जालंधर की उत्पत्ति Part 2 | स्वर्ग के देवता कैलाश पहुँचे | Padma Purana Uttar Khanda Adhyay 3
“जिस क्षण ब्रह्मा के तेज से उत्पन्न हुआ एक अद्भुत बालक, और शिव जी ने उसे वरदान दिया महा बलशाली बनने का… वही क्षण था रचने वाला इतिहास की एक अनसुनी कथा। आपने पिछले भाग में देखा कि किस प्रकार देवताओं ने देखा उस रहस्यमयी शक्ति को, जिसे ब्रह्मा ने स्वयं वरदान दिया। अब आगे…”
“पहले भाग में हमने जाना — ब्रह्मा के तेज से उत्पन्न हुआ एक तेजस्वी बालक, जिसकी आँखों में थी कालाग्नि जैसी ज्वाला। शिव जी ने उसका नाम रखा — जलंधर। उसे मिला वरदान, कि जब तक उसकी पत्नी सती रहेगी, तब तक वह अजेय रहेगा। और तब से शुरू हुई एक रहस्यमयी यात्रा…”
🌺 जालंधर की रहस्यमयी उत्पत्ति | अध्याय 3 – उत्तर खण्ड, पद्म पुराण भाग 2 🌺
स्वर्ग के सभी देवता, अप्सराएँ और गन्धर्व जब शिवजी के कैलाश धाम में एकत्रित होते हैं — यह दृश्य दिव्यता और भक्ति से भरा है। इस भाग में हम देखेंगे श्लोक 12 से 27 तक, जहाँ कैलाश पर्वत का अद्भुत वर्णन किया गया है और इन्द्रदेव द्वारा शिव से नृत्य अनुरोध किया जाता है।
🔸 श्लोक 12
गन्धर्वैरावृतो देवस्तन्त्रीशिक्षासुकोविदैः ।
रम्भा तिलोत्तमा रामा कर्पूरा कदली तथा ॥
हिन्दी अर्थ:
देवगण गन्धर्वों से घिरे हुए थे, जो तंत्री वाद्य में निपुण थे। रम्भा, तिलोत्तमा, रामा, कर्पूरा, कदली आदि सुंदर अप्सराएं भी वहाँ उपस्थित थीं।
व्याख्या:
देवताओं ने शिव जी के सामने एक भव्य नृत्य-गान का आयोजन किया। रम्भा, तिलोत्तमा जैसी स्वर्ग की अप्सराएं वहां उपस्थित थीं। यह दृश्य इन्द्र के मन की श्रद्धा और शिव के प्रति सम्मान को दर्शाता है।
🔸 श्लोक 13
मदना भारती कामा सर्वाभरणभूषिता।
नर्तक्यश्च तथा चान्याः समाजग्मुः सुरान्तिकम्॥
हिन्दी अर्थ:
मदना, भारती, कामा – सभी देवीय नर्तकियाँ सम्पूर्ण आभूषणों से सजी हुई थीं। अनेक अन्य नर्तकियाँ भी उस सभा में पहुँच गईं।
व्याख्या:
यह केवल संगीत और नृत्य का प्रदर्शन नहीं था, यह शिव की स्तुति का माध्यम था। देवियाँ सौंदर्य और कला का प्रतीक बन शिव के सामने श्रद्धा अर्पित करने आई थीं।
🔸 श्लोक 14
गन्धर्वयक्षसिद्धास्तु नारदस्तुम्बुरुस्तथा ।
किन्नरा मुहुराजग्मुस्तथा किन्नरयोषितः ॥
हिन्दी अर्थ:
गन्धर्व, यक्ष, सिद्ध, नारद, तुम्बुरु, किन्नर और किन्नर स्त्रियाँ भी बार-बार वहाँ आने लगे।
व्याख्या:
पूरा ब्रह्मांड जैसे शिवजी की वंदना में एकत्र हो गया। नारद जैसे ऋषि भी वीणा के साथ शिव की स्तुति में लग गए।
🔸 श्लोक 15
