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पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड

अध्याय 12: मानसरोवर का ऐतिसिक युद्ध-1


जय श्री हरी

मानसरोवर के ऐतिसिक युद्ध की भूमिका

बात उस समय की है जब तीनो लोक जालंधर के अधीन था और उस असुर जालंधर के संहार के लिए ब्रह्मा विष्णु शिव के साथ सभी देवताओं के तेज से सबसे संहारक अस्त्र सुदर्शन चक्र बनकर तैयार हुआ। तीनो लोक पर कब्ज़ा करके जालंधर अपनी पत्नी वृंदा के साथ सुख का जीवन बीता रहा था देवताओं को जालंधर से युद्ध का बहाना नहीं मिल रहा था क्योकि उसका धर्म पथभ्रष्ठ नहीं हुआ था।

इसलिए देवर्षि नारदजी ने जालंधर को देवी पार्वती के सौंदर्य का बखान कर आये। जालंधर एक असुर था पथभ्रष्ठ होने में तनिक भी समय नहीं लगा।  नारदजी के बातों में वह तुरंत फंस गया।  परिणाम यह हुआ कि देवी पार्वती के सामने वृंदा का सौंदर्य उसे फीका लगने लगा। उसने जल्दी ही राहु को दूत बनाकर राहु को कैलाशपति के पास भेजा।

राहु ने जालंधर का सन्देश भगवान शिव को सुनाते हुए कहा कि देवी पार्वती को जालंधर को सौंप दे क्योंकि तीनों लोक जालंधर के अधीन है। भगवान शिव उसे कोई उत्तर नहीं दिए।  शिवगणों के सामने ही राहु ने धमकाते हुए भगवान शिव से कहा की अगर जालंधर की बात नहीं माने तो इन्द्र की तरह उन्हें भी युद्ध में मार दिया जायेगा। भगवान शिव फिर भी चुप रहे और अपने गणों को भी चुप रहने का इशारा किया। झल्लाकर राहु लौट गया और जालंधर को सारी बात बताया।

तीनों लोकों के अधिपति बने जालंधर को इस प्रकार का निरादर उसके अहंकार को चोट पहुँचाने वाला था।  यह प्रसंग अहंकार और धर्म के टकराव का प्रारंभ है। जालन्धर शक्ति का प्रतीक था, पर उसमें भक्ति नहीं थी। देवता दुर्बल थे, पर धर्म से जुड़े थे। यही भेद अंततः विजय और पराजय का कारण बना। जब शक्ति अहंकार में बदल जाती है, तो वह अपने ही विनाश की भूमिका लिख देती है। और जब नम्रता, भक्ति और धर्म एकत्र होते हैं, तो असंभव भी संभव हो जाता है।

मानसरोवर के इस ऐतिसिक युद्ध में असुर सेनाओं की तैयारी

जब दूत ने देवताओं की चुनौती का समाचार जालन्धर को दिया, तो वह असुरराज क्षणभर मौन रहा…फिर उसकी आँखों में तेज चमका. मानो अग्नि प्रज्वलित हो उठी हो!”

जालन्धर ने अपने चारों ओर देखा, उसकी सभा में सहस्रों दैत्य योद्धा खड़े थे, सभी गर्व, क्रोध और उत्साह से दांत किटकिटा रहे थे। उसने कहा – “अब देवताओं का अभिमान तोड़ने का समय आ गया है।

आज त्रैलोक्य जानेगा, कौन है जालन्धर!” फिर उसने अपने मंत्री, सेनापति और दूतों को आदेश दिया कि “सम्पूर्ण सेना को बुलाओ। युद्ध का समय आ पहुँचा है!”

क्षणभर में राजमहल की भूमि हिल उठी। शंखनाद, नगाड़े और रणभेरी एक साथ गूँज उठे। मानो स्वयं पृथ्वी युद्ध की गवाही दे रही हो। चारों दिशाओं से सेना की ध्वनि उठी।

मन्दराचल की गुफाओं में सोए हुए किन्नर, अपनी पत्नियों के साथ उस गर्जन से जाग उठे। हाथियों के झुंडों ने चिंघाड़ना शुरू किया, शेरों के समूह मार्गों पर निकल पड़े। सुमेरु पर्वत की चोटियों में प्रतिध्वनियाँ गूँज उठीं।

जालन्धर की सेना का कोलाहल  त्रैलोक्य को बहरा बना रहा था! जालन्धर की राजधानी में दुन्दुभियाँ बज उठीं, जिसका ध्वनि वीरों के लिए संगीत थी। उन नगाड़ों की गूँज से पर्वत हिलने लगे, महल काँप उठे, और सातों सागरों के भीतर से दैत्य और दानव युद्ध और विनाश के लिए निकल पड़े।

