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पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड
अध्याय 16: श्रीहरि लीला का अंत और वृंदा का त्याग
जय श्री हरी
भगवान विष्णुजी ने एक नई लीला आरम्भ की—वृन्दा (जालन्धर की पत्नी) के पतिव्रत-धर्म को तोड़ने के लिए उन्होंने वन का एक अद्भुत आश्रम रचा, अनेक मायावी जीव उत्पन्न किए, और अपनी माया से वृन्दा को आकर्षित किया। वृन्दा भयावह स्वप्न से विचलित होकर अपनी सखी स्मरदूती के साथ रथ पर बैठ महलों से दूर, रहस्यमय वन की ओर खिंचती चली गयी। रास्ते पहचान में नहीं आ रहे थे, दिशाएँ खो चुकी थीं, और माया का प्रभाव इतना गहरा था कि लौटना असंभव हो गया।
अंततः वे एक ऐसे स्थान पर पहुँच गईं— जहाँ एक ओर सिद्ध पुरुषों का पवित्र आश्रम था और दूसरी ओर भयानक, काले, अंधकार से भरे जंगल फैले थे।
तपस्वी का आगमन
जंगल में भटकते-भटकते वृन्दा और उसकी सखी स्मरदूती बहुत भयभीत हो चुकी थीं। तभी वहां एक भयंकर राक्षस उनके सामने आ गया। वह राक्षस वृन्दा के पास गया और उसका हाथ पकड़ लिया। वह बोला – “यदि तुम अपने प्राण बचाना चाहती हो तो मेरी बात सुनो… मैंने सुना है कि भगवान शंकर ने तुम्हारे पति जालन्धर का वध कर दिया है।
अब तुम मुझे अपना पति बना लो। फिर तुम बिना भय के लंबे समय तक जीओगी, मांस और मदिरा का आनंद लो।” यह सुनते ही वृन्दा जैसे प्राणहीन हो गयी। वह स्तब्ध, निढाल, और मृत सदृश हो गयी।
तपस्वी द्वारा वृंदा की सुरक्षा देना
उसी समय जटा और वल्कल धारण किए दो तपस्वी—वास्तव में भगवान विष्णु और उनका अनुचर—हाथ में फल लेकर वहाँ पहुँचे। स्मरदूती ने उन्हें देखा तो तुरंत रोने लगी। दोनों ने उसे शांत करते हुए कहा—“हे सुंदरी, डरो मत। हम तुम्हारी रक्षा के लिए ही यहाँ आए हैं। दुष्ट राक्षसों से भरे इस भयंकर जंगल में तुम कैसे आ गई?”
इस प्रकार सांत्वना देने के बाद भगवान विष्णु ने वहाँ खड़े राक्षस से कठोर स्वर में कहा— “ओ दुष्ट! इस कोमल अंगों वाली, मधुर मुस्कान वाली स्त्री को तुरंत छोड़ दे। अरे मूर्ख! तू इसे खाना चाहता है? यह पुण्य की शक्ति का स्वरूप है, पृथ्वी का अलंकार है। यदि तू इसे मार देगा तो संसार का प्रकाश ही समाप्त हो जाएगा।”
फिर भगवान ने आदेश दिया— “इसे तुरंत छोड़ दो!” श्रीहरि की गर्जना सुनकर राक्षस क्रोधित होकर बोला— “अगर शक्ति है तो इसे मेरे हाथों से छुड़ाकर दिखाओ!” राक्षस के यह कहते ही भगवान माधव ने उसे क्रोध भरी दृष्टि से देखा। उनकी उस एक दृष्टि से ही राक्षस कांप उठा, वृन्दा से दूर हटते हुए गिर पड़ा और वहीं भस्म हो गया।
वृंदा पर छाया माया सम्मोहन
वृन्दा माया में मोहित थी। उसने भगवान को देख कर कहा— “हे करुणामय! आप कौन हैं? आपने मेरी रक्षा की—आपके आने से मेरे शरीर और मन का सारा दुख मिट गया। मैं आपके आश्रम में रहकर तपस्या करना चाहती हूँ।”
तपस्वी (विष्णु का रूप) ने कहा—“मैं भरद्वाज का पुत्र देवशर्मा हूँ। मैं भोगों का त्याग करके इस भयंकर वन में तप करने आया हूँ। मेरे कई और शिष्य भी हैं, जो अलग-अलग रूप धारण कर सकते हैं। यदि तुम मेरे आश्रम में तपस्या करना चाहती हो, तो मेरे इस शिष्य के साथ चलो। क्योंकि मेरा आश्रम यहाँ से काफी दूर है।”
श्रीहरि वृन्दा से बात करके पूर्व दिशा की ओर चले गए। वृन्दा की आँखों में आँसू भर आए, लेकिन वह तपस्वी के उस शिष्य के पीछे-पीछे चलती रही। स्मरदूती भी उसे आश्वस्त करते हुए कह रही थी— “सखी, चलो… हम भी साथ चलते हैं।”
रहस्यमयी दिव्य गुफा
उस वन का दृश्य भयावह था—चारों ओर भूत-प्रेत और पिशाचों का निवास। कुछ दूर आगे बढे ही थे कि उनके रस्ते के बीच एक दुष्ट व्यक्ति ने जीव जंतुओं को पकड़ने के लिए जंगल में जाल बिछाया हुआ था। जब जाल जीव-जंतुओं से पूरी तरह भर गया, तो उस पापी ने उसे समेट लिया और फिर जाल को वहीं छोड़कर चला गया। तभी एक भयंकर-सा व्याघ्र (जंगली दैत्य) उनकी ओर बढ़ा। स्मरदूती डरकर चिल्लाई— “देवि! यह मुझे खाने आ रहा है! सखी, मेरा हाथ पकड़ लो!”
