Current image: श्रीशैल (श्री सैलम) पर्वत और मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का दिव्य दृश्य, जहाँ भगवान शिव ध्यानमग्न मुद्रा में विराजमान हैं, चारों ओर हरियाली, पर्वत, नदी और पवित्र मंदिर दिखाई दे रहे हैं।

पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड

अध्याय 20: श्रीशैल का माहात्म्य वर्णन


जय श्री हरी | ॐ नमः शिवाय

श्रीशैल पर्वत का माहात्म्य (पद्म पुराण)

श्रीशैल या श्री सैलम पर्वत का वर्णन पदम् महापुराण के उत्तरखंड में 18 श्लोको में महात्म्य बताया गया है जिसका साधारण शब्दों में यहां जानिए। कहा गया है कि श्रीशैलजी का माहात्म्य सुनने या पढ़ने या सुनंने से सभी तीर्थों का फल मिल जाता है।

युधिष्ठिर और नारद संवाद

युधिष्ठिर ने नारदजी से पूछा—“हे नारदजी! यह बताइये कि मनोहर श्रीशैल पर्वत कहाँ स्थित है? वहाँ कौन-सा पवित्र तीर्थ है? किस देवता की पूजा होती है और वह किस दिशा में पड़ता है?”

नारदजी बोले—“हे राजन्! आप ध्यान से सुनें—श्रीशैल का माहात्म्य सुनने मात्र से मनुष्य बाल-हत्या जैसे भयानक पापों से भी मुक्त हो जाता है। यह पर्वत अत्यन्त सुंदर है। यहाँ महान् मुनि और ऋषि निवास करते हैं।

श्रीशैल पर्वत का प्राकृतिक सौंदर्य

पर्वत पर अनगिनत वृक्ष, लताएँ और रंग-बिरंगे पुष्प सदा खिले रहते हैं, जो श्रीशैल को स्वर्ग के उपवन जैसा दिव्य और मनोहर रूप प्रदान करते हैं। चारों ओर फैली हरियाली, सुगंधित वायु और शांत वातावरण मन को स्वतः ही तपस्या और ध्यान की ओर प्रवृत्त कर देता है। यहाँ की भूमि पर चलते हुए ऐसा अनुभव होता है मानो प्रत्येक कण में कोई दिव्य चेतना विद्यमान हो।

इस पावन पर्वत पर हंसों की मधुर कूजन, कोयलों का मीठा कलरव, भौरों की गुंजार और मयूरों की मनोहर केकारवाणी निरंतर गूंजती रहती है। ये प्राकृतिक स्वर मिलकर एक ऐसा अलौकिक संगीत रचते हैं, जो साधकों के चित्त को एकाग्र करता है और मन को गहरी शांति प्रदान करता है।

श्रीशैल का वन श्रीवृक्ष, कैथा, शिरीष, पारिजात, कदम्ब, गूलर तथा अनेक दुर्लभ और सुगंधित पुष्पों से सदा सुवासित रहता है। इन वृक्षों की छाया में तपस्वी और योगी अपनी साधना में लीन रहते हैं। पर्वत की पावन भूमि पर अनेक ऋषि-पत्नियाँ भी अपने शिष्यों सहित निवास करती हैं, जो आश्रमों में निवास कर धर्म और सदाचार का पालन करती हैं।

यहाँ कोई ऋषि वेदों का गहन अध्ययन करता है, तो कोई उनके गूढ़ अर्थों का विस्तारपूर्वक निरूपण करता है। कहीं शास्त्रार्थ चल रहा होता है, तो कहीं शिष्यों को ब्रह्मज्ञान की शिक्षा दी जाती है। इस प्रकार श्रीशैल पर्वत केवल प्राकृतिक सौंदर्य का ही नहीं, बल्कि ज्ञान, साधना और आध्यात्मिक उन्नति का भी एक अद्वितीय केंद्र है।

ऋषियों की तपस्या और आश्रम

श्रीशैल पर्वत की पावन भूमि पर निवास करने वाले ऋषि अत्यन्त कठोर और नियमबद्ध तपस्या में निरत रहते हैं। यहाँ कोई ऋषि पैरों की आगे की अंगुलियों पर खड़े होकर घंटों तक भगवान शिव का ध्यान करता है, तो कोई अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाए हुए निरंतर भगवान विष्णु का स्मरण करता रहता है। उनकी यह तपस्या केवल शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और ईश्वर-प्राप्ति के उद्देश्य से की जाती है।

कुछ महर्षि पूर्ण उपवास का व्रत धारण करते हैं और कई-कई दिनों तक अन्न ग्रहण नहीं करते। कुछ तपस्वी केवल वृक्षों से गिरे पत्तों को ही अपना आहार बनाते हैं, तो कुछ कंद, मूल और फल पर ही जीवन यापन करते हैं। अनेक ऋषि मौन व्रत का पालन करते हुए इन्द्रियों को संयम में रखते हैं और अंतर्मुखी होकर ब्रह्मचिन्तन में लीन रहते हैं।

