पद्ममहापुराण — सृष्टिखण्ड, अध्याय 12
चंद्र वंश की उत्पत्ति: बुध का जन्म और ग्रहत्व
जय श्री हरी🙏
पौराणिक कथाओं में कुछ प्रसंग छोटे होते हुए भी अत्यंत गूढ़ और दर्शनपूर्ण होते हैं। चन्द्रमा–तारा विवाद के पश्चात उत्पन्न यह कथा उसी श्रेणी की है। ब्रह्माजी के द्वारा समझाने पर चन्द्रमा ने युद्ध रोक दिया और देवगुरु बृहस्पति के पत्नी तारा को वापस लौटा दिया, लेकिन तबतक तारा गर्भवती हो चुकी थी। यहाँ इस कथा में केवल एक बालक का जन्म नहीं, बल्कि बुद्धि, विवेक और कर्मफल के सिद्धान्त की स्थापना होती है। यही कथा आगे चलकर बुध ग्रह के स्वरूप और उसके प्रभाव का आधार बनती है।
चंद्र वंश कथा का पहला भाग १-२२ श्लोक और दूसरा भाग श्लोक 23 से 42 तक पहले पब्लिश हो चूका है और यह तीसरा भाग (श्लोक 43–50 तक) है।
पुलस्त्य महर्षि ने जो श्लोक भीष्मजी को सुनाते हैं उसे हम हिंदी में बता रहें हैं –
1. तारा से बुध का जन्म(श्लोक 43–44)
पुलस्त्य महर्षि ने कथा को आगे बताते हुए गंगापुत्र भीष्म से कहा-
पुलस्त्य महर्षि ने कहा- संवत्सर के अन्त में द्वादशादित्य (12 आदित्य) के समान दिव्य, पीताम्बरधारी , दिव्य अलङ्कारों से अलङ्कृत सूर्य के समान बालक तारा के उदर से निकला । वह सभी शास्त्रों का ज्ञाता तथा हस्तिशास्त्र का प्रवर्तक था ॥४३-४४॥
जब पुलस्त्य महर्षि ने गंगापुत्र भीष्म को यह पावन कथा सुनाई, तब उन्होंने विशेष रूप से बुध का जन्म का दिव्य प्रसंग वर्णित किया। यह केवल एक साधारण जन्म नहीं था, बल्कि देवताओं और ऋषियों द्वारा प्रतीक्षित बुध का जन्म एक अद्भुत और अलौकिक घटना थी।
पुलस्त्य महर्षि ने कहा कि संवत्सर (एक वर्ष) के अंत में, शुभ नक्षत्रों और दिव्य योग के समय बुध का जन्म हुआ। तारा के उदर से जो बालक प्रकट हुआ, वह सामान्य शिशु नहीं था। बुध का जन्म ऐसे हुआ मानो द्वादश आदित्य (बारह आदित्य) का तेज एक साथ साकार हो गया हो। उस दिव्य बालक के अंग-प्रत्यंग से सूर्य के समान प्रकाश फैल रहा था।
बुध का जन्म दिव्य पीताम्बरधारी रूप में हुआ। उनके शरीर पर दिव्य अलंकार शोभायमान थे, जो यह संकेत दे रहे थे कि यह बालक असाधारण गुणों से युक्त है। देवताओं ने देखा कि बुध का जन्म केवल एक माता से उत्पन्न बालक का जन्म नहीं, बल्कि ज्ञान, बुद्धि और तेज के अवतरण का क्षण था।
पुलस्त्य महर्षि ने आगे बताया कि बुध का जन्म ऐसे समय हुआ जब समस्त दिशाएँ प्रकाशमय हो उठीं। देवगण, ऋषिगण और गंधर्व इस अद्भुत घटना के साक्षी बने। यह कहा गया कि बुध का जन्म समस्त शास्त्रों के ज्ञाता के रूप में हुआ — वह बालक वेद, वेदांग और समस्त विद्याओं में पारंगत होने वाला था।
केवल इतना ही नहीं, बुध का जन्म हस्तिशास्त्र के प्रवर्तक के रूप में भी माना गया। इसका अर्थ यह है कि भविष्य में वही ज्ञान और नीति के मार्गदर्शक बनेंगे। इस प्रकार बुध का जन्म केवल एक पारिवारिक प्रसंग नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय महत्व की घटना थी।
अंततः, बुध का जन्म यह दर्शाता है कि दिव्य संयोग से उत्पन्न संतति ज्ञान, तेज और नीति का प्रतीक बनती है। तारा के उदर से हुआ बुध का जन्म भारतीय पौराणिक परंपरा में एक उज्ज्वल अध्याय के रूप में स्मरण किया जाता है।
2. पिता को लेकर विवाद(श्लोक 45–46)
प्रख्यात राजवैद्य ने उसका नाम राजपुत्र रखा । राजा सोम का पुत्र होने के कारण बुध नाम का राजपुत्र हुआ ।॥४५॥ वह बालक सभी लोगों के तेज को तिरस्कृत कर रहा था ब्रह्मा आदि सभी देवता देवर्षियों के साथ, जब उस बालक का जातकर्म संस्कार हो रहा था तो बृहस्पति के घर आये ।॥४६॥