उसकी आवाज़ सुनकर वृन्दा ने उस विकृत चेहरे वाले दैत्य को देखा। उसे देखते ही वृन्दा डर से काँप गई। दोनों घबराकर वहाँ से भागीं और एक गुफा में घुस गईं। दौड़ते-दौड़ते वे उस तपस्वी के आश्रम में पहुँचीं— और वहाँ का दृश्य देखकर आश्चर्यचकित रह गईं।
आश्रम किसी दिव्य लोक जैसा था—चारों ओर मीठे स्वर वाले स्वर्णिम पक्षी, सोने की तरह चमकती भूमि, स्वर्ण-कमलों से भरी बावली, चीनी, मिठाइयों और स्वादिष्ट भोजन के ढेर, अनेक आभूषणों का भंडार और आकाश से गिरते दिव्य अस्त्र-शस्त्र। आश्रम में बंदर आनंद से उछल-कूद कर रहे थे— मानो सभी प्रसन्न हों। वृन्दा ने देखा कि तपस्वी (वास्तव में श्रीहरि का रूप) व्याघ्र-चर्म पर बैठे हुए हैं, और उनकी दिव्यता तीनों लोकों को प्रकाशित कर रही है।
चित्रशाला में वृंदा का प्रवेश
वृन्दा ने भयभीत होकर विनती की— “हे प्रभो! मुझे मेरे पापों से बचाइए। तप, जप, धर्म, मौन—इनसे क्या लाभ? सबसे महत्त्वपूर्ण तो भयभीत की रक्षा करना है!” वह काँपते हुए, थके-हारे अंगों के साथ, दया की याचना करते हुए तपस्वी से कहने लगी।
उसी समय वह दुष्ट व्यक्ति, जो सभी जीवों को जाल में बाँध रहा था, वहाँ आ गया। उसे देखकर भयभीत वृन्दा देवी दौड़कर श्रीहरि के कंठ से लिपट गईं। श्रीहरि की भुजाएँ अत्यंत सुखद थीं- अशोक की नाज़ुक लता की तरह उन्होंने वृन्दा को प्रेम से अपने आलिंगन में ले लिया।
भगवान ने कहा— “हे देवी! जैसा आलिंगन तुम अभी अनुभव कर रही हो, इसी प्रकार तुम्हें अपने गुणवान पति के सिर का भी प्रेमपूर्वक आलिंगन प्राप्त होगा। अब तुम अपने पति के लिए चित्रशाला में जाओ।” वृन्दा, उस मुनिरूप श्रीहरि के साथ चित्रशाला में प्रवेश कर गई। वहाँ उसने अपने पति का सिर उठाया और दिव्य शय्या (पर्यक) पर बैठ गई।
वह अत्यंत प्रेमवश, आँखें बंद करके अपने पति के अधरों का स्पर्श करने लगी। इसी दौरान वहाँ अचानक उसका पति-जैसा शरीर प्रकट हो गया— जालंधर जैसा ही आकार, जालंधर जैसा ही वक्ष, उसी जैसी लम्बाई, उसी जैसी वाणी, उसी जैसे मनोभाव—मानो स्वयं जालंधर वहाँ उपस्थित हो।
जालंधर और वृंदा का अद्भुत मिलन
अपने पति के समान शरीर देखकर वृन्दा प्रसन्न होकर बोली— “हे स्वामी! मैं आपकी प्रिय सेविका हूँ। कृपया बताइए, युद्ध में क्या हुआ था?” वृन्दा की बात सुनकर माया-जालंधर बोला— “हे प्रिये! सुनो…भयंकर रुद्र (भगवान शिव) ने अपने चक्र से मेरा सिर काट दिया। लेकिन तुम्हारी सिद्धि-शक्ति के प्रभाव से वह मेरा कटा हुआ सिर इस युद्धभूमि से यहाँ ले आया। तुम्हारे शरीर-स्पर्श से वह फिर से जीवित हो गया।
हे प्रिये! तुम्हारे वियोग से तुम दुखी हो गई थीं और मैं भी तुम्हें छोड़कर युद्ध में चला गया। उस भूल को मुझे क्षमा कर दो।” उसने ऐसे मधुर वचनों से वृन्दा को शांत किया और उसे अपने पास होने का विश्वास दिलाया।
