पद्ममहापुराण — सृष्टिखण्ड, अध्याय 12
चंद्र वंश की उत्पत्ति:
चन्द्रमा–तारा विवाद :
5 अद्भुत और चौंकाने वाले रहस्य जिन्होंने हिला दी सृष्टिजय श्री हरी🙏
चन्द्रमा–तारा विवाद – जिसके कारन देवासुर संग्राम हुआ। अवैध प्रेम से उत्पन्न ब्रह्माण्ड की प्रलयकारी अद्भुत घटना। इस घटना ने एक ग्रह को जन्म दिया जिसे बुध ग्रह कहा गया है। भारत के पुराणों में वर्णित कोई ग्रह केवल एक पिंड नहीं है बल्कि इनके जन्म के पीछे दैविक शक्तियां काम करती है। इसी रोचक घटना का नाम है चन्द्रमा–तारा विवाद।
हम महाभारत के पहले की घटनाओं की कथा कर रहें हैं जो पद्म पद्ममहापुराण सृष्टिखण्ड के 12वें अध्याय में है है। क्योंकि महाभारत की पृष्ठभूमि हजारों वर्ष पहले तय हो चूका था। कुरु वंश के पहले पुरु वंश और पुरु वंश के पहले चंद्र वंश। तो पहले हम चंद्र वंश से शुरू करते हैं। चंद्र वंश कथा का पहला भाग १-२२ श्लोक में पहले पब्लिश हो चूका है और यह दूसरा भाग (श्लोक 23 से 42 तक) है।
पद्म महापुराण के इस प्रसंग में एक ऐसी पौराणिक घटना का वर्णन मिलता है, जिसने देवताओं, असुरों और सम्पूर्ण त्रिलोकी को विचलित कर दिया। यह कथा केवल एक दाम्पत्य विवाद नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और अधर्म के संघर्ष की प्रतीक है। चन्द्रमा, तारा, बृहस्पति और भगवान शंकर के माध्यम से यह कथा हमें संयम और न्याय का गूढ़ संदेश देती है।
पुलस्त्य महर्षि ने जो श्लोक भीष्मजी को सुनाते हैं उसे हम हिंदी में बता रहें हैं –
1. चन्द्रमा–तारा विवाद का प्रसंग: कामवश हुआ विवाद (श्लोक 23–26)
पुलस्त्य महर्षि ने कथा को आगे बताते हुए गंगापुत्र भीष्म से कहा- राजसूय यश में सभी देवता सदस्य हुए। उस यज्ञ में वसुगण तथा विश्वेदेव अध्वर्युगण हुए ॥२१॥
चन्द्रमा ने त्रऋत्विजों को दक्षिणा में त्रैलोक्य को ही प्रदान कर दिया। उसके कारण सम्पूर्ण समादृत ऐश्वर्य को चन्द्रमा ने प्राप्त किया।
उस समय चन्द्रमा ने तपस्या के बल से सातो लोकों के अकण्टक स्वामित्व को प्राप्त कर लिया । एक बार चन्द्रमा ने उद्यान में गयी हुयी, अनेक प्रकार के पुष्पों के अलङ्कारों से अलङ्कृत शोभा सम्पन्न, विस्तृत नितम्ब तथा स्तनों के भार से खिन्न, पुष्पों से अलङ्कृत होने पर भी दुर्बल अङ्गों वाली बृहस्पति की सुन्दर नेत्रों वाली पत्नी तारा को देखा और वह कामार्त होकर एकान्त स्थान में उसके केशों को पकड़ लिया।
तारा भी चन्द्रमा के रूप और कान्ति को देखकर कामार्त हो गयी और उसके साथ उसने रमण किया ॥२३-२५॥
दीर्घ काल तक रमण करने के बाद चन्द्रमा तारा को लेकर अपने घर गये। अपने घर जाकर भी तारा में अनुरक्त मन वाले चन्द्रमा की तृप्ति नहीं हुयी ॥२६॥
