
पद्म महापुराण — उत्तरखंड (अध्याय 3)
युधिष्ठिर — नारद संवाद: जालन्धर की उत्पत्ति
एक बार जब पाण्डव अत्यधिक दुःख से दुर्बल हो चुके थे, तब विप्रश्रेष्ठ नारदजी उनसे मिलने काम्बवन आए। पाण्डवों ने उनका विधिपूर्वक सत्कार किया। तत्पश्चात् युधिष्ठिर ने उन्हें नमस्कार कर विनम्र भाव से प्रश्न किया— “हे भगवन्! हम सब किस कारण से इस दुःखसागर में पड़े हुए हैं?” ॥१–२॥
सूतजी ने कहा— देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर से कहा, “हे पाण्डुनन्दन! आप दुःख का त्याग कर दें। यह संसार सुख और दुःख, दोनों का मिला-जुला रूप है। यहाँ वास्तव में कौन सुखी है?” ॥३॥
नारदजी ने आगे कहा— “यहाँ तक कि ईश्वर भी शरीर धारण कर स्थिर नहीं रहते, वे भी देहधारण के कारण दुःख का अनुभव करते हैं। कोई भी शरीरधारी दुःख से रहित नहीं है। अतः सबको दुःख सहना पड़ता है।” ॥४॥
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा— “बलशाली राहु भी सूर्य के शरीर को ग्रस लेता है। और अमृतपान के समय भगवान विष्णु ने स्वयं राहु का शिर काट दिया था। इसी प्रकार, वीर जालन्धर ने भी शारंगधनुषधारी भगवान विष्णु को समुद्र में पहुँचा दिया था। किंतु अंततः शिवजी ने ही उस जालन्धर का संहार किया।” ॥५–६॥
युधिष्ठिर ने आश्चर्य से पूछा— “वह जालन्धर वीर कौन था? वह किसका पुत्र था? वह इतना बलशाली कैसे हुआ? और शिवजी ने उसे किस प्रकार युद्ध में मारा? हे तपोनिधि! कृपया मुझे यह सब विस्तार से बताइए।” ॥८॥
सूतजी ने कहा— राजा युधिष्ठिर के इस प्रकार पूछने पर नारदजी ने कथा सुनाना आरंभ किया। ॥९॥
नारदजी ने कहा— “हे राजन्! आप समस्त पापों का नाश करने वाली इस अद्भुत और दिव्य कथा को ध्यानपूर्वक सुनिए। यह कथा ईश्वर और सागर-पुत्र के बीच हुए अत्यंत अद्भुत संग्राम की है।” ॥१०॥
उन्होंने कहा— “एक समय अप्सराओं का समूह और अनेक देवता इन्द्र के साथ कैलास पर्वत पर शंकरजी की स्तुति करने के लिए गए। इन्द्र, वीणा-वादन में निपुण गंधर्वों से घिरे हुए थे। रम्भा, तिलोत्तमा, रामा, कर्पूरा, कदली, मदना, भारती और कामा जैसी देवांगनाएँ विविध आभूषणों से अलंकृत होकर वहाँ उपस्थित थीं। इनके अतिरिक्त और भी नर्तकियाँ इन्द्र के समीप आईं।” ॥११–१३॥
“उनके साथ गंधर्वगण, यक्षगण, सिद्धगण, नारद, तुम्बुरु, अनेक किन्नर और किन्नर स्त्रियाँ भी वहाँ आईं। इसके अलावा वायु, वरुण, धनाधिप कुबेर, यम, अग्नि, नित्रऋति और अन्य देवता भी वहाँ पधारे।” ॥१४–१५॥
इन्द्र अपने दिव्य विमान पर विराजमान थे। उनके साथ देवताओं की स्त्रियाँ भी विमान पर बैठी हुई थीं। अन्य देवता अपने-अपने दिव्य वाहनों पर सवार होकर, तीव्र गति से कैलास पर्वत की ओर प्रस्थान कर रहे थे। शीघ्र ही वे सब पर्वतराज कैलास पर पहुँचे, जो पृथ्वी के अलंकार के समान और पर्वतों में सर्वश्रेष्ठ था।॥१६–१८॥