इसके बाद ताम्बूल, मनोरंजन और सुन्दर आभूषणों से सजकर श्वेतवर्णा वृन्दा देवी सभी भोग-सुखों से परिपूर्ण हो गईं। रति भाव से भरी हुई उन्होंने अपने पति को कसकर आलिंगन किया और प्रेम से उनका चुम्बन लिया। मोहवश जो आनंद उन्हें मिला—वह मोक्ष से भी बढ़कर था।
श्रीहरि भी वृंदा के प्यार में खो गए
भगवान नारायण ने भी उस क्षण लक्ष्मीजी के प्रेम से मिलने वाले आनंद से अधिक सुख का अनुभव किया। वृन्दा, जालन्धर-वियोग के कारण जो दुख में थी—अब वह दुख भी श्रीमाधव की निकटता में मिट गया। श्रीहरि भी वृन्दा की सुंदरता और उसके रूप से इतने मोहित हो गये कि क्षणभर के लिए वे लक्ष्मीजी के प्रति निस्संग-से हो गए।
कहा जाता है कि कुछ ही समय बाद वृन्दा ने उस वन में ही तुलसी का रूप धारण कर लिया। उसके शरीर से निकले स्वेद-बिन्दु भूमिरूप देवी पर गिरे और वहीं से पवित्र तुलसी उत्पन्न हुई।
श्रीहरि की दिव्य लीला का खुलासा
वृन्दा के संग रहने से श्रीहरि को इतना दिव्य सुख मिला कि कुछ समय बाद उन्हें लगा, “अब शिवजी का कार्य पूरा हो गया।” एक दिन, क्रीड़ा के अंत में वृन्दा ने अचानक देखा कि उसके गले में किसी दो-भुजाओं वाले पुरुषोत्तम की भुजाएँ पड़ी हैं। वह चौंक गई। उसने तुरंत उनकी बाहें हटाई और कहा— “तुम तपस्वी का रूप बनाकर मुझे क्यों धोखा देने आए हो?”
उसकी बात सुनकर श्रीहरि ने उसे शांत किया और बोले— *“हे वृन्दा, मेरी बात सुनो— मैं ही लक्ष्मीपति नारायण हूँ। तुम्हारा पति जालंधर शिवजी को हराने और पार्वती को लाने गया था। मैं ही नारायण हूँ और शिव भी मैं ही हूँ— हम दोनों अलग-अलग शरीरों में एक ही स्वरूप हैं। जालंधर युद्ध में मारा गया है। अब तुम मेरी पत्नी बन जाओ।”
वृंदा का शॉप
भगवान विष्णु की बात सुनकर वृन्दा बहुत दुखी हो गई। फिर क्रोधित होकर उसने कहा— “जिसने युद्ध में तुम्हें बाँध दिया, जिसने अपने पिता की आज्ञा से तुम्हारा जीवन बचाया… जिसने तुम्हें अनगिनत रत्नों से सम्मानित किया— क्या उसकी पत्नी को छल से छीन लेना उचित है? तुम तो धर्म के रक्षक कहलाते हो, फिर किसी की पत्नी पर आसक्त कैसे हो गए?
मनीषियों ने कहा है कि ईश्वर तक को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। जैसे तुमने माया रूप बनकर मुझे छल से मोहित किया, वैसे ही एक दिन तुम्हारी पत्नी को भी कोई मायावी साधु छल से ले जाएगा!” ऐसा कहकर उसने भगवान विष्णु को शाप दे दिया।
यादें और पश्चाताप
शाप मिलते ही भगवान विष्णु क्षणभर में अदृश्य हो गए। उनके जाते ही वह चित्रशाला, वह सुंदर पलंग, वे खेलते हुए वानर— सब कुछ पलभर में नष्ट हो गया। वन को एकदम खाली देखकर वृन्दा ने अपनी सखी से कहा— “देखो! विष्णु ने कैसा बड़ा कपट किया है। मैंने नगर छोड़ दिया, राज्य भी गंवा दिया, पति भी मर गया, अब अकेली इस वन में हूँ… मेरे भाग्य में जो कुछ लिखा था, वह सब घट चुका है। अब मैं कहाँ जाऊँ?”
