भक्तमाल कथा | श्री नाभादास कृत महाकाव्य

भक्तमाल कथा

जय श्री हरि…
आज हम सुनेंगे उस ग्रंथ की कथा… जो केवल भक्तों का चरित्र नहीं, अपितु हृदय में भगवद्भक्ति की ज्वाला प्रज्वलित करनेवाली अमृतधारा है।
यह है — भक्तमाल… श्रीनाभादास जी द्वारा रचित वह अनुपम भक्तिसंग्रह, जिसमें भक्तों की वाणी, तप, त्याग और प्रेम की झलक मिलती है।
आइए, आरम्भ करें… इस भाव-भक्ति से भरी कथा का सुंदर समर्पण…

✨ भाग 1: मंगलाचरण और भक्तगुण वर्णन

“जग कीरति मंगल उदै तीनौं ताप नसायँ।
हरिजन को गुन बरनते हरि हृदि अटल बसायँ॥”
(भक्तमाल दोहा २०८)

नाभादासजी कहते हैं कि भगवद्भक्तों का गुणगान करने से इस संसार में कीर्ति प्राप्त होती है, मंगल होता है, तीनों प्रकार के ताप—आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक—का नाश होता है और भगवान भक्त के हृदय में अटल रूप से वास करते हैं।

“जो हरि प्रापति की आस है तौ हरिजन गुन गाव।
नतरु सुकृत भुजे बीज ज्यौं जनम जनम पछिताय॥”
(भक्तमाल दोहा २१०)

यदि किसी को भगवान की प्राप्ति की सच्ची आशा है, तो उसे भक्तों के गुणों का गान अवश्य करना चाहिए। नहीं तो जन्म-जन्मों के पुण्य भी भूने हुए बीज की तरह निष्फल हो जाते हैं।

“जीवन की सार्थकता केवल ईश्वर की प्राप्ति में है… और ईश्वर स्वयं कहते हैं — मैं भक्तों में ही निवास करता हूँ।”
“सो प्रभु प्यारौ पुत्र ज्यों बैठे हरि की गोद॥”
(भक्तमाल दोहा २११)

जो भक्तों के चरित्र को गाता है, उसे भगवान् पुत्र के समान प्रिय मानते हैं और अपनी गोद में स्थान देते हैं।

✨ भाग 2: भगवान के २४ अवतार और आचार्यों का चतुयुंह प्राकट्य

“जय जय मीन बराह कमठ नरहरि बलि-बावन।
परसुराम रघुबीर कृष्ण कीरति जग पावन॥
बुद्ध कलक्की ब्यास पृथू हरि हंस मन्वंतर।
जग्य रिषभ हयग्रीव धुरुव बरदैन धन्वंतर॥
बद्रीपति दत कपिलदेव सनकादिक करुना करौ।
चौबीस रूप लीला रुचिर श्री अग्रदास उर पद धरौ॥”

इन छप्पयों में भगवान के वे २४ रूप वर्णित हैं जिनसे उन्होंने समय-समय पर धर्म की स्थापना की।

“रामानुज ऊदार सुधानिधि अवनि कल्पतरु।
बिष्नुस्वामि बोहित्थ सिंधु संसार पार करु॥
मध्वाचारज मेघ भक्ति सर ऊसर भरिया।
निम्बादित्य अदित्य कुहर अग्यान जु हरिया॥
जनम करम भागवत धरम संप्रदाय थापी अघट।
चौबीस प्रथम हरि बपु धरे( त्यों) चतुयूंह कलिजुग प्रगट॥”

भगवान ने कलियुग में अपने प्रतिनिधि स्वरूप चार प्रमुख वैष्णव आचार्य भेजे — श्रीरामानुज, श्रीविष्णुस्वामी, श्रीमध्वाचार्य और श्रीनिम्बार्काचार्य।

✨ भाग 3: करमैती बाई की कथा — भक्ति की पूर्णता

करमैती बाई — एक छोटी बालिका, जिसने शिशुकाल में ही श्रीकृष्ण का नाम जपना आरम्भ किया। विवाह तय हुआ, पर मन तो किसी और को अर्पित हो चुका था।

