पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड

अध्याय 9: जालन्धर का सुराज्य: देवताओं पर विजय और स्वर्ग की स्थापना


जय श्री हरी

दोस्तों पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड अध्याय ८ में दैत्यराज जालन्धर और भगवान विष्णु के बीच हुए भीषण युद्ध का वर्णन आता है। श्रीहरि ने अपने दिव्य बाणों और शक्ति से दैत्यों का संहार किया, किंतु जालन्धर अपनी अपार शक्ति से देवताओं और स्वयं विष्णु को भी संकट में डाल देता है। युद्ध का दृश्य अत्यन्त रोमांचक और विस्मयकारी है — कभी विष्णु अपने शौर्य से दैत्यों को धराशायी करते हैं, तो कभी जालन्धर उन्हें पराजित कर बाँध लेता है।

लक्ष्मीजी के हस्तक्षेप से भगवान विष्णु की रक्षा होती है और जालन्धर उन्हें छोड़ देता है। विष्णु स्वयं उसके पराक्रम से संतुष्ट होकर वरदान देते हैं। इसके बाद वे लक्ष्मीजी के साथ क्षीरसागर में निवास करने चले जाते हैं। इस प्रकार अध्याय ८ का समापन होता है, जहाँ जालन्धर देवताओं को परास्त करके विजयी होकर सुराज्य स्थापित करता है।

अब कथा अध्याय ९ में प्रवेश करती है, जहाँ बताया गया है कि —

दैत्यराज जालन्धर ने देवताओं को हराकर और विष्णु को अपने पक्ष में करके स्वर्ग और पृथ्वी पर अपना अद्वितीय शासन स्थापित किया। उसके राज्य में दुःख, दरिद्रता, विधवापन या अन्याय का नाम तक नहीं था। चारों ओर समृद्धि, सौंदर्य और सुख-शांति का साम्राज्य था। जालन्धर ने देवताओं से छिने हुए रत्न और यज्ञभाग स्वयं भोगे और अपने प्रिय शुम्भ-निशुम्भ को युवराज बनाया। उसका शासन ऐसा था कि लोग जरा, मृत्यु और दरिद्रता से मुक्त होकर दिव्य सुख का अनुभव करने लगे।

इस प्रकार अध्याय ८ की युद्धगाथा से कथा आगे बढ़ती है और अध्याय ९ में जालन्धर के सुराज्य और देवताओं के अपमान की कथा सामने आती है। यह कथा युधिष्ठिर नारद संवाद के अन्तर्गत नौवें अध्याय में २६ श्लोक में वर्णित है जिसका हिंदी रूपांतर आपके सामने लाया हूँ।


श्लोक 1-87.

महाराज युधिष्ठिर ने आदरपूर्वक पूछा —

“हे देवर्षि नारद! समुद्र-पुत्र जालन्धर ने जब देवताओं को युद्ध में परास्त कर दिया और श्रीभगवान् को अपने गृह में स्थापित कर लिया, तब उसने आगे क्या किया? कृपया उसका विस्तारपूर्वक वर्णन करें।”

नारदजी बोले —

“हे राजन्! जब जालन्धर ने अपने पराक्रम से देवताओं को हराया, तब वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने शुम्भ, निशुम्भ और अन्य वीर दैत्यों को मनोहर उपहार और दान देकर सम्मानित किया। तत्पश्चात् वह स्वर्गलोक की ओर गया।

स्वर्ग में प्रवेश करते ही उसने वहाँ के अद्भुत दृश्य देखे। वहाँ प्रतिदिन स्वर्ण की वर्षा होती थी, और देवलोकवासी उस सुवर्ण को धारण कर स्वयं को अलंकृत करते थे। उस लोक में दिव्य कल्पवृक्ष सदैव अश्वमेध यज्ञ का पुण्यफल प्रदान करते रहते थे।

