Current image: सिंहासन पर विराजमान भगवान विष्णु का दिव्य स्वरूप, चारों ओर पुरुष और महिलाएँ आरती और पूजा करते हुए, मंदिर के स्वर्णिम वातावरण में भक्ति दृश्य

“जय श्रीहरि!
आज हम श्रवण करेंगे श्रीविष्णु सहस्रनाम — वे 1000 दिव्य नाम, जो स्वयं भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को श्रीकृष्ण की उपस्थिति में बताए।
यह स्तोत्र न केवल भगवान विष्णु की महिमा है, बल्कि यह हमारे चित्त को शुद्ध करने वाला, पापों का नाश करने वाला, और मोक्ष प्रदान करने वाला स्तुति-पथ है।
आइए, श्रद्धा, भक्ति और मन की एकाग्रता के साथ इन नामों का जाप करें।”

Vishnu Sahasranamam: श्रीहरि के सहस्र नामों में अनंत शक्ति का स्त्रोत

नामों में है भगवान, और भगवान में है सब कुछ…”

श्रीविष्णु सहस्रनाम — एक ऐसा दिव्य स्तोत्र, जिसमें भगवान विष्णु के 1000 पावन नाम सम्मिलित हैं। यह न केवल स्तुति है, बल्कि एक जीवित चेतना है — जो हर नाम के साथ आपको परमात्मा से जोड़ती है।

हर नाम एक दीपक है,
हर जाप एक साक्षात्कार है,
और हर श्वास में विष्णु का वास है।

यहाँ प्रस्तुत है विष्णु सहस्रनाम का पूर्ण जाप — शुद्ध उच्चारण, शांत संगीत और दिव्य भावों के साथ। ध्यान, आराधना, और आत्मिक शांति की खोज में यह स्तोत्र एक अद्भुत साधन है।

🔱 क्यों सुनें विष्णु सहस्रनाम?

  • मानसिक और आत्मिक शांति के लिए
  • रोग, भय, और संकटों से मुक्ति हेतु
  • ध्यान और भक्ति साधना में गहराई के लिए
  • श्रीहरि की कृपा और जीवन में शुभता के लिए

आइए, निर्मल हृदय और एकाग्र मन से
भगवान श्रीहरि का ध्यान करें —

🎧 यहाँ सुनें सम्पूर्ण विष्णु सहस्रनाम – एक बार में 1000 नामों का दिव्य जाप: Video Link- https://youtu.be/ugDJSnzUHxc

आइए, निर्मल हृदय और एकाग्र मन से इन श्लोकों पढ़ते हुए
भगवान श्रीहरि का ध्यान करें —

विष्णुसहस्त्रनाम स्तोत्रम – श्लोक रूप में नाम जप 
 
ॐ शुक्लाम्बरधरम् विष्णुम् शशिवर्णम् चतुर्भुजम् । 
प्रसन्नवदनम् ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ 1 ॥

व्यासम् वशिष्ठरनप्तारम् शक्ते:पौत्रमकल्मषम्।
पराशरात्मजं वंदे शुकतातम् तपोनिधिम् ॥ 2 ॥
 
व्यासाय् विष्णुरुपाय व्यासरूपाय विष्णवे। 
नमो वै ब्रम्हनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ 3 ॥
 
अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने। 
सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ 4 ॥
 
यस्य स्मरणमात्रेण जन्मा संसारबन्धनात्। 
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ 5 ॥
ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे।

श्री वैशम्पायन उवाच 
श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः । 
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ 7 ॥

युधिष्ठिर उवाच 
किमेकं दैवतं लोके किं वा‌प्येकं परायणम् । 
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ 8 ॥

को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः । 
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ 9 ॥

श्री भीष्म उवाच 
जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् । 
स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ 10 ॥

तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । 
ध्यायन् स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ 11 ॥

अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । 
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ 12 ॥

ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । 
लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूत भवोद्भवम् ॥ 13 ॥

एष मे सर्व धर्माणां धर्मो‌ऽधिकतमोमतः । 
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ 14 ॥

परमम् यो महत्तेजः परमम् यो महत्तपः ।
परमम् यो महद्ब्रह्म परमम् यः परायणम् । 15 ॥

पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् । 
दैवतं देवतानां च भूतानां यो‌ऽव्ययः पिता ॥ 16 ॥

यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादि युगागमे । 
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ 17 ॥

तस्य लोक प्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते । 
विष्णोर्नाम सहस्रं मे श्रुणु पाप भयापहम् ॥ 18 ॥

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः । 
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ 19 ॥

ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः । 
छन्दो‌ऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥ 20 ॥

अमृतां शूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः । 
त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते ॥ 21 ॥

विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् ॥ 
अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् ॥ 22 ॥

पूर्वन्यासः 
पूर्वन्यास का अर्थ है — स्तोत्र के जप से पहले उसकी दिव्य शक्ति, ऋषि, छंद, देवता आदि का स्मरण करना। यह साधक को मानसिक और आध्यात्मिक रूप से तैयार करता है।
 
अस्य श्री विष्णोर्दिव्य सहस्रनाम स्तोत्र महामन्त्रस्य ॥ 
श्री वेदव्यासो भगवान् ऋषिः । 
अनुष्टुप् छन्दः । 
श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता । 
अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम् । 
देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः । 
उद्भवः, क्षोभणो देव इति परमोमन्त्रः । 
शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम् । 
शार्ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम् । 
रथाङ्गपाणि रक्षोभ्य इति नेत्रम् । 
त्रिसामासामगः सामेति कवचम् । 
आनन्दं परब्रह्मेति योनिः । 
ऋतुस्सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः ॥ 
श्रीविश्वरूप इति ध्यानम् । 
श्री महाविष्णु प्रीत्यर्थे सहस्रनाम जपे विनियोगः ।

“अस्य श्री विष्णोर्दिव्य सहस्रनाम स्तोत्र महामन्त्रस्य…”

  • इस दिव्य विष्णु सहस्रनाम महामंत्र के

  • ऋषि हैं – भगवान वेदव्यास (जिन्होंने इसे प्रकट किया)।

  • छन्द है – अनुष्टुप् (श्लोक की काव्य संरचना)।

  • देवता हैं – श्रीमहाविष्णु, परमात्मा, श्रीमन्नारायण।

  • बीज है – “अमृतांशूद्भवो भानुः” (जो अमृत और प्रकाश के स्रोत हैं)।

  • शक्ति है – “देवकीनन्दनः स्रष्टा” (सृष्टि करने वाले श्रीकृष्ण)।

  • परम मंत्र है – “उद्भवः, क्षोभणो देव” (सृष्टि के उत्पत्ति और संचालन करने वाले)।

  • कीलक (मंत्र की गुप्त शक्ति) – शंख, चक्र, नन्दकी धारण करने वाले।

  • अस्त्र – शार्ङ्गधनुष और गदा धारण करने वाले।

  • नेत्र – रथाङ्गपाणि (चक्रधारी) जो रक्षा करते हैं।

  • कवच – त्रिसामा (तीनों वेदों के सामस्वरूप)।

  • योनि – आनंदस्वरूप परब्रह्म।

  • दिग्बन्ध – कालस्वरूप सुदर्शन।

  • ध्यान – विश्वरूप भगवान।

अंत में —
यह जप भगवान महाविष्णु की प्रसन्नता के लिए किया जाता है।

भावार्थ:
साधक यह स्वीकार करता है कि यह स्तोत्र कोई साधारण रचना नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा की दिव्य ऊर्जा से युक्त महामंत्र है।


ध्यानम्: 
क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकते मौक्तिकानां
मालाक्लुप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैमौर्तिकैमण्डितांगः।
शुभ्रैरभ्रैरदभ्रै रुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूषवर्षैः
आनन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदाशङखपाणिर्मुकुन्दः॥

अर्थ: क्षीरसागर के पवित्र तट पर, जहाँ रेत मणियों और मोतियों से चमक रही है, जो मोतियों की माला से सजे आसन पर विराजमान हैं, जिनका शरीर स्फटिक मणि के समान उज्ज्वल और आभूषणों से विभूषित है, जिनके ऊपर श्वेत मेघ अमृतमयी वर्षा कर रहे हैं। कमल, गदा और शंख धारण करने वाले, शत्रुओं का नाश करने वाले, आनंदस्वरूप भगवान मुकुन्द हमें पवित्र करें।

भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलचन्द्रसूर्यौ च नेत्रे
कर्णावाशाः शिरोद्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः।
अन्तस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः
चित्रंरंरम्यते तं त्रिभुवनवपुषं विष्णुमीशम् नमामि॥

