Current image: > 👉 श्रीकृष्ण के अन्य उपदेश और कहानियाँ जानने के लिए देखें “श्रीमद् भगवद गीता/श्रीकृष्ण कथाएँ” श्रेणी।

 

विष्णु सहस्रनाम श्लोक 1 में कुल 9 शब्द शब्द अर्थात नाम है। विष्णु सहस्रनाम श्लोक 1 का सरल हिंदी अर्थ और व्याख्या प्रस्तुत है –

श्लोक 1

ॐ विश्वं विष्णुः वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः॥

🔸 शब्दार्थ

1.विश्वं – सम्पूर्ण सृष्टि – 

भगवान स्वयं ही यह सम्पूर्ण विश्व हैं। यह नाम बताता है कि जो कुछ भी इस ब्रह्माण्ड में दिखाई देता है—पृथ्वी, आकाश, ग्रह, तारे, जीव-जंतु, मनुष्य, प्रकृति—सब भगवान का ही स्वरूप है। भगवान विष्णु केवल सृष्टि के बाहर बैठकर उसे देखने वाले नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं इस सम्पूर्ण जगत के रूप में प्रकट हैं।

विष्णु सहस्रनाम श्लोक 1 के इस नाम के अनुसार जब भक्त यह समझ लेता है कि पूरा विश्व भगवान का ही रूप है, तब उसके मन में किसी के प्रति द्वेष नहीं रहता और वह हर प्राणी में भगवान को देखने लगता है।

2. विष्णुः – सर्वव्यापक

जो हर जगह व्याप्त हैं। “विष्णु” नाम, जिस नाम को हम भगवान् को मूल नाम से जानते हैं और इसी विष्णु नाम से सहस्रनाम का पुराणों में उल्लेख है।  “विष्णु” शब्द का अर्थ है – जो सब जगह फैल गए हों। भगवान विष्णु केवल किसी एक स्थान या लोक में सीमित नहीं हैं। वे पृथ्वी, स्वर्ग, पाताल, आकाश, जल, अग्नि—सब जगह विद्यमान हैं।

विष्णु सहस्रनाम श्लोक 1 के इस इस नाम का स्मरण हमें यह सिखाता है कि भगवान हर समय और हर स्थान पर हमारे साथ हैं।

3. वषट्कारः – यज्ञ का स्वरूप

जो यज्ञ में बोले जाने वाले “वषट्” मंत्र का स्वरूप हैं। वैदिक यज्ञ में जब आहुति दी जाती है तब “वषट्” उच्चारण किया जाता है। यह शब्द भगवान को अर्पण का प्रतीक है।
इसलिए भगवान स्वयं यज्ञ हैं, यज्ञ का उद्देश्य भी वही हैं और यज्ञ का फल भी वही देते हैं।

विष्णु सहस्रनाम श्लोक 1 के इस नाम के अनुसार, जब कोई व्यक्ति भगवान को समर्पण भाव से कर्म करता है, तो वही कर्म उसके लिए यज्ञ बन जाता है।

4. भूतभव्यभवत्प्रभुः – तीनों कालों के स्वामी

जो भूतकाल, वर्तमान और भविष्य—तीनों के स्वामी हैं। समय की सीमा मनुष्यों के लिए है, भगवान के लिए नहीं। जो पहले हुआ, जो अभी हो रहा है और जो आगे होगा—सब भगवान की दृष्टि में है।

विष्णु सहस्रनाम श्लोक 1 के इस नाम का अर्थ समझने से मनुष्य भविष्य की चिंता और अतीत के दुःख से मुक्त हो सकता है।

5. भूतकृत् – भूतों के निर्माता

जो सभी जीवों की उत्पत्ति करने वाले हैं। भगवान ने ही इस सृष्टि में असंख्य प्रकार के जीवों को जन्म दिया है। मनुष्य, पशु, पक्षी, देवता, ऋषि—सब भगवान की रचना हैं।

जब हम समझते हैं कि हर जीव भगवान की रचना है, तब हम किसी को कष्ट पहुँचाने से बचते हैं।

6. भूतभृत् – उनका पालन करने वाले

जो सभी प्राणियों का पालन-पोषण करते हैं। सृष्टि को बनाना ही पर्याप्त नहीं होता, उसका पालन भी आवश्यक होता है। भगवान विष्णु इस जगत के पालनकर्ता हैं—वे ही सभी जीवों को भोजन, वायु, जल और जीवन प्रदान करते हैं।

विष्णु सहस्रनाम श्लोक 1 का यह नाम हमें विश्वास देता है कि भगवान हर जीव की रक्षा करते हैं।

7. भावः – अस्तित्व

जो स्वयं अस्तित्व का मूल हैं। सृष्टि को बनाना ही पर्याप्त नहीं होता, उसका पालन भी आवश्यक होता है। भगवान विष्णु इस जगत के पालनकर्ता हैं—वे ही सभी जीवों को भोजन, वायु, जल और जीवन प्रदान करते हैं।

विष्णु सहस्रनाम श्लोक 1 का यह नाम हमें विश्वास देता है कि भगवान हर जीव की रक्षा करते हैं।