वायुश्च वरुणश्चैव कुबेरो धनदस्तथा।
यमश्चाग्निर्निर्ऋतिश्च ये चान्ये देवतागणाः ॥
हिन्दी अर्थ:
वायु, वरुण, कुबेर, यम, अग्नि, निर्ऋति और अन्य सभी देवता वहाँ पहुँच गए।
व्याख्या:
यह कोई साधारण आयोजन नहीं था। त्रैलोक्य के समस्त देवता कैलास की ओर प्रयाण कर रहे थे — एक दिव्य दर्शन की अभिलाषा लिए।
🔸 श्लोक 16
विमानसंस्थो मघवा विमानस्थाः सुराङ्गनाः ।
स्ववाहनगतादेवाः कैलासं प्रययुर्जवात् ॥
हिन्दी अर्थ:
इन्द्र और अन्य देवियाँ अपने विमानों में, तथा अन्य देवता अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर कैलास पर्वत की ओर तीव्र गति से चल पड़े।
व्याख्या:
इस दृश्य में हम देखते हैं एक आकाशमार्गी यात्रा – जहां देवता अपने तेजस्वी विमानों से शिवलोक की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। यह उनकी भक्ति की गहराई दर्शाता है।
🔸 श्लोक 17
ददृशुस्ते ततो देवाः कैलासं पर्वतोत्तमम् ।
महीधराणां सर्वेषां पृथिव्या इव मण्डनम् ॥
हिन्दी अर्थ:
तब देवताओं ने सर्वोत्तम पर्वत कैलास को देखा, जो पृथ्वी के सभी पर्वतों का अलंकरण है।
व्याख्या:
कैलास — केवल एक पर्वत नहीं, शिव का निवास स्थान, तपस्या का प्रतीक, देवताओं के लिए ब्रह्मांड का ह्रदय।
🔸 श्लोक 18
सर्वतः सुखदं शुद्धं सिद्धिराशिमिव स्थितम् ।
यत्र वृक्षाः कल्पवृक्षाः पाषाणाश्चिन्तितप्रदाः ॥
हिन्दी अर्थ:
वह पर्वत सर्वत्र सुखदायक, शुद्ध और सिद्धियों का भण्डार है। वहाँ वृक्ष कल्पवृक्ष हैं और पत्थर भी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं।
व्याख्या:
यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच स्थित एक अद्वितीय स्थान है। जहाँ कल्पवृक्ष और चिन्तामणि समान शिलाएं हैं – जो साधकों की कामनाएं पूर्ण करती हैं।
🔸 श्लोक 19–20
पुन्नागैर्नागचम्पैश्च तिलकैर्देवदारुभिः ।
अशोकैः पाटलैश्चतैर्मन्दारैः शोभितो गिरिः ॥
पर्यन्तकवनामोदवाहका यत्र वायवः ।
पङ्गुत्वं बहुचारेण यान्ति ते मलयानिलाः ॥
हिन्दी अर्थ:
पुन्नाग, नागचम्पा, तिलक, देवदारु, अशोक, पाटल, मन्दार जैसे पुष्पों से कैलास शोभित था। वहाँ की वायु इतनी सुगंधित थी कि बार-बार भ्रमण से भी वह मंद पड़ जाती थी।
व्याख्या:
कैलास की सुंदरता प्राकृतिक नहीं, दिव्य है। वहाँ के फूल, पेड़ और हवा भी भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरे हुए हैं।
🔸 श्लोक 21-22
वाप्यः स्फटिकसोपानां ह्यगाधविमलोदकाः ।
वैडूर्यनालसंसक्त सौवर्णनिभपङ्कजाः ॥
कुमुदानां द्युतिर्यत्र राजते सर्वतो दिशम् ।
कह्नारैः शोभिता वाप्यः पिनद्धाः पद्मरागवत् ॥
