Current image: देवी दुर्गा सिंह पर विराजमान, दिव्य आभा और अग्नि पृष्ठभूमि के साथ, हाथों में शस्त्र धारण किए माँ दुर्गा का शक्तिशाली रूप — दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्र श्लोक 81–100 हिन्दी अर्थ सहित।

दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् | देवी दुर्गा 1000 नाम स्तोत्रम्

🙏 दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 81-100) 🙏

देवी दुर्गा के हजार नामों में से अगला 20 श्लोक एवं उनके हिन्दी अर्थ

श्लोक 81

सौदामिनी सुदामा सुदामा च सुधामा धामशालिनी।
सौभाग्यदायिनी द्यौश्च सुभगा द्युतिवर्धिनी॥81॥
हिन्दी अर्थ: वे सौदामिनी (बिजली) हैं, सुदामा हैं और सुधामा हैं। वे धामशालिनी हैं। वे सौभाग्य प्रदान करती हैं, स्वर्ग (द्यौः) स्वरूपा हैं, सुभगा और तेज को बढ़ाने वाली हैं।

श्लोक 82

श्रीकृत्तिवसना चैव कङ्काली कलिनाशिनी।
रक्तबीजवधोद्युक्ता सुतन्तुर्बीजसन्ततिः॥82॥
हिन्दी अर्थ: वे श्रीकृत्तिवसना (शिव के चर्म वस्त्र धारण करने वाली) हैं, कंकाली हैं और कलियुग का नाश करने वाली हैं। वे रक्तबीज के वध के लिए सदा तैयार रहती हैं। वे सुतन्तु (सूक्ष्म सूत्र समान) और समस्त बीजों की संतति (मूल कारण) हैं।

श्लोक 83

जगज्जीवा जगद्बीजा जगत्रयहितैषिणी।
चामीकररुचिश्चन्द्री साक्षाद्या षोडशी कला॥83॥
हिन्दी अर्थ: वे जगत की जीवन शक्ति हैं, जगत का बीज हैं और तीनों लोकों के हित की इच्छुक हैं। वे स्वर्ण जैसी आभा वाली, चन्द्रमा समान शीतल और षोडशी कला स्वरूपिणी हैं।

श्लोक 84

यत्तत्पदानुबन्धा च यक्षिणी धनदार्चिता।
चित्रिणी चित्रमाया च विचित्रा भुवनेश्वरी॥84॥
हिन्दी अर्थ: वे यत्पद (परम तत्व) से जुड़ी हुई हैं। वे यक्षिणी हैं, धन और वैभव से पूजित हैं। वे चित्रिणी, चित्रमाया, विचित्रा और समस्त लोकों की अधीश्वरी हैं।

श्लोक 85

चामुण्डा मुण्डहस्ता च चण्डमुण्डवधोद्यता।
अष्टम्येकादशी पूर्णा नवमी च चतुर्दशी॥85॥
हिन्दी अर्थ: वे चामुण्डा हैं, जिनके हाथ में मुण्ड हैं। वे चण्ड-मुण्ड के वध के लिए सदैव उद्यत रहती हैं। वे अष्टमी, एकादशी, पूर्णिमा, नवमी और चतुर्दशी तिथियों की अधिष्ठात्री देवी हैं।

श्लोक 86

उमा कलशहस्ता च पूर्णकुम्भपयोधरा।
अभीरूर्भैरवी भीरू भीमा त्रिपुरभैरवी॥86॥
हिन्दी अर्थ: वे उमा हैं, हाथ में कलश धारण करती हैं। उनके स्तन पूर्ण कुंभ के समान हैं। वे अभीरु (निडर), भैरवी, भीरु (दयामयी), भीमा और त्रिपुरभैरवी हैं।

श्लोक 87

महाचण्डी च रौद्री च महाभैरवपूजिता।
निर्मुण्डा हस्तिनीचण्डा करालदशनानना॥87॥
हिन्दी अर्थ: वे महाचण्डी, रौद्री और महाभैरव द्वारा पूजित हैं। वे निर्मुण्डा हैं, हस्तिनीचण्डा हैं और उनके दांत कराल (भयानक) हैं।

