पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड

अध्याय 26:

तुलसी त्रिरात्र व्रत: 3 अद्भुत लाभ और चमत्कारी महत्व


जय श्री हरी🙏

सनातन धर्म में तुलसी को केवल एक पवित्र वनस्पति ही नहीं, बल्कि स्वयं श्रीहरि की प्रिय और साक्षात् देवीस्वरूपा माना गया है। पद्ममहापुराण में वर्णित तुलसी त्रिरात्र व्रत ऐसा दिव्य व्रत है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने वाला बताया गया है। नारदजी के प्रश्न पर भगवान सदाशिव द्वारा वर्णित यह व्रत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी , दशमी और एकादशी —तीन रात्रियों में संपन्न किया जाता है। इसका श्रवण, पालन और स्मरण मात्र भी मनुष्य को समस्त पापों से मुक्त कर देता है। इस कथा में न केवल व्रत की संपूर्ण विधि बताई गई है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया गया है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया यह व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।

तुलसा त्रिरात्र व्रत की विधि और उसके माहात्म्य का वर्णन

नारदजी ने कहा- आपकी कृपा से मैंने तुलसी के माहात्म्य को सुना है, अब आप मुझे तुलसी त्रिरात्र व्रत को बतलाएँ ।।१।।

सदाशिव ने कहा- हे विप्र ! आप इस प्राचीन व्रत को सुनें, उसका श्रवण करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है ॥२॥

पहले के रथन्तर कल्प में प्रजापति नामक राजा थे । उनकी पत्नी का नाम चन्द्ररूपा था, वह महासती थी ।॥३॥

उसी ने इस समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष रूप फल को प्रदान करने बाले त्रिरात्र व्रत को किया था ।।४।।

जिसने इस तुलसी व्रत को सुना है, उसका जीवन सफल है। हे नारद ! कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को ।।५।।

त्रिरात्रव्रत करने के उद्देश्य से व्रती को पवित्र तथा अपने मन को वश में रखकर नियम का पालन करते हुए जितेन्द्रिय रहकर भूमि पर सोना चाहिए।।६।।

वह नियम पूर्वक तुलसी वन के सन्निकट सोए । उसके बाद मध्याह्न में नदी आदि के स्वच्छ जल में ॥७॥

स्नान करके विधि पूर्वक पितरों एवं देवताओं का तर्पण करे । लक्ष्मी और विष्णु भगवान् की सुवर्ण की मूर्ति बनवाये ।।८।।

आत्म कल्याण चाहने वाले को कंजूसी नहीं करनी चाहिए । उसके बाद दो-दो वस्त्र बनवाये । उन वस्त्रों को पीला और श्वेत होना चाहिए ।।९।।

आरम्भ में विधि पूर्वक नव ग्रहों की शान्ति कराये । उसके पश्चात् चरु का निर्माण करके उससे वैष्णव होम करें ।॥१०॥

द्वादशी तिथि को श्रीभगवान् की विधि पूर्वक पूजा करके, निश्छिद्र तथा शुद्ध कलश की विधि पूर्वक स्थापना करें ॥११॥

कलश में पञ्चपल्लव, पञ्चरत्न तथा सर्वोषधि डाले । उसके ऊपर एक पात्र में रखकर लक्ष्मीजी के साथ श्रीभगवान् की स्थापना करें ।।१२।।

उसकी तुलसी के मूल में वैदिक तथा पौराणिक मन्त्रों से स्थापना करें । केवल जल से अथवा दूध से तुलसी वन को सींचना चाहिए । जगत् के स्वामी श्रीभगवान् को पञ्चामृत से स्नान करायें ॥१३॥

तुलसी त्रिरात्र व्रत में प्रार्थना का मन्त्र

इसके बाद प्रार्थना करें- 

जो श्रीभगवान् अनन्त रूपों वाले हैं, सम्पूर्ण जगत् उन श्रीभगवान् का शरीर है, जो गर्भ रूप जल में स्थित रहकर सम्पूर्ण जगत् का भरण-पोषण करते हैं। जो माया को अपनाकर सम्पूर्ण संसार की सृष्टि करते हैं और रूपवान् हैं मैं उनकी प्रार्थना करता हूँ।

तुलसी त्रिरात्र व्रत में आवाह्न का मन्त्र-

हे देवेश ! हे अच्युत ! हे तेजोराशि स्वरूप ! हे जगत् के स्वामिन् ! आप यहाँ पर पधारिये। आप सदैव, अज्ञानान्धकार को विनष्ट करने वाले हैं। आप संसार सागर से मेरी रक्षा करें ।।१४-१५॥