अर्थ: राजसूय यज्ञ और महान ऐश्वर्य प्राप्त करने के बाद चन्द्रमा सातों लोकों के निर्विघ्न स्वामी बन गए। एक दिन उन्होंने उद्यान में भ्रमण करती हुई बृहस्पति की पत्नी तारा को देखा। उसकी सुंदरता और कान्ति से चन्द्रमा कामातुर हो गए। तारा भी चन्द्रमा के रूप से मोहित हो गई और दोनों एकान्त में रमण करने लगे। बाद में चन्द्रमा तारा को अपने घर ले आए, परन्तु उनके मन की तृप्ति नहीं हुई।
2. बृहस्पति का शोक और याचना (श्लोक 27–28)
बृहस्पति तारा की विरहाग्नि से संतप्त होकर, निरन्तर तारा की चिन्ता करने लगे। किन्तु वे चन्द्रमा को शाप देने में समर्थ नहीं हो सके, वे अनेक प्रकार के मन्त्र से, शंख बजाकर तथा अग्नियों एवं अनेक प्रकार के उपायों एवं अभिचार कर्मों के द्वारा भी चन्द्रमा का अपकार करने में समर्थ नहीं हुए। अन्त में काम सन्तप्त बृहस्पति चन्द्रमा के पास जाकर तारा की याचना किए ॥२७-२८॥
अर्थ: पत्नी के वियोग से दुःखी होकर बृहस्पति अत्यन्त शोकग्रस्त हो गए। उन्होंने अनेक मंत्रों, यज्ञ, अभिचार कर्म और उपायों से चन्द्रमा को रोकने का प्रयास किया, पर वे सफल नहीं हुए। अंततः काम से पीड़ित होकर बृहस्पति स्वयं चन्द्रमा के पास गए और विनम्रता से तारा को लौटाने की प्रार्थना की।
3. चन्द्रमा–तारा विवाद – शंकर और सोम का महायुद्ध (श्लोक 29–35)
किन्तु बृहस्पति के द्वारा याचना किए जाने पर भी काम परवश चन्द्रमा ने तारा को नहीं लौटाया। उसके बाद शङ्करजी, ब्रह्माजी, साध्य गण तथा लोकपालों एवं मरुद्रण के द्वारा प्रार्थना किए जाने पर भी ॥२९॥
जब चन्द्रमा ने तारा को नहीं दिया तो उस समय शङ्करजी ने कोप किया। पृथिवी पर शङ्करजी के चरण कमलों की पूजा अनेक रुद्र करते हैं ।।३०।।
उसके बाद बृहस्पति के स्नेह से आबद्ध होकर शङ्करजी अपने अजगव नामक धनुष को धारण करके अपने गणों के साथ चन्द्रमा के पास गये।॥३१॥
उस समय उनके तीसरे नेत्र की अग्नि प्रकाशित हो रही थी। वे चन्द्रमा के साथ युद्ध करने के लिए गये थे। उनका मुख भयङ्कर हो गया था । उनके साथ अस्सी उग्र मूर्ति गणेश्वर भी गये थे ॥३२॥
रथों पर बैठकर उनके साथ अनेक यक्षेश्वर भी गये थे । उस सेना में एक पद्म अर्बुद की संख्या में वेताल, यक्ष, सर्प तथा किन्नर थे ।।३३॥
क्रुद्ध होकर चन्द्रमा भी छत्तीस लाख रथियों के साथ वहाँ युद्ध करने के लिए आ गयें । शनिश्चर तथा भौम के द्वारा जिनका तेज बढा हुआ था, ऐसा ताराओं तथा असुरों की सेना चन्द्रमा के साथ थी ॥३४॥
उस समय सातो लोक तथा वन, द्वीप तथा समुद्रों से युक्त पृथिवी भयभीत हो गयी । देदीप्यमान अस्त्रों तथा विशाल नेत्राग्नि से युक्त शङ्करजी चन्द्रमा से युद्ध करने लगे ।।३५।।
चन्द्रमा–तारा विवाद ने जब अत्यधिक गंभीर रूप धारण कर लिया, तब देवताओं के मध्य अशांति फैल गई। बृहस्पति ने अनेक बार विनम्रतापूर्वक चन्द्रमा से प्रार्थना की कि वे तारा को लौटा दें, परंतु चन्द्रमा–तारा विवाद के प्रभाव में कामवश चन्द्रमा ने उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की। यही वह क्षण था जब चन्द्रमा–तारा विवाद ने देव-लोक को युद्ध की ओर धकेल दिया।
