पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड
अध्याय 7: भगवान् विष्णु और देवताओं का दैत्यकालनेमि तथा राहु संग महायुद्ध
जय श्री हरी
दोस्तों पद्म महापुराण के पिछले अध्याय ६ में युधिष्ठिर ने नारदजी से जालन्धर और उसके वैर के कारणों को जाना। जालन्धर ने देवताओं से वैर किया क्योंकि उनके पितृव्य, क्षीरसागर, से देवताओं ने लक्ष्मी, अमृत, चन्द्रमा, ऐरावत आदि ले लिए। उसने दुर्वारण को दूत भेजकर इन्द्र के पास अपने अधिकार का दावा किया, लेकिन इन्द्र ने चेतावनी दी कि जब जालन्धर युद्ध में आएगा, तो देवसेना उसे नष्ट कर देगी।
जालन्धर ने पाताल और पृथ्वी के विभिन्न दैत्य सैनिकों को बुलाकर युद्धभूमि में व्यवस्थित किया। उसकी सेना विशाल, भयभीत करने वाली और भयंकर थी। दैत्यों ने वन, पर्वत तोड़े और सुमेरु पर्वत की नदियाँ पुष्पों से भर दीं। यमराज, कुबेर और अन्य लोकों में भी उत्पात मच गया।
भयभीत देवताओं के लिए विजय द्वारपाल ने भगवान् वासुदेव को स्थिति बताई। लक्ष्मी ने कहा कि जालन्धर के वध में उनका प्रेम बाधक नहीं बने। भगवान् विष्णु गरुड़ पर सवार होकर युद्धभूमि पहुँचे और इन्द्र सहित देवताओं के साथ जालन्धर के सामने खड़े हुए।
देवताओं की सेना में आदित्य, रुद्र, मरुत और अन्य दिव्य शक्तियाँ व्यवस्थित थीं। युद्धभूमि पर घुड़सवार, रथधारी, हाथी और पैदल सैनिकों के बीच भीषण संघर्ष हुआ। कालनेमि ने देवताओं को बाँधकर नृत्य करने पर मजबूर किया, लेकिन भगवान् विष्णु स्वयं युद्ध में उतरे। यम, सूर्य, चन्द्रमा, अग्निदेव, अश्विनी कुमार, इन्द्र, कुबेर और अन्य देवताओं ने अपने श्रेष्ठ शत्रुओं से युद्ध किया।
अंततः देवताओं ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति और कौशल का उपयोग करते हुए दैत्यों को घेर लिया। इस प्रकार देवताओं और दैत्यों का युद्ध महाकाव्य रूप में और भयानक स्वरूप में संपन्न हुआ।
दैत्य–देव संग्राम का अद्भुत प्रसंग
नारद जी बोले:
हे राजन्! जैसे ही विभिन्न प्रकार के द्वन्द युद्ध प्रारंभ हुए, श्रीहरि क्रोध में उग्र हो उठे और उन्होंने कालनेमि पर प्रहार किया। कालनेमि ने मूर्छा त्यागते हुए सोच-समझकर भगवान् विष्णु पर बाणों की वर्षा की। परन्तु क्रोधित श्रीहरि ने उसे निष्प्राण कर पृथिवी पर गिरा दिया, जिससे उसकी शक्ति समाप्त हो गई।
संग्राम की उग्रता बढ़ती ही जा रही थी। अब राहु ने अपना ध्यान चन्द्रमा की ओर किया।
तत्पश्चात् चन्द्रमा ने युक्तिपूर्वक राहु पर खड्ग से प्रहार किया। राहु सूर्य को परास्त करके चन्द्रमा की ओर दौड़ा, लेकिन चन्द्रमा ने उसे खड्ग से रोकने का प्रयास किया। राहु के अंग इतने कठोर थे कि खड्ग टूट गया। तब राहु ने अपने प्रबल मुक्कों से जोरदार प्रहार किया। महासंग्राम में मूर्छित चन्द्रमा को राहु ने पकड़ लिया और निगल लिया, परन्तु थोड़ी ही देर बाद उसने चन्द्रमा को मुक्त कर दिया।
