पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड
अध्याय 25: तुलसी और शालग्राम की महिमा: पद्मपुराण में वर्णित दिव्य रहस्य
जय श्री हरी🙏
तुलसी और शालग्राम का स्थान सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र और दिव्य माना गया है। तुलसी और शालग्राम केवल पूजन की वस्तुएँ नहीं, बल्कि साक्षात् श्रीहरि के स्वरूप हैं। पद्ममहापुराण के उत्तर खण्ड में भगवान शिव और महर्षि नारद के संवाद के माध्यम से तुलसी और शालग्राम के अनुपम माहात्म्य का विस्तृत वर्णन किया गया है।
इस अध्याय में तुलसी और शालग्राम की महिमा बताया गया है कि तुलसी के स्पर्श, दर्शन, पूजन और स्मरण मात्र से मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त हो जाता है तथा शालग्राम शिला का पूजन समस्त तीर्थों के फल से भी अधिक पुण्य प्रदान करता है। यह पावन कथा न केवल धार्मिक आस्था को दृढ़ करती है, बल्कि भक्त को मोक्ष मार्ग की ओर प्रेरित भी करती है।
तुलसी और शालग्राम के 15 पवित्र और प्रभावशाली लाभ
पद्ममहापुराण के 26वे अध्याय में तुलसी त्रिरात्र व्रत के वैसे तो अनंत सुभ फल है परन्तु उनमे से 5 पवित्र, प्रभावशाली और रहस्मयी लाभ है जिसे आप भगवान शिव के मुख से ही जानिए।
महादेवजी ने कहा- नारदजी ! मैं आपको तुलसी और शालग्राम का माहात्म्य सुनाता हूँ, उसे आप सुनें ।
तुलसी और शालग्राम का श्रवण करके मनुष्य जन्म से लेकर मृत्य पर्यन्त के समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ।॥१॥
1.तुलसी के सम्पूर्ण भाग पवित्र है
तुलसी के पत्र, पुष्प, फल, मूल, छिलका, डंठल तथा मिट्टी आदि जो तुलसी से उत्पन्न है वे सबके सब पवित्र हैं ॥२॥
2. तुलसी की लकड़ी से चिता जलाना-
मृत व्यक्ति के सभी अङ्गों मे तुलसी की लकड़ी रखकर तुलसी के लकड़ी की आग से यदि किसी व्यक्ति के शरीर को जलाया जाता है, ॥३॥
वह अग्नि से जलने वाला व्यक्ति भी पापों से मुक्त हो जाता है । ॥४॥
जिसके मरते समय श्रीहरि का कीर्तन किया जाता है, उस जीव को पुनः इस संसार में तुलसी से जलाये जाने का अवसर नहीं आता है।॥५॥
जलाने के समय सैकड़ों काष्ठों के बीच में यदि एक भी तुलसी का काष्ठ रहता है तो वह करोड़ो पापों को किए रहता है तो उसकी मुक्ति हो जाती है। गङ्गाजल से स्नान करने से पुण्य कर्म और पवित्र हो जाते हैं ।॥६॥
तुलसी के काष्ठ से मिश्रित होकर दूसरे काष्ठ पवित्र हो जाते हैं । तुलसी की लकड़ी जिसमें मिली रहती है। ।।७।।
इस प्रकार की चिता जब तक जलती रहती है, तब तक उस जीव द्वारा करोड़ों कल्पों में किए गये पाप जलते रहते हैं। ॥८॥
तुलसी की लकड़ी से जलते हुए मनुष्य को देखकर उसको विष्णु भगवान् के दूत विष्णु लोक में ले जाते हैं उसे यमदूत नहीं ले जाते हैं। वह हजारों जन्मों से मुक्त होकर भगवान् जनार्दन को प्राप्त कर लेता है ।।९।।
संसार में जो मनुष्य तुलसी की लकड़ी से जलाये जाते हैं, उन सबों को विमान पर बैठे हुए देखकर देवगण उसको पुष्पाञ्जलि निवेदित करते हैं ।।१०।।
उसको देखकर भगवान् विष्णु सन्तुष्ट हो जाते हैं और उसका हाथ पकड़कर अपने धाम में लाते हैं और सभी देवताओं के सामने ही उसके पापों को अपने हाथों से दूर कर देते हैं तथा उसका जय-जयकार कराकर महोत्सव मनाते हैं। ।।११-१२॥
3. तुलसी की लकड़ी और घी –
जहाँ पर घी के साथ तुलसी की लकड़ी जलायी जाती है वह स्थान चाहे यज्ञशाला हो या श्मशान हो, उसमें मनुष्यों के पाप ही जलते हैं। जो ब्राह्मण तुलसी के काष्ठ की अग्नि से होम करते हैं, उसके एक-एक सिक्थ (पुलाव) तथा तिल से अग्निष्टोम याग के फल की प्राप्ति होती है। ॥१३-१४॥