शंकरजी, ब्रह्माजी, साध्यगण, लोकपाल और मरुद्गण — सभी ने मिलकर चन्द्रमा से निवेदन किया कि वे इस चन्द्रमा–तारा विवाद को समाप्त करें। किन्तु जब चन्द्रमा अपने निर्णय पर अडिग रहे, तब चन्द्रमा–तारा विवाद ने एक भयंकर रूप ले लिया।
चन्द्रमा द्वारा तारा को न लौटाने पर भगवान शंकर क्रोधित हो उठे। पृथ्वी पर जिनके चरण कमलों की पूजा असंख्य रुद्र करते हैं, वही महादेव अब चन्द्रमा–तारा विवाद के कारण युद्ध के लिए तत्पर हो गए। बृहस्पति के स्नेह और धर्म की रक्षा के लिए शंकरजी ने अपना अजगव नामक धनुष धारण किया और अपने गणों के साथ चन्द्रमा की ओर प्रस्थान किया।
उस समय उनके तीसरे नेत्र से अग्नि प्रज्वलित हो रही थी। उनका मुख अत्यंत भयावह प्रतीत हो रहा था, क्योंकि वे जानते थे कि चन्द्रमा–तारा विवाद अब केवल व्यक्तिगत मामला नहीं रहा, बल्कि धर्म और मर्यादा का प्रश्न बन चुका है। उनके साथ अस्सी उग्र मूर्ति गणेश्वर भी युद्ध के लिए चले।
रथों पर आरूढ़ होकर अनेक यक्षेश्वर भी उस दिव्य सेना में सम्मिलित हुए। उस विशाल सेना में एक पद्म अर्बुद की संख्या में वेताल, यक्ष, सर्प और किन्नर सम्मिलित थे। इस प्रकार चन्द्रमा–तारा विवाद ने देवताओं और गणों की विराट सेना को आमने-सामने खड़ा कर दिया।
उधर क्रुद्ध होकर चन्द्रमा भी छत्तीस लाख रथियों के साथ युद्धभूमि में आ पहुँचे। शनिश्चर और भौम के प्रभाव से उनका तेज और अधिक प्रबल हो गया था। ताराओं तथा असुरों की विशाल सेना भी चन्द्रमा के साथ थी। इस प्रकार चन्द्रमा–तारा विवाद अब एक महायुद्ध का रूप ले चुका था।
जब दोनों ओर की सेनाएँ आमने-सामने आईं, तब सातों लोक, वन, द्वीप और समुद्रों सहित पूरी पृथ्वी भयभीत हो उठी। आकाश देदीप्यमान अस्त्रों से चमक उठा। शंकरजी के तीसरे नेत्र की ज्वाला और चन्द्रमा के प्रखर तेज के मध्य भयंकर संग्राम प्रारंभ हुआ।
4. संहार का संकट (श्लोक 36–38)
उस समय चन्द्रमा तथा शङ्करजी की सेना के बीच भयङ्कर युद्ध हुआ । सम्पूर्ण जीवों को विनष्ट कर देने वाला तीक्ष्ण अग्नि स्वरूप वह युद्ध हो रहा था ।॥३६॥
दोनों ओर के तीक्ष्ण शस्त्रों के द्वारा सेना क्षीण हो गयी। उस समय स्वर्ग, भूमि तथा पाताल को जलाते हुए शस्त्रपात हो रहे थे ॥३७॥
रुद्र ने क्रुद्ध होकर ब्रह्मशिरः अस्त्र का प्रयोग किया तो चन्द्रमा ने भी अपने अमोघ पराक्रम सम्पन्न सोमास्त्र का प्रयोग किया । उन दोनों के प्रयोग से समुद्र, पृथिवी तथा अन्तरिक्ष के विनष्ट होने का खतरा उपस्थित हो गया ।॥३८॥
जब चन्द्रमा–तारा विवाद अपने चरम पर पहुँच गया, तब यह केवल एक पारिवारिक या दैवी मतभेद नहीं रहा, बल्कि समस्त सृष्टि के लिए विनाशकारी संकट बन गया। चन्द्रमा–तारा विवाद के कारण शंकरजी और चन्द्रमा की सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हो गईं, और एक भयंकर युद्ध का आरम्भ हुआ।
