Current image: जहाँ ब्रह्मा की रचना पूर्ण होती है और शिव-पार्वती से सृष्टि को संतुलन मिलता है

 

Shiva Purana

शिव और सती का विवाह और सृष्टि निर्माण की अद्भुत और अविश्वश्नीय कथा


🙏 जय श्री हरि – जय श्री महादेव 🙏

बात उस समय की है जब केवल त्रिदेव अस्तित्व में थे और सृष्टि रचना आरम्भ हुआ था। ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना आरम्भ की। ब्रह्मा पुराण, विष्णु पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, दक्ष प्रजापति की उत्पत्ति स्वयं भगवान ब्रह्मा से हुई। ब्रह्माजी ने जब सृष्टि की रचना आरंभ की, तब उन्होंने अपने मानस (मन) से अनेक पुत्र उत्पन्न किए। इन्हें मानस पुत्र कहा गया और इन्हीं मानस पुत्रों में एक थे दक्ष प्रजापति। दक्ष नाम का अर्थ है – कुशल, समर्थ, योग्य, कर्म में निपुण। इसी कारण ब्रह्मा ने उन्हें प्रजा-विस्तार का विशेष दायित्व सौंपा।

दक्ष प्रजापति की पत्नी का नाम था प्रसूति। प्रसूति की उत्पत्ति भी भगवान ब्रह्मा से ही हुई थी। लेकिन दक्ष और प्रसूति की उत्पत्ति अलग-अलग प्रकार से मानी जाती है। ब्रह्मा ने प्रसूति को कन्या रूप में उत्पन्न कियाऔर बाद में उसका विवाह अपने ही मानस पुत्र दक्ष से कराया। यह उस युग की पौराणिक व्यवस्था थी, जहाँ उद्देश्य केवल सृष्टि-विस्तार था, न कि सांसारिक संबंध।

ब्रह्मा ने दक्ष और प्रसूति का विवाह इसलिए कराया क्योंकि सृष्टि का विस्तार करना आवश्यक था। विभिन्न जीव-जगत, देवता, दानव, मानव, पशु आदि उत्पन्न होने थे इस विवाह से 60 पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं, जिन्होंने आगे चलकर देवताओं, ऋषियों और धर्म के विविध रूपों से विवाह किया।

आध्यात्मिक अर्थ में समझें तो, दक्ष प्रजापति की पुत्रियाँ केवल स्त्रियाँ नहीं, बल्कि सृष्टि के गुण, काल के आयाम, धर्म और अधर्म की शक्तियाँ, देव और दानव चेतनाएँ का प्रतीक हैं। यही कारण है कि दक्ष को प्रजापति कहा गया, जो केवल जन्म नहीं, व्यवस्था भी देता है।

दक्ष प्रजापति सृष्टि विस्तार के आधार आधार थे। सती जो शिव-शक्ति एकत्व हैं। 27 नक्षत्र जिनसे काल और ज्योतिष गणना होती है। 13 धर्म पत्नियाँ जो नैतिक व्यवस्था का आधार बनी। कश्यप की पत्नियाँ जिनसे समस्त जीव-जगत की उत्पत्ति हुईं।

दक्ष प्रजापति की 60 पुत्रियाँ थी। नीचे इसे क्रमबद्ध और विस्तार से बताया जा रहा है –

1. धर्म को दी गई 13 पुत्रियाँ

दक्ष ने अपनी 13 पुत्रियों का विवाह धर्मराज से किया। ये सृष्टि के नैतिक और आध्यात्मिक गुणों की जननी हैं। श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शांति, सिद्धि और कीर्ति इनसे धर्म, पुण्य, विवेक और सद्गुणों का विस्तार हुआ।

2. चंद्र (सोम) को दी गई 27 पुत्रियाँ –

ये 27 पुत्रियाँ नक्षत्र कहलाती हैं। अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा, उत्तराभाद्रपदा और रेवती। इनसे ज्योतिष, काल-गणना और पंचांग की रचना हुई। चंद्र का रोहिणी के प्रति अधिक प्रेम प्रसिद्ध है।

3. कश्यप ऋषि को13 पुत्रियाँ दी

कश्यप ऋषि को दक्ष ने 13 पुत्रियाँ दी। इनसे देव, दानव, नाग, पक्षी आदि उत्पन्न हुए।

अदिति — देवताओं की माता

दिति — दैत्यों की माता

दनु — दानवों की माता

कद्रू — नागों की माता

विनता — गरुड़ और अरुण की माता

मुनि, पतंगी, ताम्रा, क्रोधवशा, इला, सुरसा, अरिष्टा और द्रौणि

यही वर्गीकरण देव–दानव–नाग–पक्षी की उत्पत्ति का मूल है।

4. राक्षस कुल की उत्पत्ति

दक्ष प्रजापति ने अपनी एक पुत्री हविर्भू का विवाह महर्षि पुलस्त्य से किया। महर्षि पुलस्त्य ब्रह्मा के मानस पुत्र तथा सप्तर्षियों में से एक थे। वे महान तपस्वी और ब्रह्मज्ञान के अधिकारी थे, परंतु उनकी वंश-परंपरा में विविध प्रवृत्तियाँ उत्पन्न हुईं।

