पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड
अध्याय 19A: जालंधर ने शिवजी को माया से भ्रमित किया | हिंदी कथा
जय श्री हरी
मानसरोवर युद्ध में जालंधर की मायाशक्ति! मायावी पार्वती से शिव का मोहभंग। ब्रह्माजी का उपदेश और दैत्यसेना का नाश। पूरी कथा पढ़ें।
1. मानसरोवर युद्ध और जालंधर की माया
मानसरोवर के युद्ध में जालंधर ने अपनी महान मायाशक्ति से देवताओं को विभाजित कर दिया। वह स्वयं शिव का रूप धारण कर पार्वतीजी के पास पहुँचा, जबकि उसका साथी दुर्वारण नंदी बन गया। जालंधर ने मायावश पार्वतीजी को भ्रमित किया, परंतु उसी समय श्रीहरि विष्णु द्वारा वृंदा के पतिव्रत धर्म के खंडित होने से उसके मायाजाल का प्रभाव टूटने लगा। पार्वतीजी ने अपनी सखी जया को शिव के भेष में आए उस पुरुष की परीक्षा लेने भेजा, और जालंधर का छल तुरंत उजागर हो गया।
2. शिवगणों और दैत्यों का भीषण संग्राम
उधर युद्धभूमि में भगवान शिव ने जालंधर के रूप में लड़ रहे शुम्भ को पहचान लिया। शिवगणों और दैत्यों के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। शुम्भ, निशुम्भ, राहु, केतु, शैलोदर, जम्भ, महापार्श्व, रोमकण्ठ, उरुनेत्र आदि असुरों का देवताओं से भयानक संग्राम हुआ। कार्तिकेय, गणेशजी, भृंगी, नन्दिकेश्वर, वीरभद्र, मणिभद्र और शिवगणों ने दैत्यों को परास्त किया।
3. जालंधर की पराजय, मूर्छा और शुक्राचार्य द्वारा पुनर्जीवन
जालंधर ने शिवजी पर घोर बाणवर्षा की, लेकिन शिवजी अडिग रहे। अंत में शिवजी ने एक प्रचंड अस्त्र से जालंधर को मूर्च्छित कर दिया और उसकी पूरी सेना का संहार कर दिया। जालंधर को होश आने पर उसने अपनी विनष्ट सेना देखकर भयभीत होकर शुक्राचार्य का स्मरण किया। शुक्राचार्य ने अपनी विद्या से सारी दैत्यसेना को पुनः जीवित कर दिया।
4. कृत्या की उत्पत्ति और शुक्राचार्य का निष्क्रिय होना
शिवजी ने यह देखकर शुक्राचार्य को रोकना चाहा, पर स्वयं कहा कि ब्राह्मण को मारना उचित नहीं। इसलिए उन्होंने अपने तीसरे नेत्र से कृत्या नामक भयानक काया उत्पन्न की और आदेश दिया कि वह शुक्राचार्य को पकड़कर अपनी योनि में बंद कर दे, ताकि जालंधर उसकी विद्या से पुनः सहायता न ले सके। कृत्या ने तुरंत शुक्राचार्य को अपनी योनि में लपेट लिया और अदृश्य हो गई। यह देखकर जालंधर भयभीत हो गया।
5. गुरु-विहीन जालंधर और अंतिम निर्णायक युद्ध की तैयारी
अब जब जालंधर बिना गुरु और बिना पुनर्जीवित होने वाली सेना के रह गया, शिवजी उसके साथ निर्णायक युद्ध के लिए आगे बढ़े।
6. जालंधर का घमंड और शिव को दी गई खुली चुनौती
जालंधर का घमंड अत्यधिक बढ़ चुका था। उसने युद्धभूमि में शिवजी को देखकर चुनौती दी.
