Current image: श्रीराम के लिए दिव्य आसन, पूजन, विनियोग मंत्र, आचमन एवं प्राणायाम मंत्र के साथ उनकी पूजा कर रहा है।

 

श्रीराम के लिए दिव्य आसन, पूजन, विनियोग मंत्र, आचमन एवं प्राणायाम

🪔 भाग 3: आवाहन समापन एवं पूजन आरंभ (श्लोक 11–करन्यास)

 श्लोक 11: श्रीराम के लिए दिव्य आसन अर्पण

इत्यावाहनम्
सुवर्णरचितं राम दिव्यास्तरणशोभितम्।
आसनं हि मया दत्तं गृहाण मणिचित्रितम् ॥११॥

हिंदी अर्थ: हे श्रीराम! मैंने जो स्वर्ण निर्मित, दिव्य वस्त्रों और मणियों से अलंकृत यह सुंदर आसन अर्पित किया है, कृपया उसे स्वीकार करें।

भावार्थ: यह मंत्र “आवाहन” के समापन पर कहा जाता है। इसमें श्रीराम के लिए मानसिक रूप से एक दिव्य सिंहासन अर्पित किया जाता है — स्वर्णमयी, रत्नजड़ित और पवित्र वस्त्रों से सज्जित। यह केवल बाह्य पूजा नहीं, बल्कि अपने हृदय सिंहासन पर राम को विराजमान करने की प्रार्थना है।

षोडशोपचार पूजन संकेत

इति षोडशोपचारैः पूजयेत्

हिंदी अर्थ: अब भगवान का पूजन षोडश (16) उपचारों से करना चाहिए।

भावार्थ: ‘षोडशोपचार’ का अर्थ है 16 प्रकार के पारंपरिक पूजन अंग — जैसे आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, आरती, परिक्रमण, स्तुति और नमस्कार। यह दर्शाता है कि अब विधिवत मुख्य पूजन आरंभ हो रहा है। यह संकेत देता है कि अब पूजन पूर्ण विधि से आरंभ होना चाहिए — जिसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य आदि सभी उपचार सम्मिलित होते हैं।

पाठ विनियोग मंत्र

ॐ अस्य श्रीमन्मानसरामायणश्रीरामचरितस्य
श्रीशिवकाकभुशुण्डियाज्ञवल्क्यगोस्वामीतुलसीदासा ऋषयः
श्रीसीतरामो देवता
श्रीरामनाम बीजं
भवरोगहरी भक्तिः शक्तिः
मम नियन्त्रिताशेषविघ्नतया
श्रीसीतारामप्रीतिपूर्वकसकलमनोरथसिद्धयर्थं पाठे विनियोगः।

हिंदी अर्थ: इस श्रीरामचरितमानस पाठ के ऋषि हैं – श्रीशिवजी, काकभुशुण्डि, याज्ञवल्क्य, गोस्वामी तुलसीदास। देवता हैं – श्रीसीताराम। बीज है – श्रीरामनाम। शक्ति है – भवरोगहारी भक्ति। यह पाठ मेरे समस्त विघ्नों के निवारण, श्रीसीताराम की कृपा और सभी मनोरथों की सिद्धि के लिए किया जा रहा है। यह श्रीरामचरितमानस पाठ शिवजी, काकभुशुण्डि, याज्ञवल्क्य व तुलसीदासजी के ऋषित्व से संपन्न है। इसका देवता श्रीसीताराम, बीज श्रीरामनाम और शक्ति भक्ति है। पाठक के समस्त विघ्नों के निवारण, श्रीसीताराम की प्रीति और सभी मनोरथों की सिद्धि हेतु यह विनियोग है।

भावार्थ: यह मंत्र किसी भी वैदिक/पारंपरिक पाठ की शुरुआत में “विनियोग” के लिए बोला जाता है — यानी यह पाठ किसके लिए, किस उद्देश्य से, और किन देवताओं को समर्पित है। यहाँ रामचरितमानस की दिव्यता, ऋषियों की परंपरा, रामनाम की शक्ति और भक्ति की भावरूपी औषधि — सबका समन्वय है।

आचमन एवं प्राणायाम

अथाचमनम्
श्रीसीतारामाभ्यां नमः । श्रीरामचन्द्राय नमः । श्रीरामभद्राय नमः।
इति मन्त्रत्रितयेन आचमनं कुर्यात्।
श्रीयुगलबीजमन्त्रेण प्राणायामं कुर्यात्।

हिंदी अर्थ: अब आचमन करें — “श्रीसीतारामाभ्यां नमः”, “श्रीरामचन्द्राय नमः”, “श्रीरामभद्राय नमः” — इन तीन मंत्रों से तीन बार जल ग्रहण कर शुद्धि करें। तत्पश्चात “श्रीयुगलबीज मंत्र” से प्राणायाम करें।अब आचमन करें — श्रीसीता-राम को नमः, श्रीरामचन्द्र को नमः, श्रीरामभद्र को नमः — इन तीन मंत्रों से आचमन करना चाहिए। फिर श्रीराम-सीता के युगल बीजमंत्र से प्राणायाम करें।