4. तुलसी की लकड़ी से धुप और दीप जलाना और प्रसाद बनाना –
जो मनुष्य तुलसी की लकड़ी से बने धूप को श्रीहरि को समर्पित करता है, वह इन्द्र के समान सैकड़ों गोदान का फल प्राप्त करता है। ॥१५॥
जो नैवेद्य तुलसी की लकड़ी की आग से पकाया जाता है, उस अन्न को भगवान् केशव को समर्पित करने से वह सुमेरु के समान अक्षय पुण्यप्रद हो जाता है।॥१६॥
जो मनुष्य तुलसी की अग्नि से श्रीभगवान् को दीप दिखाता है॥१७॥
वह एक लाख हजार दीपक दान करने का फल प्राप्त करता है। उसके समान संसार में कोई भी वैष्णव नहीं दिखायी देता है ॥१८॥
5. तुलसी की लकड़ी का चन्दन लगाना –
जो श्रीभगवान् को तुलसी के काष्ठ से बने चन्दन को समर्पित करता है, हे ब्राह्मण (नारद) । वह भगवान् का प्रियतम हो जाता है ॥१९॥
तुलसी की लकड़ी से बने चन्दन का प्रतिदिन श्रीहरि के शरीर में जो भक्तिपूर्वक लेप लगाता है, वह मृत्यु के पश्चात् श्रीहरि के पास जाकर आनन्दानुभव करता है ॥२०॥
जो व्यक्ति अपने शरीर में तुलसी का चन्दन लगाकर भगवान् विष्णु की पूजा करता है वह एक ही दिन में सैकड़ों दिनों तक पूजा करने का फल तथा सौ गौओं को दान करने का फल प्राप्त करता है ॥२१॥
भगवान् विष्णु के शरीर में तुलसी के काष्ठ के चन्दन लगाने के लिए मनुष्य जब तक मन्दिर में रुका रहता है उस को प्राप्त होने वाले फल को आप सुनें ॥२२॥
आठ प्रस्थ तिलदान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, उसी फल की प्राप्ति उसको भगवान् विष्णु की कृपा से होती है ॥२३॥
6. तुलसी दल चढ़ाना –
जो मनुष्य पितृगणों के पिण्ड पर तुलसी दल को चढ़ाता है, तो तुलसी के एक-एक से पितरों को सौ वर्षों तक तृप्ति बनी रहती हैं ॥२४॥
7. तुलसी के जड़ के उपयोग –
जो व्यक्ति तुलसी की जड़ की मिट्टी को अपने शरीर में लगाकर स्नान करता है, उसको तीर्थ में स्नान करने का फल प्राप्त होता है ॥२५॥
8. तुलसी मंजरी
जो तुलसी की मञ्जरी से पूजा करता है उसको जब तक सूर्य चन्द्रमा रहते हैं तब तक पूजा करने का फल प्राप्त होता है ॥२६॥
9. तुलसी की वाटिका –
जिस घर में तुलसी के वृक्षों की वाटिका होती है। हे नारद ! उस गृह के दर्शन तथा स्पर्श करने मात्र से ब्रह्महत्यादि पापों का विनाश हो जाता है। उस गृह के दर्शन मात्र से सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं ।॥२७॥
महादेवजी ने कहा- हे नारदजी ! मैं आपको एक ऐसी बात बतलाता हूँ ॥२८॥
जिस गृह, आम अथवा वन में तुलसी रहती हैं, वहाँ-वहाँ पर प्रसन्नता पूर्वक श्रीहरि रहा करते हैं ।॥२९॥
उस गृह में कभी न तो दरिद्रता आती है और न बान्धवों का वियोग होता है। जहाँ पर तुलसी रहती हैं, वहाँ पर दुःख, भय, रोग आदि नहीं रहते हैं ॥३०॥
सर्वत्र तुलसी पवित्र होती हैं, किन्तु तीर्थ में तुलसी अधिक पवित्र होती हैं। संसार में श्रीभगवान् के सन्निकट जो तुलसी रोपते हैं ॥३१॥ तुलसी को रोपने से नित्य ही भगवान् विष्णु के प्राप्ति होती है। उत्पात, भयङ्कर रोग तथा अनेक प्रकार के अपशकुन से ॥३२॥
10. तुलसी की पट्टी से अर्चना –
तुलसी से अर्चना करने पर श्रीहरि शान्ति प्रदान करते है। तुलसी की सुगन्धि लेकर हवा जहाँ जाती है।।३३॥ वहाँ की दशो दिशाएँ पवित्र हो जाती हैं और चारो प्रकार के (जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज) जीव पवित्र हो जाते हैं। हे मुनिश्रेष्ठ ! ॥३४-३५॥
11. तुलसी के जड़ की मिटटी –
