पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड

अध्याय 18: जालन्धर का शङ्करजी के साथ युद्ध


जय श्री हरी

जालन्धर का शङ्करजी के साथ युद्ध का बीज पहले ही रोपा जा चूका था। युद्ध के मैदान में शिवगण और असुरगण एक दूसरे पर पूरी शक्ति से प्रहार कर रहे थे। असुर सेना मरकर भी पुनर्जीवित हो जाते थे। लेकिन शिवगण घायल होने के बाद भी मरते नहीं थे। युद्ध का अंत ही नहीं हो पा रहा था। तभी महादेवजी ने एक ऐसी शक्ति उत्पन्न किये कि असुर सेना का पुनर्जीवन असंभव हो गया।

कार्तिकेय को युद्ध करते देखकर जालन्धर अपनी विशाल सेना के साथ स्वयं आ गया। अपने पुत्र के लिए चिंतित होकर शिवजी भी अपने गणों के साथ वहाँ पहुँच गए। इसके बाद दोनों पक्षों में अद्भुत और विभीषिकापूर्ण युद्ध शुरू हो गया. देवों और दैत्यों की सेनाएँ आपस में भीषण टकराईं। यहीं से जालन्धर का शङ्करजी के साथ युद्ध शुरू हुआ। जालन्धर का शङ्करजी के साथ युद्ध कथा आपको आपकी आँखों के सामने दिखाई देगी।

1. जालन्धर का शङ्करजी के साथ युद्ध  – मृत दैत्यों का पुनर्जीवन और शिवजी का आश्चर्य

जब भगवान शिव युद्ध के मैदान की ओर पलटकर पलटकर देखा तो आशचर्यचकित रह गए। .. पूरी मरी हुई सेना फिर से युद्ध के लिए तैयार खड़ी थी। शिवजी चकित हो गए -“ये मृत दानव फिर कैसे जीवित हो गए? कौन यह कर रहा है?”

उनकी आंखे खोजते हुए शुक्राचार्य को देखा, जो दैत्यों को जीवित करते हुए तेजी से इधर-उधर दैत्यों के लाशों के बीच घूम रहे थे। यह देखकर शिवजी क्रोधित हो उठे और उन्हें रोकने के लिए आगे बढ़े। शिवजी ने उन्हें दण्ड देने के लिए त्रिशूल उठाया, लेकिन शुक्राचार्य बोले -“हे देव! मैं एक ब्राह्मण हूँ। यदि आप मुझे मारेंगे तो आपको ब्रह्महत्या लगेगी।”

2. जालन्धर का शङ्करजी के साथ युद्ध  – शुक्राचार्य को दण्ड देने का प्रयास और ब्रह्महत्या का स्मरण

शुक्राचार्य की बात सुनकर शिवजी ठिठक गए। उन्हें वह समय याद आया जब उन्होंने ब्रह्माजी का एक सिर काट दिया था और ब्रह्महत्या का पाप उनके पीछे लग गया था। इसलिए उन्होंने त्रिशूल नीचे रख दिया। शिवजी ने सोचा, “ब्राह्मण को मारना उचित नहीं, पर दैत्यों को जीवित करने से भी रोकना होगा।”
3. जालन्धर का शङ्करजी के साथ युद्ध  – मानसरोवर युद्ध में जालन्धर की मायाशक्ति
नारदजी ने कहा- मानसरोवर के युद्ध में जालंधर ने अपनी माया शक्ति से शिवजी, माता पार्वती, गणेशजी, कार्तिकेय जी और शिवगणों को अलग थलग कर दिया था। जालंधर ने एक तरफ भगवान शिव और उनके गणों को शुम्भ के साथ युद्ध में व्यस्त कर दिया।

4. जालन्धर का शङ्करजी के साथ युद्ध  – जालन्धर का शिवरूप धारण कर पार्वती को भ्रमित करना

शुम्भ जालंधर का रूप बनाकर युद्ध कर रहा था और माया के प्रभाव से शिवजी उसे पहचान न सके। दूसरी ओर जालंधर स्वयं शिवजी का रूप बना लिया और वह अपने साथी दुर्वारण को नंदी बना दिया। दोनों देवी पार्वती के पास हार और पश्चाताप करते हुए पहुँच गए। देवी पार्वती शोक में डूब गई और इसका फायदा उठाते हुए शिवरूपी जालंधर ने उनके साथ रति क्रिया समबन्ध बनाने की कोशिश में जुट गया।