हविर्भू और पुलस्त्य के वंश से आगे चलकर विश्रवा ऋषि उत्पन्न हुए, विश्रवा से कुबेर (देवस्वरूप, धर्मात्मा) तथा विश्रवा की दूसरी पत्नी से रावण, कुंभकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा उत्पन्न हुए। इसी कारण हविर्भू को राक्षस कुल की आदि जननी माना जाता है।

5. यक्ष, किन्नर आदि की उत्पत्ति

दक्ष प्रजापति ने अपनी कुछ अन्य पुत्रियों का विवाह महर्षि पुलह से किया। पुराणों में इनके नामों में भिन्नता मिलती है, पर सामान्यतः ये नाम माने जाते हैं, क्षमा और शांता। महर्षि पुलह भी ब्रह्मा के मानस पुत्र और सप्तर्षियों में से एक थे।

क्षमा और शांता से उत्पन्न वंशों में यक्ष (धन, प्रकृति और गुप्त शक्तियों के रक्षक), किन्नर (गायन, संगीत और अर्ध-दैवी स्वरूप) और कुछ स्थानों पर राक्षसों और गंधर्वों का भी उल्लेख मिलता है .

ये सभी प्रकृति से सीधा संबंध रखने वाले माने जाते हैं। यक्ष और किन्नर पर्वतों, वनों और दिव्य लोकों से जुड़े माने जाते हैं। ये न पूर्ण देव हैं, न पूर्ण मानव, बल्कि ये सृष्टि के मध्य लोकों के प्रतिनिधि हैं। यह दर्शाता है कि सृष्टि केवल दो ध्रुवों (देव–दानव) में नहीं, बल्कि अनेक स्तरों में बंटी हुई है।

6. सम्पूर्ण जीव-जगत की रचना

दक्ष प्रजापति की कुछ पुत्रियाँ ऐसी भी थीं जिनका उद्देश्य किसी एक वंश या लोक की उत्पत्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भूत-सृष्टि का विस्तार था। इनसे उत्पन्न सृष्टियाँ पशु, पक्षी, गंधर्व (देवलोक के गायक), अप्सराएँ (सौंदर्य और कला की प्रतीक), पितृगण (पूर्वज, श्राद्ध और तर्पण के अधिकारी), और मानव जातियों का जन्म हुआ।

यह सृष्टि-विभाजन बताता है कि प्रत्येक जीव की भूमिका निश्चित है। कोई भी प्राणी तुच्छ नहीं है। सभी ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति हैं। “एक ही चेतना, पशु में प्रवृत्ति बनी, मानव में विवेक बनी, और देव में करुणा।”

आपने ऊपर पढ़ा कि दक्ष प्रजापति की कई पुत्रियां थी। सभी पुत्रियां गुणवती थीं। फिर भी दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो सर्व शक्तिसंपन्न हो एवं सर्व विजयिनी हो। जिसके कारण दक्ष एक ऐसी ही पुत्री के लिए तप करने लगे।

तप करते करते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा, मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। तुम किस कारण वश तप कर रहे हों? दक्ष नें तप करने का कारण बताय तो मां बोली मैं स्वय पुत्री रूप में तुम्हारे यहां जन्म धारण करूंगी। मेरा नाम होगा सती। मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी।

फलतः भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में सबसे अलौकिक थीं। सती ने बाल्य अवस्था में ही कई ऐसे अलौकिक आश्चर्य चलित करने वाले कार्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मयता होती रहती थी।

जब सती विवाह योग्य हो गई, तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता होने लगी। उन्होंने ब्रह्मा जी से इस विषय में परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, सती आद्या का अवतार हैं। आद्या आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं।

अतः सती के विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं। दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं। भगवान शिव के दक्ष के दामाद थे, किंतु एक ऐसी घटना घटीत होगई जिसके कारण दक्ष के ह्रदय में भगवान शिव के प्रति बैर और विरोध भाव पैदा हो गया।

एक बार देवलोक में ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था। सभी बड़े- बड़े देवता सभा में एकत्र हो गये थे। भगवान शिव भी इस सभा में बैठे थे। सभा मण्डल में दक्ष का आगमन हुआ।

दक्ष के आगमन पर सभी देवता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान शिव खड़े नहीं हुए। उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया। फलतः दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं, उनके ह्रदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वे उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।

एक बार सती और शिव कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल कि ओर जाते हुए दिखाई पड़े।

सती ने उन विमानों को दिखकर भगवान शिव से पूछा, प्रभो, ये सभी विमान किसके है और कहां जा रहे हैं? भगवान शकंर ने उत्तर दिया आपके पिता ने बहुत बडे यज्ञ का आयोजन किया हैं। समस्त देवता और देवांगनाएं इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं।

इस पर सती ने दूसरा प्रश्न किया क्या मेरे पिता ने आपको यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए नहीं बुलाया?

