पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड
अध्याय 14: मानसरोवर का ऐतिसिक युद्ध-3
जय श्री हरी
बात उस समय की है जब महादेव और जालंधर के बिच मानसरोवर के मानसोत्तर पर्वत पर भयानक युद्ध चल रहा था। जिसे मानसरोवर का ऐतिसिक युद्ध कहा जाता है। मानसोत्तर के ऊँचे शिखर पर महादेव देवी पार्वती की सुरक्षा के लिए स्वयं मौजूद थे। जालंधर के असुर सेनाओं से युद्ध में शिवगण , गणेशजी और कार्तिकेय वीरता से लड़ रहे थे।
युद्ध का शोर-गुल सुनकर जालंधर प्रसन्न हुआ। उसे अपनी सेना की चीखें भी कोयलों के गीत से भी ज्यादा मीठी लगीं, क्योंकि उसे अपनी शक्ति पर घमंड बढ़ रहा था।
मानसरोवर का ऐतिसिक युद्ध- गणेशजी की करुण पुकार
मानसरोवर के इस ऐतिसिक युद्ध में राहु ने कार्तिकेय को घायल कर दिया वे किसी तरह बचकर पर्वत के दूसरी ओर चले गए। जंभ नामक दैत्य ने तेज बाणों से विनायक के शरीर के हिस्से काट दिए। फिर उसने फरसे से गणेशजी की सूँढ काट दी। जंभ दैत्य ने शक्ति से गणेशजी के पेट पर प्रहार किया। गणेशजी घायल होकर एक अंधेरी गुफा में चले गए।
“वह बहुत दर्द से चिल्ला रहे थे- “हाय माँ! हाय पिता! हाय भाई! हाय मेरे प्रिय मूषक!” गणेशजी की दर्द भरी आवाज़ सुनकर माँ पार्वती घबराकर तुरंत शिवजी के पास पहुँचीं। वे बोलीं— “स्वामी! दैत्य गणेश को मार रहे हैं। स्कन्द (कार्तिकेय) भी घायल होकर गिर पड़े हैं। आप यहाँ पर्वत पर खेल क्यों रहे हैं? कृपया अपने दोनों पुत्रों और गणों की रक्षा कीजिए!”
भगवान महादेव का युद्ध में प्रवेश
मानसरोवर के इस ऐतिसिक युद्ध में स्थिति विकट हो गई। भगवान शिव माता पार्वती को अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे क्योंकि जालंधर का लक्ष्य देवी पार्वती थी। दूसरी ओर उनके दोनों पुत्र युद्ध में घायल हो चुके थे। ईसके बाद शिवजी जब युद्ध में जाने लगे तोउन्होंने देवी पार्वती से कहा-“हे प्रिये! मैं युद्ध के लिए जा रहा हूँ। दानव बहुत दुष्ट हैं। तुम यहाँ अपने तेज से स्वयं अपनी रक्षा करना।”
ऐसा कहकर शिवजी तीस हज़ार महापद्म-गणों के साथ रणभूमि की ओर निकल पड़े।
भगवान शिव को जालंधर की सेना ने घेर लिया
महादेव को देखकर दैत्य जोर-जोर से गर्जना करने लगे। इसके बाद दोनों ओर से ऐसा युद्ध छिड़ा कि दिशाएँ काँप गईं। जो गण पहली बार डरकर भाग गए थे – नंदी, महाकाल, कालस्कन्द, माल्यवान, पुष्पदन्त, चण्डीश, स्वर्णदंतिक, कूष्माण्ड, गुप्तलोमक — वे सब फिर साहस लेकर युद्ध में उतर आए। इधर महाबली दैत्य चारों ओर से शिवजी को घेरने लगे, जैसे पाँच इंद्रियाँ मनुष्य को घेर लेती हैं। वे शूल, गदा, मुद्गर और भाले लेकर महादेव पर टूट पड़े। लेकिन शिवजी ने तीक्ष्ण बाणों से उन सभी दैत्यों का नाश कर दिया।
युद्ध में दैत्यों का भयानक शोर सुनकर जालन्धर तुरंत अपने रथ पर बैठकर शिवजी की ओर बढ़ा। उसने अपने सारथी खड्गरोमा से गुस्से में कहा- “मेरे लिए तुरंत ऐसा रथ लाओ, जिसमें हजार घोड़े जुते हों! मैं उस वृषभ पर बैठे लँगड़े, जटाओं वाले और अस्थियों के आभूषण पहनने वाले शिव को अपने पराक्रम से यहीं मार दूँगा। उसमें मेरी बराबरी की क्या शक्ति है?”