असंख्य रथ, असंख्य हाथी, और करोड़ों घोड़े निकल पड़े। घोड़ों की हिनहिनाहट और रथों के पहियों की गर्जना से धरती डोलने लगी। कहते हैं – उस समय पृथ्वी इतनी भर गयी थी सैनिकों से कि कहीं चलने का स्थान ही न बचा। आकाश झंडों, पताकाओं और छत्रों से ढक गया था। असंख्य घोड़े, हाथी, और असंख्य रथी, पताकाधारी वीर जब निकले तो यह दृश्य देखकर देवता कांप उठे।

अंत में निकला असुरराज जालन्धर। उसके कन्धे पर रत्नों से जड़ी हुई चमकती हुई शक्ति (शूल) थी। वह सोने के सिंहासन से उतरा, रथ पर चढ़ा, और बोला -“आज देवताओं की सत्ता मिट जाएगी!” उसके मुख पर गर्व था, पर वह गर्व ही उसका सर्वनाश बनना था।

जालंधर एक कुशल महायोद्धा ही नहीं था वह कुशल रणनीतिकार भी था। उसने देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु को बहन बहनोई बना रखा था क्योकि देवी लक्ष्मी सागर से उत्पन्न हुई थी और जालंधर भी सागर पुत्र था।

जालंधर का भगवान विष्णु से संधि

जब जालंधर मानसरोवर के इस ऐतिसिक युद्ध के लिए तैयार हुआ, तो वह सबसे पहले क्षीरसागर में रहने वाले भगवान विष्णु के पास गया। उसने उनके चरणों में प्रणाम किया और विनम्रता से बोला- “हे जीजाजी! बताइए, मैं आपको किस वस्तु का भोग अर्पण करूँ?”

भगवान विष्णु उसकी मंसा को भांपते हुए मुस्कुराए और बोले -“हे जालंधर! तुम मुझसे कौन-सा प्रिय कार्य करवाना चाहते हो?” जालंधर ने प्रसन्न होकर कहा —“मैं युद्ध के लिए जा रहा हूँ, आप यहाँ सागर में आनंदपूर्वक रहें।” यह सुनकर भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी द्वारा दी गई अक्षत (चावल के दाने) से जालंधर की पूजा की और उसे शुभाशीष दी।

मानव या असुर जब अपना कर्म स्वयं तय करके प्रभु के पास जाता है तो वे उसे रोकने की कोशिश बिलकुल नहीं करते। वे सबकुछ उसी पर छोड़ देते है क्योंकि वे जानते हैं उसके कर्मो का फल उसे ही भुगतना है।

पिता द्वारा महादेवजी से न उलझने की सलाह

इसके बाद जालंधर अपने पिता समुद्र देव (महार्णव) के पास गया। वह उनके चरणों में झुककर बोला – “पिताजी, मैं युद्ध के लिए जा रहा हूँ। कृपा कर मुझे भगवान शंकर पर विजय की आज्ञा दें।”

यह सुनकर समुद्र देव ने प्रेम से कहा – “पुत्र, उस तपस्वी शिव से युद्ध मत करो। मैंने तुम्हें जो राज्य दिया है, उसका आनंद लो। तुम्हारे समान प्रतापी राजा इस संसार में कोई नहीं है। तुम्हारे शासन में यह पृथ्वी तो वैकुण्ठ जैसी सुंदर बन गई है।

जिस विष्णु भगवान को देवता भी नहीं जीत सकते, उन्हें भी तुमने लक्ष्मी सहित अपने राज्य में आमंत्रित कर लिया है। वत्स! तुम मेरे पास ही रहो, उस भिक्षुक शिव को छोड़ दो।” पर जालंधर देवी पार्वती के रूप और सौंदर्य में आसक्त था। वह पिता की बात मानने के बजाय अपने सैनिकों के पास लौट आया।

पत्नी वृंदा द्वारा देवी पार्वती का मोह छोड़ने की सलाह

वह अपनी सैन्य दलबल के साथ निकले ही वाला था तभी उसकी पत्नी वृंदा आई। वह विनम्रता से बोली – “नाथ! आप युद्ध पर मत जाइए। उस योगी शिव से अपना मन हटा लीजिए, जो सदैव पार्वती को ही प्रसन्न करने में लगे रहते हैं। क्या पार्वती मुझसे अधिक सुंदर है? वह तो तपस्विनी है, सदा शिव से बंधी रहती है। उसका कोई संसार नहीं, कोई आसरा नहीं। नारदजी ने उसकी व्यर्थ ही प्रशंसा की है। आप उस पार्वती को छोड़कर मुझसे प्रेम कीजिए।”