स्वर्ग की उस अद्भुत नगरी में जाने का अधिकारी वही होता है, जो —

हाथी, वस्त्र, स्वर्ण, गौ, कन्या, तिल, पुष्प, कर्पूर, ताम्बूल, कस्तूरी और कुङ्कुम जैसे दान करता है। वर्षा ऋतु में गृहदान करने वाले, शिशिर ऋतु में अग्निदान करने वाले, शिवालयों में सभी वाद्यों को बजवाने वाले, और चैत्र मास में दध्योदन के साथ पौशाल चलाने वाले महानुभाव अमरावती नगरी की शोभा बढ़ाते हैं।”

वहाँ के दिव्य लोकों में लोग आनंदपूर्वक झूले (पर्यङ्क) को स्थापित करके स्वयं उस पर झूलते रहते थे। वातावरण मधुर और हृदयस्पर्शी था—सारिका, शुक (तोता), हंस, कोकिल और गुञ्जार करते भ्रमर दूत का कार्य करते, प्रियजनों और प्रियतमाओं का संदेश पहुँचाते तथा उन्हें मिलाने का दिव्य माध्यम बनते।

उस पावन प्रदेश में रम्भा, रामा, मेनका, तिलोत्तमा, सुषमा, घृताची, पुञ्जिकस्थली, सुकेशी, सुमुखी, मनुघोषा, मालिनी, मृगोद्भवा, सुखदा, धनदंष्ट्रा, तिलप्रभा और अनेकों अन्य अद्भुत सौंदर्य से युक्त अप्सराएँ अपने नृत्य और माधुर्य से वातावरण को अनुपम बना देती थीं। ये अप्सराएँ मानो स्वयं अश्वमेध और राजसूय यज्ञ का फल प्रदान करती थीं।

हे राजन्! उस स्थान पर ऐसी करोड़ों निष्पाप और अलौकिक अप्सराएँ निरंतर क्रीड़ा करती थीं। इस प्रकार जालन्धर ने अत्यंत सुखमय, वैभवशाली और रमणीय स्वर्ग में अपना राज्य स्थापित किया।

अपने प्राणों के समान प्रिय शुम्भ और निशुम्भ नामक दैत्यों को युवराज बनाकर जालन्धर स्वर्ग से लौट आया। अपने अद्वितीय पराक्रम और बल से उसने महासागर के समान विराट साम्राज्य पर पूरे बारह वर्षों तक निःशंक राज्य किया।

युधिष्ठिर ने उत्सुकता से कहा—

“हे देवर्षि! देवताओं को संग्राम में पराजित करने वाला वह प्रतापी जालन्धर, इसके बाद क्या करता रहा? कृपा करके आप विस्तार से उसका वर्णन मुझे सुनाइए।”

नारदजी ने उत्तर दिया—

“हे राजन्! ध्यानपूर्वक सुनिए। मैं जालन्धर का सटीक और अद्भुत वृत्तांत आपको सुनाता हूँ। वह युद्ध में देवताओं को हराकर निर्बाध और अकण्टक साम्राज्य का स्वामी बन बैठा।

गन्धर्वराज चित्रसेन और आति जैसे महान गन्धर्व भी असुरेश्वर जालन्धर की सेवा में निरंतर तत्पर रहते थे। इतना ही नहीं, सभी यज्ञों के पावन अंश और उनका पुण्यफल केवल उसी असुरेश्वर को प्राप्त होता था।”

हे राजन्! देवताओं ने क्षीरसागर से जो दिव्य रत्न प्राप्त किए थे, उस बलशाली जालन्धर ने अपने पराक्रम से उन सबका भी हरण कर लिया। उसके राज्यकाल में अद्भुत चमत्कार घटित हुआ—उस समय कोई मनुष्य न मृत्यु को प्राप्त होता था और न ही किसी को नरक में जाना पड़ता था।