यहाँ कोई एक पैर पर खड़े होकर वर्षों तक कठिन तप करता है, तो कोई पद्मासन में स्थिर होकर दीर्घकालीन साधना करता है। कई महात्मा निराहार रहकर केवल प्राणायाम और ध्यान के बल पर जीवन धारण करते हैं। इन तपस्वियों का जीवन त्याग, संयम और साधना का साक्षात् उदाहरण है।

इस पवित्र क्षेत्र में अनेक दिव्य आश्रम स्थित हैं, जहाँ से वेदों के स्वरों का नाद वातावरण को पवित्र करता रहता है। आश्रमों के समीप पवित्र नदियाँ शांत भाव से बहती हैं, जिनके तट पर ऋषि स्नान और जप करते हैं। यहाँ दिव्य देवकुण्ड और मनोहर सरोवर भी हैं, जिनका जल अत्यन्त शीतल और पवित्र माना जाता है।

वास्तव में श्रीशैल पर्वत का यह क्षेत्र शांति, तपस्या और दिव्यता का एक अनुपम केंद्र है, जहाँ प्रत्येक क्षण साधक को आत्मिक उन्नति और परम शांति का अनुभव होता है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का महत्त्व

हे राजन्! यह परम पवित्र श्रीशैल पर्वत इतना महान और तेजस्वी है कि यह दूर-दूर के स्थानों से भी श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। इसकी दिव्यता और पवित्रता स्वयं ही इसका परिचय देती है। इसी श्रीशैल पर्वत पर भगवान शिव का दिव्य मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग प्रतिष्ठित है, जो समस्त ज्योतिर्लिंगों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया है।

पर्वत के ऊपर स्थित यह मनोहर शिखर साक्षात् शिवस्वरूप है। कहा जाता है कि उस शिखर के केवल एक बार दर्शन कर लेने मात्र से ही मनुष्य जन्म-जन्मान्तर के बंधनों से मुक्त हो जाता है और उसे परम गति की प्राप्ति होती है। यहाँ आकर भक्त का मन स्वतः ही वैराग्य, भक्ति और आत्मशुद्धि की ओर प्रवृत्त हो जाता है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग में भगवान शिव करुणा और कल्याण के रूप में विराजमान हैं। यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि मोक्ष का द्वार माना गया है। जो श्रद्धालु निष्कपट भाव से यहाँ शिवलिंग का अभिषेक और दर्शन करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उसके जीवन में शांति एवं सद्बुद्धि का उदय होता है।

इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि श्रीशैल पर्वत के उस दिव्य शिखर के दर्शन से मनुष्य को वही पुण्यफल प्राप्त होता है, जो कठिन तपस्या और दीर्घकालीन साधना से प्राप्त होता है। इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है।

पाताल गंगा और केदार तीर्थ

यह पर्वत दक्षिण भारत में स्थित है। यहाँ एक दिव्य स्थान है जिसे पाताल गंगा कहते हैं। यह अत्यन्त सुंदर और पवित्र है। जो व्यक्ति पाताल गंगा में स्नान कर लेता है, वह महापापों से भी मुक्त हो जाता है। श्रीशैल शिखर का केवल एक बार दर्शन कर लेने से वाराणसी में मृत्यु का फल प्राप्त होता है, यानी सीधा सद्गति का मार्ग खुल जाता है।

यहाँ केदार तीर्थ भी है। केदार के जल का एक घूंट पी लेने से मनुष्य पुनर्जन्म से छूट जाता है। ऐसा कहा जाता है। यह स्थान योगियों और तपस्वियों का महान आश्रय है। इसलिए हर व्यक्ति को पूरा प्रयास करके एक बार अवश्य इस पर्वत का दर्शन करना चाहिए। यहाँ विज्ञान देव भी विराजते हैं जो मनुष्य के बड़े से बड़े पापकर्मों को नष्ट कर देते हैं। श्रीशैल पर्वत के निकट सिद्धपुर नाम का नगर है, जो स्वर्ग जैसा सुख प्रदान करने वाला माना गया है। यहाँ अप्सराएँ नित्य आती हैं और आनंदपूर्वक विचरण करती हैं।

दक्षिण का कैलाश – श्रीशैल

श्रीशैल या श्री सैलम नामक ज्योतिर्लिंग आंध्रप्रदेश के पश्चिमी भाग में कुर्नूल जिले के नल्लामल्ला जंगलों के मध्य श्री सैलम पहाड़ी पर कृष्णा नदी के किनारे विराजमान हैं | यहां शिव की आराधना मल्लिकार्जुन नाम से की जाती है| यह श्री शैल मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंगों की श्रेणी में आता है । इसे दक्षिण का कैलाश भी कहते हैं । अर्थात दक्षिण भारत में श्री शैल मल्लिकार्जुन स्वामी की मान्यता भगवान् शिव के कैलाश पर्वत के बराबर मानी गई है।

यही कारण है कि इन पर्वतों का केवल दर्शन भर जीवन में सुख और शांति ले आता है। जो मुक्ति की इच्छा रखते हैं, उन्हें अवश्य इस पर्वत का दर्शन करना चाहिए।”

ॐ नमः शिवाय

इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के छठे उत्तर खण्ड का श्रीशैल का वर्णन नामक बीसवें अध्याय का हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।२०।।
Source: पद्मपुराण

ॐ नमः शिवाय 🙏 जय श्रीहरि 🙏