भगवान शंकर ने उत्तर दिया, आपके पिता मुझसे बैर रखते है, फिर वे मुझे क्यों बुलाने लगे?

सती मन ही मन सोचने लगीं फिर बोलीं यज्ञ के इस अवसर पर अवश्य मेरी सभी बहनें आएंगी। उनसे मिले हुए बहुत दिन हो गए। यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं भी अपने पिता के घर जाना चाहती हूं। यज्ञ में सम्मिलित हो लूंगी और बहनों से भी मिलने का सुअवसर मिलेगा।

भगवान शिव ने उत्तर दिया, इस समय वहां जाना उचित नहीं होगा। आपके पिता मुझसे जलते हैं हो सकता हैं वे आपका भी अपमान करें। बिना बुलाए किसी के घर जाना उचित नहीं होता हैं। इस पर सती ने प्रश्न किया एसा क्युं? भगवान शिव ने उत्तर दिया विवाहिता लड़की को बिना बुलाए पिता के घर नही जाना चाहिए, क्योंकि विवाह हो जाने पर लड़की अपने पति कि हो जाती हैं। पिता के घर से उसका संबंध टूट जाता हैं।

लेकिन सती पीहर जाने के लिए हठ करती रहीं। अपनी बात बार- बार दोहराती रहीं। उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी। उनके साथ अपना एक गण भी साथ में भेज दिया उस गण का नाम वीरभद्र था। सती वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं।

घर में सती से किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया। दक्ष ने उन्हें देखकर कहा तुम क्या यहां मेरा अपमान कराने आई हो? अपनी बहनों को तो देखो वे किस प्रकार भांति- भांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं।

तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघंबर हैं। तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक हैं। वह तुम्हें बाघंबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता हैं। दक्ष के कथन से सती के ह्रदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीं किया। भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता हैं? अब तो आ ही गई हूं।

पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। वे उस यज्ञमंडल में गईं जहां सभी देवता और ॠषिमुनि बैठे थे तथा यज्ञकुण्ड में धूधू करती जलती हुई अग्नि में आहुतियां डाली जा रही थीं। सती ने यज्ञमंडप में सभी देवताओं के तो भाग देखे, किंतु भगवान शिव का भाग नहीं देखा।

वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं पितृश्रेष्ठ यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं किंतु कैलाशपति का भाग नहीं हैं। आपने उनका भाग क्यों नहीं रखा?

दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया मैं तुम्हारे पति शिव को देवता नहीं समझता। वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला हैं। वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं। उसे कौन भाग देगा ?

सती के नेत्र लाल हो उठे। उनकी भौंहे कुटिल हो गईं। उनका मुखमंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजोद्दीप्त हो उठा। उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा ओह मैं इन शब्दों को कैसे सुन रहीं हूं मुझे धिक्कार हैं। देवताओ तुम्हें भी धिक्कार हैं, तुम भी उन कैलाशपति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं।

वे मेरे स्वामी हैं। नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता हैं। जो नारी अपने पति के लिए अपमान जनक शब्दों को सुनती हैं उसे नरक में जाना पड़ता हैं। पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया हैं। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती।

सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी। जलती हुई आहुतियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा। यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया। देवता उठकर खड़े हो गए।

वीरभद्र क्रोध से कांप उटे। वे उछ्ल- उछल कर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषिमुनि भाग खड़े हुए। वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काटकर फेंक दिया। समाचार भगवान शिव के कानों में भी पड़ा।

वे प्रचंड आंधी की भांति कनखल जा पहुंचे। सती के जले हुए शरीर को देखकर भगवान शिव ने अपने आपको भूल गए। सती के प्रेम और उनकी भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया। उन शंकर के मन को व्याकुल कर दिया जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त कि थी और जो सारी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखते थे। वे सती के प्रेम में खो गए, बेसुध हो गए ।

भगवान शिव ने उन्मत की भांति सती के जले हुए शरीर को कंधे पर रख लिया। वे सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी रुक गई, हवा रूक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और रुक गईं देवताओं की सांसे। सृष्टि व्याकुल हो उठी, सृष्टि के प्राणी पुकारने लगे— पाहिमाम पाहिमाम भयानक संकट उपस्थित देखकर सृष्टि के पालक भगवान विष्णु आगे बढ़े।

वे भगवान शिव की बेसुधी में अपने चक्र से सती के एकएक अंग को काटकाट कर गिराने लगे। धरती पर इक्यावन स्थानों में सती के अंग कटकटकर गिरे। जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तो भगवान शिव पुनः अपने आप में आए। जब वे अपने आप में आए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे।

धरती पर जिन इक्यावन स्थानों में सती के अंग कटकटकर गिरे थे, वे ही स्थान आज शक्ति के पीठ स्थान माने जाते हैं। आज भी उन स्थानों में सती का पूजन होता हैं, उपासना होती हैं।”

Source:Shiv Puran

ॐ नमः शिवाय 🙏 जय श्रीहरि 🙏