पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड
अध्याय 8: जालन्धर और श्रीहरि का महासंग्राम: जब विष्णु भी गिरे रणभूमि में, लक्ष्मीजी ने बचाया अपने प्रभु को
जय श्री हरी
दोस्तों पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड अध्याय 7 में बल नामक दैत्य का भगवान विष्णु और देवताओं के साथ युद्ध, उनकी वीरता, और अंततः उनका स्वर्गारोहण वर्णित है। युद्ध में बल ने देवताओं का साहसपूर्वक सामना किया, इन्द्र और रुद्रों से भिड़ा, और अनेक प्रहारों का सामना किया। बल के शरीर से युद्ध में उत्पन्न हुए रत्न पृथ्वी पर फैल गए।
युद्ध के पश्चात् प्रभावती, बल की पत्नी, उसके दिव्य शरीर और बलवीरता के प्रति विलाप करती है। जालन्धर बल को जीवित करने की इच्छा व्यक्त करता है, और शुक्राचार्य के मंत्र से बल अपनी प्रिय प्रभावती से संवाद करता है। बल की आत्मा और उसके अंगों से उत्पन्न रत्नों की महिमा दर्शायी गई है। इस प्रकार, बल अपने पुण्य और वीरता के कारण स्वर्गारोहण करता है और उसका दिव्य रूप पृथ्वी और स्वर्ग में उज्जवलता फैलाता है। अब आगे आठवे अध्याय में जानिए जालन्धर और श्रीहरि का महासंग्राम कैसे हुआ? यह कथा युधिष्ठिर नारद संवाद के अन्तर्गत आठवे अध्याय में 87 श्लोक में वर्णित है जिसका हिंदी रूपांतर आपके सामने लाया हूँ।
नारद जी बोले:
जालन्धर बल के वध से क्रुद्ध होकर इन्द्र की ओर गर्जना करते हुए बोला— “हे बलहीन! कपट से बल को मारने वाले इन्द्र! अब तुम कहाँ भागोगे?” इतना कहकर प्रतापी जालन्धर ने अपने बाणों की वर्षा से इन्द्र के सारथि, घोड़े, ध्वजा और पूरे रथ को ढँक लिया। इन्द्र उन तीक्ष्ण बाणों से घायल होकर मूर्छित हो गये और रथ पर ही गिर पड़े। इन्द्र के गिरते ही जालन्धर ने विजयी गर्जना की, जिससे रणभूमि काँप उठी।
कुछ समय पश्चात् इन्द्र ने मूर्छा त्यागकर जालन्धर पर वज्र प्रहार किया। किंतु अद्भुत बात यह हुई कि पर्वतों को चूर कर देने वाला वह वज्र जालन्धर ने अपने हाथों से रोक लिया और उसे अपनी कमर में खोंस लिया। इसके बाद वह रथ से कूदकर इन्द्र को पकड़ने के लिए दौड़ा। भयभीत इन्द्र ने तुरंत श्रीहरि का स्मरण किया और वहाँ से पलायन कर गया।
मदमस्त जालन्धर इन्द्र के रथ पर चढ़ बैठा और मातलि को ही अपना सारथि बना लिया। प्रसन्नचित होकर वह सेना में गया। जहाँ-जहाँ इन्द्र का रथ जाता, वहाँ-वहाँ मेघ के समान प्रचण्ड जालन्धर स्वयं उपस्थित होता प्रतीत होता था। तभी भगवान पुरुषोत्तम प्रकट हुए। उन्होंने अपने नन्दक नामक दिव्य खड्ग को उठाया और मन के समान वेग वाले गरुड़ को प्रेरित किया। क्रोधाग्नि से दहकते हुए श्रीहरि ने दैत्यसेना पर टूटकर आक्रमण किया। उनकी प्रचण्ड शक्ति के आगे हजारों रथ, घोड़े, हाथी और असंख्य पैदल सैनिक क्षणभर में धराशायी हो गये। गरुड़ पर आरूढ़ भगवान जनार्दन ने रणभूमि में ऐसे अद्भुत और भयङ्कर चरित किए कि देवताओं की सेनाएँ आश्चर्यचकित होकर देखने लगीं।