अर्थ: जिनके चरण ही पृथ्वी हैं, जिनकी नाभि आकाश है, जिनकी आँखें सूर्य और चन्द्रमा हैं, और वायु उनका प्राण है, जिनके कान दिशाएँ हैं, जिनका सिर स्वर्ग है, जिनका मुख अग्नि है, समुद्र जिनका वस्त्र है, और जिनके भीतर सम्पूर्ण विश्व स्थित है। देवता, मनुष्य, पक्षी, पशु, सर्प, गन्धर्व और दैत्य आदि सब उन्हीं में स्थित हैं। ऐसे तीनों लोकों को शरीर रूप में धारण करने वाले, विश्वरूप भगवान विष्णु को मैं नमस्कार करता हूँ।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम्।
लक्ष्मिकान्तं कमलनयनं योगिहृद्द्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

मेघश्यामं पीतकौशेयवासं श्रीवत्साङकं कौस्तुभोद्भासिताङगं।
पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम्॥

नमः समस्तभूतानामादि भूतायभूभृते।
अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे॥

सशङखचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणं।
सहारवक्षस्थलशोभिकौस्तुभं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥

छायायां पारिजातस्य हेम्सिंहासनोपरि।
आसीनमंबूदश्याममायाताक्षमलंकृतम्॥

चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङकितवक्षसम्।
रुक्मिणीसत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये॥

ॐ विश्वम् विष्णु: वषट्कारो भूतभव्यभवतप्रभुः ।
भूतकृत भूतभृत भावो भूतात्मा भूतभावनः ।। 1 ।।
 
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः।
अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च ।। 2 ।।
 
योगो योग-विदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंह-वपुः श्रीमान केशवः पुरुषोत्तमः ।। 3 ।।
 
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणु: भूतादि: निधि: अव्ययः ।
संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभु: ईश्वरः ।। 4 ।।
 
स्वयंभूः शम्भु: आदित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादि-निधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ।। 5 ।।
 
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभो-अमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ।। 6 ।।
 
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतः त्रिककुब-धाम पवित्रं मंगलं परं ।। 7।।
 
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्य-गर्भो भू-गर्भो माधवो मधुसूदनः ।। 8 ।।
 
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृति: आत्मवान ।। 9 ।।
 
सुरेशः शरणं शर्म विश्व-रेताः प्रजा-भवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ।। 10 ।।
 
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादि: अच्युतः ।
वृषाकपि: अमेयात्मा सर्व-योग-विनिःसृतः ।। 11 ।।
 
वसु: वसुमनाः सत्यः समात्मा संमितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ।। 12 ।।
 
रुद्रो बहु-शिरा बभ्रु: विश्वयोनिः शुचि-श्रवाः ।
अमृतः शाश्वतः स्थाणु: वरारोहो महातपाः ।। 13 ।।
 
सर्वगः सर्वविद्-भानु: विष्वक-सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविद-अव्यंगो वेदांगो वेदवित् कविः ।। 14 ।।
 
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृता-कृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूह:-चतुर्दंष्ट्र:-चतुर्भुजः ।। 15 ।।
 
भ्राजिष्णु भोजनं भोक्ता सहिष्णु: जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ।। 16 ।।
 
उपेंद्रो वामनः प्रांशु: अमोघः शुचि: ऊर्जितः ।
अतींद्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ।। 17 ।।
 
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः।
अति-इंद्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ।। 18 ।।
 
महाबुद्धि: महा-वीर्यो महा-शक्ति: महा-द्युतिः।
अनिर्देश्य-वपुः श्रीमान अमेयात्मा महाद्रि-धृक ।। 19 ।।
 
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानंदो गोविंदो गोविदां-पतिः ।। 20 ।।
 
मरीचि: दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ।। 21 ।।
 
अमृत्युः सर्व-दृक् सिंहः सन-धाता संधिमान स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ।। 22 ।।
 
गुरुःगुरुतमो धामः सत्यः सत्य-पराक्रमः ।
निमिषो-अ-निमिषः स्रग्वी वाचस्पति: उदार-धीः ।। 23 ।।
 
अग्रणी: ग्रामणीः श्रीमान न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्र-मूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात ।। 24 ।।
 
