
🙏 दुर्गा सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्लोक 41-60) 🙏
देवी दुर्गा के हजार नामों में से अगला 20 श्लोक एवं उनके हिन्दी अर्थ
श्लोक 41
सिद्धिदा बुद्धिदा नित्या सत्यमार्गप्रबोधिनी।
कम्बुग्रीवावसुमती छत्रच्छाया कृतालया॥41॥
कम्बुग्रीवावसुमती छत्रच्छाया कृतालया॥41॥
हिन्दी अर्थ: वे सिद्धिदात्री, बुद्धिदात्री, नित्य स्वरूपा और सत्य मार्ग का बोध कराने वाली हैं। वे कम्बुग्रीवा (शंख के समान गला वाली), संपन्न और छत्रच्छाया प्रदान करने वाली हैं।
श्लोक 42
जगद्गर्भा कुण्डलिनी भुजगाकारशायिनी।
प्रोल्लसत्सप्तपद्मा च नाभिनालमृणालिनी॥42॥
प्रोल्लसत्सप्तपद्मा च नाभिनालमृणालिनी॥42॥
हिन्दी अर्थ: वे जगद्गर्भा, कुण्डलिनी शक्ति, सर्पाकार शैय्या पर शयन करने वाली हैं। वे नाभि से उत्पन्न सात कमलों से शोभित और मृणालिनी हैं।
श्लोक 43
मूलाधारा निराकारा वह्रिकुण्डकृतालया।
वायुकुण्डसुखासीना निराधारा निराश्रया॥43॥
वायुकुण्डसुखासीना निराधारा निराश्रया॥43॥
हिन्दी अर्थ: वे मूलाधार में स्थित हैं, निराकार हैं। वे वह्रिकुण्ड (मूलचक्र) में आलय करती हैं। वे वायु कुण्ड में सुखपूर्वक आसन ग्रहण करती हैं। वे निराधार और निराश्रया हैं।
॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
श्लोक 44
श्वासोच्छवासगतिर्जीवा ग्राहिणी वह्निसंश्रया।
वल्लीतन्तुसमुत्थाना षड्रसा स्वादलोलुपा॥44॥
वल्लीतन्तुसमुत्थाना षड्रसा स्वादलोलुपा॥44॥
हिन्दी अर्थ: वे श्वास-उच्छ्वास की गति रूपा, जीवात्मा की धारिणी, अग्नि पर आश्रिता हैं। वे लता के तन्तुओं की भाँति उत्पन्न होने वाली और षड्रसों (छह स्वादों) में आसक्ति रखने वाली हैं।
श्लोक 45
तपस्विनी तपःसिद्धि तपसः सिद्धिदायिनी।
तपोनिष्ठा तपोयुक्ताः तापसी च तपःप्रिया॥45॥
तपोनिष्ठा तपोयुक्ताः तापसी च तपःप्रिया॥45॥
हिन्दी अर्थ: वे तपस्विनी, तपःसिद्धि देने वाली, तप की सिद्धिदायिनी हैं। वे तपोनिष्ठा, तपयुक्ता, तापसी और तप की प्रिया हैं।
श्लोक 46
सप्तधातुर्मयीर्मूतिः सप्तधात्वन्तराश्रया।
देहपुष्टिर्मनःपुष्टिरन्नपुष्टिर्बलोद्धता॥46॥
देहपुष्टिर्मनःपुष्टिरन्नपुष्टिर्बलोद्धता॥46॥
हिन्दी अर्थ: वे सप्तधातुओं से बनी मूर्ति हैं और सप्तधातुओं में ही आश्रित हैं। वे शरीर की पुष्टिकर, मन की पुष्टिदात्री, अन्नपुष्टिकारिणी और बल प्रदान करने वाली हैं।
श्लोक 47
औषधी वैद्यमाता च द्रव्यशक्तिप्रभाविनी।
वैद्या वैद्यचिकित्सा च सुपथ्या रोगनाशिनी॥47॥
वैद्या वैद्यचिकित्सा च सुपथ्या रोगनाशिनी॥47॥
हिन्दी अर्थ: वे औषधि स्वरूपा, वैद्यमाता और द्रव्यशक्ति की प्रभाविनी हैं। वे वैद्य, वैद्यकला की अधिष्ठात्री और सुपथ्या (सही मार्गदर्शक) रोगनाशिनी हैं।