जब उस दिव्य तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, तब समस्त लोकों में आश्चर्य और कौतूहल फैल गया। उस अलौकिक बालक का तेज इतना प्रखर था कि वह उपस्थित सभी लोगों के प्रकाश को मानो तिरस्कृत कर रहा था। देवता, ऋषि और मुनि उसके असाधारण रूप और आभा को देखकर विस्मित थे।
प्रख्यात राजवैद्य ने शुभ मुहूर्त में उस बालक का नामकरण संस्कार किया। चूँकि वह राजा सोम (चंद्रदेव) से उत्पन्न माना जा रहा था, इसलिए उसे “बुध” नाम से संबोधित किया गया। इस प्रकार वह राजवंश में जन्मा हुआ राजपुत्र घोषित किया गया। “बुध” नाम स्वयं में बुद्धि, विवेक और ज्ञान का प्रतीक है, और बालक के दिव्य तेज को देखकर यह नाम अत्यंत उपयुक्त प्रतीत हुआ।
किन्तु उसी समय एक गंभीर प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ — उस बालक का वास्तविक पिता कौन है? तारा पहले से ही बृहस्पति की पत्नी थीं, और अब यह बालक सोम से संबंधित माना जा रहा था। यही कारण था कि इस जन्म ने देवताओं के मध्य एक सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण विवाद को जन्म दिया।
जब उस बालक का जातकर्म संस्कार संपन्न हो रहा था, तब ब्रह्मा, देवगण और देवर्षि भी वहाँ उपस्थित हुए। यह संस्कार अत्यंत विधिपूर्वक और वैदिक मंत्रों के साथ सम्पन्न किया गया। उसी अवसर पर बृहस्पति भी वहाँ आए। उनके आगमन से वातावरण में गंभीरता छा गई, क्योंकि अब यह प्रश्न और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आ गया कि बालक का पितृत्व किसे प्राप्त होगा।
बालक का अद्भुत तेज, उसकी दिव्य आभा और असाधारण प्रतिभा यह संकेत दे रही थी कि वह कोई साधारण संतान नहीं है। परंतु पिता को लेकर उत्पन्न यह विवाद देवताओं के लिए भी चिंतन का विषय बन गया। इस प्रकार, श्लोक 45–46 में वर्णित यह प्रसंग केवल नामकरण का वर्णन नहीं, बल्कि देवताओं के मध्य उत्पन्न एक महत्वपूर्ण पितृत्व-विवाद की भूमिका भी प्रस्तुत करता है।
3.ब्रह्मा द्वारा ग्रह पद(श्लोक 47–48)
उन लोगों ने तारा से पूछा कि यह किसका पुत्र है ? उस समय लज्जित होने के कारण उन लोगों के बार-बार पूछने पर भी वह नहीं बोली ॥४८॥ बहुत देर के बाद तारा ने कहा यह सोम का पुत्र है। ॥४७-४८॥
जब उस तेजस्वी बालक के पितृत्व को लेकर देवताओं के मध्य संशय उत्पन्न हुआ, तब सभी देवगण, ऋषिगण और स्वयं ब्रह्मा जी भी इस विषय को स्पष्ट करना चाहते थे। बालक का जातकर्म संस्कार सम्पन्न हो चुका था, किंतु यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित था कि यह दिव्य बालक किसका पुत्र है।
देवताओं ने तारा की ओर देखकर विनम्रतापूर्वक पूछा — “यह बालक किसका पुत्र है?” सभा में उपस्थित सभी देवर्षि और महर्षि इस उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे। उस समय तारा अत्यंत लज्जित और संकोच से भरी हुई थीं। परिस्थिति ऐसी थी कि सत्य प्रकट करना उनके लिए सरल नहीं था।
बार-बार पूछे जाने पर भी तारा मौन रहीं। उनका मौन ही उस समय की गंभीरता और आंतरिक द्वंद्व को प्रकट कर रहा था। देवताओं के प्रश्न बढ़ते गए, और वातावरण में एक प्रकार का तनाव छा गया। ब्रह्मा जी सहित सभी को सत्य जानना आवश्यक था, क्योंकि उसी के आधार पर बालक की सामाजिक और दैवी स्थिति निर्धारित होनी थी।