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सं-प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निः अनिलो धरणीधरः ।। 25 ।।
 
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृक्-विश्वभुक्-विभुः ।
सत्कर्ता सकृतः साधु: जह्नु:-नारायणो नरः ।। 26 ।।
 
असंख्येयो-अप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्ट-कृत्-शुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ।। 27।।
 
वृषाही वृषभो विष्णु: वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुति-सागरः ।। 28 ।।
 
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेंद्रो वसुदो वसुः ।
नैक-रूपो बृहद-रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ।। 29 ।।
 
ओज: तेजो-द्युतिधरः प्रकाश-आत्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मंत्र: चंद्रांशु: भास्कर-द्युतिः ।। 30 ।।
 
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिंदुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्य-धर्म-पराक्रमः ।। 31 ।।
 
भूत-भव्य-भवत्-नाथः पवनः पावनो-अनलः ।
कामहा कामकृत-कांतः कामः कामप्रदः प्रभुः ।। 32 ।।
 
युगादि-कृत युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजित्-अनंतजित ।। 33 ।।
 
इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शिखंडी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत कर्ता विश्वबाहु: महीधरः ।। 34 ।।
 
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपाम निधिरधिष्टानम् अप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ।। 35 ।।
 
स्कन्दः स्कन्द-धरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद भानु: आदिदेवः पुरंदरः ।। 36 ।।
 
अशोक: तारण: तारः शूरः शौरि: जनेश्वर: ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ।। 37 ।।
 
पद्मनाभो-अरविंदाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत ।
महर्धि-ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुड़ध्वजः ।। 38 ।।
 
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षण लक्षण्यो लक्ष्मीवान समितिंजयः ।। 39 ।।
 
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतु: दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवान-अमिताशनः ।। 40 ।।
 
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ।। 41 ।।
 
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो-ध्रुवः ।
परर्रद्वि परमस्पष्टः तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ।। 42 ।।
 
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयो-अनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठ: धर्मो धर्मविदुत्तमः ।। 43 ।।
 
वैकुंठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ।। 44।।
 
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्व-दक्षिणः ।। 45 ।।
 
विस्तारः स्थावर: स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम ।
अर्थो अनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ।। 46 ।।
 
अनिर्विण्णः स्थविष्ठो-अभूर्धर्म-यूपो महा-मखः ।
नक्षत्रनेमि: नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ।। 47 ।।
 
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमं ।। 48 ।।
 
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत ।
मनोहरो जित-क्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ।। 49 ।।
 
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ।। 50 ।।
 
धर्मगुब धर्मकृद धर्मी सदसत्क्षरं-अक्षरं ।
अविज्ञाता सहस्त्रांशु: विधाता कृतलक्षणः ।। 51 ।।
 
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद गुरुः ।। 52 ।।
 
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीर भूतभृद्भोक्ता कपींद्रो भूरिदक्षिणः ।। 53 ।।
 
सोमपो-अमृतपः सोमः पुरुजित पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ।। 54 ।।
 
जीवो विनयिता-साक्षी मुकुंदो-अमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनंतात्मा महोदधिशयो-अंतकः ।। 55 ।।
 
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनंदो नंदनो नंदः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ।। 56 ।।
 
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश्रृंगः कृतांतकृत ।। 57 ।।
 
महावराहो गोविंदः सुषेणः कनकांगदी ।
गुह्यो गंभीरो गहनो गुप्तश्चक्र-गदाधरः ।। 58 ।।
 
वेधाः स्वांगोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणो-अच्युतः ।
वरूणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ।। 59 ।।
 
भगवान भगहानंदी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णु:-गतिसत्तमः ।। 60 ।।
 
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवि: स्पृक् सर्वदृक व्यासो वाचस्पति: अयोनिजः ।। 61 ।।
 
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक ।
संन्यासकृत्-छमः शांतो निष्ठा शांतिः परायणम ।। 62 ।।
 
शुभांगः शांतिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ।। 63 ।।
 
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृत्-शिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ।। 64 ।।
 
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमान्-लोकत्रयाश्रयः ।। 65 ।।
 
स्वक्षः स्वंगः शतानंदो नंदिर्ज्योतिर्गणेश्वर: ।
विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ।। 66 ।।
 
उदीर्णः सर्वत: चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ।। 67 ।।
 
अर्चिष्मानर्चितः कुंभो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ।। 68 ।।
 
