Current image: भगवान शिव की जटाओं से अवतरित माँ गंगा, आकाश में भगवान विष्णु का आशीर्वाद, गंगा तट पर श्रद्धालुओं का स्नान, दीपदान और पूजा करते भक्त, गंगा महिमा का दिव्य दृश्य

 

पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड

अध्याय 23: गंगा, यमुना और महानदी की प्रार्थना कैसे करें | गंगा मईया की महिमा


जय श्री हरी

सनातन धर्म में गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि साक्षात् देवी हैं। पापों का नाश करने वाली, जीवन को पवित्र करने वाली और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने वाली हैं। पुराणों में कहा गया है कि गंगा भगवान विष्णु के चरण-कमलों से प्रकट हुईं और शिवजी की जटाओं से धरती पर अवतरित हुईं। इसीलिए वे स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—तीनों लोकों को पवित्र करने वाली मानी जाती हैं।

महादेव स्वयं नारदजी से गंगा के उस दिव्य माहात्म्य का वर्णन करते हैं, जिसे सुनने मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं और जीव के हृदय में भक्ति, वैराग्य और मोक्ष की भावना जाग्रत हो जाती है। यह कथा केवल गंगा के जल की महिमा नहीं बताती, बल्कि यह सिखाती है कि कैसे स्मरण, श्रद्धा और समर्पण से मनुष्य अपने जीवन को धर्ममय और पवित्र बना सकता है।

आइए, शिववचन के रूप में प्रकट इस गंगा माहात्म्य को श्रद्धा के साथ पढ़ें और समझें कि गंगा कैसे पापों के अंधकार को हरकर जीवन में प्रकाश भर देती हैं।

1. महादेव द्वारा गंगा माहात्म्य का दिव्य वर्णन

महादेव जी ने कहा— हे श्रेष्ठ मुनि! अब मैं गंगा जी के माहात्म्य का वर्णन कर रहा हूँ। इसे सुनते ही उसी क्षण मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं।

  1. जो व्यक्ति हजारों योजन दूर से भी गंगा जी के नाम का स्मरण करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त करता है।
  2. भगवान विष्णु के चरण-कमलों से उत्पन्न होने के कारण यह नदी गंगा के नाम से प्रसिद्ध है।
  3. हे नारद जी! यह गंगा पापों के विशाल समूह का नाश करने वाली है।
  4. नर्मदा, सरयू, वेत्रवती, तापी, पयोष्णी, चंद्रा, विपाशा , कर्मनाशा, पुष्या, पूण्या, दीपा, विदीपा और यमुना—इन सभी नदियों में स्नान करने से और हजारों गौओं के दान से जो पुण्य फल मिलता है, वह फल केवल गंगा जी के दर्शन मात्र से ही क्षणभर में प्राप्त हो जाता है।

2. गंगा दर्शन से पापों का नाश और ग्रहण-समान पुण्य

गंगा विशेष रूप से महान पापियों को भी परम पुण्य देने वाली हैं। नरक में पड़े हुए जीवों के भी पाप गंगा नष्ट कर देती हैं। जैसे सूर्य और चंद्र ग्रहण के समय मिलने वाला पुण्य फल होता है, वही फल गंगा के दर्शन से प्राप्त होता है। जैसे सूर्य उदय होते ही अंधकार दूर हो जाता है, वैसे ही गंगा के प्रभाव से पाप नष्ट हो जाते हैं।

3. गंगा की सर्वोच्च महिमा और माघ स्नान का फल

यह गंगा सदा पूज्य, पवित्र और पापों को हरने वाली है। भगवान विष्णु ने इसे सदा कल्याणकारी स्वरूप प्रदान किया है। यह दीन-दुखियों की माता और सभी को पवित्र करने वाली दिव्य नदी है। जैसे देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ हैं, वैसे ही नदियों में गंगा श्रेष्ठ हैं। जो लोग माघ महीने में नियमित रूप से गंगा स्नान करते हैं, उन्हें तीन सौ कल्पों तक कोई दुःख नहीं होता। जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है, वहाँ स्नान करने और उसका जल पीने से मनुष्य मुक्ति का अधिकारी बन जाता है—इसमें कोई संदेह नहीं है।