वृंदा की बातें सुनकर जालंधर स्पष्ट शब्दों में बोला – “प्रिये, जब तक मैं पार्वती को देख न लूँ, मेरा मन शांत नहीं होता। तुम मेरे राज्य की रक्षा करना। यदि मैं युद्ध में मारा जाऊँ, तो मुझे सदा याद करते रहना।” यह सुनकर वृंदा रुंधे गले से हल्का-सा मुस्कुराई, फिर अपनी शिविका (पालकी) में बैठकर महल लौट गई।

जालंधर श्रीहरि से कोई सलाह किया नहीं, पिता की सलाह माना नहीं और पत्नी के प्रेम को समझा नहीं। ये तीनों स्थिति तय कर दिया कि उसका पतन निश्चित है।

जालंधर अब पूरी तरह तैयार था। वह अपने विशाल साठ हजार महापद्म सैनिकों की सेना के साथ कैलास पर्वत की ओर चल पड़ा।  जहाँ भगवान शंकर स्वयं उसका इंतज़ार कर रहे थे।

मित्रों, भगवान शिव और विष्णु की योजना कहिये या लीला। बिना उनके चाहे कुछ भी संभव नहीं होता। जब महाबलवान् जालन्धर अपनी विशाल सेना के साथ कैलास पर्वत की ओर चला। 

पौराणिक कथा के अनुसार इधर भगवान शिव भी अपने गृह कैलाश को रक्त रंजीत नहीं देखना चाहते थे।  जब जालन्धर अपनी विशाल सेना के साथ कैलास पर्वत पहुँचने ही वाला था उसी समय भगवान शिव माता पार्वती, गणों और पुत्रों के साथ कैलास छोड़कर मानसरोवर के उत्तर तट पर चले गए। जालन्धर ने जब कैलास पहुँचा, तो उसने अपनी सेना को नीचे ठहराया और पहले दिन वह अकेला कैलास पर्वत देखने गया। 

कैलाश पर्वत और शिवजी के घर का मनोहर वर्णन

पद्मपुराण में कैलाश पर्वत और शिवजी के घर का का बड़ा ही मनोहर वर्णन है। वहाँ का दृश्य देखकर जालंधर विस्मित रह गया। कैलास जैसे किसी देवलोक से उतरा हुआ सौंदर्य था। हवा में केसर और मन्दार पुष्प की सुगंध तैर रही थी। ठंडी, मृदुल हवा फूलों के पराग और जलकणों को उड़ाती हुई बह रही थी। सिद्धांगनाएँ वहाँ क्रीड़ा कर रही थीं, उनके उन्नत वक्षों से टकराकर पराग हवा में फैल रहा था।

वातावरण सुगंधित था, और मन मोह लेने वाली शांति चारों ओर बिखरी थी। अशोक वृक्षों की छाया में, जहाँ देवताओं की रमणियाँ अपने चरणों के सुंदर चिह्न छोड़तीं, वहाँ देखकर जालन्धर का मन भी अनेक कामनाओं से भर उठा। चारों ओर मन्दार और अशोक के फूल खिले हुए थे, किन्नर और अप्सराएँ नाच रही थीं, और सुगंधित भौरों की गुनगुनाहट वातावरण में मधुर संगीत भर रही थी।

कस्तूरी और चन्दन की महक से मतवाले भौंरे ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे जले हुए कामदेव के अंगार अब भी धधक रहे हों। कहीं लाल कमल खिल रहे थे, कहीं चकोर पक्षी लवंग के पत्तों पर नृत्य कर रहे थे। कोकिलाएँ आम की मंजरी पर कुतर रही थीं, और मृग-शावक धान के पौधों के बीच विश्राम कर रहे थे। वहाँ की सुगंध, वहाँ की शोभा, यहाँ तक कि देव रमणियों की छवि देखकर ऐसा लगता था मानो यह स्थान स्वयं स्वर्ग को भी लज्जित कर दे।

शंभु भयभीत नहीं होते

जालन्धर विस्मय से महादेव जी के घर के चारों ओर देखता है और फिर अपने गुरु शुक्राचार्य की ओर मुड़ता है और आश्चर्य से कहता है: “तात! आप कहते हैं कि यह शिव कोई तपस्वी हैं? यह देखिए! उनका घर कितना दिव्य है! रत्नों से भरा, सुगंध से महका हुआ, और उनकी पत्नी… पार्वती! इतनी सुंदर… इतनी तेजस्विनी! क्या ऐसे गृहस्थ को तपस्वी कहा जाता है?” फिर, थोड़ा रुककर चारों ओर देखता है,  और शुक्राचार्य से कहता है – “परंतु, शुक्राचार्यजी… शम्भू  स्वयं यहाँ दिखाई नहीं दे रहे… क्या वे मेरे भय से कहीं चले गए हैं?”