ऐसी गर्वभरी बातें कहकर जालन्धर स्वयं अपने विशाल रथ पर चढ़ गया और धनुष लेकर तेज़ी से युद्ध की ओर निकल पड़ा।
वीरभद्र और मणिभद्र की शिवभक्ति
महादेव से दो शक्तिशाली शिवगणों से पार पाने के बाद ही जालंधर शिवजी तक पहुँच सकता था। भगवान महादेव के दाएं और वायें में उनकी सुरक्षा के लिए वीरभद्र और मणिभद्र तैनात थे। जैसे ही जालंधर आगे बढ़ा, वीरभद्र ने तीखे बाणों से उसका रास्ता रोक लिया। वीरभद्र खुद बाणों से घायल हो गए, पर वे फिर भी शिवजी का साथ नहीं छोड़ते — जैसे चंद्रमा कभी आसमान नहीं छोड़ता। इसके बाद मणिभद्र ने भी जालन्धर पर तीर बरसाए। लेकिन जालन्धर ने पाश चलाकर मणिभद्र को घायल कर दिया और शिवजी से बोला- “हे महादेव! अगर आपके पास युद्ध का अनुभव है, तो सामने आइए!
पहले आप वार करिए — मैं जटाधारी पर पहला वार नहीं करूँगा।” जालन्धर के इस अहंकार भरे वचन सुनकर मणिभद्र ने उसे फिर बाणों से ढक दिया; जैसे सूर्य अपनी किरणों से कमल को आच्छादित कर देता है। इसके बाद मणिभद्र ने दैत्यों की सेना पर गदा चलाई। उसने रथों पर सवार योद्धाओं को नीचे गिरा दिया, घोड़ों पर बैठे सैनिकों को भी मार डाला, हाथियों पर बैठे दैत्य भी एक-एक कर धरती पर गिर पड़े। कुछ ही पलों में पृथ्वी खून से लाल हो गई और रास्ता भी कठिन हो गया।
उधर मुख्य गण भी पर्वत से उतरकर दैत्यों को मार रहे थे। जितने दैत्य आगे बढ़ते, उतने ही काटे हुए हाथ, पैर, सिर और टूटे हुए हाथियों के शरीर धरती पर गिरते जाते — पूरी युद्धभूमि मरे हुए दैत्यों से भर गई।
भगवान शिव के तेज से जालंधर का मन युद्ध से भटकना
मानसरोवर के इस ऐतिसिक युद्ध में इस भीषण दृश्य को देखकर जालन्धर को आभास हुआ कि शिवजी का तेज दुनिया को बदल रहा है। देवताओं, नक्षत्रों और चंद्रमा का प्रकाश भी अजीब-सा हो गया था। सूर्य की चमक मानो किसी दूसरे ही लोक को प्रकाशित कर रही थी।
जालन्धर ने सोचा— “अब तक तो मैंने उस गौरी (पार्वती) को देखा ही नहीं, जिसके बारे में नारद ने मुझे बताया था। पहले मैं उसे देखूँगा, फिर शिव से युद्ध करूँगा।” उसने आगे विचार किया— “मेरे समान वीर तो शुंभ है — वही मेरे रूप में युद्ध कर सकता है।” जालन्धर ने शुंभ को बुलाकर कहा— “तुम मेरा रूप धारण करके युद्ध करो। अब इस लड़ाई की ज़िम्मेदारी तुम पर है — शिविर भी तुम्हारे हाथ में है और पूरा बल भी।” यह कहकर जालन्धर ने अपने आभूषण और अलंकार उतारकर शुंभ को दे दिए और खुद पार्वती को देखने के लिए निकल पड़ा।
जालंधर और दुर्वारण देवी पार्वती को देखने निकला
युद्धभूमि छोड़कर जालन्धर अपने रथ, सारथि, कवच–कुण्डल और सभी हथियार वहीं छोड़ आया। वह अपने साथी दुर्वारण के साथ चोरी-छिपे मानसरोवर पर्वत की एक गुप्त गुफा में पहुँचा। वहाँ जाकर उसने शिवजी का रूप धारण कर लिया। दुर्वारण ने नन्दी का रूप ले लिया।
दोनों—नकली शिव और नकली नन्दी बनकर पर्वत पर चढ़कर उसी दिशा में चल दिए। जहाँ पार्वतीजी अपनी सखियों के साथ विराजमान थीं। वहाँ जैसे ही पार्वतीजी ने “नन्दी” का कंधा पकड़कर चलते हुए, और “शिवजी” के खून से सने, बाणों से छिदे वस्त्रों को देखा, वे हैरान रह गईं। जया और दूसरी सखियाँ घबराकर दौड़ीं और “शिवजी” से पूछने लगीं—“हे महादेव! क्या हुआ? आपको किसने पराजित कर दिया? आप इतने दुखी क्यों हैं?”