“अब अपने प्राणों की रक्षा कर लो! मैं तुम्हें वहीं फेंक दूँगा जहाँ मधुसूदन रहते हैं। उसके बाद ब्रह्माजी को भी समुद्र में डुबो दूँगा। तुम सब जीवित रहते हुए भी आज मैं ही सर्वेश्वर बन रहा हूँ!”
यह कहकर उसने अपनी विशाल, अनंत दैत्यसेना का भार शुम्भ, निशुम्भ और अन्य महादैत्यों को सौंप दिया।
7. शिवगणों और दैत्यसेना का प्रलयंकारी महासंग्राम
उसकी सेना में भयावह दानव थे, फेंकार, केरुंड, धूमलोचन, केतु, विडालजंघ, राहु, दुर्वारण, कालासुर, लवण, भूमिरेत, अंधकासुर, रक्तवीर्य और चंडी-चामुंडी जैसे असुर। इन सबको देखकर शिवजी के वीर गण—वीरभद्र, नंदी और अन्य शिवगण युद्धभूमि में कूद पड़े और उनका सामना किया।
8. रणभूमि का विनाश और जालंधर की नई मायाचाल
इसके बाद ऐसा भयंकर और रोमांचक युद्ध छिड़ा कि सारे गण घायल होकर धरती पर गिरने लगे। शुम्भ और निशुम्भ के नेतृत्व में दैत्यों ने शिवगणों को चारों ओर से मार गिराया। कई गण भागने के लिए मजबूर हो गए। दैत्यों ने अवसर पाकर शिवजी को चारों ओर से घेर लिया। वे उन पर इतनी बाणवर्षा करने लगे मानो मेघ सुमेरु पर्वत पर वर्षा कर रहे हों।
लेकिन वृषभ पर विराजमान महादेव भला कब तक चुप रहते! उन्होंने पिनाक धनुष चढ़ाया और बिजली जैसी वेगवान बाणवर्षा से दैत्यों को धराशायी कर दिया। तीक्ष्ण बाणों से वे शुम्भ-निशुम्भ सहित अनेक दैत्यों को घायल करते गए। नंदी के प्रहारों से भी कई दैत्य भूमि पर गिर पड़े।
5. गुरु-विहीन जालंधर और अंतिम निर्णायक युद्ध की तैयारी
कुछ ही क्षणों में रणभूमि हाथी, घोड़े, रथ और दैत्यों की लाशों से पूरी तरह भर गई। दृश्य ऐसा था मानो पर्वत टूटकर धरती पर बिखर गए हों।
अपनी सेना को नष्ट होता देख जालंधर समझ गया कि बल से शिव को हराना कठिन है। इसलिए उसने अपनी मायाशक्ति का सहारा लिया और एक मायामयी स्त्री—जया को उत्पन्न किया। वह अत्यंत मोहिनी और अद्भुत रूपवती थी।
9. मायामयी जया द्वारा शिव को भ्रमित करने का प्रयास
जालंधर ने जया से कहा – “जाओ, रुद्र के सामने जाकर उन्हें मोह में डाल दो!” यहीं से कथा के अगले अध्याय की शुरुआत होती है शिव के मोहभंग की कथा और जालंधर की अंतिम चाल। जालंधर के आदेश पर मायामयी जया शिवजी के सामने पहुँची। वह खुले बालों के साथ जोर-जोर से रोने लगी। शिवजी ने आश्चर्य से पूछा-
“बताओ, तुम क्यों रो रही हो?”
तब जया ने झूठी बात कहकर शिवजी को भ्रमित कर दिया। उसने कहा –
“प्रभो, जालंधर ने आपकी पत्नी पार्वती का मानसोत्तर पर्वत से अपहरण कर लिया है!”
यह सुनते ही शिवजी विचलित हो गए। उन्होंने जया से कहा—
“तुम मेरे नंदी पर सवार हो जाओ, वरना दैत्य तुम्हारा भी अपहरण कर लेंगे।”
जया ने नंदी पर चढ़कर शिवजी को गले लगाया और बोली-
“प्रभो, मैं जा रही हूँ। मैं पार्वती के बिना जीवित नहीं रह सकती!”