5. जालन्धर का शङ्करजी के साथ युद्ध  – वृंदा के पतिव्रत भंग से जालन्धर की माया क्षीण होना

देवी पार्वती जालंधर माया से भ्रमित हो गई थी लेकिन दूसरी ओर श्री हरी के द्वारा जालंधर की पत्नी देवी वृंदा का पतिव्रता धर्म भ्रष्ट हो किया गया। इसलिए अब देवी पार्वती पर जालंधर का माया प्रभाव धीरे धीरे कम होने लगा।

6. जालन्धर का शङ्करजी के साथ युद्ध  – पार्वती द्वारा जया को परीक्षा हेतु भेजना

जब वह मायावी जालन्धर, शंकर का रूप लेकर आया, और उसने माता पार्वती को देखा—तो पार्वतीजी भीतर से बहुत व्याकुल हो गईं। लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं कहा। वे वहां से दूर चली गई और अपने सखियों के साथ गंगा की धरा में स्नान की। वे सखियों के साथ उसमें स्नान करके निकलीं, अपने शरीर की पूजा करके गंगा तट पर बैठ गईं।

फिर पार्वतीजी ने अपनी सखी जया की ओर देखा और बोलीं; “सखि जया! जल्दी करो। तुम मेरा रूप धारण करके वहाँ जाओ और पता लगाओ कि यह सच में शिव हैं या कोई और मायावी। यदि वह तुम्हें पास खींचकर आलिंगन या चुम्बन करने लगे—तो समझ लेना कि वह कोई असुर है। लेकिन यदि वह तुम पर क्रोधित होकर तुम्हें डाँटे या भला-बुरा कहे— तो समझना कि वही मेरे शिव हैं।

7. जालन्धर का शङ्करजी के साथ युद्ध  – जया के माध्यम से जालन्धर का भेद खुलना

जब जया वहाँ पहुँची, तो कामवासना से ग्रस्त जालन्धर ने उसे पार्वती समझ लिया और उसे गले लगा लिया। ऐसा करते ही जालन्धर का तुरंत वीर्यस्खलन हो गया और उसकी शक्ति समाप्त हो गई।

वृंदा का पतिव्रता धर्म भ्रष्ट होते ही भगवान् शिव भी माया के भ्रम से बाहर आ गए और जालंधर के रूप बनाये शुम्भ को पहचान गए। जालंधर का सारा भेद खुल गया। उन्होंने कुछ ही क्षणों में जालंधर की असुर सेना का सर्वनाश कर दिया।

8. वृंदा के अपहरण का समाचार और जालन्धर का क्रोध

तभी जालंधर की पत्नी वृंदा के श्रीविष्णु भगवान द्वारा अपहरण करने की सुचना सुम्भ को मिला तो वह युद्ध छोड़कर रुक गया और तुरंत यह खबर चण्ड और मुण्ड के द्वारा जालंधर को भेजा।

चण्ड और मुण्ड ने जालन्धर से कहा; उधर सुना गया है कि भगवान विष्णु आपकी रानी वृन्दा को अपने लोक में ले गए हैं। इसलिए समय न गँवाएँ, युद्ध की तैयारी करें। या तो शिव को हराकर सर्वेश्वर बन जाएँ, या फिर उनके बाणों से मारे जाकर उनके लोक तक पहुँचें।”

यह सुनते ही जालन्धर का क्रोध भड़क उठा। आँखें लाल हो गईं और वह तुरंत पर्वत से नीचे उतर पड़ा। जब जालन्धर अपनी रानी वृन्दा के अपहरण से व्याकुल था, वह युद्धभूमि में पहुँचा।

9. शुम्भ का उत्तर और जालन्धर का उग्र संकल्प

वहाँ युद्ध के कारण चारों ओर शव, रक्त, मांस और भयावह दृश्य फैले हुए थे। पूरा मैदान डरावना हो चुका था। जालन्धर ने आगे देखा कि भगवान शिव अपने नंदी (वृष) पर बैठे हुए शांत हैं। उनके शरीर पर सर्प अलंकरण की तरह लिपटे थे, जटाओं पर चन्द्रमा सुशोभित था, और आँखों में अग्नि-सी चमक थी।