जालन्धर के शासन में न तो अन्य किसी विषय में कलह होता था, केवल प्रणय-भाव में ही कभी मतभेद उठता था। भोग-विलास में ही क्षय होता था, किन्तु जीवन के अन्य क्षेत्रों में सब पूर्णता को प्राप्त थे।

उसके साम्राज्य में कोई भी स्त्री अलंकारों से रहित नहीं थी। कोई नारी कुरूप, दुर्गति-ग्रस्त, दुष्टा या यशहीन नहीं थी। न तो कोई विधवा दिखाई देती थी और न ही कोई निर्धन।

सभी लोग समृद्ध और दानी थे—हर कोई ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक अपना धन और दान अर्पित करता था। कोई भी केवल लेने वाला नहीं था, सब देने में ही आनन्द अनुभव करते थे।

हे राजन्! जालन्धर के राज्यकाल में प्रत्येक गृह की रमणियाँ अपने रूप और यौवन से विभूषित रहती थीं। वहाँ के लोग वृद्धावस्था से रहित थे, सब सदैव यौवनमय और प्रसन्नचित्त थे।

गौ का दूध, दही और घृत प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता था। हर ओर मंगल ही मंगल था। कोई मनुष्य न तो मारता था और न ही बंधन में डाला जाता था। ऋण लेने की आवश्यकता किसी को नहीं थी, क्योंकि सर्वत्र धन-संपन्न लोग निवास करते थे। प्रजाएँ धान्य-सम्पदा से परिपूर्ण और संतुष्ट थीं।

हर घर में गन्ने का रस मधुर और स्वादिष्ट रूप में उपलब्ध था। लोगों के बीच केवल मंगलकारी और कल्याणमयी वार्तालाप ही सुनाई पड़ते थे। मार्गों पर यात्री निडर होकर चलते थे, उनकी धन-संपत्ति को कोई भी छीनने वाला नहीं था।

वहाँ तो अद्भुत दृश्य देखने को मिलता था—आकाश से घी की धारा निरंतर बरसती रहती थी। स्मरण करते ही लोगों के मुख में मानो शक्कर-मिश्रित दूध प्रवाहित हो उठता था।

इस प्रकार, हे महाराज युधिष्ठिर! श्रीपद्ममहापुराण के उत्तरखण्ड में वर्णित जालन्धर-सौराज्य वर्णन नामक नवाँ अध्याय पूर्ण होता है।

जालन्धर का यह राज्य वैभव, ऐश्वर्य और दिव्य आनंद से परिपूर्ण था। कहीं मृत्यु नहीं, कहीं दुःख नहीं, न कोई निर्धन और न ही कोई विधवा। हर ओर सुख, सौंदर्य और संपन्नता का साम्राज्य था। किंतु, हे राजन्! यह दृश्य हमें एक गहन सत्य का बोध कराता है—कि बाहरी ऐश्वर्य चाहे कितना भी अद्भुत क्यों न हो, उसकी स्थिरता परमेश्वर की इच्छा के बिना संभव नहीं।

जालन्धर का साम्राज्य अपार तेज और समृद्धि से भरा था, परंतु यह भी एक लीला का अंश था। आगे की कथा में हम देखेंगे कि किस प्रकार इस दैत्यराज का अहंकार और देवताओं का संताप भगवान की योजना को आगे बढ़ाता है।

अतः आइए, हम इस प्रसंग से यह सीखें कि सुख-संपत्ति का वास्तविक आधार ईश्वर की कृपा और धर्म की स्थापना में है। बाहरी वैभव क्षणभंगुर है, परंतु भक्ति और धर्म ही शाश्वत हैं।

अब अगले अध्याय में हम प्रवेश करेंगे—जहाँ यह कथा और भी गहन मोड़ लेती है, और जालन्धर की शक्ति के साथ-साथ ईश्वरीय योजना का रहस्य हमारे समक्ष प्रकट होता है।”

Source: पद्मपुराण

ॐ नमः शिवाय 🙏