श्लोकों में वर्णित है कि चन्द्रमा–तारा विवाद से उत्पन्न यह युद्ध अत्यंत उग्र और प्रलयंकारी था। दोनों ओर से अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा होने लगी। यह युद्ध ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रलयकाल की अग्नि प्रकट हो गई हो। चन्द्रमा–तारा विवाद के कारण देव, दानव, यक्ष और रुद्रगण सभी इस भीषण संघर्ष में सम्मिलित थे।
तीक्ष्ण शस्त्रों के प्रहार से दोनों पक्षों की सेनाएँ क्षीण होने लगीं। स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तक में कंपन उत्पन्न हो गया। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि चन्द्रमा–तारा विवाद के कारण तीनों लोक अग्नि में जल उठेंगे। अस्त्रों की ज्वाला आकाश को चीर रही थी और पृथ्वी भय से कांप रही थी।
स्थिति तब और भी विकट हो गई जब रुद्र ने क्रुद्ध होकर ब्रह्मशिरः अस्त्र का प्रयोग किया। यह अस्त्र अत्यंत विनाशकारी था और इसके प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ सकती थी। किंतु चन्द्रमा–तारा विवाद में पीछे हटने को तैयार न होते हुए चन्द्रमा ने भी अपने अमोघ और प्रचंड सोमास्त्र का प्रयोग किया।
जब ब्रह्मशिरः अस्त्र और सोमास्त्र एक साथ प्रकट हुए, तब समुद्र उथल-पुथल करने लगे, पृथ्वी डगमगाने लगी और अंतरिक्ष में भय का संचार हो गया। ऐसा प्रतीत हुआ कि चन्द्रमा–तारा विवाद अब संपूर्ण ब्रह्मांड के विनाश का कारण बन जाएगा। देवताओं ने देखा कि यदि यह संघर्ष शीघ्र नहीं रोका गया, तो सृष्टि का संतुलन नष्ट हो सकता है।
इस प्रकार, चन्द्रमा–तारा विवाद ने केवल देवताओं के मध्य ही नहीं, बल्कि संपूर्ण लोकों के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न कर दिया। यह प्रसंग यह दर्शाता है कि जब अहंकार और आसक्ति के कारण विवाद बढ़ जाता है, तो उसका प्रभाव केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समस्त व्यवस्था को हिला देता है।
5. ब्रह्माजी का हस्तक्षेप और युद्ध का अंत (श्लोक 39–42)
उस समय संसार को विनष्ट करने वाले युद्ध को बढे हुए देखकर ब्रह्माजी वहाँ पर आकर किसी तरह देवताओं और असुरों को युद्ध करने से रोके ॥३९॥
उन्होंने कहा- सोम तुम भी बिना किसी कारण के ही लोगों को विनष्ट करने वाले इस अकार्य को क्यों करते हो ? तुमने दूसरे की पत्नी का अपहरण करने के लिए यह अत्यन्त भयङ्कर युद्ध किया है ॥४०॥
तुम लोको में पापग्रह हो जाओगे, क्योंकि तुमने देवताओं का अपराध किया है। मेरी बात मानों बृहस्पति की इस पत्नी को लौटा दो ॥४१॥
जब सोम ने कहा कि ठीक है, तो उस समय शान्त होकर अंशुमाली (सूर्य) भी युद्ध से चले गये। बृहस्पति भी अपनी पत्नी तारा को लेकर प्रसन्नता पूर्वक अपने घर चले गये । रुद्र भी अपने स्थान पर चले गये ॥४२॥