शिवजी समझ ही नहीं पाए कि यह सब दैत्य की माया है। नंदी से उतरते ही वह मायामयी जया शिवजी की जटा में स्थित चंद्रमा को भी निकालकर ले गई और फिर युद्ध स्थल की ओर चली गई। अब पार्वती को अपहृत समझकर शिवजी अत्यंत चिंतित और व्याकुल हो गए।
10. माया पार्वती प्रसंग
दैत्य की माया ने उन्हें इतना भ्रमित कर दिया कि वे अपने वास्तविक स्वरूप को भी भूलने लगे। इसी बीच जालंधर अपनी विशाल सेना के साथ प्रकट हुआ। वह अपने रथ पर मायामयी पार्वती को बैठाकर गर्व से शिवजी के सामने आया।
उसकी विजय की ध्वनियों से पृथ्वी काँपने लगी और पर्वतों में प्रतिध्वनि गूँज उठी।
11. जालंधर का व्यंग्य और शिव की करुण व्यथा
शिवजी ने अपने सामने रथ पर बैठी “पार्वती” को देखा। वह स्त्री भयभीत, व्याकुल और रोती हुई दिखाई दे रही थी। वह बार-बार पुकार रही थी- “हाय नाथ! हाय रुद्र!” उसे देखकर शिवजी का हृदय टूट गया। वे सोचने लगे.“मैं अपनी पार्वती को वापस कैसे पाऊँ?” दैत्य की माया का प्रभाव इतना प्रबल था कि शिवजी विलाप करने लगे,“हे प्रिये! दैत्यों ने तुम्हें कैसे छीन लिया? मुझे इसकी बहुत चिंता है…”
उनका यह दुख देखकर जालंधर पास आया और व्यंग्य-भरी करुणा के स्वर में बोला- “रुद्र! देखो, तुम बिना अम्बिका के कितने निराश, कमजोर और निर्बल हो गए हो। ईश्वर होकर भी तुम दीन दिखाई दे रहे हो।” फिर वह हँसते हुए बोला “रोओ मत शिव! मैं स्वयं तुम्हारी पत्नी को तुम्हें वापस दे रहा हूँ। आज तुम मेरी दया से पार्वती को पा रहे हो।” ऐसा कहकर जालंधर और भी अभिमान से भर उठा, क्योंकि उसे लगा कि वह शिव जैसे महादेव को भी अपने अधीन कर चुका है।
12. माया-पार्वती पर आक्रमण और शिव का शोक
जालंधर ने शिवजी के सामने घमंड से खड़े होकर मायामयी पार्वती को अपने रथ से नीचे उतार दिया। फिर उसने अपनी विशाल सेना को आदेश दिया कि वे शिवजी पर आक्रमण करें। शिवजी भी तुरंत अपने वृषभ पर सवार होकर युद्धभूमि में उतर पड़े अपने कथित “अपहृत” पार्वती को वापस पाने के उद्देश्य से।
जैसे ही शिवजी ने उस माया-पार्वती को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, तभी दैत्य शुम्भ उसे उठाकर आकाश में ले भागा। शिवजी ने क्रोध में अपना त्रिशूल उठाकर शुम्भ पर फेंका। त्रिशूल को आते देख शुम्भ भयभीत हो गया और उसने उस माया-पार्वती को नीचे छोड़ दिया।
वह रोती हुई त्रिशूल पर गिरी और फिर पृथ्वी पर आकर मूर्च्छित हो गई। अगले ही क्षण वह मर गई। माया रूप में दिखने वाली “गौरी” को मृत देखकर शिवजी का हृदय चीर गया। शोक और मोह ने उन्हें जकड़ लिया। वे स्वयं भी पृथ्वी पर गिर पड़े और कुछ देर के लिए बेहोश हो गए। जब उन्हें होश आया, तो वे अत्यंत क्रोध और दुःख में डूबे थे। उन्होंने शुम्भ और अन्य दैत्यों को शाप दिया “तुम सबका वध स्वयं गौरी के हाथों होगा!”