वह अकेली निकल पड़ी वृन्दावन के लिए। एक मृत ऊँट के पेट में छिपकर तीन दिन बिताये और अंततः वृन्दावन पहुँच गयी। वहाँ साध्वी बनी, और अपने आराध्य श्रीकृष्ण में लीन हो गयी।

जब पिता परशुराम जी वहाँ पहुँचे, तो बेटी की भक्ति देखकर उन्हें भी आत्मानन्द हुआ।

पण्डित परशुरामजी जयपुरके अन्तर्गत खण्डेलाके सेखावत सरदारके राजपुरोहित थे। इनकी पुत्री करमैतीका मन बचपनसे ही भगवान्‌में लग गया था। वह बालिका निरन्तर श्रीकृष्णका ध्यान तथा नाम-जप किया करती थी। कभी वह ‘हा नाथ! हा नाथ !’ कहकर क्रन्दन करती, कभी कीर्तन करते हुए नाचने लगती और कभी हँसते-हँसते लोटपोट हो जाती। नन्ही-सी बच्चीके भगवत्प्रेमको देखकर घरके लोग प्रसन्न हुआ करते थे।

करमैतीकी इच्छा विवाह करनेकी नहीं थी; परंतु लज्जावश वह कुछ कह नहीं सकी। पिताने उसका विवाह कर दिया, लेकिन जब ससुरालवाले उसे लेने आये, तब वह व्याकुल हो उठी। जो शरीर श्यामसुन्दरका हो चुका, उसे दूसरेके अधिकारमें कैसे दिया जा सकता है! उसने अपने प्रभुसे प्रार्थना प्रारम्भ की और जो कातर होकर उन श्रीवृन्दावनचन्द्रको पुकारता है, उसे अवश्य मार्ग मिल जाता है। करमैतीको भी एक उपाय सूझ गया। आधी रातको जब कि सब लोग सो रहे थे, वह अकेली बालिका चुपचाप घरसे निकल पड़ी और वृन्दावनके लिये चल पड़ी। सबेरे घरमें करमैतीके न मिलनेपर हलचल मच गयी। परशुराम पण्डित जानते थे कि उनकी पुत्री कितनी पवित्र है; किंतु लोकलाजके भयसे अपने यजमान राजाके पास गये। राजाने अपने पुरोहितकी सहायताके लिये चारों ओर घुड़सवार भेजे कि वे करमैतीको ढूंढ़ लावें । करमैती दौड़ी चली जा रही थी।

रात्रिभरमें वह कितनी दूर निकल आयी, सो उसे पता ही नहीं। सबेरा होनेपर भी वह भागी ही जा रही थी कि उसने घोड़ोंकी टापका शब्द सुना। उसे डर लगा कि घुड़सवार उसे ही पकड़ने आ रहे हैं। आस-पास न कोई वृक्ष था और न कोई दूसरा छिपनेका स्थान; किंतु एक ऊँट मरा पड़ा था और रात्रिमें शृगालोंने उसके पेटका भाग खा लिया था। करमैतीकी दृष्टि ऊँटके पेटमें बनी कन्दरापर गयी। इस समय वह सांसारिक विषयोंकी भयंकर दुर्गन्धसे भाग रही थी। मरे ऊँटके शरीरसे निकलनेवाली गन्ध उसे विषयोंकी दुर्गन्धके सामने तुच्छ जान पड़ी। भागकर वह ऊँटके पेटमें छिप गयी। घुड़सवार पास आये तो दुर्गन्धके मारे उन्होंने उस ऊँटकी ओर देखातक नहीं। वहाँसे शीघ्रतापूर्वक वे आगे बढ़ गये और अन्तमें हताश होकर लौट गये। माता-पिता आदि भी पुत्रीके सम्बन्धमें निराश हो गये। जिसकी कृपासे विष अमृत हो जाता है, अग्नि शीतल हो जाती है, उसीकी कृपावर्षा करमैतीपर हो रही थी।