जिस घर में तुलसी के जड़ की मिट्टी रहती है, उस गृह में सदैव देवताओं, शिवजी तथा श्रीहरि का निवास बना रहता है। हे द्विज । जहाँ कहीं भी तुलसी वन की छाया रहती है। हे द्विज । वहाँ पर उपर्युक्त सभी देवता तर्पण करते हैं। वहाँ पर पितरों के लिए जो कुछ भी समर्पित किया जाता है वह पितरों के लिए अक्षय हो जाता है। तुलसी के मूल में ब्रह्माजी तथा उसके मध्य में भगवान् जनार्दन का निवास रहता है ॥३६॥
तुलसी की मञ्जरी में रुद्र का निवास होता है, इसीलिए तुलसी पवित्र हैं। जो सन्ध्या के समय तुलसी के बिना ही मार्जन करता है, उसका किया हुआ सब कुछ राक्षस ग्रहण कर लेते हैं और वह नरक में चला जाता है।॥३७॥
12. तुलसी के पत्ते से गिरा हुआ जल –
तुलसी के पत्ते से गिरा हुआ जल जो अपने शिर पर धारण करता है, उसको गङ्गा स्नान करके सौ गौओं के दान करने का भी फल प्राप्त होता है।॥३८॥
जो व्यक्ति विशेष रूप से शिवालय पर तुलसी रोपता है, तो उससे जितने बीज तैयार होते है, उतने युगों तक वह रोपने वाला स्वर्ग में निवास करता है।॥३९॥
13. उमा देवी ने सौ तुलसी के वृक्ष लगाया –
शङ्करजी को प्राप्त करने के लिए उमा देवी ने हिमालय पर सौ तुलसी के वृक्ष लगाया अतएव मैं उसके समक्ष प्रणत बना रहता हूँ। जो मनुष्य पर्व के समय अथवा श्रावण महीने में तुलसी रोपता है, संक्रान्ति के समय तुलसी अत्यन्त पुण्यप्रद होती है ।॥४०-४१॥
दरिद्र व्यक्ति भी यदि नित्य तुलसी की पूजा करता है तो वह धनिक हो जाता है ॥४२॥
तुलसी की मूर्ति सभी सिद्धियों को प्रदान करती है तथा भगवान् की मूर्ति यश प्रदान करती है। जहाँ पर शालग्राम की शिला रहती है, वहाँ पर श्रीभगवान् का निवास होता है ॥४३॥
14. जहाँ शालग्राम होते हैं सारे पुण्य वहीँ होते है –
जहाँ शालग्राम होते हैं वहाँ पर स्नान और दान करने से वाराणसी की अपेक्षा सौ गुना फल प्राप्त होता है। कुरुक्षेत्र, प्रयाग तथा नैमिषारण्य में शालग्राम शिला का अर्चन करने से वाराणसी की अपेक्षा करोड़ गुना फल प्राप्त होता है जहाँ कहीं भी शालग्राम शिला रहती है, वाराणसी के सारे पुण्य वहाँ ही होते हैं । ॥४४-४५॥
ब्रह्महत्या आदि से जो कुछ भी पाप करता है, उन सबों का शालग्राम शिला का पूजन करने से शीघ्र नाश हो जाता है ॥४६॥
15. जहाँ तुलसी और शालग्राम होते हैं वहां हरि और हर निवास करते हैं –
इस प्रकार पद्ममहापुराण में वर्णित तुलसी और शालग्राम का माहात्म्य यह सिद्ध करता है कि ईश्वर भक्ति में साधन नहीं, बल्कि श्रद्धा और समर्पण प्रधान है। जहाँ तुलसी और शालग्राम निवास करती है, वहाँ स्वयं श्रीहरि, महादेव और समस्त देवताओं का वास होता है।
तुलसी के पत्र, काष्ठ, मिट्टी और मञ्जरी तक में दिव्य शक्ति व्याप्त है, जो पापों का नाश और पुण्य की वृद्धि करती है। वहीं शालग्राम शिला का पूजन समस्त तीर्थों, दानों और यज्ञों से भी अधिक फलदायक बताया गया है। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक तुलसी और शालग्राम की उपासना करता है, वह इस लोक में सुख-शांति और परलोक में मोक्ष को प्राप्त करता है। यह माहात्म्य हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति ही जीवन का परम उद्देश्य है।
इस प्रकार श्रीपद्ममहापुराण के छठे उत्तर खण्ड के उमापति नारद संवादान्तर्गत तुलसी और शालग्राम माहात्म्य वर्णन नामक पच्चीसवें अध्याय का हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ। ।।२५।।
Source: पद्मपुराण
🙏 जय माता तुलसी🙏भगवान शालग्राम की जय 🙏