तुलसी त्रिरात्र व्रत में स्नान का मन्त्र-

पञ्चामृत से स्नान करके, चन्दन मिश्रित जल तथा गङ्गा आदि के जल से स्नान किए हुए भगवान् अनन्त मुझ पर प्रसन्न हों ।॥१६॥

तुलसी त्रिरात्र व्रत में विलेपन मन्त्र-

हे भगवन् ! मैंने चन्दन, अगरु, कर्पूर तथा कुङ्कुम आदि का विलेपन (अङ्गराम) आपको भक्ति पूर्वक समर्पित किया है, आप इसे श्रीलक्ष्मीजी के साथ स्वीकार करें ।॥१७॥

तुलसी त्रिरात्र व्रत में वस्त्र चढ़ाने का मन्त्र-

हे नरक के सागर से पार करने वाले भगवान् नारायण ! हे त्रैलोक्य के स्वामिन्, आपको नमस्कार है, मैं आपको पवित्र वस्त्र समर्पित कर रहा हूँ ।।१८।।

तुलसी त्रिरात्र व्रत में  यज्ञोपवीत चढ़ाने का मन्त्र-

हे दामोदर भगवन् आपको नमस्कार है । आप मेरी संसार सागर से रक्षा करें । मैंने आपको यज्ञोपवीत समर्पित किया है । हे पुरुषोत्तम ! इसे आप स्वीकार करें ।।१९।।

तुलसी त्रिरात्र व्रत में पुष्प समर्पित करने का मन्त्र-

हे प्रभो ! मैंने मालती आदि के सुगन्धित पुष्यों को समर्पित किया है। हे देवेश्वर । इसे आप स्वीकार करें ॥२०॥

तुलसी त्रिरात्र व्रत में  नैवेद्य सर्पित करने का मन्त्र-

हे नाथ! मैंने भक्ष्य तथा भोज्य पदार्थों से युक्त नैवेद्य को समर्पित किया है। यह समस्त रसों से परिपूर्ण है, इसे आप स्वीकार करें ।॥२१॥

तुलसी त्रिरात्र व्रत में  ताम्बूल समर्पित करने का मन्त्र-

हे देवेश ! मैंने आपको सुपारी, पान के पत्ते और कर्पूर से युक्त ताम्बूल आपकी सेवा में समर्पित किया है। इसे आप स्वीकार करें ।॥२२।

उसके पश्चात् भक्ति पूर्वक गुग्गुल अगरु तथा घृत मिश्रित धूप देकर घी का दीपक समर्पित करें। इसी तरह से श्रीभगवान् की पूजा करनी चाहिए।। २३॥

हे मुनिश्रेष्ठ ! सावधानी पूर्वक अनेक प्रकार के दीपों को जलाकर, तुलसी वन के सन्निकट भगवान् लक्ष्मी नारायण के आगे रखें ॥२४॥

पुत्र की प्राप्ति के लिए नवमी तिथि को देवाराध्य भगवान् विष्णु को उत्तम नारियल से अर्घ प्रदान करना चाहिए ॥२५॥

दशमी तिथि को धर्म, काम तथा अर्थ की प्राप्ति के लिए बीजपूर (विजौरा) से अर्घ्य दें और एकादशी तिथि को अनार से अर्घ्य देना चाहिए उससे सदा दारिद्रय का नाश होता है ॥२६॥

हे विप्रेन्द्र । नारदजी बाँस के पात्र में सप्त धान्य रखें। उसके पश्चात् सात फल और सुपारी रखकर उसको वस्त्र से ढंक दे और उसे भगवान् के समक्ष रखे । उसके पश्चात् श्रीभगवान् को निम्नाङ्कित मन्त्र से अर्घ्य दें, इसे आप सावधानी से सुनें ॥२७-२८॥

अर्घ्य मन्त्र

हे देव ! तुलसी त्रिरात्र व्रत के दौरान तुलसी तथा शङ्ख के साथ आप को मैं यह अर्घ्य प्रदान कर रहा हूँ इसे आप स्वीकार करें। आपको नमस्कार है।॥२९॥

इस तरह से देवताओं के स्वामी श्रीभगवान् की लक्ष्मीजी के साथ पूजा करके अपने व्रत की पूर्ति के लिए श्रीभगवान् से प्रार्थना करना चाहिए ॥३०॥