ऊँटके शरीरमें वह भूखी-प्यासी तीन दिन छिपी रही। उस सड़े ऊँटके शरीरकी गन्ध उसके लिये सुगन्धमें बदल गयी थी। चौथे दिन वह वहाँसे निकली। मार्ग उसका जाना हुआ नहीं था; किंतु जो सबका एकमात्र मार्गदर्शक है, उसकी ओर जानेवालेको मार्ग नहीं ढूँढ़ना पड़ता। मार्ग ही उसे ढूँढ़ लेता है। करमैतीको साथ मिल गया और वह वृन्दावन पहुँच गयी। वहाँ पहुँचकर मानो वह आनन्दके समुद्रमें मग्न हो गयी। जब परशुराम पण्डितको अपनी पुत्रीका कहीं पता न लगा, तब वे वृन्दावन आये; लेकिन भला वृन्दावनमें करमैतीको जानता-पहचानता कौन था कि पता लगता। एक दिन वृक्षपर चढ़कर परशुराम पण्डित इधर-उधर देख रहे थे। ब्रह्मकुण्डपर उन्हें एक वैरागिनी दिखायी पड़ी। वहाँ जानेपर उन्होंने देखा कि साधुवेशमें करमैती ध्यानमग्न बैठी है। पुत्रीकी दीन-हीन बाहरी दशा देखकर पिताको शोक तो हुआ; परंतु उसके भगवत्प्रेमको देखकर वे अपनेको धन्य मानने लगे। कई घण्टे बैठे रहनेपर भी जब करमैतीका ध्यान भंग नहीं हुआ, तब पिताने उसे हिला-डुलाकर जगाया। वे उससे घर चलकर भजन करनेका आग्रह करने लगे। करमैतीने कहा—‘पिताजी ! यहाँ आकर भी कोई कभी लौटा है। मैं तो व्रजराजकुमारके प्रेममें डूबकर मर चुकी हूँ। अब मुर्दा यहाँसे उठे कैसे?’ अन्ततः परशुरामजी उसके भक्तिभावको देखकर वापस घर लौट गये । राजाने जब यह समाचार सुना, तब वह भी करमैतीके दर्शन करने वृन्दावन आया। राजाके बहुत आग्रह करनेपर करमैतीबाईने एक छोटी कुटिया बनवाना स्वीकार कर लिया। राजाने करमैतीबाईके लिये ब्रह्मकुण्डके पास एक मठिया बना दी। करमैतीबाईकी भक्तिने राजाको भी भक्त बना दिया। इसी प्रकार भक्तमालमें अनेकानेक भक्तोंके पावन चरित्रोंका रोचक वर्णन हुआ है।

श्रीनाभादासजी कहते हैं कि संसारमें जितने भक्त हैं, उन सबका वर्णन करनेकी सामर्थ्य किसमें है? यह तो वैसे ही असम्भव है, जैसे कोई चिड़िया सब समुद्रोंका जल पी लेनेका विचार करे तो उसके उदरमें समुद्रका जल कैसे अट सकता है?

✨ भाग 4: भक्तमाल की महिमा और निष्कर्ष

“भक्त जिते भूलोकमें कथे कौन पै जायँ।
समुंद पान श्रद्धा करै कहँ चिरि पेट समायँ॥”
(भक्तमाल दोहा २०४)

जितने भक्त इस जगत में हुए हैं, उनकी कथा का वर्णन करना उतना ही कठिन है जितना एक चिड़िया के लिए समुद्र का जल पी जाना।

“काहू के बल जोग जग्य, कुल करनी की आस।
भक्त नाम माला उर बसौ नारायनदास॥”
(भक्तमाल दोहा २१४)

नाभादासजी की अंतिम प्रार्थना: मुझे न योग का बल है, न यज्ञ की आस्था, न कुल का गर्व। मेरी बस एक ही अभिलाषा है — गुरु की कृपा से भक्तों की यह माला मेरे हृदय में सदा बनी रहे।

“भक्तमाल केवल ग्रंथ नहीं, यह हृदय की व्याख्या है… यह भगवान की मुस्कान है… यह उस प्रेम की जलधारा है जो भक्त और भगवान को जोड़ती है। आइए, हम भी इस प्रेमपथ के राही बनें।”