नर्मदा नदी
पौराणिक नदियां: इतिहास, आस्था और चेतना की नदी
रामायण, महाभारत तथा अनेक परवर्ती पुराण–ग्रंथों में नर्मदा नदी का गौरवपूर्ण उल्लेख मिलता है। पौराणिक परंपरा के अनुसार नर्मदा की एक नहर किसी सोमवंशी राजा द्वारा निकाली गई थी, इसी कारण इसे ‘सोमोद्भवा’ कहा गया। गुप्तकालीन ग्रंथ अमरकोश में भी नर्मदा का यही नाम मिलता है। महाकवि कालिदास ने इसे सोमप्रभवा कहा है। रघुवंश में इसका उल्लेख है और मेघदूत में रेवा (नर्मदा) का अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण वर्णन मिलता है।
विश्व में नर्मदा ही एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। पुराणों में कहा गया है कि जहाँ गंगा में स्नान से जो पुण्य फल मिलता है, वही फल नर्मदा के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है। भौगोलिक दृष्टि से भी नर्मदा अद्वितीय है। यह भारत की प्रमुख नदियों में से एक है जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है।
आधुनिक काल में नर्मदा परियोजनाओं के विकास के कारण कई पुरातात्विक और स्थापत्य स्थल जलमग्न हुए। इसके प्रत्युत्तर में मध्य प्रदेश सरकार के पुरातत्व, संग्रहालय एवं अभिलेखागार विभाग ने बचाव उत्खनन कर अनेक प्राचीन मंदिरों का प्रत्यारोपण किया। जलमग्न हो चुके स्थलों का विस्तृत दस्तावेजीकरण विद्वान जर्गेन न्यूस द्वारा किया गया, जिससे नर्मदा घाटी की सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित स्मृति के रूप में संजोई जा सकी।
नर्मदा केवल एक नदी नहीं—यह इतिहास, आस्था और भारतीय सभ्यता की जीवित धारा है।
गोंडवाना समाज को मगरमच्छ की सवारी करने वाली नर्मदा मैया से क्या है जुड़ाव ? विश्व में एकमात्र पाप-नाशिनी नर्मदा नदी को भगवान शिव ने कौन सा वरदान दिया था ? नर्मदा नदी पूर्व से पश्चिम की ओर क्यों बहती है? क्या है किंवदंती? आइये जानते हैं इस लेख में।
नर्मदा नदी भारत की एक बहुत ही प्रसिद्ध और पवित्र नदी है। इसका उद्गम मध्य प्रदेश के अमरकंटक पर्वत से होता है। यह नदी पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हुई खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में मिल जाती है। नर्मदा को रेवा भी कहा जाता है।
यह नदी विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के बीच से बहती है और भारत की प्रमुख पश्चिम की ओर बहने वाली नदी है। नर्मदा नदी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर लगभग 1312 किलोमीटर की यात्रा तय करती है। यह न केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि सिंचाई, बिजली और जल आपूर्ति के लिए भी बहुत उपयोगी है। इसी नदी पर सरदार सरोवर बांध जैसे बड़े बांध बने हैं।
1. नर्मदा नदी के प्रमुख स्थल
धुआंधार जलप्रपात – जबलपुर के पास
मार्बल रॉक्स – जबलपुर के पास संगमरमर की चट्टानें
महेश्वर और ओंकारेश्वर – प्रसिद्ध धार्मिक स्थल
सरदार सरोवर बांध – गुजरात में, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के पास
2. हिन्दू धर्म में नर्मदा का महत्व