किन्तु राहु के अंग इतने कठोर और अभेद्य थे कि खड्ग क्षणभर में चूर-चूर हो गया। फिर राहु ने अपने प्रचण्ड मुक्के से प्रहार किया, जिससे चन्द्रमा मूर्छित होकर गिर पड़े।
उस महासंग्राम में राहु ने चन्द्रमा को पकड़कर निगल लिया। परंतु शीघ्र ही उन्हें उगल दिया और उनके हृदय पर मृग का चिह्न अंकित कर पुनः छोड़ दिया। इसके पश्चात् राहु ने दिव्य उच्चैश्रवा अश्व को पकड़कर जालन्धर के पास पहुँचाया और उसे भक्ति-भाव से समर्पित कर दिया।
इधर, युद्धभूमि में क्रुद्ध होकर दुर्वारण ने गदा से यमराज पर आक्रमण किया। इन्द्रपुत्र जयन्त और संह्लाद के बीच घोर युद्ध हुआ। संह्लाद ने परिघ का प्रहार किया जिससे जयन्त मूर्छित हो गए, और संह्लाद ऐरावत हाथी पर चढ़कर जालन्धर के समीप आ गया।
कुबेर ने युद्ध में निह्वाद को गदा से परास्त किया। उधर रुद्रगणों ने त्रिशूलों से शुम्भ को घायल किया, परन्तु निशुम्भ ने बाणों के समूह से रुद्रों को अत्यन्त पीड़ित कर दिया।
शुम्भासुर ने देवताओं पर बाणों की वर्षा कर दी। वहीं, मायावी दानव मय ने अपनी माया-जाल से मृत्यु को ही बाँध लिया और उसे जालन्धर को अर्पित कर दिया। जालन्धर ने मृत्यु को पुलोम के पुत्र संध के हवाले कर दिया। किन्तु समुद्र ने मृत्यु को अपने मुख में डालते हुए कहा — “अब लोग निर्भय होकर जीवित रहेंगे।”
युद्ध की उग्रता बढ़ती ही जा रही थी। इन्द्र ने भी दैत्य नमुचि को पाश में बाँधकर रसातल में भेज दिया।
इसके उपरांत जालन्धर स्वयं संसार के संहारक महादेव शंकरजी से युद्ध के लिए अग्रसर हुआ
हे राजन्!
इसके बाद इन्द्र और बलासुर का भयावह युद्ध आरम्भ हुआ।
बलासुर के अंगों से निकलने वाली प्रभा और कान्ति
दशों दिशाओं में सूर्य के समान चमक रही थी।
भयंकर संग्राम में इन्द्र के सभी शस्त्र बलासुर के अंगों से टकराकर नष्ट हो गए।
इसके बाद बलवान् बल ने अपने प्रचण्ड मुद्गर से इन्द्र के हृदय पर प्रहार किया।
उस आघात से पीड़ित होकर इन्द्र ने भयानक गर्जना की।
इन्द्र की गर्जना सुनकर बल अट्टहास करने लगा और उसके हँसते समय मुख से मोतियों की वर्षा होने लगी।
इन्द्र ने देखा कि यह असुर अद्भुत सामर्थ्य वाला है,
इसलिए उसने युद्ध न करते हुए बल की स्तुति करनी आरम्भ की।
बलासुर ने प्रसन्न होकर कहा —
“हे देवश्रेष्ठ! माँगो, मैं तुम्हें वरदान देता हूँ।”
इन्द्र ने विनम्र होकर उत्तर दिया —
“हे दैत्येश! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो अपने अंग मुझे प्रदान करें।”
यह सुनकर बल ने हर्षपूर्वक कहा —
“हे इन्द्र! शस्त्रों से काटकर मेरे अंग ले लो।
महापुरुषों के लिए मेरे पास कोई वस्तु अदेय नहीं है।”
फिर बल ने धर्म और सज्जनों की महिमा का बोध कराते हुए उपदेश दिया —
“कायर पुरुषों की सम्पत्ति व्यर्थ है —
जैसे बहरे के लिए वाणी,
अंधे के लिए रूपवती स्त्री,
और मुर्दे के लिए पुष्पमाला।”
