लेकर आग में बैठती है, होलिका जलती है, प्रह्लाद बच जाता है।
  8. समुद्र में: समुद्र में डुबाया, समुद्र ने बाहर निकाल दिया।

हिरण्यकशिपु हर बार असफल होकर, थर-थर कांपते हुए,  “ये… ये मरता क्यों नहीं! ये कौन सी शक्ति है इसकी!

वरुण पाश और असुर बालकों को उपदेश

गुरु पुत्र थक कर प्रह्लाद को वरुण पाश से बांध देते हैं। शंड-अमर्क ने कहा, “प्रह्लाद, अब तुम्हें अर्थ, धर्म, काम की शिक्षा देंगे। ये भक्ति छोड़ो।

प्रह्लाद ने छुट्टी के समय, सभी असुर बालकों को इकट्ठा करके कहा, “मित्रो! सुनो! कौमार आचरेत प्राज्ञो धर्मान् भागवतानिह… बचपन से ही भगवान की भक्ति करनी चाहिए। तुम्हारे पिता, मेरे पिता सब नाशवान हैं। पर हरि अविनाशी हैं। आओ, हम सब हरि का नाम जपें! सारे असुर बालक “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” जपने लगते हैं।

शंड-अमर्क भागकर हिरण्यकशिपु के पास जाकर कहा, “महाराज! अनर्थ हो गया! प्रह्लाद ने तो सारे असुर बालकों को भी विष्णु भक्त बना दिया!”

खंभे से भगवान का प्रकट होना – 

विशाल राजसभा, प्रह्लाद बंधा हुआ, हिरण्यकशिपु खड्ग लेकर दहाड़ते हुए, “प्रह्लाद! तू किसके बल पर मेरी आज्ञा तोड़ता है? बता!”

प्रह्लाद शांत, हाथ जोड़कर, दिव्य तेज में कहा, “पिताजी, जिस परमात्मा ने आपको इतना बल दिया है, उसी ने मुझे भी दिया है। वही सर्वशक्तिमान है, वही सर्वत्र है, वही मेरे भीतर है और आपके भीतर भी।”

हिरण्यकशिपु हंसते हुए, पागलपन में, “सर्वत्र है! हा हा हा! अच्छा तो बता… क्या तेरा हरि इस खंभे में भी है?”

प्रह्लाद आँखें बंद कर, मुस्कुराकर कहा: “हाँ पिताजी, हैं तो। इस खंभे में भी हैं।”

हिरण्यकशिपु सिंहासन से कूदते हुए, खड्ग उठाकर, “तो फिर मैं अभी तेरा सिर काटता हूँ! देखता हूँ तेरा हरि कैसे बचाता है तुझे! कहाँ है तेरा हरि! आये सामने!”

वो जोर से खंभे पर घूंसा मारता है – धड़ाम!!!

1 सेकंड का सन्नाटा… फिर खंभे से एक भयंकर, ब्रह्मांड को हिला देने वाला शब्द – “गड़…गड़…गड़…” सभी (कांपते हुए): “ये… ये क्या था!”

श्री नृसिंह अवतार –

खंभा फटता है, उसमें से आधा मनुष्य, आधा सिंह… नाखून तलवार जैसे, आँखें अंगारे जैसी, जटाएं आग जैसी। हिरण्यकशिपु पीछे हटते हुए, सोचते हुए: “ये… ये न तो मनुष्य है, न सिंह! ये कौन है! ये तो ब्रह्मा के बनाए प्राणियों में से नहीं है! नृसिंह भगवान एक-एक कदम बढ़ाते हैं, पूरी सभा थर-थर कांपती है।

नृसिंह भगवान की पहली गर्जना और पूरी सृष्टि हिलती है। “हिरण्यकशिपु!!!”

भगवान उससे खेलते हैं – पकड़ते हैं, छोड़ते हैं। वो भागता है। भगवान अट्टहास करते हैं।

नृसिंह भगवान अट्टहास करते हुए, सन्ध्या का समय दिखाते हुए:

  1. “तूने वरदान माँगा था न – न दिन में मरूं, न रात में! देख! ये सन्ध्या है! न दिन है, न रात!
  2. तूने माँगा था न भीतर मरूं, न बाहर! देख! ये राजसभा की ड्योढ़ी है! न भीतर, न बाहर!
  3. तूने माँगा था न मनुष्य से मरूं, न पशु से! देख! मैं न मनुष्य हूँ, न पशु! मैं नृसिंह हूँ!
  4. न अस्त्र से, न शस्त्र से! देख! ये मेरे नख हैं!
  5. न पृथ्वी पर, न आकाश में! देख! तू मेरी जंघा पर है!”
  6. भगवान उसे जंघा पर लिटाकर, नाखूनों से पेट चीर देते हैं।

प्रह्लाद को गोद में और शांति
हिरण्यकशिपु वध के बाद, नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हो रहा, देवता डर रहे हैं, लक्ष्मी जी भी पास नहीं जा पा रही।

ब्रह्मा जी: “प्रह्लाद, तुम ही जाओ, तुम्हीं शांत कर सकते हो।” प्रह्लाद, नृसिंह के पास जाकर, स्तुति करो ।
ब्रह्मादयः सुरगणा मुनयोऽथ सिद्धाः… हे नृसिंह देव! शांत हो जाइए।” नृसिंह भगवान शांत होते हैं, प्रह्लाद को गोद में बिठाते हैं, जीभ से चाटते हैं।

नृसिंह भगवान प्रह्लाद से, प्रेम भरी गरज में, “वर मांगो पुत्र प्रह्लाद!”

प्रह्लाद (रोते हुए): “मुझे कुछ नहीं चाहिए प्रभु… बस मेरे पिता को क्षमा कर दीजिए।”

नृसिंह भगवान: “तुम्हारा पिता तो तुम्हारे कारण पहले ही पवित्र हो चुका है। जाओ, तुम मेरे परम भक्त हो।”

“तो देखा आपने… जीव अपनी चतुराई से ब्रह्मा को भी ठगना चाहता है, पर भगवान के विधान को कोई नहीं टाल सकता। भगवान ने अपनी युक्ति से उस युक्ति को काट दिया, जिसने मृत्यु के सारे दरवाजे बंद किए थे।”

“इसलिए कहते हैं – भक्त की रक्षा के लिए भगवान खंभे से भी प्रकट हो जाते हैं। बोलो – भक्त वत्सल भगवान की जय! श्री नृसिंह भगवान की जय!” भक्त प्रह्लाद की जय।

Source:पौराणिक कथायें

🙏जय श्री नृसिंह भगवान🙏

📿 “नृसिंह भगवान | Lord Narasimha” लेख केवल आध्यात्मिक एवं ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से प्रस्तुत है। इसमें दी गई जानकारी भारत के विभिन्न सनातन, वैदिक, और पौराणिक ग्रंथों के स्रोतों पर आधारित है तथा किसी भी प्रकार की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना इसका उद्देश्य नहीं है।

📜 ‘नृसिंह भगवान | Lord Narasimha’ लेख में प्रस्तुत श्लोक पारंपरिक ग्रंथों में उपलब्ध मूल स्वरूप पर आधारित हैं। इनमें कोई जानबूझकर परिवर्तन नहीं किया गया है।

🖼️ ‘नृसिंह भगवान | Lord Narasimha’ लेख में प्रयुक्त चित्र AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) द्वारा निर्मित हैं और केवल भावात्मक प्रस्तुति के उद्देश्य से उपयोग किए गए हैं।


✍️ लेखक: Arvind Kumar Singh Cosmic Harmony

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