श्लोक 48
मृगया मृगमांसादा मृगत्वङ् गलोचना।
वागुराबन्धरूपा च बन्धरूपावधोद्धता॥48॥
वागुराबन्धरूपा च बन्धरूपावधोद्धता॥48॥
हिन्दी अर्थ: वे मृगया (शिकार) स्वरूपा, मृगमांस खाने वाली, मृगचर्म धारण करने वाली और गरुड़ नेत्रों वाली हैं। वे वागुरा (फंदा) और बन्धन रूपिणी हैं।
श्लोक 49
बन्दी बन्दिस्तुता कारागारबन्धविमोचिनी।
शृङ्खला कलहा बद्धा दृढबन्धविमोक्षिणी॥49॥
शृङ्खला कलहा बद्धा दृढबन्धविमोक्षिणी॥49॥
हिन्दी अर्थ: वे बन्दी, बन्दिस्तुता और कारागार बन्धनों से मुक्त कराने वाली हैं। वे शृंखला (जंजीर), कलह और बन्धनों को दृढ़ कर, पुनः उनका विमोचन करने वाली हैं।
📖 हमारे अन्य लेख यहां से पढ़ें:
श्लोक 50
अम्बिकाम्बालिका चाम्बा स्वच्छा साधुजर्नाचिता।
कौलिकी कुलविद्या च सुकुला कुलपूजिता॥50॥
कौलिकी कुलविद्या च सुकुला कुलपूजिता॥50॥
हिन्दी अर्थ: वे अम्बिका, अंबालिका और अम्बा हैं। वे स्वच्छ, साधुजनों द्वारा पूजिता हैं। वे कौलिकी, कुलविद्या स्वरूपा, सुकुला और कुलपूजिता हैं।
श्लोक 51
कालचक्रभ्रमा भ्रान्ता विभ्रमाभ्रमनाशिनी।
वात्याली मेघमाला च सुवृष्टिः सस्यर्वधिनी॥
वात्याली मेघमाला च सुवृष्टिः सस्यर्वधिनी॥
हिन्दी अर्थ: माँ कालचक्र (समय के चक्र) की गति से चलती हैं और उसी से भ्रमितों को मार्ग देती हैं। वे सभी भ्रांतियों का नाश करने वाली हैं। वे आँधी और तूफान जैसी प्रचंड भी हैं, मेघमाला रूप से वर्षा करने वाली हैं और अन्न-धान्य की वृद्धि कराने वाली शक्ति हैं।
श्लोक 52
अकारा च इकारा च उकारौकाररूपिणी।
ह्रीङ्कार बीजरूपा च क्लीङ्काराम्बरवासिनी॥
ह्रीङ्कार बीजरूपा च क्लीङ्काराम्बरवासिनी॥
हिन्दी अर्थ: माँ ही “अ, इ, उ, औ” वर्णों की स्वरूपिणी हैं। वे “ह्रीं” बीजमंत्र की मूर्ति हैं और “क्लीं” मंत्र के वस्त्रों को धारण करने वाली, बीजमंत्रों की अधिष्ठात्री देवी हैं।
श्लोक 53
सर्वाक्षरमयीशक्तिरक्षरा वर्णमालिनी।
सिन्दूरारुणवर्णा च सिन्दूरतिलकप्रिया॥
सिन्दूरारुणवर्णा च सिन्दूरतिलकप्रिया॥
हिन्दी अर्थ: वे सम्पूर्ण अक्षरों की अधिष्ठात्री शक्ति हैं, अक्षर स्वरूपिणी और वर्णमाला की धनी हैं। उनका वर्ण सिन्दूर की भाँति अरुण है और वे सिन्दूर-तिलक से शोभायमान होती हैं।
श्लोक 54
वश्या च वश्यबीजा च लोकवश्यविभाविनी।
नृपवश्या नृपैः सेव्या नृपवश्यकरप्रिया॥
नृपवश्या नृपैः सेव्या नृपवश्यकरप्रिया॥
हिन्दी अर्थ: माँ वशीकरण की अधिष्ठात्री हैं, वश्य बीजमंत्र स्वरूपिणी हैं और लोकों को वश में करने वाली शक्ति हैं। वे राजाओं को वश में करने वाली, राजाओं द्वारा पूज्य और शासन-व्यवस्था को चलाने में सहायक शक्ति हैं।
श्लोक 55
महिषा नृपमान्या च नृपान्या नृपनन्दिनी।