माता पार्वती का विलाप
जालन्धर, जो शिव का रूप बनाकर आया था, उन सबको अलग-अलग आभूषण दिखाकर और दे कर उन्हें और भी भरोसा दिलाने लगा। फिर धीरे-धीरे उसने अपने शरीर से वासुकि और अन्य आभूषण उतारे और अपनी कमर के पास छिपाकर रखे गणेश और स्कन्द के कटे हुए सिर दिखा दिए। यह देखते ही पार्वतीजी चिल्लाईं— “हाय स्कन्द! हाय गणेश! हाय रुद्र!” और रोने लगीं। उनकी सखियाँ भी दुख से व्याकुल होकर रो उठीं। इसी बीच “नकली नन्दी” बोला- “देवि! अब आप ही इनकी रक्षा करें! वीरभद्र, मणिभद्र, पुष्पदन्त, दम्भ, धूम, तम, कूष्माण्ड… सब युद्ध में मारे गए। चण्डी, मृंगी, किरीटी, महाकाल, शृंखली, चण्डीश… कोई नहीं बचा! मैंने खुद स्कन्द और गणेश के सिर कटते हुए देखे हैं।”
इतना कहकर उसने वे दोनों सिर पार्वतीजी के सामने फेंक दिए। सिरों को देखकर पार्वतीजी विलाप करने लगीं— “हाय मेरे पुत्र! हे तारकारे! तुम्हें जालन्धर ने कैसे मार दिया?” वह दुःख में कहने लगीं— “जब तुम केवल तीन दिन के थे, तब देवताओं ने तुम्हें सेनापति बनाया था!” “हे वीर स्कन्द! तुमने तो तारकासुर जैसे असुर को मार दिया था!”
“हे पुत्र! नीलकण्ठ ने तुम्हें कैसे अकेला छोड़ दिया?” “मैं दुर्भाग्यिनी माँ… तुम्हारी पत्नी का मुख भी नहीं देख सकी!” “हे गणेश! हे विघ्नेश! हे गजानन! किसने तुम्हें युद्ध में मारा?” “तुम्हारे प्रिय वाहन—चूहे—को किसने मार दिया?”
पार्वतीजी रोते-रोते शिव के नकली रूप की ओर देखकर बोलीं- “हे शिव! आप तो रुद्र हैं, महादेव हैं, आप डरें नहीं। जालन्धर ने वृषभ को भी मार डाला क्या? आपका शरीर बाणों से लहूलुहान है। बताइए, मैं आपकी कौन-सी सेवा करूँ?”
माता पार्वती का माया भ्रम होना
मानसरोवर के इस ऐतिसिक युद्ध में जालंधर ने जबरदस्त माया का खेल रचा था, जिसमे जगतजननी देवी पार्वती उलझ गई। देवी पार्वती ने जब उस नकली शिव (जालन्धर द्वारा लिया गया महेश्वर का रूप) की बात सुनी, तो वे आश्चर्य में पड़ गईं।
शंकर के रूप में खड़े उस व्यक्ति ने गहरी साँस लेते हुए कहा- “देवि! इस समय तुम अपने अँग-संग से मेरी रक्षा करो!” पार्वतीजी को बहुत ही आश्चर्य हुआ।
यह वाणी सुनकर उस जगदम्बा को बिल्कुल सही नहीं लगी। उन्होंने कहा- “प्रभु! आप कैसी अनुचित बातें कह रहे हैं? दुःख, भय, बीमारी, ज्वर, श्राद्ध, गुरु-सम्मुख या किसी अनिष्ट समय में कोई बुद्धिमान व्यक्ति रति की बात नहीं करता। आप तो अत्यन्त दुःखी होकर ऐसी प्रार्थना कर रहे हैं- यह आपके स्वभाव से बिलकुल विपरीत है।” पार्वती जी दुख और शोक में डूबी हुई थीं, आँखों में आँसू थे। वे सोच भी नहीं पा रही थीं कि असली शिव ऐसे समय में ऐसी बात कैसे कर सकते हैं!
तभी, माया के प्रभाव में, शिव का रूप धारण किए जालन्धर ने अपने स्वार्थ के लिए कहा- “जो स्त्री दुखी पुरुष को रति से इंकार करती है, वह रौरव नरक में जाती है। मैं इस समय सब चीज़ों से रहित हूँ। गणों से भी, बुद्धि से भी, घर-बार से भी। मैं मृत्यु-तुल्य अवस्था में हूँ, इसलिए तुम्हारे पास आया हूँ।”
देवी पार्वती को विचलित होते देख, उसने अगला चाल चला। उसने नन्दी से कहा- “नन्दी! चलो, हम तीर्थ की ओर चलते हैं। और हे गौरी! तुम जहाँ चाहो जा सकती हो, अपनी प्रकृति त्याग दो।” इन विचित्र, अप्राकृतिक और दुख भरी बातों को सुनकर पार्वतीजी स्तब्ध रह गईं। उन्हें अत्यन्त क्षोभ हुआ, वे कुछ क्षण मौन रहीं, क्योंकि, जो देवी स्वयं सृष्टि को मोहित कर देती हैं, वही उस समय जालन्धर की माया में मोहित हो गईं।
युद्ध का अगला भाग जल्द देखने को मिलेगा जब इस युद्ध में श्रीहरि का प्रवेश होता है।
Source: पद्मपुराण
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