
🙏 दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 101-120) 🙏
देवी दुर्गा के हजार नामों में से अगला 20 श्लोक एवं उनके हिन्दी अर्थ
श्लोक 101
सत्वरा मन्दरा गतिर्मन्दा मन्दिरा मोददायिनी।
मानभूमिः पानपात्रा पानदानकरोद्यता॥101॥
मानभूमिः पानपात्रा पानदानकरोद्यता॥101॥
हिन्दी अर्थ: वे शीघ्रगामिनी (सत्वरा) हैं, मन्दगामिनी भी हैं। उनकी गति मन्द (शांत) है। वे मंदिरों में वास करती हैं और आनन्द प्रदान करती हैं। वे मानभूमि हैं, पानपात्र धारण करती हैं और पानदान देने के लिए उद्यत रहती हैं।
श्लोक 102
आधूर्णारूणनेत्रा च किञ्चिदव्यक्तभाषिणी।
आशापुरा च दीक्षा च दक्षा दीक्षितपूजिता॥102॥
आशापुरा च दीक्षा च दक्षा दीक्षितपूजिता॥102॥
हिन्दी अर्थ: उनके नेत्र हल्के अरुण (लाल) हैं। वे कभी-कभी अव्यक्त वाणी बोलती हैं। वे आशापुरा (आशाओं को पूरा करने वाली), दीक्षा स्वरूपा और दक्ष हैं। वे दीक्षितों द्वारा पूजित हैं।
श्लोक 103
नागवल्ली नागकन्या भोगिनी भोगवल्लभा।
सर्वशास्त्रमयी विद्या सुस्मृतिर्धर्मवादिनी॥103॥
सर्वशास्त्रमयी विद्या सुस्मृतिर्धर्मवादिनी॥103॥
हिन्दी अर्थ: वे नागवल्ली (पान लता), नागकन्या स्वरूपा हैं। वे भोगिनी और भोग की प्रिय हैं। वे सर्वशास्त्रमयी हैं, विद्या स्वरूपा हैं, सुस्मृति (श्रेष्ठ स्मरण शक्ति) हैं और धर्म की वाणी बोलने वाली हैं।
श्लोक 104
श्रुतिस्मृतिधरा ज्येष्ठा श्रेष्ठा पातालवासिनी।
मीमांसा तर्कविद्या च सुभक्तिर्भक्तवत्सला॥104॥
मीमांसा तर्कविद्या च सुभक्तिर्भक्तवत्सला॥104॥
हिन्दी अर्थ: वे श्रुति और स्मृति की धारिणी हैं। वे ज्येष्ठा (श्रेष्ठ) हैं, श्रेष्ठा (उत्तम) हैं और पाताल में भी निवास करती हैं। वे मीमांसा और तर्कविद्या की अधिष्ठात्री हैं। वे सुभक्ति हैं और भक्तवत्सला (भक्तों पर कृपा करने वाली) हैं।
श्लोक 105
सुनाभिर्यातनाजातिर्गम्भीरा भाववर्जिता।
नागपाशधरामूर्तिरगाधा नागकुण्डला॥105॥
नागपाशधरामूर्तिरगाधा नागकुण्डला॥105॥
हिन्दी अर्थ: वे सुनाभि (कमल नाभि) हैं, यमराज की दंड स्वरूपा भी हैं। वे गम्भीरा हैं और भाव से रहित हैं (निर्लेप)। वे नागपाश धारण करने वाली मूर्ति हैं, वे अगाध (अपरिमेय) हैं और नागकुण्डल धारण करती हैं।
श्लोक 106
सुचक्रा चक्रमध्यस्था चक्रकोणनिवासिनी।
सर्वमन्त्रमयी विद्या सर्वमन्त्राक्षरावलिः॥106॥
सर्वमन्त्रमयी विद्या सर्वमन्त्राक्षरावलिः॥106॥
हिन्दी अर्थ: वे सुचक्रा हैं, चक्र के मध्य में स्थित रहती हैं और चक्र के कोनों में भी निवास करती हैं। वे सर्वमंत्रमयी हैं, विद्या स्वरूपा हैं और समस्त मन्त्राक्षरों की मालिक हैं।