श्लोक 88

कराला विकराला च घोरा घुर्घुरनादिनी।
रक्तदन्तोर्ध्वकेशी च बन्धूककुसुमारुणा॥88॥
हिन्दी अर्थ: वे कराला और विकराला स्वरूपा हैं, घोर रूप धारण करती हैं और घुर्घुर (गर्जना) करती हैं। उनके दांत रक्त के समान लाल हैं, केश ऊपर उठे हुए हैं और उनका रंग बन्धूक पुष्प के समान लाल है।

श्लोक 89

कादम्बिनी विपाशा च काश्मीरी कुङ्कुमप्रिया।
क्षान्तिर्बहुसुवर्णा च रतिर्बहुसुवर्णदा॥89॥
हिन्दी अर्थ: वे कादम्बिनी हैं, विपाशा नदी स्वरूपा हैं, कश्मीर में पूजित हैं और कुङ्कुम प्रिय हैं। वे क्षान्ति (क्षमा), बहुसुवर्णा और रति (आनन्द) स्वरूपा हैं। वे बहुसुवर्ण (धन) भी देती हैं।

श्लोक 90

मातङ्गिनी वरारोहा मत्तमातङ्गगामिनी।
हंसा हंसगतिर्हंसी हंसोज्वलशिरोरुहा॥90॥
हिन्दी अर्थ: वे मातंगिनी (हाथिनी के समान बलशाली) हैं, वरारोहा (सुंदरांगिनी) हैं और मदमस्त हाथिनी के समान गमन करती हैं। वे हंस हैं, हंस गति वाली हैं, हंसी स्वरूपा हैं और हंस समान उज्ज्वल शिरोवेश वाली हैं।

श्लोक 91

पूर्णचन्द्रमुखी श्यामा स्मितास्या च सुकुण्डला।
महिषी च लेखनी लेखा सुलेखा लेखकप्रिया॥91॥
हिन्दी अर्थ: देवी का मुख पूर्ण चन्द्र के समान है, वे श्यामवर्णा हैं, उनके अधरों पर सदा मधुर स्मित (मुस्कान) रहती है और वे सुन्दर कुण्डल धारण करती हैं। वे महिषी (शक्तिशाली) हैं, लेखनी स्वरूपा हैं, उत्तम लेखा (लिपि) की अधिष्ठात्री हैं और लेखन करने वालों को प्रिय हैं।

श्लोक 92

शङ्खिनी शङ्खहस्ता च जलस्था जलदेवता।
कुरुक्षेत्राऽवनिः काशी मथुरा काञ्च्यवन्तिका॥92॥
हिन्दी अर्थ: वे शंखिनी हैं, हाथ में शंख धारण करती हैं, जल में स्थित रहती हैं और जल की देवी हैं। वे पवित्र स्थानों में प्रकट होती हैं – कुरुक्षेत्र, काशी, मथुरा, कांची और अवन्तिका (उज्जैन) में भी पूजित हैं।

श्लोक 93

अयोध्या द्वारिका माया तीर्था तीर्थकरप्रिया।
त्रिपुष्कराऽप्रमेया च कोशस्था कोशवासिनी॥93॥
हिन्दी अर्थ:वे अयोध्या और द्वारका में पूजित हैं। वे माया स्वरूपा हैं, तीर्थों की अधिष्ठात्री हैं और तीर्थयात्रा करने वालों को प्रिय हैं। वे त्रिपुष्कर तीर्थ में वास करती हैं। उनका स्वरूप अप्रमेय (असीम) है। वे कोश (ज्ञान, धन, भंडार) में स्थित और उसमें वास करने वाली हैं।

श्लोक 94

कौशिकी च कुशावर्ता कौशाम्बी कोशवर्धिनी।
कोशदा पद्मकोशाक्षी कौसुम्भकुसुमप्रिया॥94॥
हिन्दी अर्थ: वे कौशिकी स्वरूपा हैं, कुशावर्ता नामक तीर्थ में प्रतिष्ठित हैं। कौशाम्बी में पूजित हैं और कोश (भंडार) को बढ़ाने वाली हैं। वे कोश (धन, ज्ञान) प्रदान करती हैं। उनके नेत्र कमल कोश जैसे हैं और वे कौसुम्भ (पलाश) पुष्प को प्रिय मानती हैं।