“महापुरुष तो अपने प्राणघाती शत्रुओं को भी नहीं रोकते।
जैसे महान नदियाँ अपनी उपनदियों को लेकर समुद्र में मिलाती रहती हैं।”
“सज्जन लोग दूसरों के कल्याण के लिए जन्म लेते हैं।
मृत्यु के क्षण में भी वे विचलित नहीं होते।
चन्दन का वृक्ष काटे जाने पर भी अपनी सुगन्ध उसी कुठार को दे देता है जो उसे आहत करता है।”
“भाग्य और शरीर नष्ट हो सकते हैं,
किन्तु सज्जनों द्वारा प्रदान की गई लक्ष्मी कभी नष्ट नहीं होती।
जैसे चन्द्रमा की वह कला अमर है जो सदैव शिव के मस्तक पर शोभायमान रहती है।”
“धरती को वास्तव में वही सज्जन अलंकृत करते हैं
जो उपकार न मानने वाले दुष्टों पर भी उपकार करते हैं।
यहाँ तक कि अपने शरीर को काटकर स्वार्थ साधने वाले भी,
सज्जनों द्वारा पहले किए गए उपकार से लाभान्वित ही होते हैं।”
जब इन्द्र ने बल से कहा “ठीक है”, तो उन्होंने अपनी गदा उठाकर बल पर प्रहार किया। किन्तु आश्चर्य! बलासुर का शरीर ज़रा भी नहीं टूटा। यह देखकर इन्द्र चिन्तित हो गए। तभी उनके सारथि मातलि ने स्मरण कराया कि यह युद्ध केवल गदा से नहीं जीता जा सकता।
इन्द्र ने तुरंत अपना दिव्य अस्त्र — वज्र उठाया और पूरी शक्ति से बलासुर पर प्रहार किया। वज्र की आघात से बल का विशालकाय शरीर चकनाचूर हो गया।
उसके अंग पृथ्वी और आकाश में बिखर गए —
एक भाग सुमेरु पर्वत पर गिरा,
दूसरा हिमालय पर,
तीसरा गोपर्वत पर ॥२८॥
चौथा भाग स्वर्गगंगा में,
पाँचवाँ मन्दराचल पर,
और छठा भाग वज्राकर पर्वत पर गिरा ॥२९॥
बलासुर जन्म से ही शुद्ध और पुण्यात्मा था।
इसलिए उसके शरीर के अंग-प्रत्यंग से अनगिनत रत्न और धातुएँ उत्पन्न हुईं।
वज्र की चोट से बिखरी अस्थियों के कण षट्कोणीय मणियाँ बन गए।
उसकी दोनों आँखों से इन्द्रनील (नीलम) की उत्पत्ति हुई,
कानों से माणिक्य (रूबी) प्रकट हुआ ॥३१॥
रक्त से पद्मराग मणि (स्पिनेल) बनी,
मेद (चर्बी) से मरकत (पन्ना),
जीभ से प्रवाल (मूंगा),
और दाँतों से मोती (मुक्ता) उत्पन्न हुए ॥३२॥
मज्जा से पुनः पन्ना (मरकत),
नाक से गरुत्मत मणि,
पुरीष (मल) से कांस्य,
वीर्य से चाँदी,
और मूत्र से ताँबा उत्पन्न हुआ ॥३३॥
उसके शरीर के उद्वर्तन (उबटन से लगे लेप) से पित्तल,
नाद से वैदूर्य मणि,
नखों से सोना,
रक्त से रसोत,
मेद से स्फटिक (क्रिस्टल)
और मांस से पुनः प्रवाल (मूंगा) उत्पन्न हुआ ॥३४–३५॥
श्रीपद्ममहापुराण के अनुसार, बल का शरीर युगों तक अद्भुत रत्नों और दिव्यता का स्रोत बना रहा। बल के शरीर से उत्पन्न रत्न पृथ्वी पर छितराए हुए थे, और जब पुरुषों के पुण्य बढ़ते हैं, तो वे इन्हें उपभोग कर सौभाग्य और सम्पत्ति अर्जित करते हैं।
युद्ध में बल को इन्द्र द्वारा मारा गया। इस घटना की खबर सुनकर प्रभावती नामक रानी अपने पति के पास दौड़ी। उसने अपने दिव्य पति को युद्ध में विकीर्ण अवयवों वाला देखकर विलाप करना आरंभ किया। प्रभावती के कठोर और तेज स्तनों, खुले केशों और आँसुओं से भरे नेत्रों में गहरी पीड़ा झलक रही थी।