शिव युद्ध नहीं कर रहे थे, वे केवल प्रतीक्षा कर रहे थे जालन्धर ने अपने रथ पर चढ़कर शुम्भ से कहा— “तुमने तपस्वी को मारा क्यों नहीं?” शुम्भ ने विनम्रता से उत्तर दिया -“वह तपस्या से सिद्ध हुए हैं, उन्हें कोई नहीं मार सकता। युद्ध में अप्राजेय हैं।”

10. दैत्यों की विशाल सेना  शिव की ओर 

यह सुनकर जालन्धर क्रोध से भर गया। उसने अपना विशाल धनुष कालकेदार उठाया, दैत्यों की विशाल सेना से घिरा, और शिव की ओर बढ़ चला। जालन्धर ने मेघों की वर्षा की तरह बाणों की बौछार शुरू कर दी, पर शिवगणों ने उसे रोक लिया। तभी भगवान शिव क्रोधित हो उठे और उन्होंने अपने तीक्ष्ण बाणों से प्रहार करना शुरू किया।

11. जालन्धर और शिवगणों के बीच भयंकर बाणवर्षा

शिवजी के प्रहार से जालन्धर का कवच टूटकर गिर पड़ा। फिर भी वह बिना कवच के पर्वत की तरह अडिग खड़ा रहा। परंतु भगवान शिव के लगातार बाणों से उसका शरीर छलनी हो गया। रक्त इतना बहने लगा कि धरती लाल हो गयी। देवता आश्वस्त हो गये, दानव डरकर पीछे हटने लगे। युद्ध का रूप और भी बढ़ गया।

तभी जालन्धर ने चुनौती देते हुए कहा; “तुम महान धनुर्धर हो, पर अब मैं तुम्हारा अन्त कर दूँगा!” यह कहकर उसने और अधिक बाण बरसाए और शिवजी के शरीर को चारों ओर से छेद दिया। लेकिन शिवजी हजारों-करोड़ों बाणों से भी अलंकृत-से लग रहे थे. उनकी शक्ति अडिग थी।

जालन्धर के बाणों से शिवजी का पूरा अस्तित्व ऐसे ढक गया था जैसे आकाश पक्षियों से या पर्वत वृक्षों से ढक जाते हैं। यह देखकर वीरभद्र क्रोध से भरकर जालन्धर पर टूट पड़े। अपने अप्रमेय पराक्रम से उन्होंने जालन्धर को अत्यंत घायल कर दिया।

12. वीरभद्र और जालन्धर का प्रचण्ड द्वंद्व

जालन्धर क्रोध से भर गया। उसने इतनी तेज़ी से बाण चलाए कि वीरभद्र का धनुष, बाण, छत्र, सारथि और पूरा रथ तिल की तरह कट गया। रथ टूट जाने के बाद भी वीरभद्र नहीं रुके।

उन्होंने गदा उठाई और जालन्धर पर जोरदार हमला किया। जालन्धर भी कम नहीं था। उसने अपनी गदा से प्रहार किया और वीरभद्र जमीन पर गिर पड़े। वीरभद्र को मूर्छित देख मणिभद्र क्रोध से भरकर जालन्धर की ओर दौड़े।

13. मणिभद्र का हस्तक्षेप और पर्वत प्रहार

जालन्धर ने तुरंत मणिभद्र पर बाण बरसाए और उन्हें पूरी तरह असहाय कर दिया। इस बीच वीरभद्र होश में आए और सिंह की तरह गर्जना करते हुए फिर से युद्ध में कूद पड़े।

वीरभद्र और मणिभद्र दोनों ने मिलकर आकाश में खड़े जालन्धर पर दो विशाल पर्वत फेंके। पर्वत उसके शरीर पर गिरे, फिर भी वह डिगा नहीं। इसके बाद वीरभद्र ने मुक्का मारकर जालन्धर को घायल किया। मणिभद्र ने तो उससे भी बढ़कर—जालन्धर के पैर पकड़कर उसे हवा में घुमाना शुरू कर दिया!

