पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड

अध्याय 10: सुदर्शन चक्र का उदय क्यों और कैसे हुआ?


जय श्री हरी

“जब धर्म डगमगाए, अधर्म मुस्कुराए, और देवता निराश हो जाएं…तब शिव का नृत्य आरंभ होता है, और सृष्टि फिर से अपने संतुलन को प्राप्त करती है।”

 

आज हम एक ऐसी घटना आपको बताने जा रहें हैं जो युगों पहले धरती और स्वर्ग के मध्य घटा था। जब देवता धर्म के लिए युद्ध करते थे तो वहीं असुर अधिकार के लिए देवताओं से युद्ध करते थे। महान ऋषि वेद व्यास जी ने जो कथाएं पुराणों में लिखीं है वह केवल कथा नहीं वह घटना थी जो पूर्व में घट चुकी है।

 

देवताओं की दयनीय स्थिति

युगों पहले ऐसे ही एक घटना घटी थी जब देवताओं का संकट दिन-ब-दिन गहराता जा रहा था… स्वर्ग में मानो मृत्यु-सी निस्तब्धता छा गई थी। चारों ओर पराजय की चर्चा  थी — वह पराजय जो इन्द्रदेव के हृदय को बार-बार चीर रही थी। क्योंकि देवराज इन्द्र और उनकी समूची देवसेना… अकल्पनीय रूप से पराजित हो चुकी थी। यह पराजय केवल युद्धभूमि की नहीं थी यह देवत्व की प्रतिष्ठा पर पड़ा एक गहरा घाव था। भगवान विष्णु तक जालंधर की अपार शक्ति के आगे झुक गए — और वे देवी लक्ष्मी के साथ क्षीरसागर लौट गए। स्वर्ग शून्य हो गया, देवताओं की शक्ति जैसे विलीन हो गई।

                                

देवताओं को जीवनदान देने वाला द्रोणाचल पर्वत भी जालंधर के भय से थर-थर काँप उठा… और अंततः क्षीरसागर की गहराइयों में समा गया।

  
“सृष्टि का संतुलन तब नहीं बिगड़ता जब असुर बढ़ जाते हैं, वह तब बिगड़ता है जब देवता अपने धर्म से भटक जाते हैं।”

और जब ऐसा होता है… तब स्वयं महादेव नृत्य करते हैं और उनकी नृत्य की अग्नि से जन्म लेता है ‘सुदर्शन’।

यज्ञ और भक्ति का अंत

अब देवता भयभीत थे और उनसे भी अधिक चिंतित स्वयं ब्रह्माजी थे। क्योंकि सृष्टि का चक्र रुक चुका था… धर्म, समय, और कर्म – सब ठहर गए थे। जालंधर के अधीन अब तीनों लोक आ चुके थे। पृथ्वी पर स्वर्ग जैसा जीवन हो गया यहाँ कोई नहीं मरता था। बीमारी, दुःख, मृत्यु, सब लुप्त हो चुके थे। उम्र ठहर गई थी, मनुष्य युवा, स्वस्थ, और संपन्न बन चुके थे। जो चाहे, जब चाहे  वह पा लेते थे। ना कोई व्रत, ना कोई यज्ञ, ना कोई पूजा।

देवताओं के नाम से अब किसी के घर दीपक नहीं जलते थे। स्वर्ग की ओर कोई दृष्टि नहीं उठती थी। पृथ्वी पर जीवन पूर्ण था, पर भक्ति शून्य हो चुकी थी। और यही तो सबसे बड़ा संकट था देवताओं के लिए। क्योंकि जब पूजा रुक जाती है, तो देवत्व भी अपना तेज़ खो देता है। देवराज इन्द्र तो मानो लज्जा से भूमि में समा जाना चाहते थे। उन्होंने स्वयं तो भगवान शिव जैसे अजेय योद्धा से युद्ध माँगा था. अब वही अभिमान उनके विनाश का कारण बन गया। भगवान भोलेनाथ ने तो सदैव की तरह वही दिया जो माँगा गया।

पर इन्द्र… अब भुगत रहे थे अपने कर्मों का फल। देवता हताश थे, निराश थे, पर अभी भी आशा की एक किरण बाकी थी। वे जानते थे — संकट चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, उपाय अवश्य होता है। देवता उसी उपाय को खोजने की कोशिश कर रहे थे।