नर्मदा नदी को हिन्दू धर्म में बहुत ही दिव्य और पवित्र माना गया है। इसकी महिमा का वर्णन स्कंद पुराण के रेवाखंड में किया गया है, जिसकी रचना वेदव्यास जी ने की थी। मान्यता है कि भगवान विष्णु द्वारा राक्षसों के वध के बाद प्रायश्चित के लिए भगवान शिव ने अमरकंटक पर्वत पर नर्मदा को एक 12 वर्ष की कन्या के रूप में प्रकट किया। देवताओं ने उसके सुंदर और दिव्य स्वरूप के कारण उसका नाम नर्मदा रखा।
नर्मदा ने काशी के पंचक्रोशी क्षेत्र में भगवान शिव की तपस्या की और उनसे ऐसे वरदान पाए जो किसी और नदी को नहीं मिले—
प्रलय (संसार के अंत) में भी नर्मदा का नाश न हो
नर्मदा संसार की सबसे बड़ी पाप नाशिनी नदी कहलाए
नर्मदा के हर पत्थर को नर्मदेश्वर शिवलिंग माना जाए, जिसकी बिना प्राण-प्रतिष्ठा के पूजा हो सके
इसी कारण आज भी अनेक शिव मंदिरों में नर्मदेश्वर शिवलिंग स्थापित हैं। मान्यता है कि शिव-पार्वती, सभी देवता, ऋषि-मुनि, भगवान राम, लक्ष्मण, हनुमान, गणेश और कार्तिकेय आदि ने नर्मदा तट पर तपस्या कर सिद्धियाँ प्राप्त कीं। नर्मदा के दक्षिण तट पर आदित्येश्वर तीर्थ है, जहाँ सूर्य देव ने तपस्या की थी। जब अकाल पड़ा, तब ऋषियों की तपस्या से प्रसन्न होकर नर्मदा पुनः कन्या रूप में प्रकट हुईं। नर्मदा ने स्वयं कहा कि सच्चे गुरु से दीक्षा लेकर, नर्मदा तट पर तपस्या करने से भगवान शिव की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।
3. गोंडवाना वंशज का जुड़ाव-
नर्मदा नदी गोंडवाना वंशजों तथा गोंडी धर्म के लिए बहुत ही पवित्र है, यह केवल एक नदी ही नहीं वरन् गोंडवाना की उत्पत्ति स्थल यानि जन्म स्थली है, यहाँ लाखों गोंडवाना वंशजों के वंशज तथा गोंड लोग 14 जनवरी को मा नर्मदा एवं अपने पुर्वजो के याद में आते हैं। हीरा सिंह मरकाम के द्वारा अमर ज्योति नर्मदा उदगम स्थल के पास जलाया गया है ताकि आगे आने वाली पीढ़ी अपने पुर्वजो को भूल न पाए। कालांतर में प्रचलित कथाओं में कई उतार चढ़ाव आए। उन्ही में से एक कथा गोंडवाना इतिहास से जुड़ी है जिसके कारण गोडवाना समाज के लिए प्राचीन काल से ही एक पवित्र स्थल है।
14 जनवरी में देश विदेश के गोंडवाना वंशजों को मानने वाले ईस जगह आते हैं। अमरकंटक के जंगलों के बीच तथा अमरकंटक पहाड़ से निकले हुए हैं पूरे गोंडवाना भूभाग को जल देते हुए समुद्र में मिल गयी है। इसी नदी के तट पर मंडला गढ़ के किला का निर्माण (जिला मंडला) मरावी वंश के गोंडवाना राजाओं के द्वारा (गोंडवाना किला ) किया गया है। जिस तरह गंगा अन्य धर्मों के लिए पवित्र है उसी तरह नर्मदा नदी गोंडवाना वंशजों के लिए अति पवित्र नदी हैं।
यह मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के अमर कंटक पहाड़ से निकलते हुए गोंडवाना भूभाग को जल प्रदान करते हुए अरब सागर में मिल जाती हैं। इसको रेवा गोंडवाना की पवित्र नदी के नाम से भी जाना जाता है। नर्मदा मैया मगरमच्छ की सवारी करते हैं, यह भी कहा जाता है कि आज तक किसी भी व्यक्ति को नर्मदा नदी में मगरमच्छ नहीं खाया है, क्योंकि नर्मदा मैया खुद मगरमच्छ की सवारी करते हैं।
इसकी उत्पत्ति एक कोयावंशी पिता अपने लड़की के साथ इसी जंगल में लकड़ी लेने आया था। जब पिता और पुत्री को प्यास लगी तो, पानी दोनों पानी ढ़ूढ़ने लगे। बहुत समय बीत गया पर पानी कहीं नहीं मिला। और आगे बढ़ते हुए एक दुसरे से बिछड़ गए।