युद्धभूमि का दृश्य अत्यन्त भीषण हो उठा। वहाँ पिशाच और बेताल विचर रहे थे, पक्षियों का झुण्ड मंडरा रहा था। रक्त और आंतों से बनी हार, अस्थि-मज्जा और रुधिर की धाराएँ एक भयानक नदी के समान बह रही थीं। उस नदी के पार जाना असंभव था, क्योंकि वह व्याघ्रों और गजेन्द्रों से भरी हुई थी। उसकी लहरें मानो घूमते हुए नेत्रों के समान लग रही थीं, और वह भयावह दृश्य युद्धभूमि को भयमय बना रहा था।
इस भीषण विनाश को देखकर जालन्धर की आज्ञा से श्रेष्ठ दैत्यगण एकत्र हुए और चारों ओर से भगवान श्रीहरि को घेर लिया। वे अपने रथों पर चढ़कर इस प्रकार बाणों की वर्षा करने लगे, मानो—
🌸 भौंरे कमल पर छा जाते हैं,
🌩️ मेघ पर्वत को ढँक लेते हैं,
🐦 पक्षी आम्रवृक्ष को घेर लेते हैं,
☁️ और आकाश घूमते हुए बादलों से आच्छादित हो जाता है।
इसी प्रकार श्रीहरि और गरुड़ बाणों से पूर्णत: आच्छादित हो गए, उनका रूप क्षणभर के लिए अदृश्य हो गया। दैत्य दल भयङ्कर गर्जना कर प्रहार कर रहे थे। परन्तु तभी— श्रीहरि ने अपना दिव्य, उग्र रूप धारण किया। वे क्रोध से दहकते हुए वायु के समान हो गए और जैसे पवन पत्तों को गिरा देता है, वैसे ही उन्होंने दैत्यों को धराशायी कर दिया। इतने में शैलरोमा नामक महादैत्य रणभूमि में उतरा। वह प्रचण्ड वेग से श्रीहरि पर आक्रमण करने दौड़ा। उसके तीक्ष्ण बाणों से स्वयं भगवान विष्णु का शरीर भी विदीर्ण हो गया। किन्तु श्रीहरि ने भी अपने नन्दक खड्ग को उठाया और प्रलयंकारी वेग से उसका शिर धड़ से अलग कर दिया।
परन्तु अद्भुत दृश्य यह था कि—
शिर कट जाने पर भी शैलरोमा का धड़ रणभूमि में पराक्रम करता रहा। उसका कबन्ध प्रचण्ड बल से युद्ध करता हुआ गरुड़ के पंखों को अपनी दोनों भुजाओं से जकड़ने लगा।
शैलरोमा का कट चुका शिर एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करने लगा। वह उड़कर वापस उसके कन्धों से जा लगा, मानो मृत्यु भी उसके पराक्रम को रोक न सकी हो। यह अद्भुत घटना देखकर स्वयं हृषीकेश भगवान विष्णु भी विस्मित हो उठे।
गरुड़ ने जब यह दृश्य देखा, तो वे घबराकर पृथ्वी पर गिर पड़े। किंतु तुरंत ही वे तीव्र वेग से उठे और जाकर शैलरोमा के शिर पर बैठ गए। उस बलशाली दैत्य ने तब अप्रत्याशित रूप से भगवान विष्णु को गरुड़ की पीठ से खींच लिया। परन्तु सर्वशक्तिमान श्रीहरि ने मात्र एक प्रचण्ड थप्पड़ से उसका जीवन हर लिया। शैलरोमा पृथ्वी पर निर्जीव होकर गिर पड़ा।
इसके पश्चात् जालन्धर ने अपने सारथि खड्गरोमा से कहा— “जहाँ भगवान जनार्दन हैं, मेरा रथ तुरंत वहीं ले चलो।”
सारथि ने आज्ञा का पालन किया और रथ लेकर श्रीहरि के समीप जा पहुँचा। जालन्धर ने सामने खड़े भगवान विष्णु को देखकर विनम्रता से कहा— “हे विष्णो! बिना किसी शंका के मुझ पर प्रहार करें। मैं आप पर प्रहार नहीं कर रहा हूँ।” उसके इन वचनों को सुनकर भगवान विष्णु की आँखें क्रोध से लाल हो उठीं। उन्होंने प्राणहरण करने वाले बाणों से जालन्धर के शरीर को छलनी कर दिया।
किन्तु यह अद्भुत था कि— अन्तःकरण तक विदीर्ण होने पर भी प्रतापी जालन्धर निरन्तर अपने बाणों से भगवान विष्णु पर प्रहार करता रहा। उसके प्रचण्ड बाणों से गरुड़ घायल होकर भूमि पर मूर्छित हो गए।