13. शिव का विलाप और वियोग की वेदना
नारदजी कहते हैं कि शिवजी विलाप करते हुए बार-बार उस मृत देह से कह रहे थे “प्रिये! तुम समरभूमि में मुझे छोड़कर कहाँ चली गईं? हे सुंदरी! तुम्हारे वियोग ने मुझे रति-विहीन बना दिया… अभी तो वासुदेव भी नहीं जानते कि मैं तुमसे अलग हो गया हूँ!”वे रोते हुए स्मरण करने लगे “एक बार तुमने दक्ष के यज्ञ में अपने प्राण त्याग दिए थे, फिर तुम मुझे दोबारा मिलीं। फिर अब तुम मुझे क्यों छोड़कर चली गईं…? हे गिरिजे! उठो, मुझे धैर्य दो…
14. ब्रह्माजी का उपदेश
उसी समय, देवताओं की सभा में बैठे ब्रह्माजी शिवजी की यह अवस्था देखकर अदृश्य रूप से उनके पास आए। उन्होंने कहा “महादेव! आप शोक और मोह से परे हैं। आप माता-पिता, सुख-दुःख, जन्म-मरण सबसे परे हैं। आप अचल, अजन्मा, निष्कलंक हैं। यह सब दैत्य की माया है, जिसने आपको भ्रमित कर दिया है। आप एक ही हैं, पर आपके रूप अनगिनत दिखाई देते हैं, जैसे एक सूर्य समुद्र की तरंगों में अनेक प्रतीत होता है। सन्न्यासी ध्यान करके आपके चरणों में ही स्थित होते हैं। आपका वास्तविक स्वरूप अनिर्वचनीय है।”ब्रह्माजी के इन वचनों से धीरे-धीरे शिवजी का मोह दूर होने लगा।
15. ब्रह्माजी द्वारा माया का रहस्य उद्घाटन
जब ब्रह्माजी ने देखा कि शिवजी अब भी माया में फँसे हुए हैं, तो उन्होंने अदृश्य रूप से उन्हें समझाया “हे शम्भो! यह स्त्री आपकी पत्नी पार्वती नहीं है। जालंधर ने आपकी वास्तविक गौरी के समान दिखने वाली यह माया बनाई है। सच्ची पार्वती तो अभी भी सुरक्षित हैं और कमल-कोष में विद्यमान हैं। आप अपना मोह त्यागें और उठकर शत्रुओं से युद्ध करें, ताकि हम सबकी रक्षा हो सके।”ब्रह्माजी के इन वचनों ने शिवजी को झकझोर दिया।
16. शिव का मोहभंग और दैत्यों पर प्रचंड प्रहार
एक ही क्षण में वे समझ गए कि यह सब जालंधर की मायावी चाल थी। उनकी चेतना लौट आई, उनकी आँखों में ज्वाला भर उठी, और उनका युद्धस्वरूप जागृत हो गया। अब जब वे भ्रममुक्त हो गए, तो उन्होंने क्रोध में एक विशाल पर्वतीय शिला उठाई और दैत्यों की ओर फेंक दी। शिला इतनी भारी और प्रचंड शक्ति से फेंकी गई कि उसके प्रहार से असंख्य दैत्यों का विनाश हो गया। युद्धभूमि एक ही क्षण में दैत्यसेना के नाश से भर गई।
भगवान शिव और असुर जालंधर का युद्ध कथा अभी खत्म नहीं हुआ। जालंधर की यह मायावी रणनीति असफल होते ही उसने दूसरी माया का निर्माण शुरू किया। देखिए अगले वीडियो में।
Source: पद्मपुराण
ॐ नमः शिवाय 🙏 जय श्रीहरि 🙏
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