पति को याद करके वह गर्म-गर्म श्वास लेने लगी और बोली— “अब उसका दर्शन केवल स्मरण में ही रह गया है।” वह अति दुखी हो गई और बोली— “स्मरदूति! अब मेरी मृत्यु ही शेष है…”
गन्धर्व लोक की अप्सराओं का आगमन
स्मरदूति ने तुरंत कहा— “तुम मेरी प्राण हो, ऐसा न कहो!” सखी की बात सुनकर वृन्दा ने अपने कर्तव्य का निश्चय कर लिया। वह एक विशाल सरोवर के पास गई— वहाँ उसने दुख छोड़ दिया, अपने शरीर को जल से धोया, मन को पूरी तरह शांत किया और पद्मासन लगाकर बैठ गई। वह बोली— “विष्णु के स्पर्श से दूषित इस शरीर को अब मैं कठोर तप से शुद्ध करूँगी।”
वृन्दा और उसकी सखी निराहार होकर गहरी तपस्या करने लगीं। कुछ समय बाद गन्धर्व लोक की अप्सराएँ वहाँ आयीं। वे वृन्दा से बोलीं— “अपने शरीर का त्याग कर दो, और स्वर्ग लोक चलो। तुम्हारे लिए वहीं स्थान है।”
गन्धर्वों ने वृन्दा से कहा— “यह ज्ञान, यह गान्धर्व शास्त्र— त्रैलोक्य को जीतने वाला है। भगवान विष्णु को सबसे अधिक प्रसन्न करने वाला है। हे वृन्दा! जिसने तुम्हें यहाँ तक पहुँचाया है, उस ईश्वरीय कृपा से मिले इस शरीर का त्याग क्यों करना चाहती हो? जान लो—शंकरजी ने तुम्हारे पति को युद्ध में मार दिया है। अब तुम्हें पुण्य से मिली हुई दिव्य अवस्था को स्वीकार कर देववन में जाना चाहिए।”
गन्धर्वों की बात सुनकर वृन्दा ज़ोर से हँस पड़ी और बोली— “मेरे वीर पति ने तो स्वर्ग से इन्द्र की पत्नी तक को जीतकर उन्हें छोड़ दिया था! ऐसे देवताओं को हराने वाले महाबली पति की पत्नी होकर मैं उनसे वियुक्त कैसे हो सकती हूँ? मैं पापरहित हूँ। मैं फिर से अपने पति को पाने का प्रयास करूँगी—उन्हीं के पास जाना चाहती हूँ।”
इतना कहकर वृन्दा और सखी स्मरदूति ने आयी हुई अप्सराओं को विदा कर दिया। लेकिन वृन्दा के प्रेम से बंधी हुई वे अप्सराएँ प्रतिदिन उससे मिलने आती-जाती रहीं।
वृंदा का शरीर त्याग
कुछ समय बाद वृन्दा ने योग साधना की, ज्ञान की अग्नि में अपने सारे गुण-दोष भस्म कर दिए, और मन को सभी विषयों से हटाकर परम पद—मोक्ष—को प्राप्त कर लिया। वृन्दा को आकाश में जाते देख अप्सरा-समूह ने उसकी स्तुति की, और आकाश से फूलों की वर्षा की। फिर स्मरदूति ने सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी कीं, वृन्दा के शरीर को उन पर रखकर चिता में अग्नि प्रज्वलित की। जब शरीर पूर्ण रूप से अग्नि को समर्पित हो गया, तो उसकी भस्म को गोले के रूप में इकट्ठा कर सबको साथ लेकर गंगा जी में विसर्जित कर दिया।
जिस स्थान पर वृन्दा ने शरीर त्यागकर ब्रह्मलोक का मार्ग अपनाया— उसी स्थान पर गोवर्धन पर्वत के पास वृन्दावन बना। इसके बाद देवियाँ देवलोक पहुँचीं, और उन्होंने इन्द्राणी को वृन्दा की तपस्या और मोक्ष का विवरण सुनाया। यह सुनकर देवताओं ने अपने शत्रु का भय छोड़ दिया और विजय का नगाड़ा बजाया। इन्द्र भी अपने आसन पर सभी देवों से घिरे बैठे हुए इस शुभ समाचार को सुनकर प्रसन्नता और प्रकाश से भर उठे।
लेकिन कथा यहीं ख़त्म नहीं हुई। श्रीहरि की इस अद्भुत लीला ने देवी पार्वती और भगवान शंकर को जालंधर की महा माया जाल से कैसे मुक्ति मिली? पढ़िए अगले लेख में।
इस तरह श्रीपद्म महापुराण के छठे उत्तर खण्ड के जालन्धरोपाख्यान के अन्तर्गत वृन्दा की परमपद की प्राप्ति वर्णन नामक सोलहवें अध्याय का हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।१६।।
Source: पद्मपुराण
ॐ नमः शिवाय 🙏 जय श्रीहरि 🙏