8. भूतात्मा – समस्त जीवों की आत्मा

जो सभी प्राणियों के भीतर आत्मा के रूप में स्थित हैं। भगवान हर जीव के हृदय में आत्मा के रूप में विराजमान हैं। इसीलिए हर जीव में चेतना और जीवन दिखाई देता है।

विष्णु सहस्रनाम श्लोक 1 के इस नाम के अनुसार जब हम यह समझते हैं कि भगवान हर हृदय में हैं, तब हम किसी के साथ अन्याय नहीं करते।

9. भूतभावनः – समस्त भूतों के हितैषी

जो सभी जीवों के कल्याण की कामना करते हैं। भगवान केवल सृष्टि के निर्माता और पालनकर्ता ही नहीं हैं, बल्कि वे हर जीव के कल्याण के लिए भी कार्य करते हैं। वे समय-समय पर अवतार लेकर संसार में धर्म की रक्षा करते हैं।

विष्णु सहस्रनाम श्लोक 1 का यह नाम हमें सिखाता है कि भगवान सदैव अपने भक्तों और समस्त जीवों का कल्याण करते हैं।

 

🔸 विष्णु सहस्रनाम श्लोक 1 का सरल हिंदी भावार्थ

1. भगवान विष्णु ही यह सम्पूर्ण विश्व हैं। वे ही हर जगह व्याप्त हैं। 2. वे यज्ञों में उच्चरित होने वाले पवित्र वषट् शब्द के रूप में पूज्य हैं। 3. वे भूतकाल, वर्तमान और भविष्य – तीनों कालों के स्वामी हैं। 4. वे सभी जीवों के रचयिता हैं, उनका पालन करते हैं, स्वयं अस्तित्व हैं, 5. सभी प्राणियों की आत्मा हैं और सभी के हित में संलग्न रहते हैं।🧠

🔸 विष्णु सहस्रनाम श्लोक 1 का गूढ़ व्याख्या

🎙️ “इस श्लोक में भगवान के दस दिव्य नाम बताए गए हैं। ये नाम सिर्फ उपाधियाँ नहीं, बल्कि उनके अनंत स्वरूप के संकेत हैं।

  1. विश्वं विष्णुः – भगवान कोई सीमित रूप नहीं हैं। वे वही हैं जो हम देख रहे हैं — पर्वत, नदियाँ, आकाश, अग्नि, जीव-जंतु, सब कुछ वही हैं। जब हम संसार को परमात्मा के दृष्टिकोण से देखने लगते हैं, तो भेदभाव मिट जाता है।
  2. वषट्कारो – यज्ञों में ‘वषट्’ उच्चारित किया जाता है जिससे देवताओं को आहुति दी जाती है। यह दर्शाता है कि भगवान यज्ञस्वरूप हैं – अर्थात् हम जो भी कर्म श्रद्धा से करते हैं, उसका फल उन्हीं तक पहुँचता है।
  3. भूतभव्यभवत्प्रभुः – समय के तीनों पहर – अतीत, वर्तमान और भविष्य – पर जिनका अधिकार है, वे भगवान विष्णु हैं। इसका अर्थ है कि जो भी हुआ है, जो हो रहा है, और जो होने वाला है – सब कुछ उनके संकल्प से है।
  4. भूतकृत् भूतभृत् – वे ही संसार के सभी प्राणियों के रचयिता हैं और वही उनका पोषण करते हैं। जैसे एक पेड़ बीज से उत्पन्न होता है और फिर जड़ों से जल खींचकर स्वयं को जीवित रखता है, वैसे ही भगवान हमें जीवन देते हैं और हमें पोषित भी करते हैं।
  5. भावः भूतात्मा – ‘भाव’ का अर्थ है शुद्ध अस्तित्व, जो न बदला है, न बदलेगा। वे ही सभी जीवों के भीतर आत्मा रूप में स्थित हैं।
  6. भूतभावनः – अंततः वे ही हैं जो सभी जीवों का कल्याण करते हैं, बिना किसी अपेक्षा के।

🔸 पौराणिक संदर्भ

पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि जब युधिष्ठिर युद्ध के पश्चात् शांति चाहते थे, तब भीष्म पितामह ने उन्हें श्री विष्णु सहस्रनाम का उपदेश दिया, और यही पहला श्लोक है जो इस ज्ञान का प्रारंभ करता है।

🔸 आध्यात्मिक संदेश

“यह श्लोक हमें सिखाता है कि ईश्वर सिर्फ मंदिरों में नहीं, वह हर जगह, हर प्राणी में विद्यमान हैं। जब हम इस भाव को अपने जीवन में उतारते हैं, तो हम करुणा, सेवा और समर्पण से भर जाते हैं।”

🔸 मंत्र-स्मरण

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
ॐ भूतात्मने नमः॥


आपको यह श्लोक कैसा लगा? नीचे कमेंट में जरूर बताएं।

श्रीहरि की इस दिव्य नामावली को औरों तक पहुंचाने के लिए इसे शेयर करें