फिर भी जालन्धर अत्यन्त बलवान था। उसने मणिभद्र को पैर मारकर गिरा दिया और उसके बाद मुक्का मारकर फिर से वीरभद्र को धराशायी कर दिया।

14. नन्दिकेश्वर और शुम्भ की सेनाओं का आमना-सामना

इसी बीच नन्दिकेश्वर कई शिवगणों के साथ युद्धभूमि में पहुँचे। उन्हें देखकर शुम्भ भी अपनी सेना के साथ आ गया और दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया।

15. देव–दैत्य युद्ध के विभिन्न जोड़ों का संग्राम

अब युद्ध कई जोड़ों में बंट गया. शुम्भ शिला के साथ लड़ रहा था, राहु महाकाल से, निशुम्भ कोलाहल से, केतु काल से, शैलोदर कार्तिकेय से, जम्भ माल्यवान से, महापार्श्व चण्ड से, चण्डीश रोमकण्टक से, विकटास्य भृंगी से, और उरुनेत्र विनायक (गणेश) से भिड़ रहा था।

युद्ध इतना भीषण था कि हर तरफ़ शक्ति और विनाश का तांडव दिखाई दे रहा था। इस दौरान शुम्भ के बाणों से घायल शिलाद ने अपने वानर-से मुख से एक पर्वत शिखर को चूर–चूर कर दिया। क्रोधित शुम्भ ने अपनी शक्ति से उस पर प्रहार किया।

दूसरी ओर महाकाल ने राहु को मार गिराया। फिर शक्ति और महापर्वत ने राहु के रथ को भी नष्ट कर दिया। उधर निशुम्भ ने प्रतापी कोलाहल को मारकर युद्धभूमि को और भी डरावना बना दिया।

16. निशुम्भ और कोलाहल का भीषण युद्ध

युद्ध मैदान में चारों ओर धूल, गर्जना और अस्त्र–शस्त्रों की चमक फैली हुई थी। कोलाहल और निशुम्भ के बीच भीषण युद्ध चल रहा था। सबसे पहले निशुम्भ ने अपनी शक्ति (शस्त्र) से कोलाहल के सारथि और रथ पर प्रहार किया।

प्रहार इतना जोरदार था कि कोलाहल का पूरा रथ टूट गया और वह रथ से नीचे आ गया। रथ न रहने पर कोलाहल अत्यन्त क्रोधित हो उठा।

उसी समय, हजार फणों वाले असुरेन्द्र ने कोलाहल पर वार किया और उसे कुछ देर के लिए मूर्छित कर दिया। परन्तु वह जल्दी ही होश में आया और तुरंत अपने रथ से उतरकर तलवार और ढाल लेकर सामने खड़े निशुम्भ पर टूट पड़ा।

कोलाहल ने अपनी तलवार से निशुम्भ के रथ को टुकड़े–टुकड़े कर दिया। फिर वह तुरंत दूसरे रथ पर चढ़ा और वहां से निशुम्भ पर बाणों की वर्षा कर दी। निशुम्भ को कोलाहल का यह पराक्रम देखकर आश्चर्य हुआ, पर उसने भी क्रोध में अपनी शक्ति उठाई और कोलाहल के रथ और उसके घोड़ों को नष्ट कर दिया।

रथ टूटते ही कोलाहल फिर पैदल हो गया, लेकिन इससे वह और भी उग्र हो गया। वह दौड़कर निशुम्भ के पास पहुँचा और अपनी बाहों से निशुम्भ के रथ को दबाकर चूर–चूर कर दिया।

17. केतु, काल और कोलाहल का टकराव

निशुम्भ के बाद कोलाहल ने युद्ध में केतु पर हमला किया। उसने केतु की पूँछ पकड़कर उसे हवा में घुमाना शुरू कर दिया। केतु को छुड़ाने के लिए काल ने एक बड़ा पर्वत उठाकर कोलाहल पर फेंका, लेकिन कोलाहल ने उस पर्वत को भी पल भर में तोड़ दिया।