वह कैलास पर्वत सिद्धियों का भंडार था—हर दृष्टि से पवित्र, सुखद और शुद्ध। वहाँ के वृक्ष कल्पवृक्ष के समान थे, और पर्वत की शिलाएँ इच्छित वस्तु प्रदान करने वाली थीं। वह पर्वत पुन्नाग, नागचम्पा, तिलक, चन्दन, देवदारु, अशोक, पाटल, आम और मंदार के वृक्षों से अलंकृत होकर अद्भुत शोभा प्राप्त कर रहा था।॥१९–२०॥
मलयाचल से आने वाली सुगंधित वायु, चारों ओर फैले वनों की मनोहर गंध को लेकर बह रही थी, मानो वहाँ आकर वह भी स्थिर हो गई हो। पर्वत पर बने बावलियों की सीढ़ियाँ स्फटिकमणि से बनी हुई थीं। उनमें अगाध जल था और स्वर्णिम कमल खिले थे, जिनके नाल वैडूर्यमणि के समान प्रतीत हो रहे थे।॥२१–22॥
चारों ओर कुमुदिनी की शोभा फैली हुई थी। बावलियाँ मानो पद्मरागमणि से युक्त कक्षों की तरह सुशोभित थीं। उनके घाट नीलमणि और गोमेद से जड़े हुए थे। शिलाएँ पद्मरागमणि की बनी थीं और अनेक धातुओं से कलात्मक रूप से सजाई गई थीं।॥२३-२४॥
देवताओं ने जब उस कैलास पर्वत को देखा—जो स्वर्ग से भी अधिक अद्भुत और सुंदर प्रतीत हो रहा था—तो वे आश्चर्यचकित हो उठे।॥२५॥
इन्द्र और सभी देवता विमान से उतरकर, द्वारपाल नन्दी के समीप पहुँचे और उनसे कहा— “हे श्रेष्ठ गण! आप मेरी बात शंकरजी तक पहुँचाइए। बताइए कि मैं देवताओं सहित यहाँ नृत्य करने के लिए आया हूँ।”॥२६–२७॥
नारदजी कहते हैं—इन्द्र की यह बात सुनकर नन्दी ने शंकरजी से निवेदन किया, “हे प्रभु! देवराज इन्द्र समस्त देवताओं के साथ यहाँ पधारे हैं। वे नृत्य करना चाहते हैं।”॥२८॥
शंकरजी ने आदेश दिया, “नन्दी! शीघ्र जाकर इन्द्र को भीतर ले आओ।”
नन्दी तुरंत इन्द्र और अन्य देवताओं को लेकर भीतर पहुँचे।॥२९ ॥
इन्द्र ने प्रवेश करते ही भगवान शंकर की स्तुति की। तभी रम्भा आदि नर्तकियों ने वीणा, मृदंग और अन्य वाद्यों के साथ नृत्य का प्रदर्शन प्रारंभ किया। स्वयं इन्द्र ने भी कांस्य वाद्यों, काहल और वंशलियों की ताल पर मनोहर नृत्य प्रारंभ किया। उन्होंने ऐसा अद्भुत और मनोहारी नृत्य प्रस्तुत किया, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ था।॥३०–३१॥
शिवजी इन्द्र से प्रसन्न होकर बोले— “हे देवराज! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, माँगो, कौन-सा वरदान चाहते हो।” ॥३२॥
तब बाहुबल पर गर्व करने वाले इन्द्र ने उत्तर दिया— “हे प्रभो! मुझे किसी ऐसे ही महायोद्धा से युद्ध करने का वरदान दीजिए, जो आपके समान सामर्थ्यशाली हो।” ॥३३॥
शिवजी ने वर देने पर इन्द्र वहाँ से विजय की इच्छा के साथ प्रस्थान कर गए। उनके चले जाने के बाद शंकरजी ने अपने गणों से कहा— “सुनो! इन्द्र अत्यंत गर्वीला हो गया है।” ॥३४–३५॥