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ।। 69 ।।
 
कामदेवः कामपालः कामी कांतः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णु: वीरोअनंतो धनंजयः ।। 70 ।।
 
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृत् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ।। 71 ।।
 
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ।। 72 ।।
 
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ।। 73 ।।
 
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ।। 74 ।।
 
सद्गतिः सकृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ।। 75 ।।
 
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयो-अनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरो-अथापराजितः ।। 76 ।।
 
विश्वमूर्तिमहार्मूर्ति: दीप्तमूर्ति: अमूर्तिमान ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ।। 77 ।।
 
एको नैकः सवः कः किं यत-तत-पद्मनुत्तमम ।
लोकबंधु: लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ।। 78 ।।
 
सुवर्णोवर्णो हेमांगो वरांग: चंदनांगदी । वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरऽचलश्चलः ।। 79 ।।
 
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ।। 80 ।।
 
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश्रृंगो गदाग्रजः ।। 81 ।।
 
चतुर्मूर्ति: चतुर्बाहु: श्चतुर्व्यूह: चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भाव: चतुर्वेदविदेकपात ।। 82 ।।
 
समावर्तो-अनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ।। 83 ।।
 
शुभांगो लोकसारंगः सुतंतुस्तंतुवर्धनः ।
इंद्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ।। 84 ।।
 
उद्भवः सुंदरः सुंदो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः श्रृंगी जयंतः सर्वविज-जयी ।। 85 ।।
 
सुवर्णबिंदुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधः ।। 86 ।।
 
कुमुदः कुंदरः कुंदः पर्जन्यः पावनो-अनिलः ।
अमृतांशो-अमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।। 87 ।।
 
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधो औदुंबरो-अश्वत्थ: चाणूरांध्रनिषूदनः ।। 88 ।।
 
सहस्रार्चिः सप्तजिव्हः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघो-अचिंत्यो भयकृत्-भयनाशनः ।। 89 ।।
 
अणु: बृहत कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ।। 90 ।।
 
भारभृत्-कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ।। 91 ।।
 
धनुर्धरो धनुर्वेदो दंडो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियंता नियमो यमः ।। 92 ।।
 
सत्त्ववान सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्हो-अर्हः प्रियकृत-प्रीतिवर्धनः ।। 93 ।।
 
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ।। 94 ।।
 
अनंतो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकधिष्ठानमद्भुतः ।। 95।।
 
सनात्-सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत स्वस्ति स्वस्तिभुक स्वस्तिदक्षिणः ।। 96 ।।
 
अरौद्रः कुंडली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
 
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ।। 97 ।।
 
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।। 98 ।।
 
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः संतो जीवनः पर्यवस्थितः ।। 99 ।।
 
अनंतरूपो-अनंतश्री: जितमन्यु: भयापहः ।
चतुरश्रो गंभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ।। 100 ।।
 
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मी: सुवीरो रुचिरांगदः ।
जननो जनजन्मादि: भीमो भीमपराक्रमः ।। 101 ।।
 
आधारनिलयो-धाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ।। 102 ।।
 
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्यु जरातिगः ।। 103 ।।
 
भूर्भवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञांगो यज्ञवाहनः ।। 104 ।।
 
यज्ञभृत्-यज्ञकृत्-यज्ञी यज्ञभुक्-यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृत-यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ।। 105 ।।
 
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनंदनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ।। 106 ।।
 
शंखभृन्नंदकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथांगपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ।। 107 ।।
 
सर्वप्रहरणायुध ॐ नमः इति। वनमालिगदी शार्ङ्गीशंखीचक्री च नंदकी ।
श्रीमान्नारायणो विष्णु: वासुदेवोअभिरक्षतु।।

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यह थे भगवान श्रीविष्णु के सहस्र दिव्य नाम। प्रत्येक नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि अनंत ब्रह्मांड की शक्ति, करुणा और संरक्षण का प्रतीक है।

जो श्रद्धा और भक्ति से
इन नामों का श्रवण या कीर्तन करता है — उसके जीवन से भय दूर हो जाता है, बंधन कट जाते हैं, और आत्मा शांति का अनुभव करती है।

शास्त्र कहते हैं — “न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्।”
जो वासुदेव के भक्त हैं, उनका कभी अहित नहीं होता।

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”

जय श्रीमन्नारायण 🙏
हरि ॐ तत्सत्।