पर्वत टूटकर बिखर गया तो कोलाहल ने एक जोरदार मुक्का केतु को मारा। केतु ने भी कोलाहल के अंग–अंग को चोट पहुँचाई, जिससे काल डरकर युद्धभूमि से भाग निकला।

18. कार्तिकेय द्वारा शैलोदर का वध

उधर शैलोदर ने अपनी गदा उठाकर कार्तिकेय (स्कन्द) के सीने पर प्रहार किया। कार्तिकेय ने तुरंत प्रत्युत्तर दिया और अपनी शक्ति से प्रहार करके शैलोदर को जमीन पर गिरा दिया।

शक्ति के इस प्रहार से शैलोदर वहीं मारा गया। उस दानव को गिरते देखकर षडानन (कार्तिकेय) ने वैसी ही प्रचण्ड गर्जना की जैसी उन्होंने कभी क्रौञ्च पर्वत को फोड़ते समय की थी।

इधर युद्ध के दूसरे हिस्से में माल्यवान् ने बाणों की वर्षा करके जम्भ को घायल किया। जम्भ ने भी तीखे बाण चलाकर माल्यवान् को मूर्छित कर दिया।

19. चण्ड, महापार्श्व और रोमकण्ठ का संघर्ष

महेपार्श्व नामक दानव ने युद्ध में अत्यन्त रोष में आकर अश्वहीन रथ को उठाया और उसे हवा में ले जाकर चण्ड के ऊपर दे पटका। चण्ड ने रथ को टूटते देखा तो वह क्रोधित होकर अपने हाथी को उठाया, पर उसी समय महपार्श्व आया जिसे चण्ड ने गदा से मार दिया।

परन्तु महापार्श्व उस प्रहार की परवाह किए बिना चण्ड पर टूट पड़ा और एक भारी मुक्का मारकर उसे गिरा दिया।

उधर चण्डीश के शस्त्रों से घायल रोमकण्ठ असुर ने क्रोध में आकर चण्डीश के पैर पकड़ लिए और उन्हें उठाकर उनके रथ पर पटक दिया। चण्डीश नीचे गिर पड़े और तभी पास खड़े भयंकर–नेत्र असुर उनकी ओर दौड़ पड़ा।

20. उरुनेत्र और गणेशजी का भयंकर युद्ध

युद्ध के बीच उरुनेत्र नाम का दैत्य लम्बोदर (गणेशजी) पर टूट पड़ा। उसने बाणों से गणेशजी को घायल किया और फिर अपने विशाल दाँतों से उनके सीने पर प्रहार करके उन्हें गिरा दिया।

इसके बाद उरुनेत्र क्षणभर में क्षान्ति के रथ पर चढ़ गया और उसने गणेशजी के सिन्दूर लगे मस्तक पर एक भारी गदा (मुद्गर) से वार किया। गणेश्वर ने भी प्रत्युत्तर में अपना पट्टिश उठाया और उरुनेत्र के हृदय पर प्रहार किया।

21. नवशीर्ष असुर का प्रकट होना और उसका संहार

गणेश्वर द्वारा पट्टिश से उरुनेत्र के हृदय पर प्रहार होते ही उसी समय एक भयावह दृश्य हुआ— उरुनेत्र के मुख से नौ सिरों वाला, अठारह भुजाओं वाला एक महा-असुर प्रकट हुआ। दोनों—उरुनेत्र और वह नवशीर्ष—गणेशजी पर एक साथ टूट पड़े। गणेशजी का शरीर अनेक प्रहारों से जर्जर हो गया। क्रुद्ध होकर उन्होंने अपना परशु उठा लिया और दोनों असुरों के हथियारों को काट डाला।

22. कार्तिकेय का पुनः आगमन और उरुनेत्र का अंत

तभी कार्तिकेय (स्कन्द) युद्धभूमि में पहुँचे। उन्होंने तुरंत नवशीर्ष पर प्रहार किया और उसे वहीं मार गिराया। फिर उन्होंने उरुनेत्र पर हमला किया और अपनी शक्ति (भाला) से उरुनेत्र को भी नीचे गिरा दिया।