हरिन्मणिनिबद्धाश्च गोमेदैः सर्वतोवृताः ।
पद्मरागशिलाबद्धा नानाधातुविचित्रिताः ॥
हिन्दी अर्थ:
कैलास की सुंदरता प्राकृतिक नहीं, दिव्य है। वहाँ के फूल, पेड़ और हवा भी भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरे हुए हैं।
वहाँ के सरोवरों में स्फटिक सी सीढ़ियाँ थीं, जल निर्मल और गहराई वाला था। वैडूर्य, सोना, और मणियों से भरे कमल खिले थे। कुमुद पुष्पों की आभा दिशाओं में चमक रही थी। किनारे पद्मराग और हरित मणियों से सजे थे।
व्याख्या:
कैलास की शोभा को शब्दों में बाँधना कठिन है। यह एक आध्यात्मिक स्वप्नलोक जैसा है – जो केवल दृष्टा की भक्ति से साकार होता है।
🔸 श्लोक 23
ददृशुः सुन्दरतरं नाकाधिकविनिर्मितम् ।
कैलासं पर्वतश्रेष्ठं दृष्ट्वा ते विस्मयं गताः ॥
हिन्दी अर्थ:
देवताओं ने देखा कि कैलास स्वर्ग से भी सुंदर है। उसे देखकर वे विस्मित हो गए।
व्याख्या:
कैलास की दिव्यता, उसकी अनुपम छटा को देखकर स्वयं इन्द्र और अन्य देव भी चकित रह गए।
🔸 श्लोक 24
विमानादवतीर्णाश्च मघवा देवताश्च ताः ।
द्वारपालमथागम्य नन्दिनं वाक्यमब्रुवन् ॥
हिन्दी अर्थ:
इन्द्र और अन्य देवता अपने विमानों से उतर कर द्वारपाल नन्दि के पास पहुँचे और उससे बोले।
व्याख्या:
अब कथा एक विशेष मोड़ पर है – शिव से मिलने की अनुमति चाहिए, और नन्दि वही द्वारपाल हैं जिनके बिना शिव तक पहुँचना संभव नहीं।
🔸 श्लोक 25-27
–इन्द्र उवाचभोभोगणवरश्रेष्ठ शृणु मे वाक्यमुत्तमम् ।
समाज्ञापय शीघ्रं त्वं नृत्यार्थमिहमागतम् ।
ईश्वरं प्रति देवेशं सर्वदेवैः समावृतम् ॥
नारद उवाच
इन्द्रस्य वचनं श्रुत्वा गिरिशं नन्दिरब्रवीत् ।
प्रभोऽयमागतः सर्वैर्देवराजः पुरन्दरः ॥
हिन्दी अर्थ:
इन्द्र ने कहा – “हे गणश्रेष्ठ! मेरी बात सुनो। हम सभी देवता नृत्य के लिए भगवान शिव के दर्शन हेतु आए हैं।”
नारद कहते हैं – इन्द्र की बात सुनकर नन्दि ने शिव से कहा – “प्रभो! सभी देवता, स्वयं इन्द्र के साथ यहाँ उपस्थित हैं।”
व्याख्या:
अब देवताओं का प्रयोजन स्पष्ट हुआ – एक विशेष नृत्य आयोजन शिव के समक्ष, एक दिव्य प्रेरणा से भरा हुआ आयोजन। कथा अब शिव के दर्शनों की ओर बढ़ रही है…
“कैलास की ओर बढ़ते देवता, अप्सराएं, संगीत, और वह दिव्य वाणी – यह केवल एक सभा नहीं, यह है भक्ति की पराकाष्ठा। क्या शिव इस दिव्य आयोजन को स्वीकार करेंगे? क्या यह आयोजन जलंधर की कथा से जुड़ा है? जानिए अगले भाग में…”
श्रद्धा और ज्ञान से भरी इस कथा को सुनें, समझें और आत्मा को शांत करें।
जय शिव शंकर! हर हर महादेव!