गरुड़ को भूमि पर गिरे देखकर भगवान जनार्दन ने वैकुण्ठ में स्थित अपने दिव्य रथ का स्मरण किया। तभी आश्चर्यजनक रूप से वह अश्वयुक्त रथ बिना सारथि के स्वयं रणभूमि में आ पहुँचा। उस दिव्य रथ को देखकर स्वयं भगवान विष्णु भी एक क्षण के लिए विस्मित हो गए।
भगवान विष्णु ने गरुड़ को ही अपना सारथि बना लिया। वे दिव्य आभा से चमकते हुए शिर पर मुकुट और हृदय पर रत्नजटित मणि धारण किए थे। उनका पुरुषार्थ मानो अश्वों के समान प्रचण्ड वेग से आगे बढ़ रहा था। श्रीहरि के दिव्य रथ की गति से पृथ्वी तक कंपायमान हो उठी और वे देवताओं सहित जालन्धर का सामना करने रणभूमि में उतरे।
रणभूमि में प्रवेश करते ही भगवान विष्णु ने अपने तीक्ष्ण बाणों से दैत्यों की सेना पर प्रचण्ड आक्रमण किया। उनकी वेगवती वर्षा से दैत्यों की असंख्य टुकड़ियाँ छिन्न-भिन्न हो गईं और देखते ही देखते दैत्यसेना धराशायी हो गई।
जब जालन्धर ने अपनी शेष बची हुई थोड़ी-सी सेना की दुर्दशा देखी, तो उसका मन विचलित हो उठा। उसने मन ही मन ध्यान किया और अपने गुरु शुक्राचार्य से कहा— “गुरुदेव! मेरी विशाल सेना देवताओं के हाथों नष्ट हो गई। आप तो मन्त्रों के प्रख्यात ज्ञाता हैं, फिर आपके रहते यह कैसे संभव हुआ? जो विद्या दुखियों की रक्षा न कर सके, वह विद्या किस काम की? और जो क्षत्रिय शरणागत सेना की रक्षा न कर सके, उसका बल व्यर्थ है।”
जालन्धर की पीड़ा भरी वाणी सुनकर शुक्राचार्य ने शांत स्वर में कहा— “राजन्! अब आप युद्धभूमि में मेरे ब्राह्मण्य के अद्भुत बल को देखें।” इतना कहकर उन्होंने आचमन किया और अपने प्रचण्ड हुङ्कार से मृत दैत्यसेना को पुनर्जीवित कर दिया। वह दृश्य अद्भुत था—अभी कुछ क्षण पूर्व जो दैत्य निर्जीव पड़े थे, वे फिर से जीवन पाकर रणभूमि में गर्जना करने लगे।
इसके बाद जालन्धर ने अपने प्राणहरण करने वाले तीक्ष्ण बाणों से देवताओं पर प्रहार किया। उन बाणों से आहत होकर देवता रणभूमि में गिर पड़े। उनके शरीर बाणों से छलनी हो गए और वे असहाय हो उठे। किंतु अमर होने के कारण उनकी मृत्यु नहीं हुई, केवल प्राण शेष रह गए।
जब देवता पुनः-पुनः दैत्य बाणों से घायल होकर रणभूमि में गिरे पड़े थे, तब भगवान नारायण ने देवगुरु बृहस्पति की ओर देखा और कहा— “गुरुदेव! धिक्कार है उस गुरु पर जो अपनी संतति समान देवताओं को जीवनदान नहीं देता।”
भगवान की यह वाणी सुनकर बृहस्पति ने विनम्र स्वर में कहा— “हे स्वामिन्! मैं केवल मन्त्रबल से नहीं, बल्कि दिव्य औषधियों के प्रयोग से देवताओं को पुनर्जीवित करूँगा।”
इतना कहकर बृहस्पति तत्काल क्षीरसागर की ओर प्रस्थान किए। वहाँ द्रोणाचल नामक दिव्य पर्वत विद्यमान था, जो अनंत औषधियों का भंडार था। स्वयं जाकर बृहस्पति ने वहाँ से अमृततुल्य औषधियाँ लाईं और उनका प्रयोग करके देवताओं को पुनर्जीवन प्रदान किया।
क्षणभर में देवता मृत्यु से उठ खड़े हुए। उनके नेत्रों में पुनः प्रकाश लौटा और वे उत्साह से भरकर दैत्यों की सेना पर टूट पड़े। देवताओं का पुनः संग्राम में उतरना मानो अमृत का प्रवाह ही था।
देवताओं को जीवित देख जालन्धर क्रोधित हो उठा। उसने आश्चर्यचकित होकर अपने गुरु शुक्राचार्य से कहा— “गुरुदेव! यह कैसे संभव हुआ? आपकी विद्या के बिना देवता फिर से कैसे उठ खड़े हुए?”