शुक्राचार्य (शांत स्वर में): “नहीं महाराज, शंभु भयभीत नहीं होते। वे तो अभी मानसरोवर के उत्तर दिशा में स्थित पर्वत, मानसोत्तर पर गए हैं। वह स्थान इतना दुर्गम है कि कोई अन्य वहाँ पहुँच ही नहीं सकता।” जालन्धर (मुस्कुराकर): “अच्छा… तो वह तपस्वी वहाँ छिपा बैठा है… ठीक है, अब मैं वहीं जाऊँगा। देखते हैं, वह महादेव जालन्धर के सामने कितना ठहरता है!”

जालन्धर आकाश की ओर देखता है, उसकी आँखों में क्रोध और अभिमान चमकते हैं। उसकी सेना गर्जना करती है — मानो पृथ्वी स्वयं काँप उठी हो।

दैत्यसेना की घेराबंदी

जालंधर ने भार्गव (शुक्राचार्य) से कहा —“हे भार्गव! आप आगे चलिए, मैं स्वयं भगवान शंकर के पास जा रहा हूँ।” इतना कहकर जालंधर वहाँ से चलागया, जहाँ स्वयं भगवान शंकर विराजमान थे। उधर दैत्यराज जालंधर ने एक अद्भुत दृश्य देखा — वह था मानसोत्तर पर्वत, जो साठ हज़ार योजन ऊँचा था, आकाश को छूता हुआ, सुनहरी प्रभा से चमकता हुआ।

जालंधर की विशाल दैत्यसेना ने उस पर्वत को चारों ओर से घेर लिया। सहस्रों रथ, लाखों योद्धा, और अनगिनत झंडे— मानो पूरा आकाश ही ढँक गया हो।ढोल, नगाड़ों, शंखों और रणघोषों की ध्वनि से धरती और आकाश दोनों काँप उठे। चारों ओर युद्ध का महाघोष गूंज उठा।

देवी पार्वती को सुरक्षित करना और शिवजी का प्रण

यह दृश्य देखकर भगवान शंकर ने अपनी सखियों के साथ पार्वतीजी को पर्वत के सबसे ऊँचे शिखर पर सुरक्षित बैठाया। फिर स्वयं महायोद्धा शिव ने कवच धारण किया, उनके साथ तीस हज़ार महापद्म-प्रभव गण तैयार खड़े थे। चारों ओर देवगणों की जय-जयकार गूंज उठी। फिर भगवान शंकर ने अपने महान सेनापति नन्दी से कहा – “हे नन्दी! तुम युद्ध में जाकर उस महान दैत्य जालंधर का संहार करो। महाकाल और अन्य वीर गणों के साथ मिलकर युद्ध करो, जब तक कि मैं स्वयं शत्रु का अंत न कर दूँ।”

नन्दी, श्री गणेश और कार्तिकेय को तैयार रहने का आदेश

भगवान शंकर का आदेश सुनते ही नन्दी ने अपने सारथी काकतुण्ड से कहा – “हे महामते! मेरा रथ तुरंत ले आओ।” काकतुण्ड तुरंत रथ लेकर उपस्थित हुआ। वह रथ अद्भुत था — उसमें बत्तीस घोड़े जुते थे, सोलह विशाल चक्के थे, साठ पताकाएँ आकाश में लहरा रही थीं, और वह रथ बत्तीस योजन तक विस्तृत था। उसमें सभी प्रकार के दिव्य शस्त्र-सज्जा मौजूद थी।

भगवान शंकर ने अपने दोनों पुत्रों श्री गणेश और कार्तिकेय को नन्दी की रक्षा के लिए नियुक्त किया। दोनों ने कवच धारण किया, अपने-अपने वाहन पर आरूढ़ हुए, और नन्दी के चारों ओर गणों की सेना उमड़ पड़ी। नन्दी ने भगवान शंकर की स्तुति की, फिर अपने विशाल रथ पर बैठकर दानवों के साथ युद्ध के लिए निकल पड़े। उनके सिर पर बारह योजन चौड़ा दिव्य छत्र शोभित हो रहा था, जो उनके तेज और प्रताप का प्रतीक था।