जब चन्द्रमा–तारा विवाद के कारण देवताओं और असुरों के बीच भयंकर संहारकारी युद्ध अपने चरम पर पहुँच गया, तब समस्त लोकों में भय व्याप्त हो गया। ब्रह्मशिरः अस्त्र और सोमास्त्र के प्रयोग से सृष्टि के विनाश का संकट उत्पन्न हो चुका था। यह स्पष्ट हो गया कि यदि चन्द्रमा–तारा विवाद को तुरंत नहीं रोका गया, तो तीनों लोक नष्ट हो सकते हैं।
ऐसी विकट स्थिति देखकर स्वयं ब्रह्माजी वहाँ प्रकट हुए। सृष्टिकर्ता होने के नाते वे जानते थे कि चन्द्रमा–तारा विवाद अब केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक विवाद नहीं रहा, बल्कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड के संतुलन को भंग कर रहा है। उन्होंने अपने दिव्य प्रभाव से देवताओं और असुरों को किसी प्रकार युद्ध से रोका।
ब्रह्माजी ने चन्द्रमा (सोम) को संबोधित करते हुए गंभीर वाणी में कहा —
“हे सोम! तुम बिना किसी उचित कारण के इस लोकविनाशकारी अकार्य में क्यों प्रवृत्त हो? चन्द्रमा–तारा विवाद के कारण तुमने दूसरे की पत्नी का अपहरण किया और उसके लिए इतना भयंकर युद्ध छेड़ दिया। यह आचरण तुम्हारे पद और मर्यादा के अनुकूल नहीं है।”
उन्होंने आगे चेतावनी दी कि चन्द्रमा–तारा विवाद के कारण यदि यह अधर्म जारी रहा, तो सोम लोक में पापग्रह के रूप में प्रसिद्ध होंगे, क्योंकि उन्होंने देवताओं का अपराध किया है। ब्रह्माजी ने स्पष्ट आदेश दिया — “मेरी आज्ञा मानो और बृहस्पति की पत्नी तारा को तुरंत लौटा दो। यही इस चन्द्रमा–तारा विवाद का एकमात्र समाधान है।”
ब्रह्माजी के वचनों का प्रभाव हुआ। अंततः सोम ने अपनी त्रुटि स्वीकार की और कहा — “ठीक है।” जैसे ही सोम ने तारा को लौटाने की स्वीकृति दी, वैसे ही चन्द्रमा–तारा विवाद की ज्वाला शांत होने लगी।
उस समय अंशुमाली (सूर्य) भी शांत होकर युद्धभूमि से लौट गए। बृहस्पति अपनी पत्नी तारा को साथ लेकर प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रम लौट गए। रुद्र भी अपने स्थान को चले गए। इस प्रकार चन्द्रमा–तारा विवाद का अंत हुआ और सृष्टि विनाश से बच गई।
यह प्रसंग यह शिक्षा देता है कि जब विवाद अहंकार और आसक्ति से बढ़ता है, तो वह विनाश का कारण बन सकता है; किंतु जब धर्म और सत्य का हस्तक्षेप होता है, तो सबसे भयंकर चन्द्रमा–तारा विवाद भी समाप्त हो सकता है।
यह कथा हमें यह सिखाती है कि काम, अहंकार और अधर्म चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः उन्हें धर्म और न्याय के आगे झुकना ही पड़ता है। चन्द्रमा–तारा विवाद केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि यह मर्यादा, संयम और दैवी न्याय की अमर शिक्षा है, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
Source: पद्मपुराण
🙏 जय श्री हरी 🙏
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