तब शुक्राचार्य ने शांत भाव से उत्तर दिया— “राजन्! क्षीरसागर के मध्य द्रोणाचल नामक दिव्य पर्वत है। वहाँ ऐसी अद्भुत औषधियाँ विद्यमान हैं जिनके प्रभाव से मृत भी जीवित हो जाते हैं। बृहस्पति उन्हीं दिव्य औषधियों को लेकर आए और मन्त्रबल से देवताओं को पुनर्जीवित किया।”
यह सुनकर दैत्यराज जालन्धर का क्रोध और भी बढ़ गया। उसने तुरंत अपनी विशाल सेना का भार शुम्भ नामक दैत्य को सौंपा और स्वयं शीघ्रता से क्षीरसागर की ओर निकल पड़ा।
दैत्यराज जालन्धर महासागर की गहराइयों को चीरता हुआ क्षीरसागर के दिव्य और महाप्रभाशाली गृह में प्रवेश कर गया। उस स्थान का दृश्य अद्भुत था। वहाँ की वायु न तो गर्म थी, न ही शीतल; वहाँ अंधकार का लेशमात्र भी नहीं था। वह स्थान मानो स्वयं स्वर्ग से भी अधिक दिव्य और मनोहर था। क्षीरसागर के महाप्रभाशाली क्रीडास्थल में जालन्धर का स्वागत दिव्य स्त्रियों ने किया। वहाँ रूप और कला से सम्पन्न अप्सराएँ अपनी मोहिनी छवि से नृत्य और संगीत प्रस्तुत कर रही थीं।
उनके कटाक्षों की चपलता, पतली कमर का लयपूर्ण नृत्य, मोहक अंगों की ललित लय, चरणों के घुँघरुओं की मधुर झंकार—सब मिलकर वातावरण को मोहित कर रहे थे। सुगन्धित वस्त्रों की मादक सुवास, मुस्कान से भरे हुए चितवन, हाथों में चामर का संचालन और पुष्पमालाओं का विलास—इन सब लीलाओं से वे बिलासिनियाँ दैत्यराज जालन्धर की सेवा कर रही थीं।
किन्तु युद्ध की उत्कंठा से भरे जालन्धर का मन वहाँ भी स्थिर न रह सका। क्षीरसागर को प्रणाम कर उसने कहा— “तात! आप द्रोणाचल की औषधियों के सहारे देवताओं को पुनर्जीवित कराकर मुझे छलपूर्वक मारना चाहते हैं। अतः आप द्रोणाचल को अपने जल से बहा दीजिए।”
क्षीरसागर ने शांत भाव से उत्तर दिया—
“वत्स! द्रोणाचल मेरी शरण में आया है। शरणागत की रक्षा करना ही धर्म है। जो शरणागत का परित्याग करता है, उसकी महर्षिगण प्रशंसा नहीं करते।”
पितृव्य की इस बात को सुनकर जालन्धर क्रोध से भर उठा। उसने अपने प्रचण्ड बल से द्रोणाचल पर आघात किया। उसके थप्पड़ से सहमा हुआ द्रोणाचल स्वयं को प्रकट करके बोला— “हे दैत्यराज! मैं आपका सेवक हूँ। आपकी शरण में आया हूँ, कृपया मेरी रक्षा कीजिए। आपकी आज्ञा से मैं रसातल में चला जाऊँगा और जब तक आपका राज्य रहेगा वहीं निवास करूँगा।”
इतना कहकर द्रोणगिरि औषधियों की चीख-पुकार और सिद्धों के रुदन के साथ जालन्धर के समक्ष ही रसातल में समा गया। यह देखकर जालन्धर प्रसन्न हुआ और पुनः रणभूमि की ओर लौट पड़ा, जहाँ देवताओं और दैत्यों का महायुद्ध उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।
दैत्यराज जालन्धर, अपने पहले से ही कल्पित दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर, श्रीकृष्ण केशव से युद्ध करने के लिए आगे बढ़ा। रथ पर स्थित जगन्नाथ भगवान को देखकर उसने अहंकारपूर्वक ठहाका लगाया और गर्व से कहा— “जब तक मैं अपने शत्रुओं का संहार कर रहा हूँ, तब तक तुम यहीं रथ पर खड़े रहना!”