श्लोक 107
मधुस्त्रवास्त्रवन्ती च भ्रामरी भ्रमरालिका।
मातृमण्डलमध्यस्था मातृमण्डलवासिनी॥107॥
मातृमण्डलमध्यस्था मातृमण्डलवासिनी॥107॥
हिन्दी अर्थ: उनसे मधु (अमृत) प्रवाहित होता है। वे भ्रामरी (भौंरे जैसी ध्वनि करने वाली), भ्रमरालिका स्वरूपा हैं। वे मातृमण्डल (देवीगण) के मध्य में स्थित और वहीं निवास करने वाली हैं।
श्लोक 108
कुमार जननी क्रूरा सुमुखी ज्वरनाशिनी।
निधाना पञ्चभूतानां भवसागरतारिणी॥108॥
निधाना पञ्चभूतानां भवसागरतारिणी॥108॥
हिन्दी अर्थ: वे कुमार (कार्तिकेय) की जननी हैं। कभी-कभी क्रूर स्वरूपा भी होती हैं। वे सुमुखी हैं और ज्वर का नाश करती हैं। वे पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) की निधि हैं और भवसागर से पार उतारने वाली हैं।
श्लोक 109
अक्रूरा च ग्रहावती विग्रहा ग्रहवर्जिता।
रोहिणी भूमिगर्मा च कालभूः कालवर्तिनी॥109॥
रोहिणी भूमिगर्मा च कालभूः कालवर्तिनी॥109॥
हिन्दी अर्थ: वे अक्रूरा (दयामयी) हैं, ग्रहों की अधिष्ठात्री हैं। वे विग्रह (रूप) हैं और साथ ही निर्ग्रह (रूप से परे) भी हैं। वे रोहिणी स्वरूपा हैं, भूमिगर्मी (धरती की उष्मा) हैं, कालभू (समय की जननी) हैं और कालचक्र को चलाने वाली हैं।
श्लोक 110
कलङ्करहिता नारी चतुःषष्ठ्यभिधावती।
अतीता विद्यमाना च भाविनी प्रीतिमञ्जरी॥110॥
अतीता विद्यमाना च भाविनी प्रीतिमञ्जरी॥110॥
हिन्दी अर्थ: वे कलंक रहित नारी हैं। वे चौंसठ विद्याओं की अधिष्ठात्री हैं। वे अतीता (भूतकाल), विद्यमाना (वर्तमान) और भाविनी (भविष्य) स्वरूपा हैं। वे प्रीतिमंजरी हैं, अर्थात् प्रेम और आनन्द की वर्षा करने वाली हैं।
श्लोक 111
सर्वसौख्यवतीयुक्तिराहारपरिणामिनी।
जीर्णा च जीर्णवस्रा च नूतना नववल्लभा॥111॥
जीर्णा च जीर्णवस्रा च नूतना नववल्लभा॥111॥
हिन्दी अर्थ: माता समस्त सुखों की दात्री हैं। वे आहार के पचने की शक्ति के रूप में स्थित हैं। वे जीर्ण वस्त्रधारिणी (पुरानेपन का स्वरूप) और नूतन रूपों की प्रिय भी हैं।
श्लोक 112
अजरा च रजःप्रीता रतिरागविवर्धिनी।
पञ्चवातगतिर्भिन्ना पञ्चश्लेष्माशयाधरा॥112॥
पञ्चवातगतिर्भिन्ना पञ्चश्लेष्माशयाधरा॥112॥
हिन्दी अर्थ: वे अजरा हैं, कभी बूढ़ी नहीं होतीं। वे रजोगुण में प्रिय हैं और रति-राग (प्रेम) की वृद्धि करने वाली हैं। वे पाँच प्रकार के वायु-तत्वों की गति और पाँच श्लेष्माशयों की धारिणी हैं।
श्लोक 113
पञ्चपित्तवतीशक्तिः पञ्चस्थानविभाविनी।
उदक्या च वृषस्यन्ती बहिः प्रस्रविणी त्र्यहा॥113॥