4. प्रत्येक कर्म को ईश्वर-सेवा बनाने की प्रार्थना

भगवान से प्रार्थना करते हुए मनुष्य को ऐसा कहना चाहिए—

  1. हे प्रभो! मैं जो आपकी कथाएँ कहूँ, वही आपकी स्तुति बन जाए।
  2. मैं जो भोजन करूँ, वही आपको अर्पित प्रसाद बन जाए।
  3. मैं जहाँ चलूँ, वही आपकी सेवा बन जाए।
  4. मैं जब शांति से सोऊँ, तो वह आपके चरणों में किया गया साष्टांग प्रणाम बन जाए।
  5. हे स्वामी! मैं जो कुछ भी करूँ, उससे आप प्रसन्न हों, क्योंकि आप ही समस्त संसार के स्वामी हैं।

5. यमुना और गंगा दर्शन से मुक्ति की प्राप्ति

यमुना जी का जल भी ऐसा है कि उसे देखने, प्रणाम करने, स्पर्श करने और धारण करने से सभी जीव मुक्ति को प्राप्त होते हैं।

  1. हे महानदी, सूर्यपुत्री यमुना! संसार की दरिद्रता, रोग, मृत्यु और दुःख से पीड़ित जीव तब तक भटकते रहते हैं, जब तक वे आपके नीले जल का दर्शन और स्पर्श नहीं करते।
  2. जिस गंगा जी का स्मरण लाखों योजन दूर से भी पापों का नाश कर देता है, जिनका नाम लेने से जीव पवित्र हो जाता है—उसी गंगा जी के दर्शन का मुझे सौभाग्य प्राप्त हो।
  3. जिस गंगा जी की उत्पत्ति से स्वर्गलोक की रचना हुई, जिनके तट पर स्नान, संध्या, तर्पण, देवपूजन, श्राद्ध और ब्राह्मण-भोजन करने से भगवान प्रसन्न होते हैं—इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

6. गंगा स्तुति और शरणागत की करुण पुकार

  1. हे देवी गंगे! आप परब्रह्म को भी आनंद देने वाली हैं। मेरे द्वारा अर्पित अर्घ्य को स्वीकार कर मेरे पापों का नाश करें।
  2. आपको बार-बार नमस्कार है। आप साक्षात धर्म का स्वरूप हैं, भगवान के चरणों के अमृत से उत्पन्न हुई हैं, दुःख-सागर से पार लगाने वाली हैं, देवता और मनुष्य सभी आपकी वंदना करते हैं।
  3. हे भागीरथी देवी! आपको मैं श्रद्धा सहित नमस्कार करता हूँ। हे स्वर्ग की नदी! हे पापों में डूबे जीवों का उद्धार करने वाली! हे जगत को पवित्र करने वाली गंगे! पापों से भयभीत मुझ शरणागत की रक्षा करें और मुझे पवित्र करें।

7. गंगा-प्राप्ति से नरक-भय का नाश और देवत्व की सिद्धि

  1. हे मेरे मित्र मन! तुम नरक के भय से क्यों डरते हो? यदि मैंने पाप पर्वत को भी नष्ट करने वाली गंगा को प्राप्त कर लिया है, तो मुझे नरक का भय क्यों हो? क्या मेरे पास धर्म रूपी महान धन नहीं है?
  2. जिस गंगा में स्नान करने से देवताओं की प्राप्ति होती है, जिसे देखकर अप्सराएँ प्रसन्न होती हैं। हे जह्नुकन्या! आपके जल में नियमपूर्वक स्नान करने से बड़े से बड़ा पापी भी देवत्व को प्राप्त कर लेता है, यह वेदों में प्रमाणित है।

8. इन्द्रियों की पवित्रता और गंगा-सेवा की मंगलकामना प्रार्थना

  1. हे मेरी बुद्धि! तुम्हारी सद्बुद्धि सदा बनी रहे।
  2. हे मेरे प्रिय मन! तुम्हारा कल्याण हो।
  3. हे मेरे दोनों पैर! आप सदा गंगा जी की सेवा में लगे रहें।
  4. हे मेरी आँखें! आपकी दृष्टि सदा शुभ बनी रहे।
  5. हे मेरी प्रिय वाणी और शरीर! आपके प्राण सदा बलवान रहें, क्योंकि आप सबके माध्यम से ही मैं अपार सुख और तीर्थों का पुण्य प्राप्त करता हूँ।

इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के छठे उत्तर खण्ड के उमापति नारद संवादान्तर्गत प्रयाग माहात्म्य वर्णन नामक तेइसवें अध्याय का हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। २३।।

Source: पद्मपुराण

ॐ नमः शिवाय 🙏 जय श्रीहरि 🙏

 

गंगा, यमुना और महानदी की प्रार्थना
गंगा, यमुना और महानदी की प्रार्थना