ऐसा कहकर उसने तीक्ष्ण बाणों की वर्षा कर देवसेना को क्षत-विक्षत कर दिया। बाणों से घायल होकर देवगण व्याकुल हो उठे और भागते हुए बृहस्पति से प्रार्थना की— “गुरुदेव! हमारी रक्षा कीजिए।”
बृहस्पति तत्काल क्षीरसागर की ओर गए, परंतु वहाँ द्रोणगिरि को न देखकर वे चिंतित हो उठे। पुनः युद्धभूमि में लौटकर उन्होंने देवताओं को चेतावनी दी— “देवताओं! अब युद्ध का त्याग करो, द्रोणाचल विनष्ट हो चुका है।”
उनकी यह वाणी सुनते ही जालन्धर ने गर्वोन्मत्त होकर बाण चलाए, जिनसे बृहस्पति के केश और यज्ञोपवीत कटकर गिर पड़े। वह जोर से हँसने लगा और देवताओं का उपहास करने लगा। प्राण संकट में पड़े बृहस्पति शीघ्र ही रणभूमि से हट गए। हे राजन्! तब सभी देवता भी युद्धभूमि का परित्याग कर भाग खड़े हुए। देवताओं को खदेड़कर जालन्धर सीधे श्रीजनार्दन पर टूट पड़ा।
इधर भगवान श्रीविष्णु भी युद्ध के लिए उत्साहित होकर दैत्यराज से भिड़ गए। दोनों के मध्य भयानक संग्राम प्रारंभ हुआ। जालन्धर ने विष्णु पर बाणों की झड़ी लगा दी, किंतु श्रीहरि ने उन सब बाणों को क्षणभर में चूर-चूर कर दिया। फिर उन्होंने अपने धनुष की गूंजती टंकार से आकाश को कंपा दिया और तीक्ष्ण बाणों से दैत्यराज को व्याकुल कर दिया।
बाणों से व्यथित होकर जालन्धर ने अपना रथ त्याग दिया और प्रचंड वेग से भगवान विष्णु की ओर दौड़ा। परंतु जैसे ही वह समीप पहुँचा, श्रीहरि ने अपने तीक्ष्ण बाणों से उसके शरीर को भेद डाला।
इस प्रकार रणभूमि में भगवान विष्णु और जालन्धर का घोर युद्ध चरम पर पहुँच गया, जिसमें दैत्यराज का सारा अभिमान धीरे-धीरे खंडित होने लगा।
दैत्यराज जालन्धर, भगवान विष्णु के प्रचंड बाणों से व्यथित होकर भी डिगा नहीं। अपने अपार बल का प्रदर्शन करते हुए उसने एक हाथ से गरुड़ को और दूसरे हाथ से स्वयं श्रीहरि के रथ को उठा लिया। आकाश में उसे घूमाता हुआ वह उन्हें दूर फेंक देता है। गरुड़, जालन्धर के वेग से छिटककर क्रौञ्च द्वीप में जा गिरे और वहीं विश्राम करने लगे। उसी भयंकर प्रहार से भगवान विष्णु भी उस घूमते हुए रथमंडल से नीचे गिर पड़े।
भूमि पर आकर श्रीहरि ने जालन्धर को ललकारते हुए पुकारा— “तिष्ठ! तिष्ठ!!” हे दैत्यराज, ठहरो और मुझसे सामना करो।
जालन्धर, जो युद्ध का लोभी और गर्व से गर्जन करने वाला था, आगे बढ़ा और अपने बाणों से पृथ्वी को भरते हुए भयंकर हुंकार किया।
उस समय श्रीहरि ने अपनी चमकती हुई शक्ति उठाई और उसे दैत्यराज के हृदय में विद्ध कर दिया। वह घायल होकर भूमि पर गिर पड़ा। सारथि शीघ्रता से उसे उसके निवास स्थान पर ले गया। होश में आते ही जालन्धर ने आश्चर्यचकित होकर कहा—