23. शिव और जालन्धर का प्रत्यक्ष महासंग्राम

कार्तिकेय को युद्ध करते देखकर जालन्धर अपनी विशाल सेना के साथ स्वयं आ गया। अपने पुत्र के लिए चिंतित होकर शिवजी भी अपने गणों के साथ वहाँ पहुँच गए। इसके बाद दोनों पक्षों में अद्भुत और विभीषिकापूर्ण युद्ध शुरू हो गया. देवों और दैत्यों की सेनाएँ आपस में भीषण टकराईं।

24. जालन्धर का प्रचण्ड बाण और शिवजी का दिव्य अस्त्र

शिवजी और जालन्धर के युद्ध का प्रभाव इतना प्रचण्ड था कि जैसे धरती और आकाश दोनों ही थर्रा उठे हों। क्रोधित जालन्धर ने एक अत्यन्त शक्तिशाली बाण उठाया, जो लाखों धारों से चमक रहा था। उसने यह बाण शिवजी के ललाट पर चलाया। बाण जाकर शिवजी के मस्तक में गहराई तक धँस गया और चन्द्रमा के समान चमकने लगा; मानो सूर्यास्त के समय क्षितिज पर चमकता उजाला।

इसके बाद शिवजी ने भी एक अत्यन्त प्रचण्ड अस्त्र उठाया। उसमें पवन, अग्नि, सूर्य, काल और पृथ्वी की सम्मिलित शक्ति मौजूद थी। उन्होंने वह घातक बाण जालन्धर के हृदय में उतार दिया।

25. जालन्धर का भूमि पर गिरना और दैत्यों की व्याकुलता

बाण सीने में लगते ही जालन्धर का रक्त बहने लगा। वज्र से चोट खाए पर्वत की तरह वह युद्धभूमि में गिर पड़ा। दैत्य चीखने लगे और शिवगण गर्जना करने लगे। जालन्धर के गिरते ही उसकी सुरक्षा के लिए दानव उसे घेरकर खड़े हो गए। कुछ रक्षा करने लगे, कुछ शिवजी को रोकने लगे।

जालन्धर के मूर्छित रहने तक शिवजी ने उसके चारों ओर खड़ी उसकी सेना का संहार कर दिया। बहुत देर बाद जब जालन्धर को होश आया, तो उसने देखा कि उसकी पूरी सेना मारी जा चुकी है और जो बची थी वह भय से भाग रही थी। यह देखकर वह अत्यन्त भयभीत हो गया।

26. जालन्धर का गुरु शुक्राचार्य का स्मरण

अंत में जालन्धर ने मन से अपने गुरु शुक्राचार्य का स्मरण किया. मानो उनसे शक्ति और रक्षण की याचना कर रहा हो। जालन्धर ने जब अपनी पूरी सेना को मरा हुआ देखा, तो वह घबरा गया और मन ही मन अपने गुरु शुक्राचार्य का स्मरण किया।

स्मरण करते ही शुक्राचार्य तुरंत उसके सामने प्रकट हो गए। उन्होंने जालन्धर को आशीर्वाद दिया और पूछा, “बताइए राजा, आपको मुझसे क्या चाहिए?”

27. शुक्राचार्य द्वारा संपूर्ण दैत्यसेना का पुनर्जीवन

जालन्धर ने सम्मानपूर्वक अपने गुरु शुक्राचार्य को प्रणाम किया और कहा—“गुरुदेव, कृपा करके मेरी मरी हुई सेना को फिर से जीवित कर दें।” शुक्राचार्य ने चारों ओर देखा। युद्धभूमि में अनगिनत दानवों के शरीर, रथ, हथियार एक-दूसरे के ऊपर ऐसे पड़े थे कि मानो धरती पूरी भर गई हो।

सैकड़ों योजन तक केवल शव, रथ और टूटी हुई सेनाएँ दिखाई दे रही थीं। शुक्राचार्य ने अपनी विद्या का प्रयोग किया, जल छिड़का, और क्षणभर में सारी दैत्य सेना पुनः जीवित हो उठी।

28. शिवजी का पुनः आश्चर्य और शुक्राचार्य को रोकने का प्रयास

इतने में शिवजी अपनी जटा को सर्प-बन्धन से कस रहे थे, और जब उन्होंने पलटकर देखा तो पूरी मरी हुई सेना फिर से युद्ध के लिए तैयार खड़ी थी।