दोनों को ऐसा लगने लगा कही वो पानी पिये बिना मर जाए। पिता अपनी बिटिया की प्यास बुझाने के लिए बहुत दूर आगे बढ़ता रहा। बिटिया को अपने पिता की प्यास बुझाने के लिए तथा ईस भयंकर जंगल जहाँ बिलकुल पानी सब सूना है ऐसे जगह सभी चर अचर की प्यास बुझाने के लिए अपने आप को बड़ा देव का ध्यान लगाकर स्मरण करने लगी ।
बड़े देव से आशीर्वाद लेकर अपने आप को नदी के रूप में समाधि ले लिया। फिर आगे क्या हुआ नीचे बहते गये तो उनके पिता को यह आवाज सुनाई देता है, पिताजी दौड़ते है और अपने बिटिया को बुलाते हैं, आओ ईधर पानी है ,आ जाओ।
पिता सोचने लगा कि बिटिया को पिला ले फिर मैं पिऊगा । पिता की बेहाल देखकर पुत्री प्रगट होकर कहती हैं। आप पानी पी लो । हे पिता श्री मैं अब नहीं आ सकती, सभी को पानी की कमी ईस सूखे जंगल में नहीं होने दूगी। ईतना कहते हुए नदी में फिर से विलय हो जाती हैं। पिता भी हाथ जोड़कर विनम्र भाव से हाथ जोड़ते हुए वहाँ से चला जाता है।
ईसी कारण से गोंड वंशज अपने बिटिया के घर पानी पी लेते हैं,जबकि अन्य धर्मों में बिटिया के घर में माता पिता पानी नहीं पीते हैं। ईसी दिन से आज तक मैया बह रही हैं।
4. लोक कथायें
नर्मदा नदी को लेकर कई लोक कथायें प्रचलित हैं एक कहानी के अनुसार नर्मदा जिसे रेवा के नाम से भी जाना जाता है और राजा मैखल की पुत्री है। उन्होंने नर्मदा से शादी के लिए घोषणा की कि जो राजकुमार गुलबकावली के फूल उनकी बेटी के लिए लाएगा, उसके साथ नर्मदा का विवाह होगा। सोनभद्र यह फूल ले आए और उनका विवाह तय हो गया।
दोनों की शादी में कुछ दिनों का समय था। नर्मदा सोनभद्र से कभी मिली नहीं थीं। उन्होंने अपनी दासी जुहिला के हाथों सोनभद्र के लिए एक संदेश भेजा। जुहिला ने नर्मदा से राजकुमारी के वस्त्र और आभूषण मांगे और उसे पहनकर वह सोनभद्र से मिलने चली गईं। सोनभद्र ने जुहिला को ही राजकुमारी समझ लिया।
जुहिला की नियत भी डगमगा गई और वह सोनभद्र का प्रणय निवेदन ठुकरा नहीं पाई। काफी समय बीता, जुहिला नहीं आई, तो नर्मदा का सब्र का बांध टूट गया। वह खुद सोनभद्र से मिलने चल पड़ीं। वहां जाकर देखा तो जुहिला और सोनभद्र को एक साथ पाया। इससे नाराज होकर वह उल्टी दिशा में चल पड़ीं। उसके बाद से नर्मदा बंगाल सागर की बजाय अरब सागर में जाकर मिल गईं।
एक अन्य कहानी के अनुसार सोनभद्र नदी को नद (नदी का पुरुष रूप) कहा जाता है। दोनों के घर पास थे। अमरकंटक की पहाडिय़ों में दोनों का बचपन बीता। दोनों किशोर हुए तो लगाव और बढ़ा। दोनों ने साथ जीने की कसमें खाई, लेकिन अचानक दोनों के जीवन में जुहिला आ गई। जुहिला नर्मदा की सखी थी। सोनभद्र जुहिला के प्रेम में पड़ गया।
नर्मदा को यह पता चला तो उन्होंने सोनभद्र को समझाने की कोशिश की, लेकिन सोनभद्र नहीं माना। इससे नाराज होकर नर्मदा दूसरी दिशा में चल पड़ी और हमेशा कुंवारी रहने की कसम खाई। कहा जाता है कि इसीलिए सभी प्रमुख नदियां बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं,लेकिन नर्मदा अरब सागर में मिलती है।
जय श्री हरी
Source:पद्म पुराण और इंटरनेट मीडिया
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