यह कथा सुत जी अपने ऋषि शिष्यों को सुना रहे थे । उस कथा में युधिष्ठिर और नारद जी के बीच संवाद होता है। नारद जी बताते हैं कि किस स्थिति में, क्यों और कैसे सुदर्शन चक्र का निर्माण किया गया था। जो पद्म महापुराण उत्तरखण्ड अध्याय 10 में वर्णन है।

 
“जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब ईश्वर नए रूप में अवतरित होते हैं — कभी मनुष्य के रूप में, कभी अस्त्र के रूप में।”

आप इस कथा में जानेंगे, उस अस्त्र की कथा… जो स्वयं भगवान शंकर के चरणों से जन्मा — और जो आगे चलकर श्रीहरि विष्णु के हाथों में सुदर्शन चक्र बना।

राजा युधिष्ठिर का देवर्षि नारद जी से बातचीत

युधिष्ठिर ने नारदजी से पूछा – हे द्विजश्रेष्ठ! जब उस दुष्ट जालंधर ने देवताओं को पराजित कर औरउनसे स्वर्ग का राज्य छीन लिया। उस समय, पराजय की पीड़ा सह रहे उन देवताओं ने क्या किया? कहाँ गए वे, जिनका परिचय स्वयं उनका सिंहासन हुआ करता था?

 

नारदजी ने थोड़ी रहस्यमय और धीमी स्वर में कहा: पुत्र, उसके बाद… सभी देवताओं ने स्वर्ग लोक का परित्याग कर दिया। सोचो, देवत्व का अपमान कितना गहरा रहा होगा। दीर्घ काल तक वे दुर्दशा सहते रहे। एक ऐसी स्थिति, जिसकी कल्पना भी उन्होंने कभी नहीं की थी। उनको न तो अमृत मिलता था और न यज्ञ का भाग मिलता था। यह केवल सत्ता का नुकसान नहीं था, यह ऊर्जा का क्षरण था। वे बलहीन होते जा रहे थे। वे सभी लाचार होकर… उस परम पिता ब्रह्माजी के पास पहुँचे। उन लोगों ने ब्रह्मलोक में परमेष्ठी ब्रह्माजी का दर्शन किया। (परमेष्ठी ब्रह्माजी का अर्थ है “वह ब्रह्मा जो सर्वोच्च पद पर विराजमान हैं” यह शब्द ब्रह्मा जी के सर्वोच्च अधिकार, ज्ञान, और दिव्यता को दर्शाता है, खासकर जब वे ब्रह्मलोक में सृष्टि के कार्यों का संचालन करते हैं। यह एक सम्मानजनक उपाधि है जिसका उपयोग यह बताने के लिए किया जाता है कि वे देवताओं में भी एक अत्यंत उच्च स्थान रखते हैं। )

  

ब्रह्माजी सभी देवताओं के साथ कैलाश पहुंचे

उस समय ब्रह्माजी प्राणायाम करके परमात्मा में अपने मन को लगाये थे. यह देवताओं के लिए एक और परीक्षा थी—क्या सृष्टि का निर्माता भी उनकी पीड़ा से विमुख है?  देवताओं की अपनी सत्यवाणियों के द्वारा आदर पूर्वक ब्रह्माजी की स्तुत्ति की। उसके बाद प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने कहा मैं आपलोगों का कौन-सा काम करूँ.  इसके पश्चात्… देवताओं ने जालन्धर के समस्त अत्याचारों और अपने पराभव की बात ब्रह्माजी को विस्तार से बताई। उन्होंने बताया कि किस प्रकार देवराज इंद्र का अभिमान चकनाचूर हो चुका था, और कैसे जालंधर ने हर नियम को तोड़ा था। क्षण भर ध्यान करने के पश्चात्, ब्रह्माजी ने निश्चय किया। ब्रह्मा जानते थे कि इस समस्या का समाधान केवल एक ही देव कर सकता है—महादेव! इसके पश्चात् ब्रह्माजी सभी देवताओं को साथ लेकर कैलास पर्वत पर पहुंचे ।

 