यह प्रसंग केवल एक युद्ध का नहीं, बल्कि दैवी शक्ति के जागरण का प्रतीक है। जब अधर्म का अहंकार पर्वत के समान ऊँचा हो जाता है, तब भगवान शंकर स्वयं रणभूमि में उतरते हैं। उनकी सेना, उनके गण, उनके पुत्र सब एक ही उद्देश्य से प्रेरित होते हैं सत्य की रक्षा, धर्म की विजय और अहंकार का नाश।

असुर सेनाओं का पहला हमला और शिवगणों का पलटवार

ज्यों ही नन्दी जी अपने विशाल रथ पर बैठकर आगे बढ़े, उसी क्षण सामने से भयंकर दैत्य पर्वत पर चढ़ आए। उनका रूप विकराल था, हाथों में विशाल गदा, तलवारें और भाले। किन्तु जैसे ही वे शिवगणों के समीप पहुँचे, गणों ने अपने तीक्ष्ण अस्त्रों से उन पर प्रहार किया। क्षण भर में कई दैत्य घायल होकर धरती पर गिर पड़े।

रक्त की धाराएँ पर्वत से बहती नदियों-सी प्रतीत होने लगीं। गणों के प्रहार से भयभीत होकर अनेक दैत्य पीछे हटने लगे, कुछ तो पर्वत छोड़कर भाग खड़े हुए। फिर जो दैत्य नीचे धरती पर गिरे थे, शिवगण उनके पीछे दौड़े और तीखे शस्त्रों से उनका संहार कर डाला। चारों ओर युद्ध का भयानक दृश्य फैल गया। पृथ्वी पर देवताओं की सेनाएँ और दैत्यों की टुकड़ियाँ आमने-सामने थीं।

हर हर महादेव!” की गूँज

शिवगणों के साथ स्वर्ग से भागे गए देवता भी मिल गए और आरम्भ हुआ दैत्यों से महायुद्ध। चारों ओर से बाणों की वर्षा होने लगी। आकाश में धनुषों की टंकार गूंज उठी, धरती रणभूमि बन गई। शिवगणों में जो मयूरमुख वाले योद्धा थे और जो काकतुण्ड गण थे; उन्होंने अपने प्रहारों से दैत्यों के हाथी, रथ, घोड़े और पैदल सैनिकों का नाश कर दिया।

वह दृश्य अत्यंत भयानक था। मारे गए दैत्यों के कटे हुए सिर आकाश में उड़ रहे थे, कुछ हँस रहे थे, कुछ चीख रहे थे, उनके केश बिखरे हुए थे, मुख लाल थे, और उनकी आँखें व दाँत विकराल दीख रहे थे। मानो स्वयं प्रलय ने युद्धभूमि पर अवतार ले लिया हो। सिंहों ने मृत दैत्यों के शरीरों को नोचना आरम्भ किया, उनके पंजों से दैत्य शरीरों की जाँघें, पीठें और कमरें लहूलुहान हो गईं।

धरती पर शवों का अम्बार लग गया। वह कबन्धों (शरीर बिना सिर के धड़) से भर उठी। फिर दैत्यों की शेष सेना ने जोर-जोर से गर्जना की। उनका कोलाहल ऐसा था मानो प्रलयकाल में समुद्र गरज रहे हों। धरती काँप उठी, पर्वत थरथराने लगे, परन्तु शिवगण अडिग थे।

 

 हर प्रहार के साथ “हर हर महादेव!” की गूँज आकाश में फैल रही थी।

 

यह प्रसंग केवल एक युद्ध का नहीं, बल्कि दैवी शक्ति और अधर्म के संघर्ष का प्रतीक है। जहाँ एक ओर अहंकार और अत्याचार का अंधकार था, वहीं दूसरी ओर भगवान शंकर के गण भक्ति, निष्ठा और धर्म के प्रकाश स्वरूप थे। नन्दी जी और गणों ने यह सिद्ध कर दिया कि जब तक भगवान का नाम साथ हो, तब तक कोई भी दानव कितना ही बलशाली क्यों न हो, धर्म की विजय निश्चित है।

 

दोस्तों, यह तो युद्ध की शुरुआत है आगे की कथा में आप जानेंगे कितने ही उतारचढ़ाव आये। आप हमारे साथ जुड़े रहें।

 

 इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के छठे उत्तर खण्ड के अन्तर्गत नारद युधिष्ठिर संवाद का दैत्य सेना के पराजय वर्णन नामक बारहवें अध्याय का हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।१२।।

 

Source: पद्मपुराण

ॐ नमः शिवाय 🙏