हे देवेश ! काम तथा क्रोध से रहित होकर मैंने उपवास किया है । हे देवेश ! इस व्रत के द्वारा आप ही मेरे रक्षक हैं ॥३१॥

हे देव । तुलसी त्रिरात्र व्रत को लेकर करने में जो कुछ भी अपूर्णता रह गयी है । हे जनार्दन ! आपकी कृपा से वह सब पूर्ण हो जाय ॥३२॥

हे कमलनयन ! हे जलराशि ! भगवन् आपको नमस्कार है । हे केशव ! आपकी ही कृपा से मैंने इस व्रत को किया है ।॥३३॥

हे अज्ञानान्धकार को दूर करने वाले भगवन् केशव ! तुलसी त्रिरात्र व्रत के कारण आप प्रसन्न हो जायँ और मुझे ज्ञान दृष्टि प्रदान करें ।॥३४॥

तुलसी त्रिरात्र व्रत के दौरान रात्रि में जागरण करे, गीता की पुस्तक का पाठ करे । कलाकारों के गीत नृत्य सुन्दर पवित्र कथाओं ॥३५॥ से रात्रि के बीत जाने पर तथा सूर्योदय हो जाने पर भक्ति पूर्वक ब्राह्मणों को निमन्त्रित करें और वैष्णव श्राद्ध करें ।॥३६॥

तुलसी त्रिरात्र व्रत में ब्राह्मणों की इच्छा के अनुसार पायस तथा घी से उनको भोजन कराये । ब्राह्मणों को पान, पुष्प, चन्दन आदि समर्पित करके दक्षिणा दे ॥३७॥

तुलसी त्रिरात्र व्रत में यज्ञोपवीत, वस्त्र, माला तथा चन्दन भी समर्पित करे । तीन दम्पती ब्राह्मणों को वस्त्र, भूषण तथा कुङ्कुम प्रदान करके भोजन कराये ॥३८॥

तुलसी त्रिरात्र व्रत में अपनी शक्ति के अनुसार बाँस के पात्रों को बनवाकर उसे नारियलों पकवानों तथा अनेक वस्त्रों से भरे ॥३९॥

पत्नी सहित आचार्य को वस्त्र पहनाएँ फिर दिव्य भूषणों चन्दन तथा माला से उनकी पूजा करें ॥४०॥

दूध देने वाली गौ का दान दे । दक्षिणा तथा वस्त्र के साथ गौ का दान दे, उसे मैं बतलाता हूँ सुनो ॥४१॥

सभी तीर्थों में स्नान करने वाले लोगों को जिस फल की प्राप्ति होती है, तुलसी त्रिरात्र व्रत के करने से उस फल की प्राप्ति श्रीभगवान् की कृपा से होती है ॥४२॥

वह पुरुष इस लोक में अनेक भोगों को तथा समस्त मनोहर भोगों को भोगकर अन्त में भगवान् विष्णु की कृपा से श्रीभगवान् के लोक में जाता है ॥४३॥

इस प्रकार पद्ममहापुराण में वर्णित तुलसी त्रिरात्र व्रत केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम और भक्ति का जीवंत उदाहरण है। जो साधक इस व्रत को नियमपूर्वक करता है, वह इस लोक में समस्त सुखों का भोग करता हुआ अंत में श्रीहरि के परम धाम को प्राप्त करता है। रात्रि-जागरण, गीता-पाठ, तुलसी-वन के समीप दीपदान, ब्राह्मण-भोजन और गोदान—ये सभी इस व्रत को पूर्णता प्रदान करते हैं। भगवान केशव की कृपा से यह व्रत अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर ज्ञान-दृष्टि प्रदान करता है। अतः जो व्यक्ति भक्ति, श्रद्धा और संयम के साथ तुलसी त्रिरात्र व्रत करता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है और वह जन्म-जन्मांतर के बंधनों से मुक्त होकर श्रीविष्णु लोक को प्राप्त करता है।

इस प्रकार श्रीपद्ममहापुराण के छठे उत्तर खण्ड के उमापति नारद संवादान्तर्गत तुलसी त्रिरात्रव्रत वर्णन नामक छब्बीसवें अध्याय का हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ। ।।२६।।

Source: पद्मपुराण

🙏 जय माता तुलसी🙏भगवान शालग्राम की जय 🙏