कैलास पर्वत के पास जाकर वे सभी देवता उसकी विचित्रता, अद्भुत शांति और दिव्य तेज को देखकर घबरा गए। यह वह स्थान था जहाँ भौतिक संसार के नियम काम नहीं करते थे। वहीं स्थित होकर देवताओं ने ब्रह्माजी तथा इन्द्र को आगे करके शङ्करजी की स्तुत्ति करते हुए कहा –

   
भव,शर्व तथा नीलग्रीव नाम वाले आपको नमस्कार है ।
  
स्थूल, सूक्ष्म तथा अनेक रूप वाले आपको नमस्कार है ।
 

इस तरह से सबों की ओर मुख करके तथा देवताओं की बाणी को सुनकर शङ्करजी ने नन्दी से कहा कि देवताओं को शीघ्र लाओ । शङ्करजी की वाणी को सुनकर नन्दी के द्वारा बुलाये गये देवगण शीघ्रता से  भीतर प्रवेश करके आश्चर्यचकित नेत्रों वाले देवताओं ने देखा। लोक-कल्याणकारी शङ्करजी अपने आसन पर विराजमान हैं। उनकी सेवा में, करोड़ों गण मौजूद थे, जो नरम, विरूप (टेढ़े-मेढ़े), जटाधारी, और धूल धूसरित थे। यह दृश्य देवताओं को याद दिलाता था कि शिव का ऐश्वर्य, उनके स्वर्ग जैसा नहीं, बल्कि सत्य और वैराग्य से भरा था।

भगवान् शिव की मज़बूरी

ब्रह्माजी ने शङ्करजी को प्रणाम करके कहा: “हे शरणागत वत्सल महादेव! आप कृपा करें। हे शरणागत बत्सल महादेव । आप कृपा करें। भगवान शंकर व्यंगपूर्वक जोर से हँसे, शङ्करजी की जोर से हँसी को सुनकर ब्रह्माजी ने शङ्करजी से कहा आप देवताओं की दशा को देखें । उसके पश्चात ब्रह्माजी के अभिप्रेत अर्थ को  तथा इन्द्र के अभिमान का नाश जानकर पार्वतीजी के प्रेम पूर्वक कहने पर शङ्करजी ने देवताओं से कहा: “जिस शत्रु को स्वयं भगवान् विष्णु ने नहीं मारा… उसे मैं कैसे मार सकता हूँ? क्या विष्णु ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी?” हे ब्रह्माजी ! पहले जो वज्र आदि आयुध बनाये गये हैं, उन सबों से जालन्धर का वध नहीं सम्भव है । अतएव पूर्व निर्मित वज्रों से मैं भी उसको नहीं मार सकता हूँ ।

 

यह वही क्षण था जब भगवान शिव को सुदर्शन चक्र के निर्माण की प्रेरणा मिली और वही सुदर्शन चक्र बाद में भगवान विष्णु को मिला जिसका उपयोग उन्होंने द्वापर युग में कृष्णावतार में किया था।

 

भगवान शंकर जी ने आगे बताया वह और भी आश्चर्यजनक था, उन्होंने कहा – “इसलिए, हे देवताओं । आप मेरे प्राणों के बल से, एक सुदृढ़ महा-शस्त्र का निर्माण करें।” शङ्करजी की इस बात को सुनकर ब्रह्माजी ने उनसे कहा – आप अपने बल को जानते हैं अतएव आप ही उस महाशस्त्र को बनायें ।

सुदर्शन चक्र का निर्माण

ब्रह्माजी की इस वाणी को सुनकर शङ्करजी ने कहा -“तो फिर सब मिलकर अपनी शक्ति को एक स्थान पर केंद्रित करो!” उसके बाद ब्रह्माजी ने ब्रह्मास्त्र के सूचक तेज को प्रकट किया । उसके बाद स्वयं रुद्र ने अपने त्रिनेत्र जन्य तेज को प्रकट किया  और सभी देवताओं ने क्रोध करके अपने तेज समूह को प्रकट किया! वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी… सभी तत्वों का तेज एक बिंदु पर केंद्रित होने लगा। 