शिवजी चकित हो गए— “ये मृत दानव फिर कैसे जीवित हो गए? कौन यह कर रहा है?” उन्होंने खोजते हुए शुक्राचार्य को देखा, जो दैत्यों को जीवित करते हुए तेजी से इधर-उधर घूम रहे थे। यह देखकर शिवजी क्रोधित हो उठे और उन्हें रोकने के लिए आगे बढ़े।

29. ब्रह्महत्या के भय से शिवजी का संयम

शिवजी ने उन्हें दण्ड देने के लिए त्रिशूल उठाया, लेकिन शुक्राचार्य बोले— “हे देव! मैं एक ब्राह्मण हूँ। यदि आप मुझे मारेंगे तो आपको ब्रह्महत्या लगेगी।”

शुक्राचार्य की बात सुनकर शिवजी ठिठक गए। उन्हें वह समय याद आया जब उन्होंने ब्रह्माजी का एक सिर काट दिया था और ब्रह्महत्या का पाप उनके पीछे लग गया था। इसलिए उन्होंने त्रिशूल नीचे रख दिया।

30. शिव के तीसरे नेत्र से कृत्या का प्रकट होना

शिवजी ने सोचा— “ब्राह्मण को मारना उचित नहीं, पर दैत्यों को जीवित करने से भी रोकना होगा।”

तभी शिवजी के तीसरे नेत्र से एक भयानक कृत्या उत्पन्न हुई — नग्न, उग्र, खुले हुए केश, विशाल पेट, लम्बे स्तन, रक्त से भरे दाँतों वाली भयंकर योनि और डरावनी आँखें।

31. कृत्या को शुक्राचार्य को बन्दी बनाने का आदेश

दृश्य अत्यन्त भयावह था। कृत्या ने शिवजी से पूछा— “आज्ञा दें, प्रभु! मैं क्या करूँ?”

शिवजी ने आदेश दिया— “कृत्ये! इस दुष्ट शुक्राचार्य को पकड़कर अपनी योनि में डाल दो। और जब तक मैं जालन्धर को मार न दूँ, इन्हें अपनी योनि में ही बंद रखो। जालन्धर के नाश के बाद इन्हें बाहर निकाल देना।”

32. कृत्या द्वारा शुक्राचार्य का निग्रह

दोस्तों, भगवान् शिव ने ऐसा इसलिए कहा कि जब जालंधर और उसकी असुर सेना जब जीवित ही नहीं रहेगा तो शुक्राचार्य से जीवन का वरदान मांगेगा कौन?

अतः आदेश सुनते ही कृत्या शुक्राचार्य की ओर दौड़ी। उसे आते देख शुक्राचार्य जमीन पर गिर पड़े, लेकिन कृत्या ने उनके बाल पकड़कर उन्हें घसीटा, फिर भयावह हँसी के साथ उन्हें अपनी योनि में समा लिया।

33. गुरु-विहीन जालन्धर का भय और कृत्या का अन्तर्धान

जालन्धर यह देखकर दहशत में भर उठा। वह तुरंत बाणों का संधान करने लगा, लेकिन उससे पहले कृत्या वहाँ से अन्तर्धान हो गई अपने साथ गुरु शुक्राचार्य को लेकर।

मित्रों युद्ध कथा यहीं ख़त्म नहीं हुई आगे की कथा देखिए अगले पोस्ट में।

इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के छठे उत्तर खण्ड के जालन्धरोपाख्यानान्तर्गत शुक्राचार्य के योनि में प्रवेश नामक अठारहवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।१८।।

Source: पद्मपुराण

ॐ नमः शिवाय 🙏 जय श्रीहरि 🙏

 

जालन्धर का शङ्करजी के साथ युद्ध - स्वर्णिम आकाश के नीचे युद्धभूमि में एक वृषभ-मुखी दिव्य योद्धा गदा लिए एक क्रोधी असुर योद्धा से तलवार के साथ युद्ध करता हुआ, पौराणिक महायुद्ध का दृश्य।
जब धर्म और अहंकार आमने-सामने होते हैं, तब युद्ध केवल रणभूमि में नहीं, चेतना में लड़ा जाता है।