वह विलाप करते हुए कहने लगी, “बल और वीरता से सम्पन्न हे नाथ! हे देदीप्यमान शरीर वाले, तुम मुझे अकेला छोड़कर कैवल्य पद में कैसे चले गए? अन्य प्राणी भी जरा, कुष्ठ आदि से व्याप्त शरीर को नहीं छोड़ते, पर तुमने अपने दिव्य शरीर का त्याग व्यर्थ ही कर दिया। मैं तुम्हारे दिव्य शरीर से अपने हार को सजाती थी। रण में जाने के लिए उत्सुक, तुमने मेरी चोटी को जो प्रेमपूर्वक गूंथा था, अब उसे वैधव्य दुःख से आर्त मेरी ओर लौटाओ।”
इस प्रकार प्रभावती के विलाप को देखकर जालन्धर अत्यंत दुःखी हुआ और उसने शुक्राचार्य से बल को जीवित करने का आग्रह किया। शुक्राचार्य ने उत्तर दिया कि बल ने स्वयं अपने इच्छा से मृत्यु को अपनाया है, फिर भी मंत्रशक्ति के सामर्थ्य से उसे कुछ समय के लिए बोलवाया जा सकता है।
जालन्धर की इच्छा अनुसार, शुक्राचार्य ने थोड़ी देर ध्यान किया, और बल के मुख से प्रभावती के लिए कोमल और स्पष्ट वाणी निकली, जैसे कोई मधुर वाद्य बज रहा हो। उसने कहा, “प्रभावती! तुम अपना शरीर मेरे शरीर में लीन कर दो।” यह वाणी सुनते ही प्रभावती अत्यंत प्रसन्न और भावविभोर हो गई।
बल के शरीर से सुमेरु पर्वत से बहने वाली पूर्व वाहिनी भी निकल पड़ी, और यह नदी बल के अंगों में विलीन हो गई। इस नदी के जल के सम्पर्क से रत्नों की कान्ति अत्यंत सुंदर और उच्च कोटि की हो गई।
इस प्रकार, बल का दिव्य शरीर और प्रभावती के साथ उसका अंतिम संवाद, वीरता, भक्ति और प्रेम का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है।
यह कथा केवल युद्ध और पराक्रम की नहीं, बल्कि दिव्यता, प्रेम और पुण्य की भी शिक्षा देती है, जहां बल के अंगों से उत्पन्न रत्न और उसकी वाणी भावनाओं और पवित्रता का प्रतीक बन जाती है।
मित्रों! इस अध्याय में बल नामक दैत्य का भगवान विष्णु और देवताओं के साथ युद्ध, उनकी वीरता, और अंततः उनका स्वर्गारोहण वर्णित है। युद्ध में बल ने देवताओं का साहसपूर्वक सामना किया, इन्द्र और रुद्रों से भिड़ा, और अनेक प्रहारों का सामना किया। बल के शरीर से युद्ध में उत्पन्न हुए रत्न पृथ्वी पर फैल गए।
युद्ध के पश्चात् प्रभावती, बल की पत्नी, उसके दिव्य शरीर और बलवीरता के प्रति विलाप करती है। जालन्धर बल को जीवित करने की इच्छा व्यक्त करता है, और शुक्राचार्य के मंत्र से बल अपनी प्रिय प्रभावती से संवाद करता है। बल की आत्मा और उसके अंगों से उत्पन्न रत्नों की महिमा दर्शायी गई है। इस प्रकार, बल अपने पुण्य और वीरता के कारण स्वर्गारोहण करता है और उसका दिव्य रूप पृथ्वी और स्वर्ग में उज्जवलता फैलाता है।
बलासुर और इन्द्र का अद्भुत संवाद
श्लोक 16-25.
बलासुर का पराक्रम और रत्नों की उत्पत्ति
श्लोक 26-35.
बल का दिव्य शरीर और प्रभावती के साथ उसका अंतिम संवाद
श्लोक 36-47.