“कौन है जिसने मुझे इस प्रकार निर्लज्ज किया?” अब युद्ध और भी भयंकर हो उठा। पृथ्वी पर स्वयं भगवान विष्णु और जालन्धर आमने-सामने थे। किंतु श्रीहरि, लक्ष्मीजी के स्नेह के कारण, उसे मारना नहीं चाहते थे। उलटे वे स्वयं ही जालन्धर के बाणों से घायल होकर धरती पर गिर पड़े।
धरती पर पड़े हुए श्रीहरि को देख जालन्धर ने उन्हें उठाया और अपने रथ पर बिठा लिया। तभी लक्ष्मीजी, अपने प्रिय कमलनयन भगवान के पास पहुँच गईं। पति को गिरे हुए देख उनका हृदय व्याकुल हो उठा। वे जालन्धर के समीप खड़ी होकर अत्यंत करुण स्वर में बोलीं—
“हे भ्राता! मेरी बात सुनो। तुमने विष्णु को परास्त कर पकड़ लिया है। अब कृपा करके उन्हें छोड़ दो।”
हे महाबलवान्! विधवा को कष्ट पहुँचाना उचित नहीं। लक्ष्मीजी की करुण वाणी सुनकर जालन्धर ने जगत्पति भगवान् को छोड़ दिया।
महाबाहु जालन्धर ने अपनी प्रिय बहन के चरणों को भक्ति भाव से नमस्कार किया और उसकी स्नेहिल दृष्टि से भगवान् विष्णु के चरणों की वन्दना की। तब भगवान् विष्णु ने जालन्धर से कहा— “हे दैत्यराज! तुम्हारे कर्मों से मैं संतुष्ट हूँ। अब वरदान मांगो, मैं तुम्हें जो चाहो दे दूँ।” जालन्धर ने विनम्रता से उत्तर दिया— “हे केशव! यदि आप मेरे पराक्रम से प्रसन्न हैं, तो कृपया मेरे पिता के स्थान पर ही लक्ष्मीजी के साथ निवास करें।”
भगवान् विष्णु ने संतोषपूर्वक कहा—
“ठीक है।”
इसके पश्चात् उन्होंने गरुड़ का स्मरण किया, उस पर विराजमान होकर लक्ष्मीजी के साथ क्षीरसागर की ओर प्रस्थान किया। तब से, जगद्गुरु भगवान् विष्णु लक्ष्मीजी की प्रसन्नता हेतु अपने श्वसुरालय क्षीरसागर में निवास करते हैं। ॥८७॥
इस प्रकार श्रीपद्ममहापुराण के षष्ठ उत्तरखण्ड में युधिष्ठिर–नारद संवाद के अन्तर्गत अष्टम अध्याय का हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ।
इस प्रकार, युधिष्ठिर–नारद संवाद में हमें जालन्धर और भगवान् विष्णु के महायुद्ध का अद्भुत वर्णन देखने को मिला। इस प्रसंग में न केवल दैत्यराज की वीरता और पराक्रम की झलक मिलती है, बल्कि भगवान् विष्णु की दिव्य शक्ति, करुणा और धर्म की स्थिरता भी स्पष्ट होती है।
लक्ष्मीजी की भक्ति और प्रेम ने जालन्धर के हृदय को मृदु किया और अंततः धर्म और न्याय की विजय सुनिश्चित हुई। इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि चाहे कितनी भी शक्ति और पराक्रम हो, अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है, और धर्म तथा भक्ति की शक्ति सर्वोपरि है।
अतः श्रीपद्ममहापुराण के इस अध्याय का समापन हमें जीवन में धर्म, भक्ति और विनम्रता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