श्लोक 95

तोतला च तुलाकोटिः कूटस्था कोटराश्रया।
स्वयम्भूश्च सुरूपा च स्वरूपा पुण्यवर्धिनी॥95॥
हिन्दी अर्थ: वे तोतला (बालिका समान मधुर बोलने वाली) हैं। तुला (तराजू) की कोटि (संतुलन) स्वरूपा हैं। वे कूटस्थ (अचल, नित्य) हैं और पर्वत की गुफाओं में वास करती हैं। वे स्वयंभू हैं, अत्यंत सुन्दर हैं और पुण्य बढ़ाने वाली हैं।

श्लोक 96

तेजस्विनी सुभिक्षा च बलदा बलदायिनी।
महाकोशी महावार्ता बुद्धिः सदसदात्मिका॥96॥
हिन्दी अर्थ: वे तेजस्विनी हैं, सुभिक्षा (समृद्धि) देने वाली हैं। वे बल प्रदान करती हैं और बलदायिनी कहलाती हैं। वे महाकोशी (महान कोश की स्वामिनी), महावार्ता हैं। वे बुद्धि स्वरूपा हैं और सत्य-असत्य की आत्मा हैं।

श्लोक 97

महाग्रहहरा सौम्या विशोका शोकनाशिनी।
सात्विकी सत्वसंस्था च राजसी च रजोवृता॥97॥
हिन्दी अर्थ: वे महाग्रहों (दुष्ट ग्रहों) का नाश करने वाली हैं। वे सौम्या हैं, शोक से रहित हैं और शोक को नष्ट करती हैं। वे सात्विकी हैं, सत्वगुण में स्थित रहती हैं। वे राजसी भी हैं और रजोगुण से युक्त हैं।

श्लोक 98

तामसी च तमोयुक्ता गुणत्रयविभाविनी।
अव्यक्ता व्यक्तरूपा च वेदविद्या च शाम्भवी॥98॥
हिन्दी अर्थ: वे तामसी भी हैं और तमोगुण से युक्त हैं। वे तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) को विभावित करती हैं। वे अव्यक्त (अदृश्य) और व्यक्त (दृश्य) दोनों रूप धारण करती हैं। वे वेदविद्या स्वरूपा हैं और शाम्भवी (शिव की शक्ति) हैं।

श्लोक 99

शङ्करा कल्पिनी कल्पा मनस्सङ्कल्पसन्ततिः।
सर्वलोकमयी शक्तिः सर्वश्रवणगोचरा॥99॥
हिन्दी अर्थ: वे शंकरा (कल्याणदायिनी) हैं, कल्पना करने वाली हैं और कल्पा (युगों की अधिष्ठात्री) हैं। वे मन के संकल्पों की सृष्टिकर्त्री हैं। वे सर्वलोकमयी शक्ति हैं और सभी के श्रवण (सुनने) में आने योग्य हैं।

श्लोक 100

सर्वज्ञानवती वाञ्छा सर्वतत्त्वावबोधिका।
जाग्रतिश्च सुषुप्तिश्च स्वप्नावस्था तुरीयका॥100॥
हिन्दी अर्थ: वे सर्वज्ञानवती हैं, वांछित फल देने वाली हैं और सभी तत्त्वों का बोध कराने वाली हैं। वे जाग्रत, सुषुप्ति, स्वप्न और तुरीय—चारों अवस्थाओं की अधिष्ठात्री हैं।

॥ जय माँ दुर्गा ॥

माँ आद्या शक्ति, माँ भवानी, माँ जगदम्बिका — आप ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार की अधिष्ठात्री हैं। आपके सहस्रनाम का पाठ करने से साधक को समस्त सुख, सिद्धि और मोक्ष प्राप्त होता है। हे माँ! अपनी अनंत करुणा से हम सबका जीवन मंगलमय करें।

॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तु ते ॥

🌺🌺 जय माता दी 🌺🌺