उसी समय शङ्करजी ने श्रीहरि को स्मरण किया।  उनके द्वारा स्मरण किए जाने पर वहाँ श्रीहरि आ गये और पूछे कि मैं क्या करूँ ? तो शङ्करजी ने जनार्दन से कहा – हे विष्णो ! आपने जालंधर को क्यों छोड़ दिया?” आपने युद्ध में जालन्धर को क्यों नहीं मारा ? देवताओं को छोड़कर आप क्षीर सागर में शयन करने के लिए क्यों चले गये ? श्रीविष्णु भगवान् ने कहा हे देवेश ! यदि मैं उसको मारता हूँ तो लक्ष्मी मेरी प्रियतमा कैसे रह सकती है ? जालंधर की पत्नी वृंदा की पतिव्रता शक्ति के कारण मेरा तेज वहाँ काम नहीं करेगा। अतएव हे पार्वतीपते ! आप ही जालन्धर को युद्ध में मारें ।

 

तब शङ्करजी द्वारा यह कहे जाने पर कि आप अपने क्रोध जन्य तेज को प्रकट करें, भगवान् विष्णु ने वैष्णव तेज को प्रकट किया । इस तरह सम्पूर्ण तेज बढ़ गया । उस समृद्ध हुए तेज को देखकर शङ्करजी ने भगवान् केशव से कहा – आप लोग इसी तेज से मेरे अस्त्र का निर्माण करें । शङ्करजी के इस वचन को सुनकर विश्वकर्मा आदि देवता एक दूसरे को देखकर सोचने लगे कि हमलोग क्या करें? देवता मौन हो गए, वे इस महा-तेज को छूने का साहस नहीं कर पाए। देवताओं को मौन हुए देखकर तथा उन सबों के मन की बात को जानकर ब्रह्माजी ने कहा कि देवता इस तेज को देख भी नहीं सकते हैं पकड़ना तो दूर की बात है। अतएव इसको कौन पकड़ पायेगा।  उसके पश्चात् जोर से हंसकर उस दिव्य तेज के ऊपर उछल कर चढ़ गए तथा अपने बायें पैर की एड़ी से दबाकर भगवान शंकर भ्रमरी समूह के समान नाचने लगे ।  इंद्र आदि देवता, उस अद्भुत नृत्य को देखकर, समतापूर्वक वाद्य बजाने लगे! यह सृजन का नृत्य था, सृष्टि के सबसे भयानक अस्त्र का जन्म!

 

शङ्करजी द्वारा नृत्य में मसले जाने के कारण, उसी प्रचंड तेज से’चक्र’ उत्पन्न हो गया!  उस चक्र में तीन लाख और एक करोड़ अस्थियाँ थीं । शङ्करजी के चरणों की रगड़ से उस तेज से चक्र निकला।  विश्वकर्मा उससे अस्त्र तथा विमानों का निर्माण किए।  उस सुदर्शन चक्र को देखकर देवता डर गये और शङ्करजी से कहे कि आप इससे हमलोगों की रक्षा करें। विश्वकर्मा ने जो उसका कोश (आवरण) बनाया था, वह क्षण भर में भस्म हो गया! उस निर्मित चक्र के तेज से भूमि भी जल गई। यह चक्र ‘सुदर्शन’ नाम से विख्यात हुआ। शङ्करजी ने इस चक्र को ब्रह्माजी के हाथ में दिया। फिर मुस्कुराकर, उन्होंने उस चक्र को वापस ले लिया, और उसे अपनी कक्षा में ( बगल में) उसी प्रकार रख लिया, जैसे कोई निर्धन व्याक्ति खजाने को छिपा लेता है।

 

जिस तरह, महामूर्ख को दिए गए दान का फल नहीं दिखता है। यह चक्र अब सही समय की प्रतीक्षा कर रहा था—उस महायुद्ध की, जो जल्द ही जालंधर के साथ होने वाला था।॥

 

इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के छठे उत्तर खण्ड के युधिष्ठिर नारद संवाद के अन्तर्गत सर्वदेव तेजोमय चक्र के निर्माण नामक दशवां आध्याय संपूर्ण हुआ।

मित्रों, इस कथा के लिए अपनी राय विचार जरूर बताएं।

अगली कथा में हम फिर मिलेंगे।

जय श्रीहरि