भावार्थ: आचमन शुद्धिकरण का पहला चरण है। तीन बार “रामनाम” के भिन्न रूपों का उच्चारण कर जल ग्रहण किया जाता है। इसके बाद युगल मंत्र (जैसे “श्रीसीताराम” या “श्रीरामाय नमः”) के साथ प्राणायाम — अर्थात भीतर-बाहर की सांसों को रामनाम से शुद्ध करना — किया जाता है।

करन्यास (हाथों में मंत्र स्थापन)

विधि: करन्यास का अर्थ है — मंत्रशक्ति को अपने हाथों की अंगुलियों और अंगों में स्थापित करना, ताकि जो कुछ पूजा से किया जाए — वह राममय हो:

    • अगुष्ठाभ्यां नमःजग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के।।

हिंदी अर्थ: श्रीराम समस्त मंगल गुणों के धनी हैं – वे धर्म, धन, मुक्ति के दाता हैं।

  • तर्जनीभ्यां नमःराम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पापपुंज समुहाहीं।।

 

हिंदी अर्थ: जो बार-बार राम नाम लेते हैं, उनके सारे पाप समाप्त हो जाते हैं।

  • मध्यमाभ्यां नमःराम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।

 

हिंदी अर्थ: श्रीराम का नाम सभी नामों से श्रेष्ठ है, और समस्त पापों का नाशक है।

  • अनामिकाभ्यां नमःउमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं।।

 

हिंदी अर्थ: जैसे कठपुतली नाचती है, वैसे ही सबको श्रीराम नचाते हैं — वे नियंता हैं।

  • कनिष्ठिकाभ्यां नमःसन्मुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।

 

हिंदी अर्थ: जब जीव मेरे सम्मुख होता है (श्रीराम कहते हैं), तब उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

  • सर्वाङ्गे नमःमामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक।।

 

हिंदी अर्थ: हे रघुकुल नायक! धनुष-बाण धारण करने वाले श्रीराम! आप मेरी रक्षा करें।

व्याख्या: यह मंत्रात्मक करन्यास हमें हमारे हर कर्म को राममय बनाने की प्रेरणा देता है। जब हाथों में राम की कृपा और स्मृति हो, तो सेवा स्वतः पवित्र हो जाती है।

श्री रामचरितमानस के अन्य कथाएं यहां से पढ़ें –
श्रीरामचरितमानस पारायण – प्रारंभिक आवाहन मंत्र
वंदना पदावली – बालकाण्ड प्रारंभ
गुरु व संत वंदना की भावपूर्ण व्याख्या
श्रीरामचरितमानस (बालकाण्ड) – गुरु महिमा

अथ ध्यानम् (श्रीराम ध्यान श्लोक)

मामवलोकय पंकजलोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन ॥
नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि ॥
जातुधान बरुथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन ॥
भूसुर ससि नव वृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक ॥
भुजबल बिपुल भार महि खडित । खर दूषण बिराध बध पडित ॥
रावनारि सुखरुप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर ॥
सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम ॥
कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब विधि कुसल कोसला मंडन ॥
कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन ॥

हिंदी अर्थ:

  • हे कमल-नेत्र वाले श्रीराम! कृपादृष्टि से मुझे देखें; आपकी दृष्टि ही शोकों को हरने वाली है।
  • आप नीलकमल के समान श्यामवर्ण हैं; कामदेव के शत्रु हैं; भक्तों के हृदयरूपी कमल में बसी मधुर माधवी गंध के मधुप हैं।
  • आप राक्षसों के समूह का संहार करने वाले हैं, मुनियों और सज्जनों को आनंद देने वाले, पापों को हरने वाले हैं।
  • ब्राह्मणों के लिए चंद्रमा जैसे, देवों के लिए मेघों के समूह जैसे हैं; असहायों के आश्रयदाता हैं, दीनों की रक्षा करने वाले हैं।
  • आपने अपने भुजबल से पृथ्वी को भारमुक्त किया, खर-दूषण और विराध जैसे दुष्टों का वध किया।
  • आप रावण के शत्रु, सुंदर स्वरूपधारी, श्रेष्ठ राजा, और दशरथ वंश के चंद्रमा के समान हैं।
  • आपका यश पुराणों, वेदों और आगमों में प्रसिद्ध है; देवता, मुनि, संत सभी मिलकर आपकी स्तुति करते हैं।
  • आप करुणा से परिपूर्ण हैं, अहंकार और मद को नष्ट करने वाले हैं; सब प्रकार से कुशल हैं, अयोध्या की शोभा हैं।
  • आप कलियुग के पापों का नाश करने वाले, मोह को हरने वाले हैं; तुलसीदास कहते हैं – हे प्रभु! शरणागत जन की रक्षा कीजिए।

भावार्थ/व्याख्या: यह ध्यान श्लोक केवल श्रीराम के रूप, लीलाओं और प्रभाव का स्तवन नहीं है, यह एक गहन प्रार्थना है — जिसमें तुलसीदासजी पूर्ण समर्पण भाव से श्रीराम को पुकारते हैं। वे राम को केवल एक राजा या अवतार नहीं, अपितु शरणागतों के रक्षक, पापों के नाशक और भक्तों के हृदय में विराजमान माधव के रूप में अनुभव करते हैं। यह ध्यान पाठक के अंतर्मन में भक्ति, श्रद्धा और भाव की तरंगें जगा देता है।

स्रोत: रामचरित मानस ग्रन्थ