अंततः, बहुत देर तक मौन रहने के पश्चात तारा ने साहस जुटाया और स्पष्ट शब्दों में कहा — “यह सोम का पुत्र है।” तारा के इस कथन से सभा में उपस्थित सभी देवताओं को सत्य ज्ञात हो गया। अब यह निश्चित हो गया कि यह तेजस्वी बालक चंद्रदेव (सोम) का पुत्र है।
तारा के इस स्वीकारोक्ति के बाद विवाद का अंत हुआ। बालक का पितृत्व स्पष्ट होने पर ब्रह्मा जी ने उसके असाधारण तेज, ज्ञान और योग्यता को देखकर उसे ग्रहों में विशिष्ट स्थान प्रदान किया। इस प्रकार वह बालक “बुध” के नाम से प्रतिष्ठित हुआ और नवग्रहों में एक महत्वपूर्ण ग्रह पद प्राप्त किया।
इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि सत्य अंततः प्रकट होकर ही रहता है, और दिव्य गुणों से संपन्न व्यक्ति को उचित स्थान अवश्य प्राप्त होता है।
4. पृथ्वी का राज्य(श्लोक 49–50)
अतएव उसको चन्द्रमा ने ले लिया और उसका बुध नाम रखकर उन्होंने उसे पृथिवी का राज्य दे दिया ॥४९॥ चन्द्रमा ने उसका अभिषेक करके पृथिवी का राज्य दे दिया और ब्रह्माजी ने उसे ग्रहों के बीच एक ग्रह बना दिया ॥५०॥
जब तारा ने यह स्वीकार कर लिया कि वह तेजस्वी बालक सोम (चन्द्रमा) का ही पुत्र है, तब समस्त देवसभा में उत्पन्न विवाद शांत हो गया। सत्य स्पष्ट होते ही चन्द्रदेव ने आगे बढ़कर उस बालक को स्नेहपूर्वक अपने पास ले लिया। उस क्षण में पिता का वात्सल्य और गर्व दोनों स्पष्ट झलक रहे थे।
चन्द्रमा ने उस दिव्य बालक का नाम “बुध” रखा। यह नाम केवल एक संबोधन नहीं था, बल्कि उसकी विलक्षण बुद्धि, प्रखर तेज और ज्ञान के प्रतीक के रूप में दिया गया था। “बुध” शब्द का अर्थ ही है — बुद्धिमान, विवेकी और ज्ञान से युक्त। बालक के स्वरूप और गुणों को देखकर यह नाम पूर्णतः सार्थक सिद्ध हुआ।
इसके पश्चात चन्द्रदेव ने विधिपूर्वक उसका अभिषेक कराया। वैदिक मंत्रों, देवताओं की उपस्थिति और मंगल ध्वनियों के मध्य उस बालक को पृथ्वी के राज्य का अधिकार प्रदान किया गया। इस प्रकार बुध केवल देवपुत्र ही नहीं, बल्कि पृथ्वी के अधिपति भी घोषित किए गए। पृथ्वी का राज्य प्राप्त करना इस बात का प्रतीक था कि वह नीति, ज्ञान और धर्म के आधार पर शासन करने योग्य हैं।
इसी समय ब्रह्माजी ने भी उस अद्वितीय बालक के तेज और क्षमता को देखकर उसे नवग्रहों में स्थान प्रदान किया। ब्रह्मा जी ने उसे ग्रहों के मध्य एक विशिष्ट ग्रह पद दिया, जिससे वह “बुध ग्रह” के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इस प्रकार बुध को दोहरी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई — एक ओर पृथ्वी का राजत्व और दूसरी ओर आकाश मंडल में ग्रह पद।
“बुध का जन्म” प्रसंग दर्शाता है कि दिव्य गुणों से संपन्न व्यक्ति को लौकिक और दैवी दोनों क्षेत्रों में सम्मान प्राप्त होता है। बुध का पृथ्वी का राज्य प्राप्त करना और ग्रहों में स्थान पाना इस सत्य का प्रमाण है कि ज्ञान, विवेक और तेज अंततः सर्वोच्च पद तक ले जाते हैं।
“बुध का जन्म” कथा हमें सिखाती है कि जन्म की परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, कर्म और गुण ही व्यक्ति का वास्तविक परिचय होते हैं। बुध का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि विवाद से जन्मा बालक भी, यदि धर्म और विवेक से जुड़ जाए, तो वह सम्पूर्ण सृष्टि का पथप्रदर्शक बन सकता है।
यही है बुध का दर्शन — जहाँ बुद्धि है, वहीं मंगल है। 🌿
Source: पद्मपुराण
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