हिन्दी अर्थ: माता पंच-पित्त की शक्ति हैं, पाँच अंगों की धारिणी हैं। वे नदियों के जल की धारा के रूप में प्रकट होती हैं और तीन दिनों तक बहने वाले स्त्रोत (ऋतुचक्र आदि) की धारिणी हैं।
श्लोक 114
रजःशुक्रधरा शक्तिर्जरायुर्गर्भधारिणी।
त्रिकालज्ञा त्रिलिङ्गा च त्रिमूर्तिस्त्रिपुरवासिनी॥114॥
हिन्दी अर्थ: वे रज और शुक्र की धारिणी शक्ति हैं, गर्भ को धारण करने वाली हैं। त्रिकाल की ज्ञाता हैं, तीन लिंगों की अधिष्ठात्री, त्रिमूर्ति और त्रिपुरा में निवासिनी हैं।
श्लोक 115
अरागा शिवतत्त्वा च कामतत्वानुरागिणी।
प्राच्यवाची प्रतीची च दिगुदीची च दिग्विदिग्दिशा॥115॥
हिन्दी अर्थ: वे रागरहित, शिवतत्त्व स्वरूपा और कामतत्त्व की अनुरागिणी भी हैं। वे सभी दिशाओं में व्याप्त हैं—पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और संपूर्ण दिशाएँ उन्हीं में स्थित हैं।
श्लोक 116
अहङ्कृतिरहङ्कारा बाला माया बलिप्रिया।
शुक्रश्रवा सामिधेनी सुश्रद्धा श्राद्धदेवता॥116॥
हिन्दी अर्थ: माता अहंकार और अहंकारिणी भी हैं। वे बालरूपा, माया और बलि (यज्ञ) प्रिय हैं। वे यज्ञ की सामिधेनी, सुश्रद्धा और श्राद्ध की देवता हैं।
श्लोक 117
माता मातामही तृप्तिः पितुमाता पितामही।
स्नुषा दौहित्रिणी पुत्री पौत्री नप्त्री शिशुप्रिया॥117॥
हिन्दी अर्थ: वे माता हैं, मातामही हैं, तृप्ति स्वरूपा हैं। पितामही हैं, पुत्री हैं, पौत्री और नातिनियों की प्रिय माता हैं। वे समस्त कुल की स्त्रियों में व्याप्त हैं और शिशुओं की प्रिय हैं।
श्लोक 118
स्तनदा स्तनधारा च विश्वयोनिः स्तनन्धयी।
शिशूत्सङ्गधरा दोला लोला क्रीडाभिनन्दिनी॥118॥
हिन्दी अर्थ: वे स्तनपान कराने वाली, विश्व की योनिरूपिणी, शिशु की पोषण करने वाली हैं। वे शिशुओं को गोद में झुलाने वाली और खेल-खेल में आनन्द देने वाली माता हैं।
श्लोक 119
उर्वशी कदली केका विशिखा शिखिवर्तिनी।
खट्वाङ्गधारिणी खट्व बाणपुङ्खानुवर्तिनी॥119॥
वे उर्वशी के रूप में, केले की तरह कोमल, मोरनी की तरह स्वरयुक्त और बाण की नोक जैसी तीक्ष्ण हैं। वे खट्वांग धारण करने वाली और बाण की पंखधारिणी हैं।
उदक्या च वृषस्यन्ती बहिः प्रस्रविणी त्र्यहा॥113॥
त्रिकालज्ञा त्रिलिङ्गा च त्रिमूर्तिस्त्रिपुरवासिनी॥114॥
प्राच्यवाची प्रतीची च दिगुदीची च दिग्विदिग्दिशा॥115॥
शुक्रश्रवा सामिधेनी सुश्रद्धा श्राद्धदेवता॥116॥
स्नुषा दौहित्रिणी पुत्री पौत्री नप्त्री शिशुप्रिया॥117॥
शिशूत्सङ्गधरा दोला लोला क्रीडाभिनन्दिनी॥118॥
खट्वाङ्गधारिणी खट्व बाणपुङ्खानुवर्तिनी॥119॥