नारदजी कहते हैं— यह कहकर शिवजी क्रुद्ध हो उठे। तभी उनका क्रोध मूर्त रूप धारण कर उनके सम्मुख प्रकट हुआ। ॥३६॥
वह क्रोध घोर अंधकार के समान काला था। उसने विनम्र होकर कहा— “हे प्रभो! आज्ञा दीजिए, मैं क्या करूँ?” ॥३७॥
शिवजी ने आदेश दिया—
“तुम जाकर पराक्रमी इन्द्र को पराजित करो।” इतना सुनते ही वह क्रोध स्वर्गगंगा और सागर को प्राप्त कर विलीन हो गया। यह देखकर शिवगण अत्यंत चकित रह गए। ॥३८॥
तब सागर, शंकरजी के समान कामनाओं से भर गया और स्वर्गगंगा अपनी यौवनावस्था में मदमत्त हो उठी। उसे देखकर सागर की लहरें उफान मारने लगीं। ॥३९–४०॥
हे राजेन्द्र! उस समय गंगा और सागर का संगम हुआ और गंगाजी ने सागर के साथ बलपूर्वक रमण किया। ॥४१॥
उस संगम से गंगा के गर्भ से एक अत्यंत बलशाली पुत्र उत्पन्न हुआ। ॥४२॥
जब वह पुत्र उत्पन्न होकर रोने लगा, तो उसके रुदन से पृथ्वी काँप उठी और समस्त त्रैलोक्य उसकी ध्वनि से गूँज उठा। ॥४३॥
उस गर्जना से ब्रह्माजी की समाधि भी टूट गई। त्रैलोक्य को भयभीत देख इन्द्र ने ब्रह्माजी को समुद्र के पास भेजा। ब्रह्माजी भी इसे अद्भुत मानकर हंस पर आरूढ़ होकर तीव्रगति से समुद्र के समीप पहुँचे। ॥४४–४५॥
समुद्र ने ब्रह्माजी का पूजन किया। तब ब्रह्माजी ने पूछा— “हे सागर! तुम व्यर्थ ही इतनी गर्जना क्यों कर रहे हो?” ॥४६॥
सागर ने उत्तर दिया—“हे देवेश! यह गर्जना मैं नहीं, बल्कि मेरा बलशाली पुत्र कर रहा है। कृपया इसकी रक्षा कीजिए। आपका दर्शन ही दुर्लभ है। आप मेरी पत्नी और पुत्र दोनों को दर्शन का सौभाग्य दीजिए।” ॥४७–४८॥
पति की आज्ञा पाकर समुद्र की पत्नी पुत्र सहित ब्रह्माजी के पास पहुँची। उसने पुत्र को गोद में लेकर ब्रह्माजी को प्रणाम किया। उस समय बालक को देखकर ब्रह्माजी भी चकित रह गए। ॥४९॥
तभी उस बालक ने ब्रह्माजी की दाढ़ी पकड़ ली और ब्रह्माजी उसका हाथ छुड़ा न सके। तब समुद्र हँसते हुए आगे आए और बालक का हाथ पकड़कर उनकी दाढ़ी छुड़ाई। ॥५०॥
उस बालक के उस प्रकार के पराक्रम को देखकर ब्रह्माजी ने उसे प्रेम पूर्वक जालन्धर कहा और उसका नाम जालन्धर हो गया।॥५१॥
फिर उन्होंने वरदान दिया— “प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे वरदान दिया कि यह जालन्धर देवताओं के लिए अजेय होगा॥५२॥
यह मेरी कृपा से पाताल और स्वर्ग दोनों का स्वामी होगा, इस तरह से कहकर ब्रह्माजी हंस पर चढ़कर शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये ॥५३॥
इस प्रकार पचपन हजार श्लोकों वाले श्रीपद्ममहापुराण के उत्तरखण्ड का युधिष्ठिर–नारद संवादान्तर्गत जालन्धर की उत्पत्ति और ब्रह्माजी के आगमन का वर्णन करने वाला तीसरा अध्याय सम्पूर्ण हुआ।