नृपधर्ममयी धन्या धनधान्यविवर्धिनी॥
नृपधर्ममयी धन्या धनधान्यविवर्धिनी॥
हिन्दी अर्थ: वे महिषासुर का नाश करने वाली, राजाओं द्वारा मान्य और उनकी रक्षिणी हैं। राजधर्म की स्वरूपिणी हैं, कल्याणकारी और धन-धान्य को बढ़ाने वाली शक्ति हैं।
श्लोक 56
चतुर्वर्णमयीमूर्तिश्चतुर्वणैंश्च पूजिता।
सर्वधर्ममयीसिद्धि श्चतुराश्रमवासिनी॥
सर्वधर्ममयीसिद्धि श्चतुराश्रमवासिनी॥
हिन्दी अर्थ: देवी चारों वर्णों की मूर्ति हैं और सब वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) द्वारा पूजित हैं। वे सभी धर्मों की सिद्धिदायिनी और चारों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) में वास करने वाली हैं।
श्लोक 57
ब्राह्मणी क्षत्रिया वैश्या शूद्रा चावरवर्णजा।
वेदमार्गरता यज्ञा वेदिर्विश्वविभाविनी॥
वेदमार्गरता यज्ञा वेदिर्विश्वविभाविनी॥
हिन्दी अर्थ: वे ब्राह्मणी, क्षत्राणी, वैश्य और शूद्र—सभी रूपों में प्रकट होती हैं। वे वेदमार्ग का पालन करने वाली, यज्ञ स्वरूपा और यज्ञ वेदी की अधिष्ठात्री हैं।
श्लोक 58
अनुशस्त्रमयी विद्या वरशस्त्रास्त्रधारिणी।
सुमेधा सत्यमेधा च भद्रकाल्यपराजिता॥
सुमेधा सत्यमेधा च भद्रकाल्यपराजिता॥
हिन्दी अर्थ: वे शास्त्र और शस्त्र दोनों की मूर्ति हैं। वे उत्तम शस्त्रास्त्रों की धारिणी हैं। सुमेधा (श्रेष्ठ बुद्धि), सत्यमेधा (सत्य की समझ वाली) और भद्रकाली के रूप में अपराजिता हैं।
श्लोक 59
गायत्री सत्कृतिः सन्ध्या सावित्री त्रिपदाश्रया।
त्रिसन्ध्या त्रिपदी धात्री सुपर्वा सामगायिनी॥
त्रिसन्ध्या त्रिपदी धात्री सुपर्वा सामगायिनी॥
हिन्दी अर्थ: देवी गायत्री स्वरूपा, सत्कर्मों की प्रेरक और सन्ध्या की अधिष्ठात्री हैं। वे सावित्री हैं, त्रिपदा मंत्र पर आश्रित हैं। तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में पूज्य हैं। वे त्रिपदी, पालनकर्त्री और सामवेद की गायिका हैं।
श्लोक 60
पाञ्चाली बालिका बाला बालक्रीडा सनातनी।
गर्भाधारधराशून्या गर्भाशयनिवासिनी॥
गर्भाधारधराशून्या गर्भाशयनिवासिनी॥
हिन्दी अर्थ: वे पाँचाली (द्रौपदी के रूप में), बाला (कन्या रूप), बालक्रीड़ा में रमण करने वाली सनातनी शक्ति हैं। वे गर्भ धारण से परे रहते हुए भी गर्भाशय में वास करती हैं।
॥ जय माँ दुर्गा ॥
माँ आद्या शक्ति, माँ भवानी, माँ जगदम्बिका — आप ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार की अधिष्ठात्री हैं। आपके सहस्रनाम का पाठ करने से साधक को समस्त सुख, सिद्धि और मोक्ष प्राप्त होता है। हे माँ! अपनी अनंत करुणा से हम सबका जीवन मंगलमय करें।
॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोऽस्तु ते ॥
🌺🌺 जय माता दी 🌺🌺
